विवाह और प्रकार
हिन्दू धर्म में विवाह के प्रकार :Types of hindu marriage in hindi
पिछले लेख में हमने हिन्दू धर्म के अथवा प्राचीन भारत में होने वाले 16 संस्कारों के बारे में बात की। इस लेख के अंतर्गत हम प्राचीन भारत में होने वाले 8 प्रकार के विवाहों के बारे में विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे। आप इस लेख को अंत तक पूरा पढ़ें।
सूत्र काल : sutra period in hindi
जैसा कि पिछले लेख में ही हम जान चुके हैं कि प्राचीन भारतीय इतिहास के उस कालखण्ड को, जिसमें सूत्र साहित्य की रचना हुई , सूत्र काल (Sutra period) कहते हैं।
सामान्यता 7वीं-6वीं शताब्दी ई०पू० से लेकर 3री० शताब्दी ई०पू० तक का काल सूत्र काल कहा जा सकता है।
सूत्र साहित्य को मुख्यतः 3 भागों में बांटा गया है- श्रौत सूत्र , गृह्य सूत्र , धर्म सूत्र।
सूत्र साहित्य और सूत्र कालीन भारतीय सभ्यता के विषय में विस्तार पूर्वक चर्चा हम कर चुके हैं। आप निम्नलिखित लिंक से उसे अच्छी तरह समझ सकते हैं–
विवाह के प्रकार : vivah ke prakar
हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों में से विवाह संस्कार एक प्रमुख संस्कार है। यह एक बेहद पवित्र संस्कार है जिसे बहुत ही विधि विधान से, धर्मशास्त्रों के अनुसार, वेद मंत्रों के साथ संपन्न किया जाता है। हिन्दू विवाह मात्र भोगलिप्सा का साधन नहीं, एक धार्मिक-संस्कार है। संस्कार से अंतःशुद्धि होती है और शुद्ध अंतःकरण में ही दांपत्य जीवन सुखमय व्यतीत हो पाता है।
अन्य धर्मों से अलग हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बन्ध होता है जिसे किसी भी परिस्थिति में तोड़ा नहीं जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक सम्बन्ध से अधिक आत्मिक सम्बन्ध होता है और इस सम्बन्ध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
प्राचीन भारत में विवाह के प्रकार :
विवाह के प्रकारों से हमारा तात्पर्य विवाह बंधन में बंधने की विभिन्न विधियों से है। गृह्य सूत्रों और स्मृतियों में विवाह के 8 प्रकारों का उल्लेख है। हालांकि वशिष्ठ ने विवाह के 6 स्वरूपों का ही उल्लेख किया है। किंतु मनु समेत अन्य स्मृतिकारों ने तथा गृह्यसूत्रों व पुराणों में 8 प्रकार की विवाह पद्धतियों का जो उल्लेख है वो अधिक मान्य है।
हिन्दू विवाह के 8 प्रकार :
स्मृतिकारों व सूत्रकारों ने जिन 8 प्रकार के विवाहों की व्याख्या की है वो निम्नलिखित है―
1. ब्रम्ह विवाह 2. दैव विवाह 3. आर्ष विवाह 4. प्रजापत्य विवाह 5. गंधर्व विवाह 6. असुर विवाह 7. राक्षस विवाह 8. पैशाच विवाह ।
★ बता दें कि विवाह के 8 स्वरूप वास्तव में विवाह की विभिन्न 8 परिस्थितियों को स्पष्ट करते हैं।
★ उपरोक्त विवाह के 8 प्रकारों में से प्रथम चार प्रकार (ब्रम्ह विवाह , दैव विवाह , आर्ष विवाह व प्रजापत्य विवाह) के विवाह उत्तम कोटि के विवाह माने जाते थे तथा बाद के चार प्रकार (गंधर्व विवाह, असुर विवाह, राक्षस विवाह, पैशाच विवाह) के विवाह निम्न कोटि के (निंदनीय) विवाह माने जाते थे।
★ मनुस्मृति में कहा गया है कि प्रारम्भिक 4 प्रकार के उत्तम विवाहों से उत्पन्न संतान गुणवान , शीलवान , सम्पत्तिवान , आदर्श , योग्य , धार्मिक , यशश्वी , अध्ययनशील व सदाचारी होता है। जबकि बाद के 4 निम्न कोटि के निन्दनीय विवाहों से उत्पन्न संतान दुराचारी , व्यभिचारी , अधार्मिक , मिथ्यावादी व अन्य दुर्गुणों से युक्त होते हैं।
प्राचीन भारत में विवाह कितने प्रकार के होते थे?
