जलियांवाला बाग, अमृतसर, पंजाब भारत

जलियांवाला बाग, अमृतसर, पंजाब भारत

जलियांवाला वाग हत्याकांड भारत के स्वाधीनता आंदोलन की सबसे त्रासद घटना थी। साहित्य के आइने में इस घटना का सजीव और मार्मिक चित्रण द्रवित कर देता है। जलियांवाला वाग के प्रतिबंधित साहित्य पर केंद्रित आलेख...

अंग्रेजों के भारत में काबिज होते मूल्यों पर पाश्चात्य असर दृष्टिगोचर होने लगा था। सभ्यताओं के बीच की खाई से जागरूक लोग भारतीय जनता के एक हिस्से के उदीयमान राष्ट्रीय प्रतीक बन रहे थे। परंपरागत चिंतन और पाश्चात्य प्रभाव से राष्ट्रीय चेतना का ढांचा गुना बना जाने लगा था जिसको साहित्य, कला, राजनीतिक, सामाजिक सुधार आंदोलनों और बौद्धिक-साहित्यिक संगठनों के माध्यम से अभिव्यक्ति मिली। 

अनेक भाषाओं में भारतीय साहित्यकारों ने अंग्रेजों के अन्यायकारी कुकृत्यों को उजागर करने और जनचेतना जगाने का बीड़ा उठाया। यह साहित्य ब्रितानो हुकूमत के लिए भयभीत करने वाला और असहनीय था। अतः उन्होंने उन कृतियाँ / रचनाओं को सीआईडी तथा सन् 1860 में बने आईपीसी कानून की धारा 124 ए के तहत प्रतिबंधित / जब्त कर लिया कलमकारों, प्रकाशकों व मुद्रको को यातनाएं दी गई, मुद्रणालयों पर छापे पड़े, जुमनि और दंड दिए गए पर वे अपने नाम-पते के साथ आगे आते रहे।

स्वाधीनता की लड़ाई में जलियांवाला बाग हत्याकांड और भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी, इन दो घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर कर दिया। पंजाब से लेकर कलकत्ता (अब कोलकाता) तक अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध वर्नाकुलर और ओरिएंटल साहित्य में तीव्र आक्रोश प्रकट किया इन साहित्यकारों में अधिकतर बुद्धिजीवी लेखक नहीं, अपितु जनभाषा में लिखने वाले रचनाकार थे, जो स्थानीय तौर पर बहुत लोकप्रिय थे।

मई 1913 में जब माइकल ओडायर पंजाब प्रांत का लेफ्टिनेंट गवर्नर बनकर आया था तभी वायसराय लार्ड हार्डिंग ने उसे सचेत कर दिया था कि यहाँ बहुत कुछ ऐसा उत्तेजक है, जो जरा सी लापरवाही पर भड़क उठेगा। इसलिए इसे सतर्कता से संभाला जाए। पंजाब में उस समय 29 जिले और 34 देशी रियासत थीं। लाहौर केंद्र में पड़ता था। पंजाब के लोगों के लिए विचार और कार्य के बीच फासला बहुत कम है और उनकी मजबूत प्रकृति बहादुरी के कार्यों के लिए अधिक उपयुक्त है। इसलिए वे सत्याग्रह आंदोलन से स्वभावतः कम जुड़ रहे थे। आठ मार्च, 1919 को द ट्रिब्यून समाचारपत्र ने सत्याग्रह के प्रति लोगों के रूख के संबंध में लिखा कि अन्य प्रांतों में निष्क्रिय विद्रोह आसान हो सकता है, लेकिन पंजाब के लिए यह मुश्किल है। 

जनवरी 1919 में दो आपत्तिजनक बिल 'क्रिमिनल (अमेंडमेंट) बिल' और 'इमरजेंसी पावर्स बिल' भारत के गजट में प्रकाशित किए गए तभी 21 मार्च 1919 को द ट्रिब्यून में इन कानूनों को भारी भूल 'ब्लंडर आफ कोलोसल मेग्नीट्यूड' कहा।

लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओड्वायर ने पंजाब में अघोषित मार्शल ला लागू कर दिया। जनरल डायर कुछ दिन पहले ही पंजाब की स्थिति को नियंत्रित करने अमृतसर पहुंच चुका था। अंग्रेज 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग में हो रही शांति सभा में एकत्र 15-20 हजार लोगों की भीड़ पर मुख्य द्वार को बंद करके तब तक गोलियां बरसाते रहे जब तक कि गोलियां खत्म नहीं हो गई। करीब 1650 राउंड गोलियां दागी गई। निर्दोष और निहत्थे सैकड़ों लोग मारे गए। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, परंतु मरने वालों की संख्या बहुत अधिक यो और करीब 3400 लोग घायल हो गए थे। अंग्रेजों की नृशंसता का प्रतीक बना जलियांवाला बाग उस वक्त उनकी चहलकदमी के लिए बने 'कंपनी बाग' या उद्यान जैसा स्थल नहीं था, बल्कि असमतल जमीन का साढ़े सात-आठ एकड़ का रकबा था जहां पेड़ पौधे थे पशु चरते थे, कुआं था, लोग कूड़ा डाल देते थे। यह जलिया गांव के एक वकील हिम्मत सिंह की निजी संपत्ति थी इसीलिए इसे जलियांवाला बाग कहा जाता था।

