जन्म; मृत्यु ; पुनर्जन्म व मोक्ष
पुनर्जन्म
मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक मरने के बाद व्यक्ति की तीन तरह की गतियां होती हैं-
1. उर्ध्व गति,
2. स्थिर गति और
3. अधो गति।
व्यक्ति जब देह छोड़ता है तब सर्वप्रथम वह सूक्ष्म शरीर में प्रवेश कर जाता है। सूक्ष्म शरीर की गति के अनुसार ही वह भिन्न-भिन्न लोक में विचरण करता है और अंत में अपनी गति अनुसार ही पुन: गर्भ धारण करता है।
आत्मा के तीन स्वरूप माने गए हैं-
● जीवात्मा,
● प्रेतात्मा और
● सूक्ष्मात्मा।
जो भौतिक शरीर में वास करता है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासनामय शरीर में निवास होता है
तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं।
तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म स्वरूप। मरने के बाद जब आत्मा सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, तब उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
कमजोर सूक्ष्म शरीर से ऊपर की यात्रा मुश्किल हो जाती है तब ऐसा व्यक्ति नीचे के लोक में स्वत: ही गिर जाता है या वह मृत्युलोक में ही पड़ा रहता है और दूसरे जन्म का इंतजार करता है।
उसका यह इंतजार 100 वर्ष से 1000 वर्ष तक की अवधि का भी हो सकता है।
पहले बताए गए आत्मा के तीन स्वरूप से अलग-
1. पहली विज्ञान आत्मा,
2. दूसरी महान आत्मा और
3. तीसरी भूत आत्मा।
1. विज्ञान आत्मा वह है, जो गर्भाधान से पहले स्त्री-पुरुष में संभोग की इच्छा उत्पन्न करती है, वह आत्मा रोदसी नामक मंडल से आता है, उक्त मंडल पृथ्वी से सत्ताईस हजार मील दूर है।
2. महान आत्मा वह है, जो चन्द्रलोक से अट्ठाईस अंशात्मक रेतस बनाकर आता है, उसी 28 अंश रेतस से पुरुष पुत्र पैदा करता है। 28 अंश रेतस लेकर आया महान आत्मा मरने के बाद चन्द्रलोक पहुंच जाता है, जहां उससे वहीं 28 अंश रेतस मांगा जाता है। चंद्रलोक में वह आत्मा अपने स्वजातीय लोक में रहता है।
3. भूतात्मा वह है, जो माता-पिता द्वारा खाने वाले अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड में प्रवेश करता है। उससे खाए गए अन्न और पानी की मात्रा के अनुसार अहम भाव शामिल होता है, इसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं।
यह भूतात्मा पृथ्वी के अलावा किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता है।
वे लोग जो जिंदगीभर क्रोध, कलह, नशा, भोग-संभोग, मांसभक्षण आदि धर्म-विरुद्ध निंदित कर्म में लगे रहे हैं, मृत्यु के बाद उन्हें अधो गति प्राप्त होती। जिन्होंने
थोड़ा-बहुत धर्म भी साधा है या जो मध्यम मार्ग में रहे हैं उन्हें स्थिर गति प्राप्त होती है और जिन्होंने वेदसम्मत आचरण करते हुए जीवनपर्यंत यम-नियमों का पालन किया है उन्हें उर्ध्व गति प्राप्त होती है।
अधो गति वाला आत्मा कीट-पतंगे, कीड़े-मकौड़े, रेंगने वाले जंतु, जलचर प्राणी और पेड़-पौधे आदि योनि में पहुंच जाता है।
स्थिर गति वाला आत्मा पशु, पक्षी और मनुष्य की योनि में पहुंच जाता है
लेकिन जो उर्ध्व गति वाला आत्मा है उनमें से कुछ पितरों के लोक और कुछ देवलोक पहुंच जाता है।
जो आत्मा अपने आध्यात्मिक बल के द्वारा देवलोक चला जाता है वह देवलोक में रहकर सुखों को भोगता है। यदि वहां भी वह देवतुल्य बनकर रहता है तो देवता हो जाता है। लेकिन यदि उनमें राग-द्वेष उत्पन्न होता है तो वह फिर से मृत्युलोक में मनुष्य योनि में जन्म ले लेता है।
लेकिन उर्ध्व गति प्राप्त कुछ आत्माएं अपने आध्यात्मिक बल की शक्ति से पितर और देवलोक से ऊपर ब्रह्मलोक में जाकर सदा के लिए जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
यही मोक्ष है।
पुनर्जन्म एक भारतीय मान्यता है जिसमें जीवात्मा के जन्म और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की मान्यता को स्थापित किया गया है। विश्व के सब से प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद से लेकर वेद, दर्शनशास्त्र, पुराण , गीता, योग आदि ग्रंथों में पूर्वजन्म की मान्यता का प्रतिपादन किया गया है। इस मान्यता के अनुसार शरीर का मृत्यु ही जीवन का अंत नहीं है परंतु जन्म जन्मांतर की श्रृंखला है। ८४ लाख योनियों में जीवात्मा अपने धर्म को प्रदर्शित करता है, आत्मज्ञान होने के बाद श्रृंखला रुकती है, जिस को मोक्ष के नाम से जाना जाता है। फिर भी आत्मा स्वयं के निर्णय, लोकसेवा, संसारी जीवों को मुक्त कराने की उदात्त भावना से भी जन्म धारण करता है। पुराण से लेकर आधुनिक समय में भी पुनर्जन्म के विविध प्रसंगों का उल्लेख मिलता है।
