संगीत चिकित्सा
सुन-सुन-सुन... इलाज में म्यूजिक की धुन
कोरोना हो या घर या ऑफिस से जुड़ी बातें, ज़िंदगी में तनाव इतना बढ़ गया है कि मेंटल स्ट्रेस, डिप्रेशन, एंजाइटी से लेकर हिस्टीरिया, डिमेंशिया, फोबिया जैसी कई मानसिक बीमारियां शरीर में घर बना रही हैं। इन्हें दूर करने के लिए अकसर किसी डॉक्टर या साइकॉलजिस्ट के पास जाते हैं। इनके अलावा ऐसी बीमारियों को म्यूजिक थेरपी से भी दूर किया जा सकता है। म्यूजिक थेरपी के बारे में एक्सपर्ट्स से बात करके जानकारी दे रहे
हैं राजेश भारती
संगीत चिकित्सा दिवस (1 मार्च ) पर िवशेष
म्यूजिक थेरपी एक वह प्रक्रिया है जिसमें म्यूजिक थेरेपिस्ट म्यूजिक की मदद से टेंशन, मेंटल स्ट्रेस, डिप्रेशन, एंजाइटी जैसी मानसिक बीमारियों का इलाज करते हैं। इनमें कोई पसंद का गाना सुनना या सुनना भी आता है। दरअसल, म्यूजिक थेरपी वाइब्रेशंस की एक सीरीज है जो तरह-तरह का साउंड पैदा करती है। जब मरीज इन वाइब्रेशंस को सुनता है और महसूस करता है तो इससे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और शरीर में सकारात्मक बदलाव होते हैं यानी कह सकते हैं कि मरीज की बीमारी खत्म होती जाती है। म्यूजिक थेरपी से शरीर के 7 चक्र ऐक्टिव हो जाते हैं जो किसी भी बीमारी को दूर भगाने में सहायक होते हैं।
बीमारी के हिसाब से थेरपी
मनुष्य के कान 20 हर्ट्ज से 20 हजार हर्ट्ज फ्रीक्वंसी तक की साउंड वेव्स को सुन सकते हैं। म्यूजिक थेरेपिस्ट बीमारी के हिसाब से म्यूजिक की थेरपी देते हैं। बीमारी दूर करने के लिए जिस साउंड या म्यूजिक का इस्तेमाल किया जाता है, वह कुछ भी हो सकता है। मसलन तिब्बती बॉउल्स, कोई राग, गाना, किसी खास गाने का म्यूजिक, म्यूजिक के साथ कोई मंत्र आदि। ये सारे साउंड अलग-अलग हर्ट्ज पर सुनाए जाते हैं। मान लीजिए, अगर किसी शख्स को स्ट्रेस या किसी चीज का फोबिया है तो इसे दूर करने के लिए उस शख्स को 396 हर्ट्ज से 960 हर्ट्ज तक की साउंड वेव्स को सुनाया जाता है।
पसंद पर भी निर्भर करता है म्यूजिक
ऐसा नहीं है कि हर शख्स को ठीक करने के लिए कोई म्यूजिक जबरदस्ती सुनाया जाता है। जब वह इलाज के लिए आता है तो म्यूजिक थेरेपिस्ट पहले दिन ही पूछ लेते हैं कि शख्स को किस तरह का म्यूजिक पसंद है।
म्यूजिक थेरपी के फायदे
- पार्किंसन और अल्जाइमर में म्यूजिक थेरपी से सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। दरअसल, म्यूजिक के जरिए मस्तिष्क अपनी पुरानी बातों को जल्दी याद करता है। यही कारण है कि इससे पार्किंसन और ऐल्टशाइमर के मरीजों को जल्दी लाभ मिलता है।
- डिप्रेशन के असर को कम करने में भी म्यूजिक थेरपी काफी अहम रोल निभाती है। अगर कोई शख्स डिप्रेशन से ग्रस्त है और वह रोज कुछ समय के लिए अपना मनपसंद म्यूजिक सुने तो डिप्रेशन से आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम शब्दों और संगीत को महसूस कर कल्पना करने लगते हैं।