प्राचीन काल में विवाह उपरोक्त 8 प्रकार से होते थे।
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ।।
प्रत्येक प्रकार के विवाह किसी न किसी विशेष परिस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। गौरतलब है कि हिन्दू शास्त्रकार स्त्री सम्मान तथा शील रक्षा को विशेष महत्व दिया है तथा उसके जीवन को नष्ट होने से बचाने की दिशा में प्रयत्नशील रहे हैं।
हिन्दू विवाह के 8 प्रकारों की व्याख्या निम्नवत् है ―
1. ब्रम्ह विवाह :
हिन्दू विवाह में इस प्रकार के विवाह को सबसे अच्छा और सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह विवाह वर – कन्या के माता पिता की पूर्ण सहमति से होता था। शास्त्रों के अनुसार इस विवाह में एक पुत्री का पिता योग्य वर की खोज कर उसे बुलाकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार अलंकारों से सजा-धजा कर कन्यादान दिया जाता है।
मनु ने ब्राह्म विवाह को परिभाषित करते हुए लिखा है कि “वेदों के ज्ञाता शीलवान वर को स्वयं बुलाकर, वस्त्र, आभूषण आदि से सुसज्जित कर पूजा एवं धार्मिक विधि से कन्यादान करना ही ब्राह्म विवाह है।”
याज्ञवल्क्य के अनुसार इस प्रकार के विवाह के बाद पैदा पुत्र इक्कीस पीढ़ियों को पवित्र करने वाला होता है, ऐसा माना गया है।
भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार के विवाह वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित हैं।
2. दैव विवाह :
इस विवाह के अन्तर्गत कन्या का पिता एक यश की व्यवस्था करता है एवं वस्त्र-अलंकार से सुसज्जित कन्या का दान उस व्यक्ति को कर देता है जो उस यश को समुचित ढंग से पूरा करता है। प्राचीन काल में गृहस्थ लोग समय-समय पर यज्ञ करवाते थे और ऋषियों के साथ आए हुए नवयुवक पुरोहितों में से किसी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर देते थे। देवताओं की पूजा के समय इस प्रिकार का विवाह सम्पन्न होता था अतः इसका नाम देव विवाह पड़ गया।
आज न यज्ञों का महत्व है और न ही देव विवाह का प्रचलन।
मनु ने लिखा है कि सद्कर्म में लगे पुरोहित को जब वस्त्र और आभूषणों में सुसज्जित कन्या दी जाती है, तो इसे देव विवाह कहा जाता है। डॉ. इन्द्रदेव के अनुसार, “यज्ञों की महत्ता और अपनी कन्या से किसी के विवाह को उसके आदर की पराकाष्ठा मानना, विवाह के इस रूप के कारण प्रतीत होते हैं।”
देव विवाह की मनु ने बहुत ही प्रशंसा की है और यहाँ तक कहा है कि इस विवाह के उत्पन्न सन्तान सात पीढी ऊपर और सात पीढ़ी नीचे तक के लोगों का उद्धार कर देती है। पर मनु के विपरीत अनेक स्मृतिकारों ने देव विवाह को अनुचित मानते हुए कहा है कि देवताओं के पूजन के समय पूजा करवाने वाले वर और वधू की आयु में काफी अन्तर रह जाने की सम्भावना बनी रहती है। यद्यपि अब ऐसे विवाहों का प्रचलन नहीं है। ए. एस. अल्तेकर के मतानुसार, देव विवाह वैदिक यज्ञों के साथ ही लुप्त हो गए।
3. आर्ष विवाह :
इस प्रकार के विवाह में विवाह का इच्छुक वर कन्या के पिता को एक गाय और एक बैल अथवा इनके दो जोड़े प्रदान करके विवाह करता है।
गौतम ने धर्मसूत्र में लिखा है, “आर्ष विवाह में वह कन्या के पिता एक गाय और एक बैल प्रदान करता है।
” याज्ञवल्क्य लिखते हैं कि दो गाय लेकर जब कन्यादान किया जाय तब उसे आर्ष विवाह कहते हैं।
मनु लिखते हैं, “गाय और बैल का एक युग्म वर के द्वारा धर्म कार्य हेतु कन्या के लिए देकर विधिवत् कन्यादान करना आर्ष विवाह कहा जाता है।
आर्ष का सम्बन्ध ऋषि शब्द से है। जब कोई ऋषि किसी कन्या के पिता को गाय और बैल भेंट के रूप में देता है तो यह समझ लिया जाता था कि अब उसने विवाह करने का निश्चय कर लिया है। कई आचार्यों ने गाय व बैल भेंट करने को कन्या मूल्य माना है, किन्तु यह सही नहीं है, गाय व बैल भेंट करना भारत जैसे देश में पशुधन के महत्त्व को प्रकट करता है। बैल को धर्म का एवं गाय को पृथ्वी का प्रतीक माना गया है जो विवाह की साक्षी के रूप में दिये जाते थे। कन्या के पिता को दिया जाने वाला जोड़ा पुनः वर को लौटा दिया जाता था। इन सभी तथ्यों के आधार पर स्पष्ट है कि आर्ष विवाह में कन्या मूल्य जैसी कोई बात नहीं है।
वर्तमान में इस प्रकार के विवाह प्रचलित नहीं हैं।
4. प्रजापत्य विवाह :
इस प्रकार के विवाह में पिता सम्मानपूर्वक एक व्यक्ति को यह उपदेश देकर “तुम दोनों एक साथ रहकर आजीवन धर्म का पालन करो” , विधिवत वर की पूजा करके , अपनी पुत्री उपहार स्वरूप देता था।
याज्ञवल्क्य के अनुसार इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न संतान अपने वंश की पीढ़ियों को पवित्र करने वाली होती है।
