शरीर 01 || आंखें

नैन को चैन...

एक पुराना गाना है: 'तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है, ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढले...' लेकिन ऐसी खूबसूरत आंखों के लिए आंखों को दुरुस्त रखना जरूरी है। वैसे इन्हें दुरुस्त रखना इतना मुश्किल भी नहीं। हमें सिर्फ लापरवाही नहीं करनी। अगर परेशानी शुरू हो तो लक्षणों को जल्द से जल्द समझ लें। किस उम्र में कितनी देर के लिए स्क्रीन देखें, आंखों की परेशानियों को कैसे समझें, आंखों की रोशनी बरकरार रखने के लिए क्या उपाय करें?  एक्सपर्ट्स से बात करके जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

6 सबसे खास बातें
1. स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताना हमारी मजबूरी हो सकती है, शौक नहीं होना चाहिए।
2. 6 से 13 साल तक के बच्चों में दूर तक साफ न देखने की परेशानी सबसे ज्यादा देखी जा रही है, इसलिए लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है।
3. 20:20:20 फॉर्म्यूले पर अमल करना जरूरी है यानी हर 20 मिनट में 20 बार पलकें झपकना, फिर लगातार 20 सेकंड तक 20 फुट दूर देखना।
आंखों को ताजा पानी से दिनभर में 2-3 बार जरूर धोएं। पलकों को झपकते रहें।
आम रुटीन में हम एक मिनट में 20 से 25 बार पलकों को झपकाते हैं, लेकिन स्क्रीन देखते समय यह महज 5 से 7 रह जाता है।
वयस्क लगातार एक बार में 20-30 मिनट से ज्यादा और बच्चे 15-20 मिनट से ज्यादा देर तक स्क्रीन न देखें। 20:20:20 फॉर्म्यूले को अपनाएं।

कोरोना ने आंखों को सीधे तौर पर भले ही बहुत ज्यादा परेशान न किया हो, लेकिन कोरोना की वजह से स्क्रीन से नजदीकी ने बड़ों से लेकर बच्चों तक की आंखों के लिए समस्याएं जरूर पैदा की हैं। कोरोना की दूसरी लहर खत्म होने पर ऐसा लगने लगा था कि स्कूल फिर से खुल जाएंगे और कामकाज भी सामान्य हो जाएगा। लेकिन ऑमिक्रॉन ने सारी योजनाओं पर पानी फेर दिया। बच्चे और बड़े फिर से मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर से चिपककर बैठने को मजबूर हो गए। इसका बुरा असर आंखों पर दिखने लगा है।

स्क्रीन पर ज्यादा देर तो परेशानी
जब शरीर में कोई परेशानी होने वाली होती है तो वह इशारा जरूर करता है। यह बात आंखों पर भी लागू होती है। आंखों के इन इशारों को समझना बहुत जरूरी है।  
स्क्रीन को ज्यादा पास से देखना: अगर कोई बच्चा या बड़ा टीवी, लैपटॉप, मोबाइल या डेस्कटॉप को नजदीक से ही देखता है तो उसे यह भी पता नहीं चल पाता कि उसकी आखों में कोई परेशानी शुरू हो चुकी है। इसलिए जब भी बच्चा टीवी देखते समय नजदीक बैठने की ही कोशिश करे तो समझें कि परेशानी है।

इनके अलावा कुछ दूसरे लक्षण हो सकते हैं:

आंखों से पानी आना: कुछ भी पढ़ते समय या बिना कारण आंखों से पानी आए तो समझ लें, खतरा शुरू हो चुका है।

आंखों में खुजली होना: अगर किसी को बार-बार खुजली हो और पलकें मलना अच्छा लगे।

लगातार आंखें लाल रहना:  बिना किसी चोट के आंखें लगातार लाल रहती हैं तो समझ लें कि आंखों की मांसपेशियों में ज्यादा तनाव आ गया है।

सिर में दर्द या भारीपन रहना:  आंखें भी हमारे दिमाग का ही हिस्सा हैं। इसलिए सिर दर्द या भारीपन महसूस होने लगे तो आंखों की नसों और मांसपेशियों में तनाव इसकी अहम वजह होती है।

दूर की निगाह हो जब कमजोर
अगर किसी शख्स को 6 फुट की दूरी पर मौजूद कोई भी ऑब्जेक्ट साफ दिखाई न दे तो वह मायोपिया का शिकार हो सकता है। ज्यादातर बच्चे मायोपिया वाले ही होते हैं। मायोपिया होने पर रेटिना पर बनने वाली इमेज उससे कुछ आगे बनने लगती है।
 
नजदीक देखने में जब हो दिक्कत
इसे हाइपरमेट्रोपिया भी कहते हैं। इसमें नजदीक की चीजों को देखने में परेशानी होती है। इमेज रेटिना के पीछे बनता है। यह परेशानी अमूमन 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में देखी जाती है।

सेहतमंद आंखों के लिए चंद बेहतरीन टिप्स

पलकें भी झपकाएं और दूर, बहुत दूर भी जरूर देखें
सेहतमंद आंखें चाहिए तो कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। इसमें जहां 20:20:20 का फॉर्मूला कारगर है, वहीं पलकें झपकाना भी बहुत जरूरी है। इनके अलावा धूप और खानपान पर भी ध्यान देना जरूरी है।

6/6 के लिए 6 जरूरी बातें
1. जब हम ज्यादा दूरी की चीजें देखते हैं तो हमारे आंखों की मांसपेशियां आराम करती हैं। 6/6 का मतलब है कि दोनों आंखें 6 मीटर की दूरी तक की चीजों को सही तरीके से पढ़ पा रही हों। आउटडोर गेम्स बंद हैं, इसलिए अगर सुबह धूप निकली है तो 9 से 12 बजे के बीच कम से कम 25-35 मिनट धूप जरूर सेकें। धूप से मिलने वाला विटामिन डी आंखों के लिए भी बहुत फायदेमंद हैं।
2. जब हम स्क्रीन पर लगातार देखते हैं तो पलकें झपकाना कम कर देते हैं। इससे आंखें ड्राई होने लगती हैं। हमें हर मिनट 20 से 25 बार पलकों को जरूर झपकाना चाहिए। स्क्रीन की पोजिशन आंखों की बराबरी पर हो तो बेहतर है। नीचे या ऊपर न हो।
3. अगर चश्मा नहीं लगा है तो हर 6 महीने पर और अगर चश्मा लगा है तो हर 3 महीने पर आंखों की जांच जरूर कराएं।
4. स्क्रीन पर पढ़ाई या काम करते समय हर 20 मिनट पर 20 सेकंड के लिए 20 फुट की दूरी तक जरूर देखना चाहिए। इससे आंखों का तनाव कम होता है। कंप्यूटर या लैपटॉप स्क्रीन की दूरी 1 आर्म डिस्टेंस यानी डेढ़ से दो फुट के करीब होनी चाहिए।
5. अगर पैरंट्स में से किसी को मायोपिया (दूरी की चीजें देखने में परेशानी) की शिकायत रही है तो यह उनके बच्चों में भी होने का खतरा ज्यादा होता है। इसलिए ऐसे पैरंट्स को सचेत होने की ज्यादा जरूरत है।
6. बच्चा पास में बैठा हो तो टीवी देखते हुए न्यूज चैनल पर उन छोटे अक्षरों को 6 फुट की दूरी से पढ़ने के लिए कहें, जिन्हें आप अच्छी तरह से पढ़ सकते हैं। इससे बच्चे की आंखों की स्थिति के बारे में पता चल जाएगा।

