रंग क्या है?
हो जा रंगीला रे...
हमारी धरती पर कुदरत ने अनूठे रंग बिखेरे हैं। लेकिन कुछ रंग अब पहले जैसे नहीं रहे। विकास के क्रम में हजारों पक्षी और जानवरों की प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक करीब 1 लाख जानवरों और पौधों की प्रजातियां अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। उनके गायब होने की गति पहले से कई गुना तेज है। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम का अंदाजा है कि इंसानी वजहों से करीब 83 फीसदी जंगली स्तनधारियों और आधे पौधों का सफाया हो चुका है। मानवीय गतिविधियों से जंगल सिमट रहे हैं। स्तनधारी जीवों, पक्षियों, सरीसृपों आदि की आबादी में साल 1970 के बाद से अब तक करीब 68 फीसदी की कमी आ गई हैं। वन्य जीवों का शिकार, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन आदि इसकी वजह हैं। लेकिन कुदरत ने हर जीव को किसी न किसी योगदान के लिए तैयार किया है। उनका जीवन जरूरी है। लेकिन हम कुदरत के काम में दखल देते हैं। कई जीवों का अस्तित्व हमारी वजह से खतरे में है। हमें कुदरत की बनाई जादुई और रंगीन दुनिया के बारे में जागरूक होना होगा। यहां एक्सपर्ट रंगों की उस दुनिया की बात कर रहे हैं जिसमें पौधे और जीव-जंतु आपस में बात करते हैं:
'हमें नहीं मिली हरेक रंग देखनेवाली नजर'
होपी होकस्ट्रा अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इवोल्यूशनरी बायोलॉजिट्स हैं। सृजना मित्रा दास से हुई इस खास बातचीत में वह बता रही हैं कि पक्षियों और जीव-जंतुओं में इतने रंग कैसे आए और अब कैसे आदमी कुदरत के रंगों में हेरफेर कर रहे हैं:
Q आपकी रिसर्च किस बारे में है?
A जब हम लैब में रिसर्च करते हैं तो एक सवाल सारी रिसर्च को एक जगह ले आता है कि कैसे जीव खुद को पर्यावरण के अनुकूल बना लेते हैं। हमारे काम में डिवेलपमेंट से लेकर इकोलॉजी तक और न्यूरोसांइस से लेकर जेनेटिक्स तक का क्षेत्र शामिल होता है।
Q हम पक्षियों और जानवरों में जो रंग देखते हैं क्या इसके पीछे विकास से जुड़ी वजह है?
A रंग से हम उनमें फर्क कर पाते हैं। उनके जीवन और आकर्षित करने की क्षमता जिससे कि वे फिर उत्पादन कर पाएं, ये दो डार्विन विज्ञान संबंधी वजहें हैं। सबसे खूबसूरत तथ्य है कुदरत के दिए अलग-अलग रंगों के पैटर्न।
Q रंग के मामले में बाकी जीव क्या वाकई बहुत जल्दी विकसित हो गए?
A शायद ऐसा इसलिए हुआ कि रंगों का विकासवादी फिटनेस पर गहरा असर पड़ता है। हमने कई जगह अध्ययन किया। हमने पाया कि रंगों का फर्क कुछ हजार बरसों पहले ही विकसित हुआ है। हमने फील्ड वर्क में भी दिखाया कि कुछ मुट्ठीभर पीढ़ियों पहले रंगों का विकास हुआ था। हमने जीवों के पूरे शरीर का अध्ययन किया। चूहे को देखें, आमतौर पर भूरे रंग का होता है लेकिन अमेरिका के फ्लोरिडा में समुद्र तट के पास रहनेवाले चूहों ने सफेद रंग विकसित कर लिया। शायद इसलिए की रेत के रंग से मिलते-जुलते दिखें। वास्तव में रंग उनके लिए बेहद जरूरी है।
Q रंगों के ऐसे कौन-से काम हैं जो कुदरत में ज़िंदा रहने के लिए जरूरी हैं?
