होली से पहले 'होलाष्टक' का महत्व
होली से पहले 'होलाष्टक' का महत्व
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलिका दहन तक की अवधि के 8 दिनों को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है। यह अवधि इस वर्ष 10 से 17 मार्च अर्थात होलिका दहन तक है।
शास्त्रों में होलाष्टक के दौरान अनेक शुभ कार्यों को करने की मनाही है। इस दौरान गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, विवाह संबंधी वार्तालाप, सगाई, विवाह, किसी नए कार्य, नींव आदि रखने, नया वाहन एवं आभूषण आदि खरीदने, नया व्यवसाय आरंभ करने या किसी भी मांगलिक कार्य आदि का आरंभ शुभ नहीं माना जाता है यहां तक कि इस काल में 16 संस्कार भी नहीं किए जाते। शास्त्रों में ऐसा भी वर्णन मिलता है कि नवविवाहिता को पहली होली मायके की बजाय ससुराल में मनानी चाहिए।
एक मान्यता के अनुसार देवों के कार्य को सादरी के लिए कामदेव द्वारा शिव की तपस्या भंग करने से रुष्ट होकर शिव जी ने उसे फाल्गुन की अष्टमी तिथि के दिन भस्म कर दिया था।
कामदेव की पत्नी रति ने शिव जी की 8 दिन तक कठिन आराधना करके उनसे अपने पति को पुनर्जीवित करने की याचना की जो भगवान महादेव शिव ने स्वीकार कर ली।
महादेव के इस निर्णय के बाद जन साधारण ने हर्ष मनाया और इस तरह होलाष्टक का अंत धुलैडी को हो गया। देवों की चिंता से जुड़े होने के कारण इस परम्परा में होलाष्टक के 8 दिन शुभ कार्यों के लिए वर्जित माने गए हैं।
इसका ज्योतिषीय कारण है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार फाल्गुन मास की अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव के हो जाते हैं।
इनके निर्बल होने से मानव मस्तिष्क की निर्णय क्षमता क्षीण हो जाती है और इस दौरान उसके द्वारा गलत फैसले लेने के कारण हानि की संभावना बढ़ जाती है।
विज्ञान के अनुसार भी पूर्णिमा के दिन ज्वार-भाटा जैसी घटनाएं घटित होती रहती है और इसी प्रकार व्यक्ति के मस्तिष्क की तरंगे भी उग्र हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के लिए सही निर्णय कर पाना काफी मुश्किल होता है।
जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा, वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में हैं, उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहना चाहिए क्योंकि ये अष्ट ग्रह, दैनिक कार्यकलापों पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।
मानव मस्तिष्क में उत्पन्न हुए इस अवसाद को दूर करने के लिए होलाष्टक नामक इन 8 दिनों में मन में उल्लास जगाने के लिए और वातावरण को जीवंत बनाने के लिए लाल या गुलाबी रंग का प्रयोग विभिन्न प्रकार से किया जाता है।
लाल रंग के परिधान मन में उत्साह उत्पन्न करते हैं इसीलिए उत्तर प्रदेश में आज भी होली का पर्व एक दिन नहीं अपितु 8 दिन मनाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण भी इन 8 दिनों में गोपियों संग होली खेलते रहते हैं और अंतत: होली में रंगे लाल वस्त्रों को अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है। होली मनोभावों की अभिव्यक्ति का पर्व है जिसमें वैज्ञानिकता, ज्योतिषीय गणना, उल्लास, पौराणिक इतिहास तथा भारत की सुंदर संस्कृति का समावेश है। इस पर्व पर सब लोग अपने भेदभाव मिटा कर एक ही रंग में रंगे जाते हैं।
इस दिन से मौसम की छटा में बदलाव आना आरंभ हो जाता है। सर्दियां अलविदा कहने लगती हैं और गर्मियों का आगमन होने लगता है। साथ ही वसंत की खुशबू फूलों की महक के साथ प्रकृति में बिखरने लगती है।
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