‘सत्यार्थप्रकाश‘ में कहा गया है कि, ‘वर और वधु दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के लिए हो’ यह कामना करना ही प्रजापत्य का आधार है।
वशिष्ठ और आपस्तम्ब ने इस प्रकार के विवाह का उल्लेख नहीं किया है , जिससे डॉ० आल्तेकर यह मत व्यक्त करते हैं कि विवाह के 8 प्रकारों को पूर्ण करने के लिए इसे और ब्रम्ह विवाह पद्धति को पृथक रूप दे दिया गया।
यह विवाह सामान्यतः ब्रम्हविवाह के समान ही होता था। दोनों में मूल अंतर यह है कि जहां ब्रह्म विवाह के अंतर्गत कन्या के पिता को अपनी पुत्री को वस्त्रादि आभूषणों से युक्त कन्या का दान करना आवश्यक होता था वहीं प्रजापत्य विवाह में वस्त्रों तथा विशेष अलंकारों की व्यवस्था के साथ कन्यादान आवश्यक नहीं था।
इस प्रकार ब्रम्ह विवाह उच्च वर्गीय व धनी लोग करते थे तथा प्रजापत्य विवाह जनसामान्य व निर्धन लोग करते थे।
5. गन्धर्व विवाह :
इस प्रकार को हम ‘प्रेम विवाह’ की भी संज्ञा दे सकते हैं। युवक-युवती तब परस्पर प्रेम या काम के वशीभूत होकर स्वेच्छा से संयोग कर लेते हैं तो ऐसे विवाह को गान्धर्व विवाह कहा जाता है।
याज्ञवल्क्य‘ पारस्परिक स्नेह द्वारा होने वाले विवाह को गान्धर्व विवाह कहते हैं।
महर्षि गौतम के अनुसार, “इच्छा रखने वाली कन्या के साथ अपनी इच्छा से सम्बन्ध स्थापित करना गान्धर्व विवाह कहलाता है।
इस प्रकार के विवाहों में माता-पिता की इच्छा का कोई महत्व नहीं होता। वास्तविक विवाह से पूर्व भी प्रेमिका से शरीर संयोग हो सकता है और बाद में उचित विधियों से सम्पन्न आज के प्रेम विवाह प्राचीनकाल के गान्धर्व विवाह ही माने जा सकते हैं। प्राचीनकाल में ऐसे विवाह प्रायः रूपवान गान्धर्व जातियों के लोग करते थे, इसीलिए इनका नाम गान्धर्व-विवाह पड़ गया।
कुछ स्मृतिकारों व शास्त्रकारों ने इसे स्वीकृत किया है तो कुछ ने इसे अस्वीकार किया है। बौधायन धर्मसूत्र में इसकी प्रशंसा की गई है। वात्स्यायन भी अपने कामसूत्र में इसे एक आदर्श विवाह स्वीकार करते हैं।
दुष्यंत का शकुंतला के साथ गान्धर्व विवाह ही हुआ था।
6. आसुर विवाह :
यह एक प्रकार का क्रय विवाह है अर्थात कन्या मूल्य चुकाया जाता है। इस विवाह में व्यक्ति द्वारा कन्या और कन्या के परिवार के लोगों को शक्ति के अनुसार धन देकर अपनी इच्छा से कन्या का ग्रहण किया जाता है।
मनु लिखते हैं, “कन्या के परिवार वालों एवं कन्या को अपनी शक्ति के अनुसार धन देकर अपनी इच्छा से कन्या को ग्रहण करना असुर विवाह कहा जाता है।”
याज्ञवल्क्य एवं गौतम का मत है कि अधिक धन देकर कन्या को ग्रहण करना असुर विवाह कहलाता है। कन्या मूल्य देकर सम्पन्न किये जाने वाले सभी विवाह असुर विवाह की श्रेणी में आते हैं।
कन्या मूल्य देना कन्या का सम्मान करना है साथ ही कन्या के परिवार की उसके चले जाने की क्षतिपूर्ति है।
यह विवाह निम्न वर्ग में होता था, उच्च वर्ग में इसे घृणित दृष्टि से देखा जाता था।
राजा दशरथ-कैकेयी तथा गांधारी-धृतराष्ट्र का विवाह इसी विवाह पद्धति में हुए थे।
वर्तमान समय में यह प्रचलित नहीं है।
7. राक्षस विवाह :
लड़ाई-झगड़ा करके, छीन झपट कर कपटपूर्वक या युद्ध में हरण करके किसी स्त्री से विवाह कर लेना राक्षस विवाह कहा जाता है। मनु के अनुसार, “मारकर, अंग छेदन करके घर को तोड़कर हल्ला करता हुआ, रोती हुई कन्या को बलात् अपहरण “युद्ध में कन्या का राक्षस विवाह कहलाता है। याज्ञवल्क्य के अनुसार “युद्ध में कन्या का अपहरण करके उसके साथ विवाह करना ही राक्षस विवाह है।” इस प्रकार के विवाहों को प्रचलन तब तक अधिक था जब युद्धों का बहुत महत्व था और स्त्री को युद्ध का पुरस्कार माना जाता था।
राक्षस विवाह में वर और वधु पक्ष के मध्य मार पीट , लड़ाई झगड़ा होता था। राक्षस विवाह अधिकतर क्षत्रिय करते थे इस कारण इसे ‘क्षात्र विवाह’ भी कहते हैं।
भगवान कृष्ण और रुक्मिणी का तथा अर्जुन और सुभद्रा का विवाह इस कोटि का उदाहरण है।
वर्तमान समय में इस विवाह पद्धति के विवाह लगभग न के बराबर होते हैं।
8. पैशाच विवाह :
सबसे निकृष्ट कोटि का माना गया पैशाच विवाह ऐसा विवाह है जिसमें – निद्रारत, उन्मत्त घबराई हुई, मदिरापान से प्रभावित या रास्ते में जाती हुई कन्या के साथ बल का प्रयोग करके यौन सम्बन्ध स्थापित करने के उपरान्त उससे विवाह किया जाता है। बलपूर्वक कुकृत्य कर लेने के बाद भी विवाह से संबंधित विधियों को पूर्ण कर लेने पर ऐसे विवाहों को मान्यता दे दी जाती थी। वशिष्ठ एवं आपस्तम्ब ने इस प्रकार के विवाह को मान्यता नहीं दी है, किन्तु इस प्रकार के विवाह को लड़की का दोष न होने के कारण कौमार्य भंग हो जाने के बाद उसे सामाजिक बहिष्कार से बचाने एवं उसका सामाजिक सम्मान बनाये रखने के लिए ही स्वीकृति प्रदान की गयी है।