हर दिन आंखों से खेलें 20:20:20
- स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित करें। अगर यह मुश्किल है तो इस फॉर्म्यूले का इस्तेमाल करें। आंखों को नुकसान कम पहुंचेगा।
-20:20:20 नियम को याद रखना
- हर 20 मिनट में 20 बार पलकें झपकाना, फिर लगातार 20 सेकंड के लिए 20 फुट दूर देखना।
- इसके लिए मोबाइल में टाइमर सेट कर लें और आप बच्चे को इसे याद दिलाएं कि जितना जरूरी है क्लास करना, उतना ही जरूरी है इसे भी करना।
-यह नियम सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि विडियो गेम खेलते समय भी होना चाहिए। हालांकि, हर दिन ऑनलाइन क्लास के बाद 30 मिनट से 1 घंटा काफी है विडियो गेम के लिए। बेस्ट आधा घंटा है।
- अगर किताबें हैं तो ई-बुक से पढ़ाई न की जाए। इसी तरह आंखों को 10 बार ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं घुमाने के लिए भी कहें। यह आंखों की एक्सरसाइज है, दिन में 3 से 4 बार करना काफी होगा।
 
जब हम दूर देखते हैं तो आंखें कहती हैं 'थैंक्स'
कुदरत ने आंखों की बनावट ऐसी की है कि जब हम दूर देखते हैं तो यह आंखों के लिए सामान्य स्थिति होती है जबकि नजदीक की चीजों को देखने पर आंखों में मौजूद मांसपेशियों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। हम जितना नजदीक देखते हैं, आंखों की मांसपेशियों को मेहनत करके लेंस को सही सेटिंग्स पर लाना पड़ता है ताकि जो चीज हम देख रहे हैं उसकी इमेज रेटिना पर ही बने, उससे पहले नहीं। जब हम मोबाइल या लैपटॉप आदि स्क्रीन को लगातार करीब से देखते हैं तो इससे आंखों में मौजूद मांसपेशियां धीरे-धीरे थकने लगती हैं और बाद में कमजोर हो जाती हैं। एक तो मांसपेशियों को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, दूसरा आंखों पर पड़ने वाली अतिरिक्त लाइट और तीसरा पलकों का झपकना कम हो जाता है। दूर की निगाह भी यहीं से कमजोर होती हैं। आंखें खराब होने की शुरुआत होने में 2 से 3 महीने या फिर 1 साल का वक्त लग सकता है। अगर स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताया तो यह धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और हमारी आंखों के लिए पावर वाले चश्मे की जरूरत भी होती है। इसलिए स्क्रीन देखते हुए 20:20:20 का नियम फॉलो करें और स्क्रीन लगातार न देखें ताकि आंखों की मांसपेशियों को कुछ आराम मिल सके।  

पलकें झपकाना भी जरूरी
चाहे बच्चा हो या बड़ा, जब कोई मोबाइल या दूसरी स्क्रीन पर नजरों को टिकाए रखता है तो उसके पलकें झपकने की गति एक चौथाई रह जाती है।
-जब हम स्क्रीन पर नहीं होते हैं तब अमूमन एक मिनट में हम 20 से 25 बार पलकें झपकाते हैं।
- जब हम स्क्रीन पर होते हैं तब हम अमूमन एक मिनट में 5 से 6 बार ही पलकें झपकाते हैं।
- कुदरत ने अगर आंखें दी हैं तो पलकें भी दी हैं। पलकें सिर्फ धूल और कीड़ों आदि को आंखों तक पहुंचने से बचाने के लिए ही नहीं हैं। पलकों का काम इससे कहीं ज्यादा है।
- जब हम पलकें झपकाते हैं तो आंखों में मौजूद पानी जो बाहर निकलने पर आंसू बन जाता है, वह आंखों में एक परत बनाकर आंखों की ड्राइनेस खत्म कर देता है। वहीं लगातार स्क्रीन देखने से हम काफी कम पलकें झपकाते हैं। इससे आंखें ड्राई रहने लगती हैं।
- जब आंखें ड्राई होती हैं तो आंखों में खुजली होती हैं और आंखें लाल होती हैं। कई बच्चों और लोगों को आंखों में चुभन होती है। नतीजा यह होता है कि हम अपनी आंखों को बार-बार मलते हैं। इससे खुजली में तो आराम मिलता है, लेकिन आंखें ज्यादा लाल होने लगती हैं। लगातार ड्राइनेस रहने से आंखों में घाव होने की आशंका भी रहती है। इसलिए सामान्य तरीके से पलकें जरूर झपकाएं।

स्क्रीन टाइम की स्क्रीनिंग
हम यहां समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि किस उम्र से बच्चों को स्क्रीन देना चाहिए और कितनी देर के लिए।  

 2 साल तक        
- क्या करते हैं: बच्चों को विडियो दिखाकर खाना खिलाते हैं।      
वह कार्टून देखकर आसानी से खा लेता है।                
-क्या करना चाहिए: उसे खिलौनें आदि दें। मोबाइल, लैपटॉप या दूसरे स्क्रीन वाले गैजेट्स की आदत न डालें।
- 24 घंटे में कितनी देर के लिए स्क्रीन दें: 0 (शून्य) मिनट

