फैमिली ट्री

फैमिली ट्री के माली
आमतौर पर लोगों को अपने दादा, परदादा तक का इतिहास ही पता होता है लेकिन उनसे पहले की पीढ़ियों का इतिहास? वे किस जगह से आए और किस वंश से जुड़े हैं, यह जिज्ञासा बहुत-से लोगों के मन में होती है। लेकिन अधिकतर लोगों को यह पता नहीं होता कि कहां से उन्हें अपने फैमिली ट्री की सही जानकारी मिलेगी। आज यह जानना हैरत की बात हो सकती है कि जिस दौर में कंप्यूटर भी नहीं था, तब भी यह इतिहास बहुत सलीके से संजोया जाता था। हम कहां से अपनी वंशावली का पता कर सकते हैं और यह इतिहास कैसे संभालकर रखा जाता है, इस बारे में खास रिपोर्ट पेश कर रहे हैं मोहित अग्रवाल

ऐसे मिलता है किसी शख्स का इतिहास

किसी भी शख्स से जुड़े इतिहास का पता लगाने के लिए उसके वंश को आधार बनाया जाता है। कौन किस वंश का है यह जानने के लिए वंशावलियों का सहारा लिया जाता है। वंशावली ही ऐसा दस्तावेज है जिसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने दिवंगत पूर्वजों से लेकर मौजूदा पीढ़ी तक के नाम सहित वर्णन होता है। कोई शख्स अगर किसी तीर्थ पर जाकर अपने इलाके का पंडा खोजकर वंशावली में अपने परिवार के सदस्यों की जानकारी दर्ज करवाता है तो वह उसी पंडे से अपने पूर्वजों की जानकारी भी ले सकता है। इससे पता चल जाता है कि 4-5 पीढ़ी पहले या उससे भी पहले यानी 150-200 साल पहले उनके परिवार से जुड़ा कौन शख्स वहां आया था, उसके परिवार में कितने लोग थे, क्या कामकाज करते थे आदि। 
वंशावली में सिर्फ पूर्वजों के नाम ही नहीं होते। इससे फलां शख्स का वंश, जाति, गोत्र, पूर्वजों के नाम, उनकी जगह, मूल निवास, उनके काम, तत्कालीन परिस्थितियों की भी पूरी जानकारी मिल जाती है। मोटे तौर पर कहें तो वंशावली से हम पूर्वजों के गौरव, परंपरा, विरासत और महत्व की जानकारी भी मिल सकती है। ये वंशावलियां वजन में कई-कई किलो की होती हैं। कुछ वंशावलियां वजन तो 25-25 किलो तक हो चुका है। यह इतिहास संजोने का ऐसा सिस्टम है जिसे देख विकसित देश भी हैरत में पड़ जाते हैं। दुनियाभर में गिने-चुने देश हैं जो वंशावली रेकॉर्ड दर्ज करने के लिए रजिस्टर तैयार करते हैं। लेकिन वंशावलियां को पांडुलिपियों या बही में रेकॉर्ड करके रखने का भारत जैसा सिस्टम दूसरी जगह नहीं है।

हाथ से बही लिखने की परंपरा 

इतिहास केवल सम्राटों का नहीं बल्कि हर शख्स का होता है, देश के हरेक निवासी का होता है। वंशावली लेखन का काम सदियों से होता आ रहा है। अब सवाल उठता है कि ये वंशावलियां कहां रखी होती हैं? अगर हम अपनी वंशावली देखना चाहें तो कहां से देख सकते हैं? तो बता दें कि हमारी वंशावलियां देश के अलग-अलग तीर्थस्थानों पर मिल जाती है। उस तीर्थ पर जाने वालों की वंशावलियां, उनकी जाति, गोत्र और वंश के रेकॉर्ड के तौर पर लिखित रूप में रखी जाती हैं। ये वंशावलियां पूरी तरह से हाथ से लिखी हुई होती हैं। कुछ वंशावलियां तांबे और ताड़पत्र की भी मिल जाती हैं।