- म्यूजिक सुनने से कम्युनिकेशन स्किल भी सुधरती है। इससे मूड फ्रेश रहता है। कई बार हम अपनी पसंद के किसी खास गाने में खुद को रखते हैं और कई चीजों की कल्पना करते हैं। इससे हम अपनी बात को आसानी से दूसरे से कह पाते हैं।
- पसंद का संगीत सुनने से काम करने की क्षमता भी बढ़ती है। कई ऑफिस में स्पीकर्स लगे होते हैं जहां से धीमी आवाज में इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक सुनाई देता रहता है। इससे एम्प्लॉई का काम करने में ज्यादा मन लगता है। यही नहीं, कई लोग अपने काम से कुछ देर का ब्रेक लेकर पसंद की संगीत सुनते हैं तो ब्रेक के बाद काम करने की क्षमता बढ़ जाती है।
- बच्चों को म्यूजिक सिखाने की ट्रेनिंग देना भी काफी फायदेमंद होता है। इससे बच्चों में न सिर्फ पॉजिटिविटी आती है बल्कि वे किसी भी चीज को जल्दी सीख जाते हैं।
कई तरह की बीमारियां होती हैं दूर
म्यूजिक थेरपी की मदद से टेंशन, स्ट्रेस आदि ही नहीं बल्कि दर्द, ब्लड प्रेशर, स्ट्रोक, दिल से जुड़ी बीमारी, सिरदर्द और माइग्रेन जैसी समस्याओं का भी काफी हद तक समाधान किया जा सकता है।
खुद भी कर सकते हैं संगीत से इलाज
जरूरी नहीं कि म्यूजिक थेरपी के लिए किसी म्यूजिक थेरेपिस्ट के ही पास जाया जाए। जब भी आपको गुस्सा आए या मूड खराब हो तो अपनी पसंद का म्यूजिक या गाने सुनें। यह भी म्यूजिक थेरपी ही है। पसंद का म्यूजिक सुनने से मूड अच्छा हो जाता है।
- कोई भी म्यूजिक (नए गाने, पुराने गाने, म्यूजिक के धुन) जो आपको पसंद हो वो जरूर सुनें।
- रोजाना 15 मिनट अपनी पसंद का म्यूजिक जरूर सुनें।
- अगर म्यूजिक सुनने के लिए समय नहीं है तो ड्राइविंग करते समय या एक्सरसाइज करते समय भी म्यूजिक सुन सकते हैं।
- बेहतर होगा कि गाना सुनने के दौरान खुद भी गाएं। इससे दिल और दिमाग दोनों में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
20 मिनट भी हैं काफी
म्यूजिक थेरपी के लिए एक दिन में 20 मिनट काफी हो सकते हैं। हालांकि बीमारी के अनुसार इस समय को कम या ज्यादा भी किया जा सकता है। यह समय 21 मिनट से 45 मिनट तक का हो सकता है। इस दौरान मरीज को उसकी पसंद का म्यूजिक सुनाया जाता है। हो सकता है म्यूजिक थेरेपिस्ट उस शख्स से गाना लिखने या गाना सुनाने के लिए भी कह दे।
जीवनशैली का हिस्सा बनाएं
हर समय खुश रहने के लिए किसी एक खास साउंड या म्यूजिक को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। जब भी टेंशन या स्ट्रेस में आएं तो उस साउंड या म्यूजिक को सुनें। इससे 100% लाभ मिलेगा। पसंद का म्यूजिक सुनने से दिल और दिमाग, दाेनों सही रहते हैं। वहीं मन के खुश रहने से हर काम अच्छा होता है। म्यूजिक सुनने से स्ट्रेस जैसी कई बीमारियों को दूर रखा जा सकता है। म्यूजिक थेरपी न सिर्फ इलाज का तरीका है, बल्कि यह बचाव का भी तरीका है। शंख