3 से 5 साल
- क्या करते हैं: बहलाने के लिए मोबाइल दे देते हैं।    
ऑनलाइन क्लासेज भी शुरू हो जाती हैं।
- क्या करना चाहिए: ये बच्चे खिलौनों से खेलने लगते हैं। उन्हें ब्लॉक्स जैसे खिलौने दें ताकि दिमाग उलझा रहे।
- 24 घंटे में कितनी देर के लिए स्क्रीन दें: ज्यादा से ज्यादा 15-15 मिनट करके 2 बार यानी क्लास के बाद आधा घंटा से ज्यादा नहीं। याद रखें कि वह ऑनलाइन क्लास में करीब 1 घंटा अलग से स्क्रीन पर बिताता है।
- बचाव के लिए ये जरूर करें: 20:20:20 फॉर्म्यूला अपने सामने जरूर करवाएं। अगर मुमकिन हो तो दिन भर में आंखों को 3 से 4 बार पानी से धो दें।

6 से 10 साल  
- क्या करते हैं: अमूमन इस उम्र में बच्चा दूसरी से 5वीं तक चला जाता है। वह विडियो गेम के ऐप्स खुद ही डाउनलोड कर लेता है और हम उसे ऐसा करने देते हैं। समझते हैं कि बच्चा हाइटेक हो गया है, लेकिन परेशानी यहीं से शुरू होती है। पसंद का विडियो गेम मोबाइल या लैपटॉप में आने पर वह खेलने के मौके खोजता रहता है।
- क्या करना चाहिए: ऐसे बच्चों में ज्यादा देर तक स्क्रीन पर समय बिताने से मायोपिया के मामले आने लगते हैं। इसलिए जितना हो सके, स्क्रीन पर वक्त बिताने से उतना रोकें।
- 24 घंटे में कितनी देर के लिए स्क्रीन दें: चूंकि इस उम्र तक अमूमन ऑनलाइन क्लास 4 से 6 घंटे की हो जाती है। वैसे केंद्र सरकार की गाइडलाइंस के मुताबिक पहली से आठवीं क्लास तक के बच्चों के लिए एक दिन में कुल डेढ़ घंटे से ज्यादा ऑनलाइन क्लास नहीं होनी चाहिए। खेलने के लिए उसे मोबाइल एक बार में 15 मिनट से ज्यादा नहीं दें। यानी 4 से 6 बार। कुल 1 घंटा से ज्यादा नहीं।
- बचाव के लिए ये जरूर करें: 20:20:20 फॉर्म्यूले के साथ दिन में 2-3 बार बच्चों को खुद आंखों को धोने के लिए कहें।
 
11 से 13 साल
- क्या करते हैं: बच्चा टीन एज की तरफ कदम बढ़ा देता है। हम कम ध्यान देते हैं। यही कारण है कि कोरोना के इस माहौल में दूर की नजर कमजोर होने के सबसे ज्यादा मामले इसी उम्र में मिलते हैं। बच्चा अमूमन 4 से 6 घंटे ऑनलाइन क्लास करता है।
- क्या करना चाहिए: इस उम्र तक बच्चे इतने समझदार हो जाते हैं कि पैरंट्स अगर उन्हें स्क्रीन टाइम और सामान्य ज़िंदगी में तालमेल बिठाने के लिए कहें तो वे मान भी जाते हैं। उन्हें यह समझाएं कि आंखों के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा।
- 24 घंटे में कितनी देर के लिए स्क्रीन दें: दिनभर में 4 बार में 15-15 मिनट के लिए कुल 1 घंटा से ज्यादा नहीं।
n बचाव के लिए ये जरूर करें: 20:20:20 के नियम के साथ फिजिकल ऐक्टिविटी को भी बढ़ाने के लिए कहें।
 
13-14 साल से ऊपर वाले
- क्या करते हैं: बच्चे बड़े हो जाते हैं और जो बड़े हैं उन्हें कोई टोकने वाला नहीं होता। कभी सोशल मीडिया पर तो कभी मूवी या गेम पर। आंखों में खुजली, लाल होना आम रहता हैं।
- क्या करना चाहिए: स्क्रीन का टाइम तय करना चाहिए। हफ्ते में एक बार 12 घंटे तक स्क्रीन से दूर रहें। सुबह 8 से रात के 8 बजे तक।
-24 घंटे में कितनी देर के लिए स्क्रीन दें: ज्यादा से ज्यादा 1 से 2 घंटे तक ही समय स्क्रीन पर बिताना चाहिए।
-बचाव के लिए ये जरूर करें: सभी 20:20:20 नियम को जरूर मानें। हर दिन 10 मिनट योग और 20 मिनट की एक्सरसाइज करनी चाहिए। धूप में बैठना भी जरूरी है। 

रोशनी की हो सही डोज
आंखों को जितनी रोशनी सुकून दे, वही ठीक है। कमरे में रोशनी की जरूरत इन बातों पर निर्भर करती है...
1. कमरे का साइज क्या है: अगर कमरा 100 वर्ग फुट का स्क्वायर शेप में है तो एक 16 से 18 वॉट के LED बल्ब की रोशनी काफी होती है। पर यहां इस बात को समझना भी जरूरी है कि अगर वह कमरा किचन या बाथरूम या स्टडी रूम है तो इससे ज्यादा रोशनी भी हो सकती है। ऐसी जगहों पर लोग अक्सर ज्यादा रोशनी पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें साफ-सफाई ज्यादा रखनी होती है। बारीक काम ज्यादा करना होता है। वहीं बेडरूम के लिए ज्यादा रोशनी की जरूरत नहीं होती।
2. उस कमरे में किस उम्र का शख्स रहता है: रोशनी की जरूरत उम्र के हिसाब से होती है। 55 साल तक के शख्स के लिए अमूमन सामान्य रोशनी में ही काम चल जाता है। वहीं इससे ज्यादा उम्र वालों को ज्यादा रोशनी की जरूरत होती है।
3. घर की दीवारों का रंग कैसा है: अगर दीवारें सफेद रंग की हैं तो वह रोशनी को ज्यादा रिफ्लेक्ट करेंगी। वहीं किसी दूसरे गहरे रंग की हैं तो दीवारें रोशनी को सोख लेती हैं। गहरे की दीवारों के लिए ज्यादा वाट के बल्ब या ट्यूब की जरूरत होती है।

LED बल्ब (वाट में) कितनी चमक (लुमन्स में)        
4- 5 450
6- 8 890
9- 13 1,210
16- 20 1,750
25- 28 2,780

नोट: एक 10X10 वर्ग फुट के कमरे में 2400 लूमंस लाइट की जरूरत होती है जो एक 20 से 25 वाट की एक एलईडी ट्यूब या 9 से 13 वॉट के दो बल्ब से आसानी से पूरी हो जाती है। लैपटॉप या मोबाइल आदि में काम करते समय रोशनी का स्रोत या तो आपके सिर के ऊपर हों या फिर पीछे ताकि इनकी रोशनी स्क्रीन पर सीधे पड़े।  

