*कुभलगढ़ किला* घूमने के लिए बेहतरीन जगह
भारत में ऐतिहासिक स्थलों की कोई कमी नहीं है। यहां एक से बढ़कर एक महल और किले हैं, जो देखने लायक है। यदि आप इतिहास में रूचि रखते हैं और किलों और महलों को देखने का शौक है, तो आपको राजस्थान जरूर जाना चाहिए। इस राज्य में कई पहाड़ी किले हैं, जिनमें से एक है कुम्भलगढ़ किला | करीब 3,600 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह किला घूमने के लिए एक बेहतरीन जगह है। यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग घूमने के लिए आते हैं। इस किले से आप थार रेगिस्तान के सुंदर दृश्यों का आनंद उठा सकते हैं। जब भी आपको मौका मिले, एक बार इस किले की जरूर सैर कर आएं। आइए आपको बताते है इस किले की कुछ खास बाते
कुम्भलगढ़ दुर्ग का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के ढ़लवाये जिन पर दुर्ग और उसका नाम अंकित था। वास्तुशास्त्र के अनुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर, जलाशय, बाहर जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल, मंदिर, आवासीय इमारतें, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियां आदि बने है।
निर्माणकर्ता
इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुंभा ने सन 13 मई 1459 वार शनिवार को कराया था।
उपनाम *अजय गढ़*
इस किले को 'अजयगढ' कहा जाता था क्योंकि इस किले पर विजय प्राप्त करना दुष्कर कार्य था।राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित इस किले को अजेयगढ़ उपनाम से भी जाना जाता था, क्योंकि इस किले पर विजय प्राप्त करना किसी भी राजा के लिए बेहद ही मुश्किल काम था।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार
आपने चीन की गेट वॉल ऑफ चाइना के बारे में तो सुना होगा, लेकिन कुंभलगढ़ को भारत की महान दीवार कहा जाता है। इस किले की दीवारे लगभग 36 किमी लम्बी है। उदयपुर के जंगल से 80 किमी उत्तर में स्थित, कुंभलगढ़ किला चित्तौड़गढ़ किले के बाद राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा किला है। अरावली पर्वत माला पर समुद्र तल से 1,100 मीटर (3,600 फीट) की पहाड़ी की चोटी पर निर्मित, कुंभलगढ़ के किले परिधि की दीवारें है जो 36 किमी (22 मील) तक फैली हुई हैं और 15 फीट चौड़ी है, जो इसे दुनिया की सबसे लंबी दीवारों में से एक बनाती है। अरावली रेंज में फैला कुम्भलगढ़ किला मेवाड़ के प्रसिद्ध राजा महाराणा प्रताप का जन्म स्थान है। यही कारण है कि इस किले के दिलों में राजपूतों का विशेष स्थान है। 2013 में विश्व विरासत समिति के 37 वें सत्र में किले को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।
कुभलगढ़ किले की संरचना:
किला सात विशाल द्वारों के साथ बनाया गया है। इस भव्य किले के अंदर की मुख्य इमारते बादल महल, शिव मंदिर, वेदी मंदिर, नीलकंठ नाम दिए गए हैं।
दुर्ग से पहले केलवाड़ा नामक एक प्राचीन कस्बा हुआ है जहाँ स्थित एक गढ़ी में बाणमाता का प्रसिद्ध मंदिर है। दुर्ग में स्थित महलों तक पहुंचने के लिये गोल घुमावदार रास्ता पार करना पड़ता है तथा एक एक करके ओरठ पोल, हल्ला पोल, हनुमान पोल, विजय पोल, भैरव पोल, नींबू पोल, चौगान पोल, पागड़ा पोल और गणेश पोल नामक कुल नौ द्वार पार करने पड़ते हैं।
केलवाड़ा से चलने के बाद ओरठ पोल और हल्ला पोल पार करने के बाद दुर्ग का मुख्य द्वार आता है जिसे हनुमान पोल कहते हैं। यहाँ हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। यह माण्डव्यपुर (मण्डोर) से लाई गई थी। इसका उल्लेख कीर्ति स्तंभ की प्रशस्ति में भी है। यह मूर्ति महाराणा कुंभा द्वारा माण्डव्यपुर (मण्डोर) पर प्राप्त की गई विजय की प्रतीक है। इसकी चरण चौकी पर वि.सं. 1515 फाल्गुन मास का लेख खुदा हुआ है। हनुमानपोल के बाद विजयपोल आता है जिसमें प्रवेश करने पर मध्यकालीन मंदिर, मण्डप, स्मारक दिखाई देते हैं।