मनु कहते हैं, “सोयी हुई उन्मत्त, घबराई हुई, मंदिरापान की हुई अथवा राह में जाती हुई लड़की के साथ बलपूर्वक कुकृत्य करने के बाद उससे विवाह करना पैशाच विवाह है।
आज भी पैशाच विवाह के यदा कदा उदाहरण मिल ही जाते हैं।
बालात्कार के कुछ मामलों में लड़की के माता पिता बदनामी के डर से न्यायालय की शरण न लेकर उस कन्या से शादी कर देते हैं जिसने बलात्कार किया है। जिससे प्रायः ऐसे मामले सामने नहीं आ पाते हैं।
निष्कर्ष : Types of hindu marriage in hindi
वर्तमान में हिन्दुओं में विवाहों के उपरोक्त समस्त स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होते, लेकिन इनमें से कुछ स्वरूप थोडे बहुत संशोधनों के साथ हमें दिखाई देते हैं।
हम बता चुके हैं कि प्रारम्भ के 4 प्रकार के विवाह (ब्रम्ह , दैव , आर्ष व प्रजापत्य) विवाह को उत्कृष्ट कोटि के विवाह तथा बाद के 4 प्रकार के विवाह (गंधर्व , असुर , राक्षस व पैशाच) विवाह को निम्न कोटि के विवाह माने जाते थे।
वर्तमान समय में ब्रह्म विवाह व गान्धर्व विवाह का सामान्य प्रचलन है।
डी एन मजूमदार ने ‘Races and Culture of India’ में लिखा है कि. हिन्दू समाज अब केवल दो स्वरूपों को मान्यता देता है ब्रह्म एवं असुर उच्च जातियों में पहले प्रकार का एवं निम्न जातियों में दूसरे प्रकार का विवाह प्रचलित है। यद्यपि उच्च जातियों में असुर-प्रथा पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है।”
अनुलोम विवाह क्या है ?
अनुलोम विवाह के अर्थ में 'अनुलोम' एवं 'प्रतिलोम' शब्दों का व्यवहार वैदिक साहित्य में नहीं पाया जाता। पाणिनि (चतुर्थ,4.28) ने इन शब्दों से व्युत्पन्न शब्द अष्टाध्यायी में गिनाए हैं और इसके बाद स्मृतिग्रंथों में इन शब्दों का बहुतायत से प्रयोग होता दिखाई देता है (गौतम धर्मसूत्र, चतुर्थ 14-15; मनु., दशम, 13; याज्ञवल्क्य स्मृति, प्रथम, 95; वसिष्ठ., 18.7), जिससे अनुमान होता है कि उत्तर वैदिक काल के समाज में अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों का प्रचार बढ़ा।
अनुलोम विवाह का सामान्य अर्थ है अपने वर्ण से निम्नत्तर वर्ण में विवाह करना। इसके विपरीत किसी निम्नस्तर वर्ण के पुरुष और उच्चत्तर वर्ण की कन्या के बीच संबंध का स्थापित होना प्रतिलोम विवाह कहलाता है। प्राय: धर्मशास्त्रों की परीक्षा इसी सिद्धांत का प्रतिपादन करती है कि अनुलोम विवाह ही शास्त्रकारों को मान्य थे, यद्यपि दोनों प्रकार के दृष्टांत स्मृतिग्रंथों में मिलते हैं। अनुलोम विवाह से उत्पन्न संतान के विषय में ऐसा सामान्य मत जान पड़ता है कि उसे माता के वर्ण के अनुरूप मानते हैं। इसका एक विपरीत उदाहरण बौद्ध जातकों में फिक ने 'भद्दसाल जातक' में ढूँढ़ा है; जिसके अनुसार माता का कुल नहीं देखा जाता, पिता का ही कुल देखा जाता है। अनुलोम से उत्पन्न संतानों और प्रजातियों के संबंध में विभिन्न शास्त्रों में विभिन्न मत पाए जाते हैं, जिन सबका यहाँ उल्लेख करना कठिन है। मनु के अनुसार अंबष्ठ, निषाद और उग्र अनुलोम विवाहों से उत्पन्न जातियाँ थीं।
ऐसे अनुलोम विवाहों के उदाहरण भारत में मध्यकाल तक काफी पाए जाते हैं। कालिदास के 'मालविकाग्निमित्रम्' से पता चलता है कि अग्निमित्र ने, जो ब्राह्मण था, क्षत्राणी मालविका से विवाह किया था। चंद्रगुप्त द्वितीय की राजकन्या प्रभावती गुप्त ने वाकाटक 'ब्राह्मण' रुद्रसेन द्वितीय से विवाह किया और उसकी पट्टमहिषी बनी। कदंबकुल के सम्राट् काकुत्स्थ वर्मा (एपि. इंडिका, भाग 8, पृ. 24) के तालगुंड अभिलेख से विदित होता है कि कदंबकुल के संस्थापक मयूर शर्मा ब्राह्मण थे, उन्होंने कांची पल्लवों के विरुद्ध शस्त्र ग्रहण किया।
अभिलेख से पता चलता है कि काकुत्स्थ वर्मा (मयूर शर्मा चतुर्थ वंशज) ने अपनी कन्याएँ गुप्तों तथा अन्य नरेशों को ब्याही थीं। आगे चल कर ऐसे विवाहों पर प्रतिबंध लगने आरंभ हो गए।
जब एक उच्च वर्ण, जाति, उपजाति, कुल एवं गोत्र के लडके का विवाह ऐसी लड़की से किया जाय जिसका वर्ण, जाति, उपजाति, कुल एवं वंश के लडके से नीचा हो तो ऐसे विवाह को अनुलोम विवाह कहते हैं। दूसरे शब्दों में इस प्रकार के विवाह में लड़का उच्च सामाजिक समूह का होता है और लड़की निम्न सामाजिक समूह की।
उदाहरण के लिए, एक ब्राह्मण लडके का विवाह क्षत्रिय या वैश्य लड़की से होता है तो इसे हम अनुलोम विवाह कहेंगे। वैदिक काल से लेकर स्मृति काल तक अनुलोम विवाह का प्रचलन रहा है।