रोशनी कौन-सी बेहतर
आजकल एलईडी ही सबसे ज्यादा चलन में है। सीएफएल लगभग बंद हो गया है और फिलामेंट वाले बल्ब की डिमांड कम है। दरअसल, एलईडी बल्ब या ट्यूब में कम वॉट में ज्यादा रोशनी मिलती है। इनकी लाइफ ज्यादा होती है और बिजली बिल भी कम आता है।
कौन-सा रंग लें
एलईडी सफेद, लाल, पीला आदि रंगों में मिलना है, लेकिन स्क्रीन पर काम करने के लिए सफेद लाइट को ही बेहतर माना गया है। सफेद रोशनी आंखों पर फालतू तनाव पैदा नहीं करती।

नोट: 1. आजकल लाइट को lux मानक में भी निकालते हैं। लूमंस को जब एरिया के हिसाब निकालते हैं तो उसे लक्स कहा जाता है।
2. कमरे में रोशनी को पर्याप्त तब माना जाता है जब रोशनी हर तरफ पहुंचे। हर कोने में पहुंचे।
3. एक एलईडी बल्ब की लाइफ औसतन 40 से 50 हजार घंटे तक मानी जाती है। कुछ कंपनियां 1 लाख घंटे तक का दावा करती हैं।

कम नींद और कम रोशनी से आंखों
को बड़ा नुकसान

क्या अंधेरे में मोबाइल या लैपटॉप चलाने से परेशानी हो सकती है?
मोबाइल या लैपटॉप चलाने पर इनकी स्क्रीन लाइट से हम सब कुछ देख और पढ़ लेते हैं। इसलिए हमें दूसरी लाइट की कमी महसूस ही नहीं होती। नतीजा यह होता है कि हम अंधेरे कमरे में या कम रोशनी में भी मोबाइल या लैपटॉप आदि चलाने लगते हैं। आजकल सर्दियों का मौसम है, इसलिए कुछ बच्चे और बड़े कंबल के अंदर लेटकर मोबाइल देखते हैं। कम रोशनी में इस तरह के किसी भी गैजेट को चलाना आंखों की सेहत के लिए खतरनाक है। ऐसे गैजेट्स को कम या बहुत ज्यादा रोशनी में चलाने से आंखों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसलिए रोशनी ऐसी होनी चाहिए जो आंखों को आराम दे, चुभे नहीं।

ल्यूब्रिकेंट आईड्रॉप की भूमिका क्या होती है?
वैसे तो आंखों पर पानी के छींटें से बेहतर चीज कोई नहीं, लेकिन कुछ लोगों को इससे भी ज्यादा फायदा नहीं होता। ऐसे में कुछ लुब्रिकेंट्स बाजार में उपलब्ध हैं जो OCT प्रोडक्ट हैं यानी इन दवाओं को लेने के लिए डॉक्टर के पर्चे की जरूरत नहीं होती। मेडिकल दुकानों पर आई लूब्रिकेंट्स मांगने पर मिल जाते हैं। यह ध्यान रखें कि डॉक्टर के पूछे बिना कभी भी आंखों में ऐंटिबॉयोटिक के ड्रॉप न डालें।

आंखों की सेहत के लिए नींद कितनी जरूरी?
नींद सिर्फ आंखों के लिए ही नहीं, शरीर के सभी अंगों के लिए जरूरी है। पहले कहा जाता था कि जो सोएगा, वो खोएगा, पर अब तो स्थिति ऐसी है कि जो न सोया, उसने सब कुछ खोया। इसलिए 7 से 8 घंटे की नींद जरूरी है। इससे दिमाग और आंखों को जोड़ने वाली नसें आराम करती हैं। हमारी पलकें आराम करती हैं। कोशिकाओं की मरम्मत होता है। ब्लड सर्कुलेशन ठीक रहता है। वैसे भी इस बात का अनुभव लोग कभी न कभी कर ही लेते हैं कि रतजगा होने पर दूसरा दिन कैसा गुजरता है, आंखें थकी-थकी सी रहती हैं और जलन भी महसूस होती हैं।

रोज देर रात काम करने से आंखों को नुकसान होता है?
देर रात काम करने का नुकसान तब है जब रोशनी पर्याप्त न हो और उसकी पोजिशन सही न हो। अगर पर्याप्त रोशनी है तो देर रात काम कर सकते हैं, लेकिन काम करने के बाद नींद जरूर पूरी करें। हालांकि रोज देर रात जगने के दूसरे शारीरिक नुकसान बहुत ज्यादा है। इसलिए कोशिश हो कि देर रात जगने की नौबत न आए।

क्या मोबाइल या लैपटॉप पर काम करने के लिए कुदरती रोशनी बेहतर है?
जरूरी यह नहीं है कि हम किस तरह की लाइट में काम करते हैं। कुदरती रोशनी का मतलब दिन के उजाले से है। पर कुछ ऐसे भी घर होते हैं जहां कुदरती रोशनी ठीक से नहीं पहुंचती। ऐसे घरों में रोशनी की सही व्यवस्था का होना जरूरी है। वैसे आंखों के लिए कुदरती रोशनी ही बेहतर है।

आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए अंगूठे पर ध्यान एकाग्र करने के लिए कहा जाता है। क्या यह तरीका सही है?
यह खास तौर पर उन लोगों के लिए है जिन्हें कंप्यूटर, मोबाइल पर काम करते हुए या फिर पढ़ते समय आंखों में दर्द रहता है। आंखें भारी रहती हैं। ऐसे में अंगूठे की जगह पेंसिल से इस एक्सरसाइज को किया जाना चाहिए। इसे कन्वर्जेंस एक्सरसाइज भी कहा जाता है।

कैसे करते हैं: इसके लिए किसी पेंसिल की टिप को नाक के सीध में डेढ़ से 2 फुट दूर रखा जाता है और फिर उसे धीरे-धीरे नाक की तरफ लाना होता है। इसमें यह देखा जाता है कि शख्स को धुंधला कहां से दिखना शुरू होता है। अगर नाक तक पहुंचने के बाद धुंधला दिखता है तो आंखें अमूमन ठीक मानी जाती हैं। इस एक्सरसाइज को डॉक्टर की सलाह से करें तो बेहतर है।