पुनर्जन्म का मान्यता संपादित करें
भारतीय दर्शनशास्त्रों के अनुसार प्राचीन काल में ऋषियों ने स्वयं की खोज की और पाया कि स्वयं शरीर नहीं है परंतु शरीर के अंदर स्थित आत्मा-जो निराकार है-उनका मूल स्वरूप है। आत्मा को जानने की इस प्रक्रिया को आत्मसाक्षात्कार के नाम से जाना जाता है। आत्मा के साक्षात्कार हेतु योग, ज्ञान, भक्ति आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं जिसका आविर्भाव प्राचीन काल में हुआ है। ऋषियों ने स्वयं को जानकर अपने जन्मांतर के ज्ञान की भी प्राप्ति की और पाया कि उनके कई जन्म थे। स्वयं का मूल स्वरूप आत्मा जिसकी कभी मृत्यु नहीं होती; ये पहले था, आज है और कल भी रहेगा। शरीर के मृत्यु के बाद जीवात्मा पुनः जन्म धारण करता है और ये चक्र चलता ही रहता है। पुनर्जन्म का कारण सांसारिक पदार्थों में आसक्ति आदि है। जब व्यक्ति साधना के बल पर सांसारिक दुविधाओं से मुक्त होकर स्वयं को जान लेता है तब जन्म की प्रक्रिया से भी मुक्ति पा लेता है। फिर भी अपनी स्वेच्छा से जन्म धारण कर सकता है। मूल रूप से सभी को अपने पूर्व के जन्मों की विस्मृति हो जाती है। योग आदि क्रियाओं से आत्मा को जानकर ध्यान में पूर्व के जन्मों के ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। ज्ञानी पुरुष दूसरों के जन्मांतर के विषय में भी बता सकते हैं अतः ऐसे सदगुरु से भी पूर्वजन्म के ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। पुराण आदि में भी जन्म और पुनर्जन्मों का उल्लेख है जिससे अमुक व्यक्तियों के पूर्वजन्म के विषय में जानकारी मिलती है। कभी बाल्यकाल में किसी बालक को पूर्वजन्म का ज्ञान होने के प्रसंग भी सामने आए हैं।
प्राचीन ग्रंथों में पुनर्जन्म संपादित करें
पुनर्जन्म की प्रक्रिया के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट जानकारी दी गई है जो अत्यंत लोकप्रिय भी है। कर्मयोग का ज्ञान देते समय भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहाँ कि, 'सृष्टि के आरंभ में मैंने ये ज्ञान सूर्य को दिया था। आज तुम्हें दे रहा हूँ।' अर्जुन ने आश्वर्यचकित होकर प्रश्न पूछा कि, 'आपका जन्म तो अभी कुछ साल पूर्व हुआ और सूर्य तो कई सालों से है। सृष्टि के आरंभ में आपने सूर्य को ये (कर्मयोग का) ज्ञान कब दिया?' कृष्ण ने कहाँ कि, 'तेरे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, तुम भूल चुके हो किन्तु मुझे याद है। गीता में कृष्ण-अर्जुन का ये पूरा संवाद निम्नलिखित है:-
“ श्री भगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ (१)
„
भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - मैंने इस अविनाशी योग-विधा का उपदेश सृष्टि के आरम्भ में विवस्वान (सूर्य देव) को दिया था, विवस्वान ने यह उपदेश अपने पुत्र मनुष्यों के जन्म-दाता मनु को दिया और मनु ने यह उपदेश अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु को दिया। (१)
“ एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ (२)
„
भावार्थ : हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार गुरु-शिष्य परम्परा से प्राप्त इस विज्ञान सहित ज्ञान को राज-ऋषियों ने बिधि-पूर्वक समझा, किन्तु समय के प्रभाव से वह परम-श्रेष्ठ विज्ञान सहित ज्ञान इस संसार से प्राय: छिन्न-भिन्न होकर नष्ट हो गया। (२)
“ स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ (३)
„
भावार्थ : आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग (आत्मा का परमात्मा से मिलन का विज्ञान) तुझसे कहा जा रहा है क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय मित्र भी है, अत: तू ही इस उत्तम रहस्य को समझ सकता है। (३)
“ अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ (४)
„
भावार्थ : अर्जुन ने कहा - सूर्य देव का जन्म तो सृष्टि के प्रारम्भ हुआ है और आपका जन्म तो अब हुआ है, तो फ़िर मैं कैसे समूझँ कि सृष्टि के आरम्भ में आपने ही इस योग का उपदेश दिया था? (४)
“ बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥
„
अर्थात-श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन ! मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं; उन सबको मैं जानता हूँ, किंतु हे परंतप ! तू (उन्हें) नहीं जानता।