मनुस्मृति में लिखा है एक ब्राह्मण को अपने से निम्न तीन वर्णों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की कन्या से क्षत्रिय को अपने से निम्न दो वर्णों वैश्य एवं शूद्र कन्या से और वैश्य अपने वर्ण के अतिरिक्त शूद्र कन्या से भी विवाह कर सकता है, किन्तु मनु पाणिग्रहण संस्कार करने की स्वीकृति केवल सवर्ण विवाह के लिए ही देते हैं।
याज्ञवल्क्य ने भी ब्राह्मण को चार, क्षत्रिय को तीन, वैश्य को दो, एवं शूद्र को एक विवाह करने की बात कही है। मनु ने एक अन्य स्थान पर शुद्र कन्या से द्विज लडके का विवाह अनुचित भी बताया है। ऐसे विवाह से द्विज का वर्ण दूषित हो जाता है, उसके परिवार का स्तर गिर जाता है। और उसकी सन्तान को शूद्र की स्थिति प्राप्त होती है। ऐसे विवाह से उत्पन्न सन्तान को मनु ‘पार्षव’ ;एक जीवित शुद्ध की संज्ञा देते हैं तथा उसे सम्पत्ति में भी कोई अधिकार नहीं होता है।
प्राचीन समय में अनुलोम विवाह का विस्तार वर्णों तक था, किन्तु जब वर्ण अनेक जातियों एवं उपजातियों में बंट गये और उनमें रक्त शुधता एवं ऊँच-नीच की भावना पनपी तथा जैन एवं बौध धर्म का उदय हुआ तो कुलीन विवाह (Hypergamy) का प्रचलन हुआ।
कुलीन विवाह का तात्पर्य है एक जाति अथवा उपजाति में विवाह करने पर वधु के लिए वर उच्च कुल या गाँव से प्राप्त किया जाता है। कुलीन विवाह का सर्वाधिक प्रचलन बंगाल में रहा है जहाँ उच्च कुल के लडके का विवाह निम्न कुल की कई लड़कियों से होता था। डॉ. राधकृष्णन् का मत है कि भारत में अनुलोम विवाहों का प्रचलन दसवीं शताब्दी तक रहा है।
रिजले का मत है कि प्रारम्भ में अन्तर्वर्ण विवाहों का प्रचलन इण्डो-आर्यन प्रजाति में िस्त्रायों की कमी पूरी करने के लिए हुआ और जैसे ही उनकी आवश्यकता की पूर्ति हो गयी उन्होंने ऐसे विवाहों पर प्रितबन्ध् लगा दिया।
अनुलोम विवाह के प्रभाव व हानियां
उच्च कुलों में लड़कों की कमी-जो कुछ सामाजिक दृष्टि से ऊँचा माना जाता है उस कुल के लड़कों से नीचा समझा जाने वाले कुल के लोग अपनी कन्या का विवाह करना चाहते हैं, परिणामस्वरूप ऊँचे कुल की लड़कियों के लिए वर का अभाव हो जाता है और उन्हें अविवाहित ही रहना पड़ता है।
नीच कुलों में लड़कियों की कमी-नीच कुल के सभी लोग जब अपनी कन्या का विवाह उच्च कुल में कर देते हैं तो नीच कुल में लड़कों के लिए कन्या का अभाव हो जाता है, और कई लड़कों को अविवाहित ही रहना पड़ता है।
बहुपति एवं बहुपत्नी विवाह का जन्म-ऊँचे कुल के लडके से नीचे कुल के सभी लोग अपनी कन्या का विवाह करना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में उच्च कुल में बहुपत्नी विवाह का प्रचलन होगा, दूसरी ओर नीचे कुल में लड़कियों का अभाव होने पर बहुपति विवाह का प्रचलन होगा।
वर-मूल्य प्रथा-जब नीचे कुल वाले उच्च कुल के लड़कों को वर के रूप में प्राप्त करना चाहते हैं तो लड़कों का अभाव हो जाता है। ऐसी स्थिति में वर-मूल्य प्रथा प्रचलन बढ़ जाता है।
बेमेल विवाह-अनुलोम विवाह के कारण ऊँचे कुल में लड़की का विवाह कभी-कभी प्रौढ़ या वृद व्यक्ति के साथ भी कर दिया जाता है। बंगाल एवं बिहार में उच्च कुलों के कई लड़कों के तो सौ तक पत्नियाँ होती हैं जिन्हें याद रखने के लिए रजिस्टर रखना होता है। कई बार तो वधु की आयु वर की पुत्री के बराबर होती है।
बाल-विधवाओं में वृद्धि-अनुलोम विवाह के कारण उच्च कुल के पुरुषों के कई पत्नियाँ होती हैं। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर समाज में बाल-विधवाओं की संख्या बढ़ जाती है।
बाल-विवाह का प्रचलन-अनुलोम विवाह में प्रत्येक पिता यह चाहता है कि उसकी कन्या का विवाह उच्च कुल के लडके से हो अत: ज्योंही कोई योग्य वर मिला कि कन्या का विवाह कर दिया जाता है। कई बार तो चार-पाँच वर्ष से कम आयु की कन्याओं का भी विवाह कर दिया जाता है।
कन्या-मूल्य का प्रचलन-अनुलोम विवाह के कारण नीच कुलों में कन्याओं का अभाव हो जाता है जिसके फलस्वरूप कन्या-मूल्य का प्रचलन होता है।
सामाजिक बुराइयाँ-अनुलोम विवाह प्रथा में समाज में रूढ़िवादिता तथा सामाजिक पारिवारिक एवं वैयक्तिक जीवन में अनेक समस्याओं को जन्म दिया है। निम्न कुल की लड़कियों का देर तक विवाह न होने पर समाज में भ्रष्टाचार व नैतिक पतन की समस्या पैदा होती है। कई कन्याएँ तो जब उनके माता-पिता द्वारा वर-मूल्य नहीं जुटाया जाता तो वे सामाजिक निन्दा से तंग आकर आत्महत्या तक कर लेती हैं।
प्रतिलोम विवाह किसे कहते हैं?