नेचरोपैथी वाले कहते हैं कि उगते सूरज को देखने पर चश्मा हट जाता है। आंखों की स्थिति ठीक हो जाती है?
सुबह उठने और उठकर योगाभ्यास व एक्सरसाइज करने से फायदा जरूर होता है। हम तंदुरुस्त रहते हैं। लेकिन सुबह उठकर सनराइज देखने से आंखों के चश्मे हट जाते हैं, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। हां, सुबह 9 से 12 के बीच धूप में बैठने से विटामिन जरूर मिलता है। इससे हड्डियां भी मजबूत होती हैं। वहीं कुछ लोग सुबह उठकर घास पर चलने से भी चश्मा हटाने की बात कहते हैं, इसका भी कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।



आंखों की गुस्ताखियां…

कोरोना ने जहां बच्चों का स्कूल छुड़वाया, वहीं इसका असर उनकी सेहत पर भी पड़ा है। आउटडोर गेम्स के बंद होने से उनका वजन भी बढ़ा है। वहीं लगातार स्क्रीन (मोबाइल, लैपटॉप, डेस्कटॉप, टीवी) देखने से आंखों पर होने वाले असर की चर्चा हम करते ही रहते हैं, लेकिन समस्या यह तब बढ़ जाती है जब आंखों पर पावर वाला चश्मा लगाने की जरूरत अचानक ही हो जाती है। अपनी आंखों की परेशानी के बारे में कई बार बच्चे बता नहीं पाते और हम समझ नहीं पाते। इससे स्थिति ज्यादा खराब हो जाती है। बच्चों की आंखों की परेशानी को आसानी से कैसे समझें, खुद और उन्हें इससे कैसे बचाएं, साथ ही हमारे लिए क्या है ध्यान रखने वाली बातें? एक्सपर्ट्स से बात कर पूरी जानकारी दे रहे हैं लोकेश के. भारती

बच्चे अपनी परेशानी को समझने और बताने में कई बार सक्षम नहीं होते। उन्हें जब तक बहुत ज्यादा दिक्कत न हो वे अपने पैरंट्स से कह ही नहीं पाते। कुछ दिन पहले ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। परिवार के साथ टीवी देख रहा था। सभी लोग सोफे पर बैठे हुए थे। एक हिंदी न्यूज चैनल में अफगानिस्तान की खबर चल रही थी। चैनल के नीचे छोटे फॉन्ट (टिकर) में दूसरी खबर चल रही थी। मेरे बराबर में मेरा 11 साल का बेटा, जो छठी क्लास में पढ़ता है, बैठा हुआ था। मैंने यूं ही उससे नीचे वाले टिकर को पढ़ने के लिए कह दिया। सोफे पर बैठे हुए वह पढ़ नहीं पाया जबकि मैं उसे पढ़ पा रहा था। पत्नी ने भी उसे पढ़ लिया। फिर मैंने उसे सोफे से उठकर टीवी के कुछ करीब जाकर पढ़ने के लिए कहा तो उसने छोटे फॉन्ट वाली खबर को अच्छी तरह पढ़ लिया। मैं समझ गया था कि शायद इसे चश्मा लगने वाला है। अगले दिन आई स्पेशलिस्ट के पास गया। जांच के बाद यह पता चल गया कि वाकई में उसे मायोपिया हो चुका है। अब उसे चश्मा लग चुका है। 

आजकल इस तरह की गलतियां बहुत हो रही हैं...
जब तक स्कूल खुला हुआ था, तब तक पढ़ाई वाइट या ब्लैक बोर्ड पर हो रही थी। सबसे आगे बैठने वाले बच्चे से भी बोर्ड की दूरी 5 फुट से ज्यादा होती थी जबकि बीच में और पीछे बैठने वाले बच्चे से तो 10 से 15 फुट की दूरी हो जाती थी। ऐसे में बच्चे को अगर बोर्ड पर साफ-साफ नहीं दिखता था तो वह कई बार इसकी शिकायत क्लास टीचर या पैरंट्स से कर देता था। नतीजा यह होता था कि समय रहते हुए उनका इलाज शुरू हो जाता था। वहीं स्कूल में भी साल में एक या दो बार बच्चों की आई टेस्टिंग भी हो जाती थी। इससे भी कई बच्चों को आगे होने वाली परेशानी के बारे में पता चल जाता था। कोरोना ने इस सिस्टम को ही पूरी तरह बंद कर दिया है।

पैरंट्स की तरफ से होने वाली गलतियां

-पहले पैरंट्स की निर्भरता स्कूलों पर बहुत ज्यादा थी, लेकिन बदलते माहौल में ये अभी तक खुद को पूरी तरह बदल नहीं पाए हैं, खासकर आई टेस्टिंग आदि को लेकर।
-पहले अगर स्कूलों में साल में एक या दो बार आंख, दांत आदि की जांच हो जाती थी तो अब यह जांच नहीं हो पा रही है। भले ही वे रुटीन जांच थीं, लेकिन काम की थीं। हां, हम उन्हें बहुत गंभीरता से कभी नहीं लेते थे। ऐसे में अब जब किसी बच्चे को घर पर रहते हुए देखने में परेशानी होने लगे तो उसके बारे में पता ही नहीं चल पाता। इसलिए आंखों का जांच कराना बहुत जरूरी है। 
-अगर पहले से चश्मा नहीं लगा है तो बच्चे की जांच हर छह महीने पर करानी चाहिए।
- अगर चश्मा लगा है तो यह जांच 3 महीने पर करानी चाहिए। 

इन लक्षणों को नजरअंदाज कभी न करें
चाहे बच्चा हो या फिर बड़ा, आंखों में पावर लगने से पहले वह इशारा जरूर करता है। अहम यह है कि हम उन इशारों यानी लक्षणों को कितना समझ पाते हैं। 
- सच तो यह है कि लैपटॉप, मोबाइल या डेस्कटॉप को नजदीक से ही देखा जाता है, इसलिए आंखों की परेशानी हो चुकी है, यह पता नहीं चलता। लेकिन जब बच्चा टीवी देखते समय भी नजदीक बैठने की ही कोशिश करे, पीछे सीट मिलने पर भी वह आगे बैठने की जुगत में हो तो समझें परेशानी है। इनके अलावा कुछ दूसरे लक्षण हो सकते हैं:
- आंखों से पानी आना
- आंखों में खुजली होना 
- लगातार आंखें लाल रहना
-सिर में दर्द या भारीपन रहना
-भेंगापन (Squint: अमूमन यह स्थिति तब बनती है जब बच्चे की एक आंख को ज्यादा पावर की जरूरत हो और दूसरी को कम, उसका इलाज न हो रहा हो या फिर चश्मा का पावर बदल गया हो, लेकिन उसका चश्मा नहीं बदला हो)