परिमल हीन पराग दाग सा सना पड़ा है। 
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है। आओ! प्रिय ऋतुराज! कितुधीरे से आना। 
यह है शोक स्थान, यहा मत शोर मचाना ।।
                               सुभद्रकुमारी चौहान

इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। तत्कालीन रचनाकारों की जब्त कृतियों में डायर के जुल्म और अमानवीय कृत्यों के आंखों देख विवरण हैं। कुछ पात्र असली है यथा बारबार उद्धत हुई स्त्री श्रीमती रत्नदेवी, जिनके पति लाला पदम जो अमृतसर के ही रहने वाले थे, उनकी मौत इसी हत्याकांड में हो जाती है। रत्नदेवी रात के अंधेरे में पेट के बल रेंगती हुई बाग में पहुंचती हैं और लाशों के बीच अपने पति को तलाशती हैं और पति को पानी के लिए सिसकता हुआ पाती हैं। वह कहीं से अपनी ओढ़नी को पानी में भिगोकर लाती हैं और कुछ बूंदें पति के मुंह में टपकाती है, जो पहले ही प्राण त्याग चुका है। रत्नदेवी बाग की उस त्रासद रात का आंखों देखा हाल मकानों पर। जलियांवाला कांड की जांच हेतु अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा बनाई गई उप समिति के समक्ष प्रस्तुत करती है।

इसी तरह एक 13-14 साल का इकलौता पुत्र 'मदन' जो इस कत्लेआम में मारा गया, इतिहास और साहित्य में बार बार दोहराया गया है। अजेय की पुस्तक "शेखरः एक जीवनी' के पात्र मदन में भी इसका प्रतिबिंब दिखाई देता है।

अंग्रेजों की इस नृशंसता को हिंदुस्तानियों ने अपनी आत्माओं पर झेला, अपनी आखों से देखा और साहित्यकारों ने उसे अपनी कलम से उकेरा। इस विषय पर प्रतिबंधित हिंदी पुस्तकों में बनारस से छपी जलियांवाला बाग का महात्म्य' जबलपुर से सन् 1922 में प्रकाशित पंजाब का 'खून', हाथरस से सन् 1923 में 'बागे जलियां- संगीत' बुलंदशहर से सन् 1921 में लाला रतनलाल जमरुद लिखित 'पंजाब का हत्याकांड, सूरजभान मटेर राजपूत की अमृतसर से प्रकाशित 'ओडावर शाही यानी मजलूम ए पंजाब आदि है और लाला किशनचंद जेबा द्वारा सन् 1922 में लिखा और लाहौर से प्रकाशित एक ड्रामा जख्मी पंजाब' भी है। इसका एक अंश 

अगर चलती रही गोली, यू ही निर्दोष जानों पर।
तो कौए और कबूतर हो, रहेंगे इन मकानों पर।
मिटा डालेंगे गर इस तरह, हाकिम अपनी प्रजा को।
हुकूमत क्या करेंगे फिर वह मरघट और मसानों पर।

(यह प्रतिबंधित साहित्य इंडिया आफिस लंदन से प्राप्त हुआ है) 



(यह प्रतिबंधित साहित्य इंडिया आफिस लंदन से प्राप्त हुआ है, जो शीघ्र ही पुस्तक रूप में पाठकों को उपलब्ध होगा।)

नियति देखिए कि निर्दयी डायर को बापस इंग्लैंड बुला लिया गया और वह कई बीमारियों से ग्रस्त हुआ। लकवे से उसकी जबान और शरीर बेकार हो गया और अंततः सन् 1927 में नितांत अकेले जिंदगी की आखिरी सांस ली। पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओड्वायर को लंदन के कैक्स्टन हाल में सरदार ऊधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को गोली से मारकर 21 साल बाद जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था।


बर्बरता का मार्मिक चित्रण 
बेशक अत्यंत कठिन रहा होगा उस बर्बरता को कलमबद्ध करना निहत्थे और बेकसूर लोगों पर गोलियों की बैठार लोग जान बचाने के लिए दीवारों पर चढ़ते दिखाई दें और गोलियों से मार दिए जाएं दीवारों के साथ-साथ लाशों के ढेर बाहर निकलने के सारे रस्ते बंद लोगों का भागकर बाग में स्थित कुए में गिरना और कुए का लाशों से भरजाना। लाशों और घायलों को तडपते छोड़कर डायर का निकल लेना। एक घूट पानी के लिए तड़पना, विलाप करना। चौत्कारों पर सिपाहियों की झिड़कियां। रेंग-रेंगकर घरवालों का अपने परिजनों को ढूंढने पहुंचना प्रतिबंधित कृतियों में ये आखो देखे मार्मिक चित्रण हैं।

रेंग कर हमको चलाया, प्यास से मारा हमें। कौम के खू का जलाया, हा दिया पंजाब पर। जिन कलेजों से तुम्हारी, जान जरमन से बची। 
उन कलेजों का बनाकर मय पिया पंजाब पर। (प्रतिबंधित 'पंजाब का खून शीर्षक पुस्तक, 1922 से)


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