और मंदिर की घंटी की आवाज भी एक तरह से म्यूजिक थेरपी का काम करती है। अगर आपको शंख या घंटी की आवाज पसंद है और पूजा-पाठ करते हैं तो रोजाना पूजा के बाद शंख या घंटी जरूर बजाएं या इसका साउंड मोबाइल में भी सुन सकते हैं। यही नहीं, अगर आपको बारिश की बूंदों की आवाज पसंद है तो जब भी बारिश हो, बूंदों की आवाज सुनें। वहीं अगर किसी पक्षी की आवाज पसंद है तो किसी पक्षी को घर में रख सकते हैं।
मनोवैज्ञानिक इलाज से अलग है म्यूजिक थेरपी
अकसर कहा जाता है कि मानसिक इलाज (जिसमें साइकॉलजिस्ट या साइकाइट्रिस्ट की मदद ली जाती है) और म्यूजिक थेरपी लगभग एक जैसी चीज है। हालांकि इन दोनों में काफी फर्क है। कुछ अंतर इस प्रकार हैं:
- साइकाइट्रिस्ट इलाज में मरीज को टेंशन या स्ट्रेस जैसी दिमागी बीमारियों से बाहर निकालने के लिए दवा का भी इस्तेमाल किया जाता है, जबकि म्यूजिक थेरपी में कोई दवा नहीं दी जाती।
- अगर कोई शख्स किसी भी प्रकार की दवाई खा रहा है तब भी वह म्यूजिक थेरपी कर सकता है।
- साइकलॉजिस्ट आपके दिमाग को शांत करने का तरीका बताता है, जबकि म्यूजिक थेरेपिस्ट आपको बताता है कि आप म्यूजिक सुनने के बाद दिल और दिमाग का इस्तेमाल करें। म्यूजिक तब तक सुनें, जब तक की आपके सिर में दर्द न होने लगे।
नए अवतार में आवाज़ का जादू
फरवरी का गुलाबी महीना कई अहम दिन लेकर आता है। यूनेस्को की ओर से हर साल 13 फरवरी को ‘वर्ल्ड रेडियो डे’ मनाया जाता है। हर साल इसकी एक थीम होती है। इस बार की थीम है-‘रेडियो और भरोसा', सही मायनों में रेडियो आज भी संसार का सबसे भरोसेमंद संचार माध्यम बना हुआ है। अब इसका विस्तार पॉडकास्ट तक हो चुका है। आवाज़ की दुनिया के इसी खास सफर पर ले जा रहे हैं विविध भारती सेवा के उद्घोषक और फिल्म-संगीत-इतिहासकार युनूस ख़ान
रेडियो की दुनिया में यह तारीख
एक वक्त था जब देश-दुनिया की अहम खबरें पाने के लिए या क्रिकेट का मैच सुनने के लिए लोग छोटे-से डिब्बे से कान लगाए बैठे रहते थे। एक रेडियो से पूरा गांव या मोहल्ला दुनियाभर की जानकारी पा लेता था। इसी रेडियो के नाम है आज का दिन। स्पेन की रेडियो अकादमी ने साल 2010 में ‘विश्व रेडियो दिवस’ मनाने का प्रस्ताव रखा था और यूनेस्को ने इसे मंज़ूर कर 2012 को पहला रेडियो दिवस मनाया। इसके पीछे एक वजह यह है कि 13 फरवरी 1946 को यूनाइटेड नेशंस रेडियो की शुरूआत की गई थी। विश्व-युद्ध के बाद यह दुनिया के पुनर्निर्माण का समय था। हालांकि दुनिया में रेडियो की शुरूआत इससे बहुत पहले हो चुकी थी। न्यूयॉर्क में 13 जनवरी 1910 को दुनिया का पहला सार्वजनिक रेडियो प्रसारण हुआ। भारत में रेडियो इसके 17 बरस बाद आया। 23 जुलाई 1927 को मुंबई रेडियो-स्टेशन का उद्घाटन हुआ था। इसलिए 23 जुलाई को भारत में ‘राष्ट्रीय प्रसारण दिवस’ मनाते हैं।
आज़ादी के आंदोलन से रेडियो का रिश्ता