कितनी देर बिताएं स्क्रीन पर

2 साल तक के बच्चे
-इस उम्र तक के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना चाहिए। 
क्यों: हम बच्चों को पैदा होने के कुछ महीनों बाद ही मोबाइल की आदत लगाना शुरू कर देते हैं। अगर बच्चा खाना नहीं खा रहा है तो उसे मोबाइल में विडियो दिखाकर खाना खिलाते हैं। यह उनकी आंखों के लिए खतरनाक है।
क्या करें: गाकर खिलाएं, नाच कर खिलाएं, कैसे भी करें, लेकिन स्क्रीन की आदत न लगाएं।

3 से 5 साल तक के बच्चे
- दिन भर में 1 घंटे से ज्यादा नहीं बिताना चाहिए। 
क्यों: ऑनलाइन क्लास चल रही हैं। इस उम्र के बच्चों को 2 घंटे तो स्कूल के लिए ऑनलाइन बिताने पड़ते हैं। इसके बाद जब वे विडियो गेम खेलते हैं तो यह वक्त और बढ़ जाता है। यह गलत है। 
क्या करें: क्लास जरूरी है तो उसे मजबूरी में करानी पड़ेगी। लेकिन यह लगातार नहीं होना चाहिए। बीच-बीच में 20:20:20 के नियम (इस नियम के बारे में आगे बताया गया है) को भी फॉलो कराने की कोशिश होनी चाहिए। घर पर खेलने के लिए खिलौने होने चाहिए। पैरंट्स को भी उसके खेल में शामिल होना चाहिए।

6 से 10 साल तक के बच्चे
- दिनभर में डेढ़, 2 घंटे से ज्यादा नहीं
क्यों: इस उम्र के बच्चे दूसरी क्लास से 5वीं क्लास तक के होते हैं। ये ऑनलाइन क्लास के लिए खुद ही स्क्रीन पर बैठने लगते हैं। इनकी क्लास 3 से 4 घंटे तक चलती है। यह ज्यादा है। इसके बाद भी ये विडियो गेम में अपना काफी समय देते हैं।
क्या करें: 20:20:20 के नियम को जरूर फॉलो करें। क्लास के बीच में कम से 1 बार उठकर सामान्य पीने वाले हल्के ठंडे पानी से आंखों पर पानी डालने के लिए कहें। 

11 से 13 साल तक के बच्चे
- दिनभर में 2 से 3 घंटे से ज्यादा नहीं
क्यों: बच्चे 4 से 6 घंटे तक स्क्रीन पर नजर जमा कर रखते हैं। क्लास के लंबे पीरियड्स होते हैं। 
क्या करें: इस उम्र तक बच्चे इतने समझदार हो जाते हैं कि पैरंट्स अगर उन्हें स्क्रीन टाइम और सामान्य जिंदगी में तालमेल बिठाने के लिए कहे तो वे मान भी जाते हैं। उन्हें यह समझाएं कि आंखों के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। 20:20:20 के नियम के साथ फिजिकल ऐक्टिविटी को भी बढ़ाने के लिए कहें। अगर मुमकिन हो तो घर पर ही एक्सरसाइज आदि करने को कहें। 

13 साल से ऊपरवाले 
ऐसे सभी लोगों को ज्यादा से ज्यादा 3 से 4 घंटे तक ही स्क्रीन पर बिताना चाहिए, लेकिन यह मुमकिन नहीं होता। इसलिए सभी को 20:20:20 नियम को जरूर मानना चाहिए। हर दिन 10 मिनट का योग और 20 मिनट की एक्सरसाइज जरूर करनी चाहिए। इनके अलावा धूप में बैठना भी बहुत जरूरी है। ध्यान रहे कि विटामिन-डी की कमी की वजह से भी मायोपिया की परेशानी हो सकती है।

6/6 के लिए 6 जरूरी बातें...
1. जब हम ज्यादा दूर देखते हैं तो हमारे आंखों की मांसपेशियां आराम करती हैं। 6/6 का मतलब है कि दोनों आंखें 6 मीटर की दूरी तक की चीजों सही तरीके से पढ़ पा रही हों। आउटडोर गेम्स बंद हैं, इसलिए हर सुबह 8 से 12 बजे 25-35 मिनट धूप जरूर सेकें।
2. जब हम स्क्रीन पर लगातार देखते हैं तो हम पलकों का झपकना कम कर देते हैं, इससे आंखें ड्राई होने लगती हैं। हमें हर मिनट 20 से 25 बार पलकों को जरूर झपकाना चाहिए।
3. अगर चश्मा नहीं लगा है तो हर छह महीने पर और अगर चश्मा लगा है तो हर 3 महीने पर आंखों की जांच जरूर कराएं। इससे आंखों की परेशानी से बच सकते हैं।
4. स्क्रीन पर पढ़ाई या काम करते समय, हर 20 मिनट पर 20 सेकंड के लिए 20 फुट की दूरी तक जरूर देखना चाहिए। इससे आंखों का तनाव कम होता है। साथ ही स्क्रीन की दूरी 1 आर्म डिस्टेंस यानी डेढ़ से दो फुट के करीब होनी चाहिए।
5. अगर पैरंट्स में से किसी को मायोपिया (दूरी की चीजें देखने में परेशानी) की शिकायत रही है तो यह उनके बच्चों में भी होने का खतरा ज्यादा होता है। इसलिए ऐसे पैरंट्स को ज्यादा सचेत होने की जरूरत ज्यादा रहती है। 
6. बच्चा पास में बैठा हो तो टीवी दिखाते हुए छोटे फॉन्ट की लाइन्स को 6 फुट की दूरी से पढ़ने के लिए कहें, जिन्हें आप अच्छी तरह से पढ़ सकते हैं। इससे बच्चे की आंखों की स्थिति के बारे में पता चल जाएगा।

क्या है मायोपिया
अगर किसी शख्स को 6 फुट की दूरी पर मौजूद कोई भी ऑब्जेक्ट साफ दिखाई न दे तो वह मायोपिया का शिकार हो सकता है। जिन बच्चों को पावर का चश्मा लगाने की बात कही जाती है, उनमें से ज्यादातर मायोपिया वाले ही होते हैं। मायोपिया होने पर रेटिना (हम किसी भी चीज को तब ही देखकर समझते और पहचानते हैं जब उसकी इमेज आंख के अंदरूनी भाग रेटिना पर बनती है) पर बनने वाली इमेज उससे कुछ आगे बनने लगती है। इसकी वजह होती है हमारे आईबॉल में आई हुई परेशानी।