तीर्थ से पंडों और यजमान का संबंध

अगर आप यह सोच रहे हैं कि इतनी सारी वंशावलियों को संभालता कौन है? तो बता दें कि सदियों से तीर्थ पुरोहित यह काम करते आ रहे हैं। बदरीनाथ, सोमनाथ, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम सहित लगभग सभी प्रमुख तीर्थस्थानों पर रहने वाले पुरोहित कई पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं। इन तीर्थों पर पिंडदान और अस्थि विसर्जन आदि भी होता है। वहां रहने वाले पुरोहित या पंडों के पूर्वज भी यही काम करते थे। इसलिए हमारे रेकॉर्ड सिर्फ हमारी ही नहीं, बल्कि उनकी भी विरासत का हिस्सा हैं। पंडों के परिवारों पर इस विरासत को संभालने का जिम्मा है। भारत की हर दिशा में तीर्थ हैं, जहां अस्थि विसर्जन होता है और पितरों की गति कराई जाती हैं। इनमें कुरुक्षेत्र का पिहोवा, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, प्रयागराज, नासिक, कोलकाता आदि हैं। पिहोवा तीर्थ बेशक ज्यादा चर्चा में नहीं लेकिन उसकी मान्यता काफी है। यहां भगवान राम के वंश के राजा पृथु ने अपने मृत पिता का तर्पण किया था। इस जगह सरस्वती नदी की 7 धाराएं थीं। यह भी माना जाता है कि जो लोग गयाजी में पूर्वजों का पिंडदान या श्राद्ध करने नहीं जा पाते, वे हरियाणा के पिहोवा स्थित पृथूदक तीर्थ पर आकर पिंडदान करते रहे हैं। यहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान के इलाकों से आने-वाली हिंदू महिलाओं का उल्लेख भी मिलता है। अग्रवाल, अरोड़ा, खत्री, ब्राह्मण, राजपूत सहित अनेक जातियों की वंशावली यहां देखी जा सकती हैं। 

संभालकर ऐसे रखते हैं सात पुश्तों का पक्का चिट्ठा

वंशावलियों में नाम और जानकारी दर्ज करना अपनेआप में अनूठा काम है। इसमें दर्ज जानकारी भी सटीक होती है। सबसे अहम है इन पुरोहितों या पंडों के काम का तरीका। किस यजमान के परिवार का हिसाब कौन-सा पंडा रखता है, इसे बेहद सलीके से बांटा जाता है। इसीलिए इनसे इलाका, वंश, गोत्र, जाति आदि के आधार पर मिलनेवाली जानकारी बिलकुल सही निकलती है। मान लें कि  हरियाणा के किसी गांव का मूल निवासी दिल्ली से हरिद्वार जाएगा तो हरिद्वार में उस गांव और उसके संबंधित तीर्थ पुरोहित से संपर्क करके अपनी जाति, वंश और गोत्र की जानकारी देगा। तब पुरोहित उस गांव की बही खोलकर बता देंगे कि उनसे पहले उनके परिवार से कौन लोग यहां आ चुके हैं। यजमान पहले अपने उन पूर्वजों के नाम बताते हैं जो उन्हें याद हैं। उसी आधार पर बही में लिखी जानकारी से मिलान किया जाता है। जब जानकारी की पुष्टि हो जाती है तो बाद की पीढ़ियों के नाम जोड़ दिए जाते हैं। इसीलिए वंशावली दर्ज करने की खातिर लंबी बहियां बनाई जाती हैं। इन्हें लपेट कर रखा जाता है। पुरोहित विनोद कुमार पचौली, राम शर्मा और श्रीभगवान गोछीकार ने बताया कि कैसे वे अपनी बही को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हैं। वह बताते हैं कि बहियों को साल में दो बार धूप भी दिखाई जाती है। बही पर कीटनाशक तेल लगाया जाता है, जिल्द कसी जाती है, नए पेज लगाए जाते हैं। अगर कभी ऐसा लगता है कि कागज खराब होने लगा है तो उसके पीछे नया कागज चिपका दिया जाता है। कई बार तो पूरी बही नए सिरे से तैयार करनी पड़ती है। पुरानी बही के जरूरी हिस्से नई बही पर चिपकाए जाते हैं। 

पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलता है यह वृक्ष

-हरिद्वार में वंशावली तैयार करने का काम करने के काम में ढाई हजार पुरोहित लगे हैं। हमने अलग-अलग जगहों के कुछ पुरोहितों से बातचीत की तो पता चला उनके परिवारों को लोगों की वंशावली सहेजते-बनाते 250 से लेकर 500 साल तक हो चुके हैं। अब उनकी मौजूदा पीढ़ी इस काम में जुटी है। 
- पिहोवा, हरियाणा में पुरोहित का काम करने वाले 62 साल के विनोद पचौली ने बताया कि उनके परिवार में 12-13 पीढ़ियों से तीर्थ पुरोहिताई का काम होता है। उनके पूर्वज 'पचौली समूह' के रूप में 'सात परिवार संधोली गांव' से साल 1725 में यहां आए थे जो अब बढ़ते हुए 250 परिवार हो चुके हैं।
- ओड़िशा के जगन्नाथपुरी में 39 साल के श्रीभगवान गोछीकार पिछले 27 साल से भगवान जगन्नाथ के सेवाधिकारी और तीर्थ पुरोहित हैं। उन्होंने बताया कि यहां बांग्लादेश, पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भी तीर्थयात्री आते हैं। यहां 7 पीढ़ियों तक की जानकारी मिल जाती है। उनका पुराना रिकॉर्ड मुड़िया लिपि में था। लेकिन अब स्थानीय उड़िया भाषा में दर्ज होता है। कहीं-कहीं यजमानों के पुराने हस्ताक्षर उर्दू में किए हुए मिलते हैं। 
- प्रयागराज में रहनेवाले राम शर्मा 50 साल के हो चुके हैं। वह बताते हैं कि उनके पूर्वज पिछले 500 साल से इसी काम में जुटे हैं। वहां करीब 300 साल पुरानी धर्मशाला है, जिसे दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के अग्रवालों व ब्राह्मणों ने बनवाया था।

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वंशवृक्ष की जड़ें जानें

Q पुरानी बही को सुरक्षित करने के लिए इन्हें डिजिटाइज करने की कोशिश हुई है?
A कागज के जलने और कीड़ा लगने का खतरा रहता है इसलिए डिजिटाइज करना बेहतरीन उपाय है। हरिद्वार और पिहोवा में कहीं-कहीं पर इन बहियों को डिजिटाइज करके संरक्षित करने की कोशिश भी शुरू हो गई है। 

Q अपनी जड़ें जानने के लिए क्या करें?
A अगर आपके मन में भी अपने पूर्वजों के नाम व उनसे जुड़ी जानकारी जानने की इच्छा है तो सबसे पहले यह पता करें कि आपके पूर्वज किन तीर्थों की यात्रा पर गए थे या पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन कहां हुआ था। इन दोनों में से किसी एक जगह या दोनों जगह जानकारी जरूर मिलेगी। कुछ लोग अपनी यात्रा की सूचना बही में नहीं लिखवाते। बही में न लिखवाने की वजह से जानकारी नहीं मिलती। बही में सिर्फ उन यात्रियों की जानकारी होती है, जो खुद अपनी जानकारी लिखवाते आ रहे हैं। 

Q पंडे या पुरोहित जानकारी कैसे देते हैं
A तीर्थस्थल पर इलाके के तय पंडे या पुरोहित के पास ही वंश की जानकारी मिलती है। पंडे का बंटवारा होने पर उनके हिस्से में अलग-अलग स्थान की बही आती हैं, जिसका प्रबंधन वही करते हैं। पुरोहित ऐसी जानकारी लेने के लिए या जानकारी लिखते वक्त कोई फीस नहीं लेते। यजमान की अपनी इच्छा और पुरोहित से मिलने वाली जानकारी के हिसाब से ही उन्हें दक्षिणा देते हैं। कुछ पंडे अपने यजमानों को पीढ़ियों के नाम लिखकर देते हैं तो कुछ केवल उसके बारे में बता देते हैं। यजमान चाहे तो अपने पूर्वजों की जानकारी नोट कर लें या उसकी तस्वीर खींच लें। फोटो स्टेट कराने का सिस्टम नहीं चलता। इन तीर्थ पुरोहितों की आजीविका इसी से चलती है। कई बार ऐसा भी होता है कि यजमान पंडे को बेहद मामूली दक्षिणा देते हैं तो ऐसी भी बातें सुनने में आती हैं कि पंडों ने जानकारी देने के बदले बहुत ज्यादा दक्षिणा की मांग कर दी। वंशावलियां पुरोहित और यजमान दोनों की विरासत हैं तो उन्हें एक-दूसरे का ख्याल रखना चाहिए। 


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