A रंगों के कई काम होते हैं। सबसे पहला काम है कि शिकारी को छलावा दे सकते हैं। जानवर इसकी वजह से शिकारी की निगाहों में नहीं आते। इससे शिकार की ज़िंदगी बच जाती है। दूसरा अहम काम है, अपने साथी को रिझाना। पक्षी खासतौर पर नर पक्षी रंगों से हैरतअंगेज स्तर तक भी दिखावा कर सकते हैं, साथ ही उनकी हरकतें, बर्ताव भी उस दिखावटीपन को जाहिर करती हैं। रंग का इस्तेमाल खतरे का संकेत देने के लिए भी होता है। जब कोई जहरीला जीव सामने खड़ा हो तो वह काफी चमकीला दिख सकता है। यह चमक और रंग जहर का संकेत देते हैं। जैसे जहर फेंकने वाले मेंढक। पौधों की दुनिया में रंग परागण को आकर्षित करने के लिए विकसित हुए।
Q क्या ये रंग इंसानों की आंखों से छुपे हुए होते हैं?
A हां, हम इंसान इस दुनिया को अपने खास विजुअल सिस्टम से देखते हैं और बाकी जीव अपने विजुअल सिस्टम की मदद से देखते हैं। वहां रंगों की पूरी छुपी हुई दुनिया है। कुदरत में रंगों के इतने पैटर्न हैं कि हम नहीं देख सकते लेकिन बाकी जीव देख सकते हैं। जानवर अक्सर इंसानों की तुलना में व्यापक रंगों को देख लेते हैं। तितलियां और पक्षी अल्ट्रावॉयलेट (यूवी) रंगों को भी देख सकते हैं जबकि इंसान नहीं। दरअसल जीवों में उस विशेष वातावरण में रहने के लिए जरूरी फिटनेस पाने की खातिर विजुअल सिस्टम विकसित हो जाता है। मैं अपने स्टूडेंट्स को भी बताती हूं कि रंगों के विकास के बारे में सोचते हुए बहुत अलर्ट रहना चाहिए क्योंकि हमारा विजुअल स्पेक्ट्रम जो दिखाता है वही हम देख पाते हैं जबकि यह धरती की दूसरी प्रजातियों से अलग है।
Q हम इंसानों को रंगों की अनूठी दुनिया के बारे में किस तरह सोचना चाहिए?
A यह सबसे खास बात है जो हमें विविधता की सराहना करना सिखाती है। कुदरत के रंगों में से हमें सीमित हिस्सा देखने को मिलता है। यहां छिपी हुई जैव विविधता भी है जिससे हम अनजान है। बहुत-से प्राणी पर्यावरण के हिसाब से रंग बदल लेते हैं। जानवरों की कुछ प्रजातियां जो मौसम के मुताबिक रंग बदलती थीं, उनमें अब अलग किस्म के बदलाव देखे जा रहे हैं। इसमें इंसानी प्रभाव भी है जो जानवरों को प्रभावित कर रहा है। स्नो हॉर्स सर्दियों में सफेद और गर्मियों में भूरे रंग के हो जाते थे। अब सर्दियां छोटी हो रही हैं, बर्फ कम होती जा रही है। इसका पूरे परिदृश्य पर फर्क पड़ा है। कुछ चमकीली मछलियां अब नहीं दिखती। कुछ मछलियों के रंग और रंगों के पैटर्न गायब हो गए हैं।
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'पौधे और जानवर रंगों की वजह से करते हैं आपस में बातें'
किम वैलेंटा अमेरिका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में इवोल्यूशनरी इकॉलजिस्ट हैं। वह बता रही हैं कि कैसे पौधे अपने प्रसार और बढ़ोतरी के लिए रंगों का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही पक्षियों को कितने रंग दिखते हैं:
मेरी रिसर्च यह समझने के लिए है कि पौधे और जानवर आपस में कैसे बात करते हैं। पौधे जानवरों की जरूरतों को पूरा करते हैं लेकिन इससे उनका प्रसार भी होता है। वैसे तो पौधे हिल भी नहीं सकते इसलिए उनकी सारी एक्टिविटी संकेत देने में दिखती है। वह जानवरों को मदद के लिए संकेत देते हैं और इस तरह वे बात करते हैं। दरअसल सभी फल पौधों के प्रसार का साधन होते हैं। वे जानवरों को आकर्षित करते हैं, जिससे वे फल खाएं और बीजों को यहां-वहां फैला दें। यह एक पारस्परिक रिश्ता है जो कुदरत ने उन्हें दिया है। पौधों को जीवन बढ़ाने वाली सेवा मिलती है और जानवरों को पोषक तत्वों से भरपूर फल। जानवरों को इस काम का संकेत देने के लिए पौधे रंगों का इस्तेमाल करते हैं। इस काम में कई तरह के जीवों की प्रजातियां शामिल होते हैं।