दूर देखने के लिए बनी हैं हमारी आंखें...
कुदरत ने आंखों की बनावट ऐसी की है कि जब हम दूर देखते हैं तो यह आंखों के लिए सामान्य स्थिति होती है जबकि नजदीक की चीजों को देखने पर आंखों में मौजूद मांसपेशियों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। हम जितना नजदीक देखते हैं, आंखों की मांसपेशियों को मेहनत करके लेंस को सही सेटिंग्स पर लाना पड़ता है ताकि जो चीज हम देख रहे हैं उसकी इमेज रेटिना पर ही बने, उससे पहले नहीं। जब हम मोबाइल या लैपटॉप आदि स्क्रीन को लगातार करीब से देखते हैं तो इससे आंखों में मौजूद मांसपेशियां धीरे-धीरे थकने लगती हैं और बाद में कमजोर हो जाती हैं। एक तो मांसपेशियों को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, दूसरा आंखों पर पड़ने वाली अतिरिक्त लाइट और तीसरा पलकों का झपकना कम हो जाता है। मायोपिया की स्थिति भी यहीं से बनती हैं। आंख खराब होने की शुरुआत होने में 2 से 3 महीने या फिर 1 साल का वक्त लग सकता है। अगर स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताया तो यह धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और हमारी आंखों के लिए पावर वाले चश्मे की जरूरत भी। यही कारण है कि स्क्रीन देखते हुए 20:20:20 का नियम फॉलो करने और लगातार देखने मना किया जाता है ताकि आंखों की मांसपेशियों को कुछ आराम मिल सके।  

पलकें झपकाना भी जरूरी
चाहे बच्चा हो या बड़ा जब कोई मोबाइल या दूसरी स्क्रीन पर नजरों को टिकाए रखता है तो उसके पलक के गिरने की गति एक चौथाई रह जाती है। 
-जब हम स्क्रीन पर नहीं होते हैं तब अमूमन एक मिनट में हम 20 से 25 बार पलक झपकते हैं।
- जब हम स्क्रीन पर होते हैं तब हम अमूमन एक मिनट में 5 से 6 बार ही पलक झपकते हें। 

जब पलकें कम झपकती हैं तो परेशानी हो जाती है शुरू
कुदरत ने अगर आंखें दी हैं तो पलकें भी दी हैं। पलकें सिर्फ धूल और कीड़े आदि को आंखों तक पहुंचने से बचाने के लिए ही नहीं हैं। पलकों का काम इससे कहीं ज्यादा है। जब हम पलक झपकते हैं तो आंखों में मौजूद पानी जो बाहर निकलने पर आंसू बन जाते हैं, वह आंखों में एक परत बनाकर आंखों की ड्राइनेस को खत्म कर देती है। वहीं लगातार स्क्रीन देखने से हम काफी कम पलक झपकाते हैं, इससे आंखों ड्राई रहने लगती हैं। 
जब आंखें ड्राई होती हैं तो आंखों में खुजली होती हैं और आंखें लाल होती हैं। कई बच्चों और लोगों को आंखों में चुभन होती है। नतीजा यह होता है कि हम अपनी आंखों को बार-बार मलते हैं। इससे खुजली में तो आराम मिलती है, लेकिन आंखें ज्यादा लाल होने लगती हैं। इसलिए पलकें जरूर झपकाएं।

इन ऐप्स की मदद से घर पर ही कर सकते हैं टेस्ट
1. Eye exam, 2. Eye test
- ये दोनों फ्री एेप है जो एेंड्रॉयड और iOS दोनों प्लैटफाॅर्म के लिए उपलब्ध हैं। 
-इन्हें डाउनलोड करते समय, इसके उपयोग करने का तरीका भी देख लें। 
- घर पर आंखों की जांच करते समय मोबाइल या लैपटॉप को आंखों से 40 सेमी/16 इंच की दूरी पर रखें। दूरी को स्केल से नाप लें।
- वैसे घर पर टेस्टिंग से इस बात का अंदाजा चल जाता है कि आंखों में परेशानी हो गई है। निर्णय पर पहुंचने के लिए डॉक्टर से जरूर करानी चाहिए।

20:20:20 नियम को याद रखना
-हर 20 मिनट में 20 बार पलक झपकना फिर 20 सेकंड के लिए 20 फुट दूर देखना।
-इसके लिए मोबाइल में टाइमर सेट कर लें और आप बच्चे को इसे याद दिलाएं कि जितना जरूरी है क्लास करना, उतना ही जरूरी है इसे भी करना। 
-यह नियम सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि विडियो गेम खेलते समय भी होना चाहिए। हालांकि, हर दिन ऑनलाइन क्लास के बाद 30 मिनट से 1 घंटा काफी है विडियो गेम के लिए।
-अगर बुक हाथ में हो तो ई-बुक में पढ़ाई को टालने के लिए कहें। इसी तरह आंखों को 10 बार ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं घुमाने के लिए भी कहें। यह आंखों की एक्सरसाइज है, दिन में 3 से 4 बार करना काफी होगा।

कैसे दूर हो मांसपेशी की कमजोरी
मायोपिया की परेशानी आंखों में मौजूद मांसपेशी के कमजोर होने से होती है। जब किसी 17 साल से कम उम्र के टीनएजर या बच्चे को मायोपिया हो जाए तो डॉक्टर 0.01%Atropine की दवा भी लिखते हैं। इससे आंखों की मांसपेशियां आराम की स्थिति में पहुंच जाती हैं। लेकिन यहां इस बात को समझना भी जरूरी है कि इसको बिना डॉक्टर से पूछे नहीं लेना चाहिए। यह उनके लिए होती है जिनमें चश्मा लगने के बाद भी मायोपिया के बढ़ने की आशंका बनी रहती है। अगर पहली जांच के 3 महीने बाद डॉक्टर ने दोबारा जांच की और पावर बढ़ गया तो Atropine की एक-एक बूंद देने के लिए कह सकता है। 

...तो एक नजर इधर भी

लाइट कैसी हो?
-  कमरे की लाइट ज्यादा ब्राइट भी नहीं होनी चाहिए और न ही ज्यादा कंट्रास्ट। इसे ऐसे समझ सकते हैं जब कमरे की लाइट से पढ़ने में न ज्यादा मेहनत करनी पड़े और न वह आंखों को सामान्य लगे।
- लाइट वाइट या यलो कलर दोनों ठीक हैं।
-स्क्रीन के लिए डार्क मोड की जरूरत रात 9 बजे के बाद ही खासतौर पर होती है। दरअसल, ब्लू लाइट में काम करने से हमारी नींद भाग जाती है। अगर हम रात में डार्क मोड में काम करेंगे तो नींद कुछ कम खराब होगी।
- लाइट का फोकस किताब पर ज्यादा हो, न कि आंखों पर।
- पहले टेबल लैंप में पढ़ने का तरीका अपनाया जाता 
    था, इससे आंखों पर रोशनी कम पड़ती थी और किताबों पर ज्यादा।
- अगर रिवाइज करना हो तो किताब ही विकल्प होना चाहिए, पीसी या टीबी नहीं।
- क्रिएटिविटी के लिए कॉपी या ड्राइंग बुक एक सही विकल्प है जब तक ऑनलाइन क्लास चल रही है। ताकि स्क्रीन टाइम कम हो सके।
- कोशिश यह होनी चाहिए कि स्क्रीन की लाइट, कमरे की लाइट जितना ही हो।
-अंधेरे में कम रोशनी स्क्रीन पर निगाह डालने से आंखों पर ज्यादा तनाव आता है। इसलिए डिम लाइट में स्क्रीन पर काम नहीं करना चाहिए।