देश आज़ादी के 75 साल का जश्न मना रहा है। अगस्त 1942 में महात्मा गांधी ने ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’ का नारा देते हुए आंदोलन की शुरूआत की तो मुंबई के विल्सन कॉलेज की 22 साल की छात्रा उषा मेहता ने एक सीक्रेट रेडियो स्टेशन शुरू किया। 13 अगस्त 1942 को उन्होंने पहला अनाउंसमेंट किया, '42.34 मीटर पर हम भारत की किसी अनजान जगह से कांग्रेस रेडियो से बोल रहे हैं।' वहीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 1942 में आज़ाद हिंद रेडियो का जर्मनी से प्रसारण शुरू किया। विश्व-युद्ध की वजह से बाद में आज़ाद हिंद रेडियो को सिंगापुर और रंगून ले जाया गया। इस रेडियो पर अंग्रेजी, हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, पंजाबी, पश्तो और उर्दू प्रसारण होता था।
जब महात्मा गांधी पहुंचे आकाशवाणी स्टूडियो
आज़ादी मिलने के बाद 11 नवंबर 1947 को महात्मा गांधी को पाक से आकर कुरुक्षेत्र के शरणार्थी कैंपों में रह रहे लोगों से मिलने जाना था। किसी वजह से कार्यक्रम रद्द हुआ तो उन्होंने आकाशवाणी से इन लोगों को संबोधित करने का फैसला किया। बापू इस दिन पहली और आखिरी बार आकाशवाणी आए थे। यह ऐतिहासिक रिकॉर्डिंग आकाशवाणी के यूट्यूब चैनल पर मौजूद है। आकाशवाणी की अनमोल ‘सिग्नेचर-ट्यून’ को बनाया था चेकोस्लोवाकिया के कंपोज़र वॉल्टर कॉफ़मैन ने। 30 के दशक में वॉल्टर कॉफ़मैन मुंबई आकाशवाणी के वेस्टर्न म्यूजिक डिपार्टमेंट में कंपोज़र थे। कुछ विद्वान यह भी कहते हैं कि ‘राग शिवरंजनी’ पर आधारित इस धुन में ब्रह्मांड में गूंजते ओंकार-नाद का सा स्वर है। जब देश आजाद हुआ तो सिर्फ 6 रेडियो स्टेशन थे। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नै, लखनऊ और त्रिचरापल्ली।
वॉल्व वाला ट्रांजिस्टर और झुमरी तिलैया
एक ज़माना वॉल्व वाले ट्रांजिस्टर का था, जिसके साथ एक जालीदार एंटीना ऊंचाई तक खींचा जाता था। तब जाकर बीबीसी और रेडियो सीलोन जैसे रेडियो स्टेशन उतार-चढ़ाव भरी आवाज़ में सुनाई देते।। रेडियो पर हॉकी और क्रिकेट की कमेंट्री सुनने का अलग ही रोमांच था। रास्ते चलते लोग पूछते, ‘भैया स्कोर क्या हुआ है?' रेडियो पर नाटक, झलकियां, वार्ताएं, समूह-गीत, कविता-पाठ और शास्त्रीय-संगीत का प्रसारण होने लगा। 3 अक्टूबर 1957 को शुरू हुई ‘विविध भारती’ और फ़रमाईशी फिल्मी-गीतों का कार्यक्रम शुरू हुआ। यहीं से ‘झुमरी तिलैया’ एक मिथक बन गया। कभी बिहार का हिस्सा रही यह जगह अब झारखंड के कोडरमा जिले से 6 किलोमीटर दूर है। यहां से विविध भारती पर फ़रमाईशें भेजनेवालों में रामेश्वर प्रसाद बर्णवाल, गंगा प्रसाद मगधिया और नंदलाल सिन्हा जैसे कई श्रोताओं के नाम नियमित रूप से प्रसारित हुए।
...और फिर रेडियो का जमाना भी बदला