कुछ जानवर सिर्फ काला या सफेद देखते हैं। ये काफी हद तक रात में घूमने वाले जानवर होते हैं और इन्हें रंगों की समझ नहीं होती। दिन में घूमने वाले जानवर आमतौर पर स्तनधारी या कई रंगों वाले होते हैं। ये पीले और नीले में अंतर कर सकते हैं लेकिन लाल और हरे में नहीं। लेकिन पक्षी उन रंगों को भी देख सकते हैं जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इस बारे में रिसर्च करते हुए हम रंगों की मात्रा तय करते हैं। स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए हम पता लगा सकते हैं कि कौन-सा फल रोशनी की किस वेवलेंथ को दिखा रहा है।
हम यह भी देख सकते हैं कि पकने पर फल का रंग किस नजरिये से बदलेगा। हमने रंगों और जीवों के बीच बड़ा मजेदार तालमेल देखा है। वे हरे रंग की पत्तियों के बीच से फलों को तितर-बितर कर देते हैं। फलों का अलग रंग जानवरों को आकर्षित करने का संकेत देता है। केला एक दिलचस्प उदाहरण है। आमतौर पर हम पके केले का सिर्फ पीला रंग देखते हैं लेकिन पक्षियों को पीले रंग के अलावा भी उसके कई रंग दिखते हैं। पक्षी अल्ट्रावॉयलेट रंगों को देख सकते हैं। उनके लिए सबसे वाइब्रेंट रंग है इलेक्ट्रिक ब्लू। इसलिए अल्ट्रावायलेट रोशनी पक्षियों को आकर्षित करने का अच्छा संकेत हैं। इसकी वजह से ही पक्षी फलों की ओर आते हैं और भारी मात्रा में उनका प्रसार करते है।
मेडागास्कर में अपनी रिसर्च में मैंने पाया कि जो फल अलग-अलग प्रजातियों ने यहां-वहां फैलाए उनमें नीले रंग की ओर झुकाव था। इसलिए सभी पक्षियों और स्तनधारी जीवों ने उन्हें देखा और उनका प्रसार किया। विकासवादी इतिहास से भी पता चलता है कि जानवर और पक्षी नीले रंग से खुद को आकर्षक दिखाते हैं। हालांकि अब रंगों की यह दुनिया सिमट रही है। कुछ फल और जानवर अब विलुप्त हो गए हैं। कुछ पौधे शायद अब भी हैं लेकिन वे सभी जीव अब नहीं रहे जिन्हें उन्होंने कभी अपनी ओर बुलाया था।
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कुदरत के रंग
-ध्रुवीय भालू के सफेद फर होते हैं जिससे वे वातावरण में खुद को छिपा सकते हैं। लेकिन इस भालू की त्वचा का रंग असल में काला ही होता है। सफेद उसके फर होते हैं। ये भालू 10 फुट तक ऊंचे होते हैं। ये पूरी तरह से सफेद दिखते हैं क्योंकि उनके घने बालों को हवा इस तरह बिखरा देती है कि त्वचा नहीं दिखती। भालू का यह बर्फ जैसा सफेद रंग उन्हें बर्फ से ढके आर्कटिक में छिपा देता है।
-मोर के पंख अपनी सुंदरता के लिए मशहूर हैं। ये इस पक्षी की कुल लंबाई का 60 फीसदी हिस्सा होते हैं। इसमें इंद्रधनुषी रंग दिखता है। इन पंखों पर सुनहरी, लाल, चमकीला नीला रंग उभरता है। मोर अपने पंखों का इस्तेमाल अपना प्रेम दिखाने के लिए करते हैं। ये पंखों को फैलाकर पीठ के पीछे धनुषाकार बना लेता है। मोर के आकार और रंगों के मुताबिक ही मोरनी अपना साथी चुनती हैं।
-ब्लैक पैंथर यानी काले तेंदुए या काले जैगुआर की खासियत है कि ये अंधेरे में काले धब्बे की तरह दिखते हैं। एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में पाया जाने वाला काला तेंदुआ ऐसा ही होता है। इनके फर और त्वचा का रंग गहरा होता है। रात में यह शिकार करता है तो इसके आसपास होने का अंदाजा लगाना भी मुश्किल होता है। यह भयानक शिकारी है।
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