अनुलोम विवाह का विपरीत रूप प्रतिलोम विवाह है। इस प्रकार के विवाह में लड़की उच्च वर्ण, जाति, उपजाति, कुल या वंश की होती है और लड़का निम्न वर्ण, जाति, उपजाति, कुल या वंश का। इसे परिभाषित करते हुए कपाड़िया लिखते हैं, एक निम्न वर्ण के व्यक्ति का उच्च वर्ण की स्त्री के साथ विवाह प्रतिलोम विवाह कहलाता था।
उदाहरण के लिए, यदि एक ब्राह्मण लड़की का विवाह किसी क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र लडके से होता है तो ऐसे विवाह को हम प्रतिलोम विवाह कहेंगे। इस प्रकार के विवाह में स्त्री की स्थिति निम्न हो जाती है।
हिन्दू विवाह अधिनियम, 1949 एंव 1955 के हिन्दू विवाह अधिनियम में अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह दोनों को ही वैध् माना गया है।
पूर्व हिंदू विधि के अंतर्गत विवाह के विभिन्न प्रकार क्या है ?
हिन्दू विवाह के प्रकार- हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों में से विवाह संस्कार एक प्रमुख संस्कार है। यह एक बेहद पवित्र संस्कार है जिसे बहुत ही विधि विधान से, धर्मशास्त्रों के अनुसार, वेद मंत्रों के साथ संपन्न किया जाता है। हिन्दू विवाह मात्र भोगलिप्सा का साधन नहीं, एक धार्मिक-संस्कार है। संस्कार से अंतःशुद्धि होती है और शुद्ध अंतःकरण में ही दांपत्य जीवन सुखमय व्यतीत हो पाता है।
प्राचीन भारत में हिंदू विधि के अंतर्गत विवाह के कितने प्रकार है?:-
प्राचीन हिंदू विधि में विवाह का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया जा सकता है:-
- ब्रम्हा विवाह ( Brahma marriage)
- दैव विवाह ( Daiva marriage)
- आर्ष विवाह (Arsha marriage )
- प्रजापत्य विवाह (Prajapatya marriage)
- गन्धर्व विवाह (Gandharva marriage )
- आसुर विवाह(Asura Marriage)
- राक्षस विवाह (Rakshasa Marriage)
- पैशाच विवाह (Paishach Marriage)
B. हिन्दू विवाह के प्रकार- द्वितीय वर्गीकरण (Second classification):-
- अनुलोम विवाह(Anulom Marriage)
- प्रतिलोम विवाह (Pratilom Marriage)
C. हिन्दू विवाह के प्रकार- तृतीय वर्गीकरण ( Third classification):-
वर्तमान में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 ने विवाह के पुराने वर्गीकरण को समाप्त कर उन्हें निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित कर दिया है –
- मान्य विवाह
- शून्यकरणीय विवाह
- शून्य विवाह
A. प्रथम वर्गीकरण( First classification ):-
प्राचीन विधि के अंतर्गत विवाह की आठ पद्धतियां मानी गई थी- चार मान्य पद्धतियां तथा चार अमान्य पद्धतियां
मनु के अनुसार, ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ।।
मान्य पद्धति के अनुसार विवाहिता स्त्री को पत्नी कहा जाता था, किंतु अमान्य विवाह पद्धति के अनुसार स्त्री पत्नी नहीं होती थी। मान्य पद्धतियां समाज में आदर की दृष्टि से तथा अमान्य पद्धतियां हेय दृष्टि से देखी जाती थी।
विवाह के 8 प्रकारों की पद्धतियां निम्नवत् है ―
विवाह की मान्य पद्धतियां कौन सी है ?