अब रेडियो तेज़-तर्रार एफ़एम बन गया है, जिसका मक़सद है ‘बोलो और गाना सुनाओ’। 15 से 25 साल की पीढ़ी पर फोकस है। ज़्यादातर नये या थोड़े पुराने चर्चित गाने एफएम पर गूंजते रहते हैं। देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में कई प्राइवेट रेडियो-स्टेशन हैं। यहां फरमाईशें फोन, ईमेल, फेसबुक पेज वगैरह पर आती हैं। रेडियो अब मोबाइल पर, गाड़ी में और इंटरनेट या ऐप के ज़रिए ज़्यादा सुना जा रहा है। आकाशवाणी के ऐप NewsOnAir के जरिये दुनिया के किसी भी हिस्से में विविध भारती और आकाशवाणी केंद्रों को सुन सकते हैं। यह एंड्रॉइड और IOS दोनों पर मौजूद है। आज के युवा आरजे (रेडियो-जॉकी) सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों की आंखों के तारे हैं। इससे पहले ऐसा दौर भी था जब लोग नहीं जानते थे कि देवकीनंदन पांडे, जसदेव सिंह, अमीन सायानी या कब्बन मिर्ज़ा दिखते कैसे हैं। कभी रेडियो के ज़रिए मानक हिंदी सीखी जाती थी। लेकिन नए ज़माने के रेडियो में छोटी-छोटी कहानियां हैं, ट्रिविया भी है, शेरो-शायरी, सवाल-जवाब हैं।
ऑडियो की दुनिया का हो रहा विस्तार
भागदौड़ के इस जमाने में जब लोगों के पास वक्त कम है तो ऑडियो में अपार संभावनाएं हैं। इसलिए रेडियो की दुनिया का जबरदस्त विस्तार हुआ है। पॉडकास्ट का माध्यम रेडियो से ही प्रेरित है। पॉडकास्ट की दुनिया में तरह-तरह के प्लैटफॉर्म मौजूद हैं। कुछ इंटरनैशनल हैं और कुछ भारतीय। भारत में आवाज़ डॉट कॉम, ख़बरी, स्पूलर, हेडफ़ोन, ऑडियोमेटिक, सुनो इंडिया, जियो सावन, विंक और गाना जैसे प्लैटफॉर्म मौजूद हैं। पॉडकास्ट के जो इंटरनैशनल प्लेटफॉर्म हैं उनमें स्पॉटिफ़ाइ, गूगल पॉडकास्ट, ट्यून-इन, साउंड-क्लाउड, ऑडिबल, स्टिचर, एंकर, एपल पॉडकास्ट, ब्लूबरी वगैरह शामिल हैं। यहां अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग विषयों पर अपना पॉडकास्ट होस्ट कर सकते हैं। ‘गाना’ इस वक्त सबसे बड़ा भारतीय प्लैटफॉर्म है जिसके सब्स्क्राइबर्स का आंकड़ा करीब 18.5 करोड़ का है। हब-हॉपर पॉडकास्ट की दुनिया में भारतीय स्टार्ट-अप कंपनी है, जो 15 भाषाओं में पॉडकास्ट होस्ट करती है और इसके क़रीब 1 करोड़ सब्स्क्राइबर्स हैं। पॉडकास्ट के कुछ प्लैटफार्म मुफ्त हैं जबकि कई ऐसे ऐप हैं जिन्हें एक तय रकम देकर सब्स्क्राइब करना होता है तभी पॉडकास्ट सुन सकते हैं। चीन, अमेरिका के बाद भारत सबसे बड़ा पॉडकास्ट बाज़ार है। प्राइस-वॉटरहाउस कूपर्स (PwC) के मुताबिक अगले 5 बरसों में भारत में हर महीने पॉडकास्ट सुननेवालों की तादाद में 30 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हो सकती है। डिलॉइट की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 2018 में मोबाइल फोन के 1.19 अरब यूजर्स थे। साल 2025 तक ऑडियो स्ट्रीमिंग का बाजार 1.1 अरब डॉलर का होने जा रहा है। अब किताबें भी ऑडियो रूप में आ रही हैं। स्टोरी-टेल और ऑडिबल सब्स्क्रिप्शन आधारित प्लैटफार्म हैं।
बलराज साहनी से आयुष्मान तक रेडियो