महादेव मंदिर और मम्मदेव मंदिर हैं। कुंभलगढ़ किला परिसर में लगभग 360 मंदिर हैं, जिनमें से 300 जैन मंदिर हैं और बाकी हिंदू हैं। इस किले की एक विशेषता यह भी है कि यह भव्य किला वास्तव में कभी युद्ध में नहीं जीता गया था। हालांकि इसे केवल एक बार मुगल सेना ने धोखे से हथियाने का प्रयास किया था, जब उन्होंने किले की जल आपूर्ति में जहर मिला दिया था किले के अंदर बने कमरों के साथ अलग-अलग खंड हैं और उन्हें अलग-अलग
किले की एक विशेषता यह भी है कि यह भव्य किला वास्तव में कभी युद्ध में नहीं जीता गया था। हालांकि इसे केवल एक बार मुगल सेना ने धोखे से पकड़ लिया था जब उन्होंने किले की जल आपूर्ति में जहर मिला दिया था।
कटारगढ़
इस दुर्ग के भीतर एक और
गढ़ है जिसे "कटारगढ़" के नाम से जाना जाता है। यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुद्रढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है। इस गढ़ के शीर्ष भाग में बादल महल है व कुम्भा महल सबसे ऊपर है।
कुंभलगढ़ के भीतर एक पहाड़ी के शिखर पर एक और दुर्ग स्थित है जिसे कटारगढ़ कहते हैं। यह गढ़ भी द्वारों एवं प्राचीरों से सुरक्षित है। भीतरी दुर्ग में प्रवेश करने से पहले देवी का मंदिर आता है। महाराणा, युद्ध अभियान पर जाते समय देवी की आज्ञा लेकर जाते थे और लौटकर सबसे पहले देवी को प्रणाम करते थे। कटारगढ़ में झाली महल, बादल महल ( कुंभा महल), तालाब, तोपखाना, बंदीगृह, अन्नागार, अस्तबल और कुछ मंदिर स्थित हैं। बादल महल की छत पर भित्तिचित्र बने हुए हैं। महल के द्वार तथा झरोखे आनुपातिक रूप से छोटे हैं। यहाँ के महलों की छत से पूरे दुर्ग का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। साथ ही मेवाड़ राज्य की सीमा पर स्थित मारवाड़ राज्य दिखाई देता है।
रणकपुर जैन मंदिर: भारतीय शिल्पकला का अद्भुत नमूना रणकपुर स्थित जैन मंदिर तीर्थंकार रिषभनाथ को समर्पित है। मार्बल से बने इस मंदिर में कुल 1444 खंभे हैं, जिन पर अलग-अलग नक्काशी की गई है। ऐसा माना जाता है कि कोई भी इन खंभों को आज तक गिन नहीं पाया है, क्योंकि जब भी कोई गिनती करता है, तो एक खंभा कम हो जाता है या फिर एक खंभा ज्यादा एक ही नंबर कभी नहीं आता। राणा कुंभा ने इस कस्बे और मंदिर को बनाने में मदद की थी, इसलिए इसका नाम उनके नाम से ही रणकपुर रखा गया इस मंदिर में आपको अद्भुत भारतीय शिल्पकला देखने का सुनहरा अवसर मिलता है। मंदिर के चार मुख्य द्वार है। मंदिर की छत में ठीक मूर्ति के सामने कल्पतरु का वृक्ष बनाया गया है। कुंभलगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी रोमांचक जीप सफारी जंगली जानवरों को नजदीक से देखने के रोमांच का अनुभव करना चाहते हैं, तो कुभलगढ़ वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में जीप सफारी का आनंद जरूर उठाएं। यहां आपको तेंदुआ से लेकर नील गाय, सांभर, लंगूर जैसे तमाम जंगली जानवर देखने को मिलेंगे। साथ ही आपको कई नए पक्षी भी देखने को मिल जाएंगे। यहां एक क्षेत्र खासतौर से मोर का है, जहां आपको अनगिनत मोर नजर आएंगे जंगल सफारी के दौरान आपको कई पेड़-पौधे और जड़ी- बूटियां भी देखने को मिलेंगी, जिनका स्थानीय लोग उपचार के लिए इस्तेमाल करते हैं। इस जंगल में आपको एक खास पेड़ देखने को मिलेगा, जिसका दो घंटे लगते हैं। नाम है- घोस्ट ट्री जी हां, यह पेड़ एकदम सफेद रंग का होता है, जो रात में चमकता है, इसीलिए इसे घोस्ट ट्री कहते हैं। यहां दिन में तीन सफारी करवाई जाती है और नाइट सफारी की भी व्यवस्था है। अगर आप ज्यादा से ज्यादा जानवरों को देखना चाहते हैं, तो सुबह की बजाय शाम के अंतिम शेड्यूल में सफारी पर जाएं।
इतिहास
महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर कुंवर पृथ्वीराज और राणा सांगा का बचपन बीता था। उड़वा राजकुमार कुंवर पृथ्वीराज की छतरी भी इस दुर्ग में देखी जाती है | महाराणा उदय सिंह को भी पन्ना धाय ने इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था। हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी दुर्ग में रहे। इस दुर्ग के बनने के बाद ही इस पर आक्रमण शुरू हो गए लेकिन एक बार को छोड़ कर ये दुर्ग प्राय: अजय ही रहा है लेकिन इस दुर्ग की कई दुखांत घटनाये भी है जिस महाराणा कुम्भा को कोई नहीं हरा सका वही शुरवीर महाराणा कुम्भा इसी दुर्ग में अपने पुत्र ऊदा सिंह द्वारा राज्य पिपासा में मारे गए। कुल मिलाकर दुर्ग ऐतिहासिक विरासत की शान और शूरवीरों की तीर्थ स्थली रहा है।
माड गायक इस दुर्ग की प्रशंसा में अक्सर गीत गाते हैं :
कुम्भलगढ़ कटारगढ़ पाजिज अवलन फेर।
संवली मत दे साजना, बसुंज, कुम्भल्मेर॥
इस किले की ऊँचाई के संबंध में अबुल फजल ने लिखा है कि "यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।" कर्नल जेम्स टॉड ने दुर्भेद्य स्वरूप की दृष्टि से चित्तौड़ के बाद इस दुर्ग को रखा है तथा इस दुर्ग की तुलना (सुदृढ़ प्राचीर, बुर्जों तथा कंगूरों के कारण) 'एट्रस्कन' से की है।
क्लब महिंद्राः
प्रकृति की गोद में शानदार आतिथ्य अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं से घिरे कुंभलगढ़ क्लब महिंद्रा रिजॉर्ट में आपको प्रकृति के स्पर्श का अनुभव होता है। इसके स्विमिंग पूल फन जोन और रेस्टोरेंट आपको बेस्ट क्वालिटी रोशनी जलाई जाती है।
टाइम बिताने का मौका देते हैं। यकीनन आप यहां से अविस्मरणीय यादें लेकर जाएंगे।
महाराणा प्रताप का जन्मस्थानः
कुंभलगढ़ किला मेवाड़ महान योद्धा बहादुर महाराणा प्रताप का जन्मस्थान भी है, जिन्होंने विशाल मुगलों के आगे कभी घुटने नहीं टेके किले के ऊपर से आपको कुम्भलगढ़ के किले के आगे दूर-दूर तक फैले हरे-भरे पहाड़ों की परतें दिखाई देंगी।
किले का स्थापत्य व अन्य स्थल
- दुर्ग की प्राचीर 36 मील लम्बी व 7 meter ही चौड़ी है जिस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं, इसलिए इसे भारत की महान दीवार के नाम से जाना जाता है।
- किले के उत्तर की तरफ का पैदल रास्ता 'टूट्या का होड़ा' तथा पूर्व की तरफ हाथी गुढ़ा की नाल में उतरने का रास्ता दाणीवहा' कहलाता है। किले के पश्चिम की तरफ का रास्ता 'हीराबारी' कहलाता है जिसमें थोड़ी ही दूर पर किले की तलहटी में महाराणा रायमल के 'कुँवर पृथ्वीराज की छतरी' बनी है, इसे 'उड़वाँ राजकुमार' के नाम से जाना जाता है। पृथ्वीराज स्मारक पर लगे लेख में पृथ्वीराज के घोड़े का नाम 'साहण' दिया गया है।
- किले में घुसने के लिए आरेठपोल, हल्लापोल, हनुमानपोल तथा विजयपाल आदि दरवाजे हैं। कुम्भलगढ़ के किले के भीतर एक लघु दुर्ग कटारगढ़' स्थित है जिसमें 'झाली रानी का मालिया' महल प्रमुख है।
- इस दुर्ग में मंदिर वास्तुकला और स्थापत्य कला दर्शनीय है।
- नीलकंठ महादेव मंदिर,चांमुडाली देवी का मंदिर प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक सुरक्षित और भव्य है।
वहां कैसे पहुंचे और टिकट की कीमतः
कुंबलगढ़ सड़क मार्ग से उदयपुर से 82 किमी उत्तर पश्चिम में स्थित है। कैब लेने पर आपको लगभग पांच हजार रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं, साथ ही आप किराए पर एक वाहन भी ले सकते हैं जो काफी सस्ता और मजेदार विकल्प है और उदयपुर से कुंभलगढ़ पहुंचने में लगभग 2 घंटे का समय लगता है।
लाइट एंड साउंड शो
हर शाम एक लाइट एंड साउंड शो होता है जो शाम 6.45 बजे शुरू होता है और यदि आप यहां आए हैं, तो आपको इसे एक बार जरूर देखना चाहिए 45 मिनट का शो एक आकर्षक अनुभव है जो किले के इतिहास को जीवंत कर देता है। यह शाम 6.45 बजे शुरू होता है और अंत तक आते-आते यहां काफी अंधेरा हो जाता है इसलिए सलाह दी जाती है कि बाहर निकलने के लिए टॉर्च का इस्तेमाल करें। किले को रोशन करने के लिए शाम के समय विशाल रोशनी जलाई जाती है।
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