ब्रम्हा विवाह क्या है ? :-
हिन्दू विवाह में इस प्रकार के विवाह को सबसे अच्छा और सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह विवाह वर – कन्या के माता पिता की पूर्ण सहमति से होता था। शास्त्रों के अनुसार इस विवाह में एक पुत्री का पिता योग्य वर की खोज कर उसे बुलाकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार अलंकारों से सजा-धजा कर कन्यादान दिया जाता है।
मनु ने ब्राह्म विवाह को परिभाषित करते हुए लिखा है कि “वेदों के ज्ञाता शीलवान वर को स्वयं बुलाकर, वस्त्र, आभूषण आदि से सुसज्जित कर पूजा एवं धार्मिक विधि से कन्यादान करना ही ब्राह्म विवाह है।” याज्ञवल्क्य के अनुसार इस प्रकार के विवाह के बाद पैदा पुत्र इक्कीस पीढ़ियों को पवित्र करने वाला होता है, ऐसा माना गया है।
दैव विवाह क्या है ? :-
इस प्रकार के विवाह में वधु के पिता के साथ वर यज्ञ में पुरोहित का कार्य करता था और वधू का पिता शुल्क के रूप में वधु को वर के हाथों में सौंप देता था। आज न यज्ञों का महत्व है और न ही दैव विवाह का प्रचलन। मनु ने लिखा है कि सद्कर्म में लगे पुरोहित को जब वस्त्र और आभूषणों में सुसज्जित कन्या दी जाती है, तो इसे दैव विवाह कहा जाता है। डॉ. इन्द्रदेव के अनुसार, “यज्ञों की महत्ता और अपनी कन्या से किसी के विवाह को उसके आदर की पराकाष्ठा मानना, विवाह के इस रूप के कारण प्रतीत होते हैं।” दैव विवाह की मनु ने बहुत ही प्रशंसा की है और यहाँ तक कहा है कि इस विवाह से उत्पन्न सन्तान सात पीढी ऊपर और सात पीढ़ी नीचे तक के लोगों का उद्धार कर देती है। ए. एस. अल्तेकर के मतानुसार, दैव विवाह वैदिक यज्ञों के साथ ही लुप्त हो गए।
आर्ष विवाह क्या है ?:-
इस प्रकार के विवाह में गोमिथुन या गाय बैल (दोनों में से कोई एक- एक या दो- दो) धर्म -कार्य करने के लिए वर से लेकर विधिपूर्वक कन्यादान करना आर्ष विवाह माना गया है
मनु लिखते हैं, “गाय और बैल का एक युग्म वर के द्वारा धर्म कार्य हेतु कन्या के लिए देकर विधिवत् कन्यादान करना आर्ष विवाह कहा जाता है।
वर्तमान में इस प्रकार के विवाह प्रचलित नहीं हैं।
प्रजापत्य विवाह क्या है ?:-
इस प्रकार के विवाह में कन्या के पिता द्वारा “तुम दोनों (वर -कन्या) साथ- साथ धर्मांचरण करो”ऐसा कहकर वस्त्रालंकार आदि से उन्हें पूजित कर कन्यादान किया जाता है।याज्ञवल्क्य के अनुसार इस प्रकार के विवाह से उत्पन्न संतान अपने वंश की पीढ़ियों को पवित्र करने वाली होती है। ‘सत्यार्थप्रकाश’ में कहा गया है कि, ‘वर और वधु दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के लिए हो’ यह कामना करना ही प्रजापत्य का आधार है।यह विवाह सामान्यतःब्रम्हा विवाह के समान ही होता था। दोनों में मूल अंतर यह है कि जहां ब्रम्हा विवाह के अंतर्गत कन्या के पिता को अपनी पुत्री को वस्त्रादि आभूषणों से युक्त कन्या का दान करना आवश्यक होता था वहीं प्रजापत्य विवाह में वस्त्रों तथा विशेष अलंकारों की व्यवस्था के साथ कन्यादान आवश्यक नहीं था। इस प्रकार ब्रम्हा विवाह उच्च वर्गीय व धनी लोग करते थे तथा प्रजापत्य विवाह जनसामान्य व निर्धन लोग करते थे।
विवाह की अमान्य पद्धतियां कौन सी है ?
गन्धर्व विवाह क्या है ? :-
किसी नवयुवक और सुंदर लड़की का ऐच्छिक मिलना जो इच्छा और येंद्रिक झुकाव से उत्पन्न होता है, गंधर्व विवाह है। इस प्रकार के विवाह बिना किसी धार्मिक कृत्य के प्रेम -विवाहों की तरह किए जाते थे।इस प्रकार के विवाह में धार्मिक कृत्यों से विवाह संपन्न हुए बिना ही शारीरिक संसर्ग विवाह के पक्षकारों में हो जाता है।
उदा. – इस प्रकार का विवाह दुष्यंत कथा शकुंतला का हुआ था।
इस प्रकार के विवाहों में माता-पिता की इच्छा का कोई महत्व नहीं होता। वास्तविक विवाह से पूर्व भी प्रेमिका से शरीर संयोग हो सकता है और बाद में उचित विधियों से सम्पन्न आज के प्रेम विवाह प्राचीनकाल के गन्धर्व विवाह ही माने जा सकते हैं। प्राचीनकाल में ऐसे विवाह प्रायः रूपवान गान्धर्व जातियों के लोग करते थे, इसीलिए इनका नाम गन्धर्व-विवाह पड़ गया।
कुछ स्मृतिकारों व शास्त्रकारों ने इसे स्वीकृत किया है तो कुछ ने इसे अस्वीकार किया है। बौधायन धर्मसूत्र में इसकी प्रशंसा की गई है। वात्स्यायन भी अपने कामसूत्र में इसे एक आदर्श विवाह स्वीकार करते हैं।
केस:- विश्वनाथ स्वामी बनाम कोबानी(24 एम. एल. जे.271)