कई फ़िल्मी सितारे रेडियो से जुड़े रहे हैं। बलराज साहनी बीबीसी में काम करते रहे। सुनील दत्त रेडियो सीलोन के हिंदी विभाग में अनाउंसर थे। संगीतकार रोशन आकाशवाणी दिल्ली में कंपोज़र थे जबकि संगीतकार मदनमोहन आकाशवाणी लखनऊ में प्रोग्राम असिस्टेंट थे। संगीतकार रघुनाथ सेठ आकाशवाणी इलाहाबाद में काम करते थे। जानी-मानी फ़िल्म लेखिका अचला नागर, गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा, गायक कब्बन मिर्ज़ा और गीतकार अहमद वसी सभी का ताल्लुक विविध भारती से रहा है। अमिताभ बच्चन रेडियो के ऑडिशन में फेल हो गए थे। आज के ज़माने के नामी सितारे आयुष्मान खुराना बरसों तक एक प्राइवेट रेडियो स्टेशन में आरजे रहे।
नवभारत गोल्ड' पॉडकास्ट तेजी से उभरा
अब अखबारों ने भी अपना पॉडकास्ट शुरू किया है। नवभारत टाइम्स का 'नवभारत गोल्ड' एक बेहतरीन पॉडकास्ट के रूप में उभरा है, जहां आप ख़बरें, खास रिपोर्ट, इंटरव्यू और साहित्य की अनूठी सामग्री सुन सकते हैं। साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ ने भी अपना ऑडियो अंक शुरू किया है। डिजिटल प्लेटफ़ार्म ‘बिंज’ और ‘नॉटनल’ ने साहित्य को डिजिटल फ़ॉर्मेट में मुहैया करवाया है। ऑडियो की दुनिया का फ़ायदा यह है कि मान लीजिए आपको उर्दू, हिंदी, अंग्रेज़ी या कोई भाषा पढ़नी नहीं आती पर इन्हें समझ लेते हैं तो ये रचनाएं आपकी पहुंच में आ जाती हैं। इसके अलावा टहलते, यात्रा करते, आराम करते हुए आप इन्हें मज़े से सुन सकते हैं।
आवाज़ के हैं नए-नए मंच
इंटरनैशनल प्लैटफॉर्म
स्पॉटिफ़ाइ, गूगल पॉडकास्ट, ट्यून-इन, साउंड-क्लाउड, ऑडिबल, स्टिचर, एंकर, एपल पॉडकास्ट, ब्लूबरी आदि।
भारतीय प्लैटफॉर्म
नवभारत गोल्ड, गाना, विंक, जियो सावन, आवाज़ डॉट कॉम, ख़बरी, स्पूलर, हेडफ़ोन, ऑडियोमेटिक, सुनो इंडिया आदि
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साहित्यिक मंच
स्टोरी-टेल और ऑडिबल, ‘बिंज’ और ‘नॉटनल’। साहित्यिक पत्रिका हंस’ का ऑडियो अंक।
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सबसे अच्छा रेडियो कार्यक्रम वह होता है जिसे सुनने वाले देख सकें। जी हां बहनो और भाइयो, एक अच्छे रेडियो कार्यक्रम को सुनकर श्रोता के दिलो-दिमाग़ में कल्पना की एक तस्वीर तैयार हो जाती है और यही उस प्रोग्राम की कामयाबी है।
-अमीन सायानी, मशहूर अनाउंसर
जब मैं स्कूल में था तो सब जानते थे कि यह देवकीनंदन पांडे के बेटे हैं। मेरे पिता आवाज़ से ही पहचाने जाते थे। हिंदी क्लास में गलती करने पर टीचर कहते थे कि यह देवकीनंदन पांडे के बेटे होकर ग़लत हिंदी बोल रहे हैं। घर में भी पिताजी ग़लत शब्द का इस्तेमाल बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। वह फ़ौरन टोक देते थे।
-सुधीर पांडे (न्यूज रीडर देवकीनंदन पांडे के बेटे और ऐक्टर)
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