स्क्रीन की दूरी और बैठने का तरीका?
- लैपटॉप, मोबाइल आदि स्क्रीन की आंखों से दूरी 1 आर्म डिस्टेंस यानी कंधे से हथेली की दूरी जो बच्चों के लिए डेढ़ फुट और बड़ों के लिए 2 फुट है, रहना चाहिए।
- स्क्रीन की पोजिशन आंखों से थोड़ा नीचे 5 से 10 डिग्री कम रखना चाहिए।
- स्क्रीन को आंखों की तुलना में ऊपर कभी नहीं रखना चाहिए, इससे आंखों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। 
- जब हम लैपटॉप या डेस्कटॉप पर काम करते हैं या फिर बच्चे क्लास करते हैं तो उनकी बैकबोन या रीढ़ की हड्डी सीधी होनी चाहिए। इससे पीठ दर्द होने की आशंका कम रहती है। 

क्या टीवी भी है खतरनाक?
चूंकि टीवी हम एक दूरी से देखते हैं। यह दूरी अमूमन 5 फुट से ज्यादा होती है। ऐसे में आंखों की मांसपेशियों को उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती, जितना कि मोबाइल या लैपटॉप आदि को देखने के दौरान करना पड़ता है। फिर भी लगातार नहीं देखना चाहिए। टीवी देखते हुए भी हर आधे या एक घंटे पर आंखों को जरूर आराम देना चाहिए।

एसी से क्या है नुकसान? 
अगर सोते या जागते हुए एसी की हवा सीधी आंखों पर लग रही हो तो आंखें जल्दी ड्राई होने लगती हैं। इससे सुबह उठने पर आंखों में खुजली होने लगती है। आंखें लाल होने लगती है। इसलिए कोशिश यह होनी चाहिए कि एसी की हवा सीधी आंखों पर न पड़े, खासकर बच्चों की आंखों पर तो सीधी न ही पड़े।  

आंखों में कीचड़ क्यों आती है?
अगर आंखों में इंफेक्शन नहीं है तो यह भी ड्राइनेस की निशानी हो सकती है। दरअसल, जब हम सोते हैं तो कई बार डस्ट आदि की वजह से आंसू निकलने वाली ग्रंथि बंद हो जाती है। इससे आंखें चिपक जाती हैं या कीचड़ आ जाती है। कीचड़ हल्का या कभी-कभी आने से परेशान नहीं होना चाहिए। लेकिन जब यही कीचड़ लगातार 3 से ज्यादा दिनों से आए और ज्यादा मात्रा में आए तो डॉक्टर से दिखाना चाहिए। अगर पीला कीचड़ आ रहा है तो यह बैक्टीरियल इंफेक्शन की वजह से हो सकती है। 

क्या पानी के छींटों से फायदा होता है?
- दिनभर में 3 से 4 बार आखों को सामान्य या हल्का ठंडा पीने वाले पानी से धोना चाहिए। इससे आंखों में मौजूद गंदगी साफ हो जाती है और कीचड़ बनने की आशंका भी कम हो जाती है। 
-सीधे टैब के पानी को आंखों में डालने से बचें। उनमें बैक्टीरिया हो सकता है। 

खानपान और विटामिनों से कितना फायदा?
-मायोपिया की परेशानी को बढ़ाने में खानपान की भूमिका भी होती है। अगर हमारी डाइट में विटामिन ए और डी की कमी होगी तो मायोपिया होने का खतरा बना रहता है। जहां तक विटामिन ए की बात है तो इसके स्रोत गाजर, हरी साग-सब्जियां, ताजे फल आदि हैं। हर दिन एक मौसमी फल और एक कटोरी सब्जी खानी चाहिए। 7 साल तक के बच्चों को आधा फल और आधी कटोरी सब्जी दे सकते हैं। अगर सब्जी अलग से नहीं खाते तो दाल में ही हरी सब्जियों को मिलाकर पका कर दें। वहीं इससे ज्यादा बड़े बच्चे को एक फल और एक कटोरी सब्जी देना चाहिए। 
विटामिन-डी की भी अहम भूमिका: यह सुनकर थोड़ा आश्चर्य होता है कि विटामिन-डी तो हड्डियों के लिए जरूरी चीज है, यह आंखों के लिए अहम क्यों हो जाता है। सचाई तो यह है कि जिन बच्चों को अमूमन मायोपिया हुआ है, उनमें विटामिन-डी की कमी भी देखी गई है। विटामिन-डी कमी की वजह से आंखों के अंदर मौजूद मांसपेशियां भी जल्दी कमजोर होने लगती हैं। दरअसल, कोरोना की वजह से बच्चे बाहर खेलने नहीं जा रहे और बड़े वॉकिंग को भी टालते हैं। ऐसे में उनका धूप में निकलना कम हो गया है। साथ ही फिजिकल ऐक्टिविटी कम होने से ब्लड सर्कुलेशन भी तेज नहीं हो पाता। अतिरिक्त ऊर्जा का 
भी शरीर में जमा होने लगता है। इससे भी परेशानी बढ़ जाती है। विटामिन डी की कमी की वजह से शरीर कैल्शियम को भी सही तरीके से जज्ब नहीं कर पाता। इसलिए जब तक बाहर धूप में खेलने नहीं जा रहे हैं, हर एक को धूप में...
- हर दिन सुबह 8 से 12 बजे  25 से 35 मिनट बिताना चाहिए।
-पैरंट्स खुद भी बैठें और बच्चे को भी बिठाएं। उनसे बातें करें। कुछ सुनाने के लिए बोलें। 
- पैरंट्स हर दिन बच्चों को 10 मिनट योग और एक्सरसाइज करवाएं। अगर बच्चे योग न करना चाहें तो 10 मिनट का डांस भी काफी है। 


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