इस मामले में कहा गया था कि यह विवाह- पद्धति अब अप्रचलित हो चुकी है।
आसुर विवाह क्या है ? :-
इस प्रकार के विवाह में वधू का पिता वर पक्ष से अपनी कन्या का मूल्य शुल्क के रूप में लेकर वधू को वर को सौंप देता था। इसमें कन्या के पिता अथवा संरक्षक को धन लाभ देकर कन्या ग्रहण की जाती है। यह प्रथा दक्षिणी भारत के सुद्रों में प्रचलित है। यह पद्धति एक प्रकार की क्रय- विक्रय की पद्धति है।
केस:- चुन्नीलाल बनाम सूरज राम, 38 बाम्बे 433।
इस मामले में अभिनिर्धारित किया गया है कि आसुर विवाह में एक प्रकार से लड़की को बेच दिया जाता है।
केस:- गोविंद बनाम सावित्री, 43 बाम्बे173
इस मामले में कहा गया कि कन्या का पिता कन्या को विवाह में देने का जो शुल्क पाता है, वह उसका प्रतिफल है।
मनु लिखते हैं, “कन्या के परिवार वालों एवं कन्या को अपनी शक्ति के अनुसार धन देकर अपनी इच्छा से कन्या को ग्रहण करना असुर विवाह कहा जाता है।”
उदा. – राजा दशरथ-कैकेयी तथा गांधारी-धृतराष्ट्र का विवाह इसी विवाह पद्धति में हुए थे।
वर्तमान समय में यह विवाह प्रचलित नहीं है।
राक्षस विवाह क्या है ? :-
इस प्रकार के विवाह के अंतर्गत कन्या के पक्ष वालों की हत्या करके अथवा उनका अंगादि छेदन करके और गृह अथवा द्वार आदि को तोड़कर सहायता के लिए चिल्लाती तथा रोती हुई कन्या का बलपूर्वक अपहरण करके विवाह किया जाता है।इस प्रकार की पद्धति अब भी बरार तथा बैतूल ( मध्य प्रदेश ) की गोंड जातियों में प्रचलित है |राक्षस विवाह में वर और वधु पक्ष के मध्य मारपीट , लड़ाई झगड़ा होता था। राक्षस विवाह अधिकतर क्षत्रिय करते थे इस कारण इसे ‘क्षात्र विवाह’ भी कहते हैं।
उदा. – भगवान कृष्ण और रुक्मिणी का तथा अर्जुन और सुभद्रा का विवाह इस कोटि का उदाहरण है।
पैशाच विवाह क्या है :-
यह पद्धति अत्यंत ही निंदनीय पद्धति है। इस प्रकार के विवाह में सोई हुई, नशीले पदार्थों का सेवन करा कर उसकी अचेतन अवस्था में मैथुन करके अथवा विकृत मस्तिष्क वाली कन्या के साथ मैथुन करके विवाह किया जाता है।
मनु कहते हैं, “सोयी हुई उन्मत्त, घबराई हुई, मंदिरापान की हुई अथवा राह में जाती हुई लड़की के साथ बलपूर्वक कुकृत्य करने के बाद उससे विवाह करना पैशाच विवाह है।
आज भी पैशाच विवाह के यदा कदा उदाहरण मिल ही जाते हैं।
B. द्वितीय वर्गीकरण (Second classification):-
1.अनुलोम विवाह क्या है ? :-
इस प्रकार के विवाह में वर ऊंची जाति का होता था और वधू निम्न जाति की जाति की होती थी। इस प्रकार के विवाह मान्य नहीं किए जाते थे।
मनु ,याज्ञवल्क्य स्मृतियों में और “मिताक्षरा “की हिंदू विधि व्यवस्थाओं से प्रकट होता है।
केस:- गुलाबवती बनाम जीवनलाल, (ए आई आर 1922 बंबई 32)
इस मामले में बंबई उच्च न्यायालय ने वैश्य वर और शूद्र कन्या या बाह्यण वर और शूद्र कन्या के विवाह को वैध ठहराया था। न्यायालय ने पुनः इस बात की पुष्टि कर दी कि अनुलोम विवाह से उत्पन्न पुत्र संपत्ति का उत्तराधिकारी होगा। इसके विपरीत इलाहाबाद और मद्रास उच्च न्यायालय ने यह निरूपित किया है कि अनुलोम विवाह वैध नहीं है क्योंकि नियमानुसार विवाह एक ही जाति में होना चाहिए।
2.प्रतिलोम विवाह क्या है ? :-
इस प्रकार के विवाह के अंतर्गत कन्या उच्च जाति की होती थी और वर निम्न जाति का होता था। इस प्रकार के विवाहों को मान्य नहीं किया जाता था। प्रतिलोम विवाह उस विवाह को कहते हैं, जिसमें उच्च कुल की स्त्री निम्न कुल के पुरुष से विवाह करती है। विशेष विवाह अधिनियम 1954, हिन्दू विवाह अधिनियम 1955, हिन्दू विवाह क़ानून (संशोधन) अधिनियम 1976 इत्यादि के कारण अब अंतर्जातीय विवाह को क़ानूनी मान्यता प्राप्त हो गई है। फलस्वरूप प्रतिलोम नियम कमज़ोर हो गया है। इस प्रकार के विवाहों के उदाहरण प्राचीन साहित्य में मिलते हैं।
निष्कर्ष:-
वर्तमान में हिन्दुओं में विवाहों के उपरोक्त समस्त स्वरूप दृष्टिगोचर नहीं होते, लेकिन इनमें से कुछ स्वरूप थोडे बहुत संशोधनों के साथ हमें दिखाई देते हैं। प्रारम्भ के 4 प्रकार के विवाह (ब्रम्हा , दैव , आर्ष व प्रजापत्य) विवाह को उत्कृष्ट कोटि के विवाह तथा बाद के 4 प्रकार के विवाह (गंधर्व , असुर , राक्षस व पैशाच) विवाह को निम्न कोटि के विवाह माने जाते थे। वर्तमान समय में ब्रम्हा विवाह व गान्धर्व विवाह का सामान्य प्रचलन है।
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