इसमें श्रीकृष्ण ने पुनर्जन्म के सिद्धांत का प्रतिपादन किया है और स्वयं (कृष्ण) को अपने पिछले कई जन्मों की जानकारी होने की बात भी रखी है।[1]
सन्दर्भ संपादित करें
व्यास, महर्षि वेद (पौराणिक काल). श्रीमद्भगवद्गीता (संस्कृत में). भारत. पृ॰ अध्याय ४, श्लोक संख्या ५. |date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
विश्व का हर मनुष्य अपने जन्मों में सात स्तर की बुद्धि सम्पन्नता व प्रसिध्द प्राप्त करता है । VVIP::विश्व स्तर का जीवन ____ सभी मनुष्य असंख्य बार विश्व स्तर के जीवन जीये है जियेगे। VIP::राष्ट्र स्तर का जीवन ____ जो मनुष्य राष्ट्र में सम्पन्न व प्रसिध्द रहता है । 1st::क्षेत्र स्तर का जीवन ___ जो राज्य स्तर का जीवन जीता है । 2nd::शहर /ग्राम ____ जो मनुष्य अपने शहर गांव में सम्पन्न व प्रसिध्द रहता है । 3rd:: जो मनुष्य अपने कार्य क्षेत्र व घर परिवार तक सिमित रहता है । 4th:: जो मनुष्य अपने लिए भोजन वस्त्र गृह के प्राप्ति के लिए जीवनभर परिश्रम करता है । NO CLASS :: सामान्य व सज्जन मनुष्य वन पहाड़ी समुद्र क्षेत्र में जो संस्कृति है उसमे जन्म आवश्य लेता है परन्तु दृष्टि मनुष्य भिखारी बनाता है ।
मनुष्य सात जन्मों में उच्च से निम्न जीवन की ओर बढाता उतरता रहता है ।
कोई आने वाले जन्मों में उच्च स्तर का जीवन जियेगा निम्न स्तर का उसके वर्तमान जीवन का विश्लेषण कर बताया जा सकता है जो मनुष्य अपने जीवन के अंतिम स्थिति में अधिक सम्पन्न हुआ वहां उच्च स्तर का जीवन जियेगा और जो अंतिम स्थिति में दरिद्र बनना वहां निम्न स्तर का जीन जियेगा आने वाले जन्मों में।
अगर माता पिता भाई बहन पुत्र पुत्री दोस्तों से अत्यधिक प्रेम और स्नेह है तो वे आने वाले जन्मों में भी वही रिश्ता बनेगा परन्तु ना पसंद है तो रिश्तेदार दोस्त बदल जाऐगे। पत्नी पति का सम्बन्ध एक दो तीन चार पांच छैः सात जन्मों का हो सकता है परन्तु विश्व में करोड़ों स्त्री पुरूष हर जन्म में एक दूसरे के पति पत्नी बनाते है । === जन्मों के अनुसार लोगों का शारीरिक रूप रंग सुन्दरता बढती व कम होती जाती है ।
दुष्ट सज्जन व सामान्य मनः स्थिति वालों का जन्म के सात स्तर एक समान है ।
_____ मनुष्यों के पाप के कारण विकलांग अशांति माहौल में बेरोजगार अविवाहित निसंतान और पुन्य के कारण शांत महौल व विशेष गुणों को लेकर जन्म लेते है । _____ प्रचीन धर्मो के स्वर्ग व नरक के मिथ्क परिकल्पना है वास्तव में मृत्यु हुई तत्काल जन्म हुआ अपने कर्मो के अनुसार। _____ मनुष्य अपने सात व अन्यों के सात जन्मों को समझ गया तो उसके अरबों जन्मों को समझ गया ।
प्रश्न: पुनर्जन्म किसको कहते हैं?
उत्तर: जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।
प्रश्न: पुनर्जन्म क्यों होता है?
उत्तर: जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।
प्रश्न: अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो?
उत्तर: नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।
प्रश्न: पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है?
उत्तर: पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।
प्रश्न: शरीर के बारे में समझाएँ?
उत्तर: हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है ।
जिसमें मूल प्रकृति ( सत्व रजस और तमस ) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है ।
बुद्धि से अहंकार ( बुद्धि का आभामण्डल ) ।
अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ( चक्षु, जिह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र ), मन ।
पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) ।
शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है ( सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर ) ।
प्रश्न: सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं?
उत्तर: सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ । ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( 4320000000 या ४३२००००००० वर्ष ) तक चलता है । और यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा ।
प्रश्न: स्थूल शरीर किसको कहते हैं?
उत्तर: पंच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) , ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।
प्रश्न: जन्म क्या होता है?
उत्तर: जीवात्मा का अपने करणों ( सूक्ष्म शरीर ) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।
प्रश्न: मृत्यु क्या होती है?
उत्तर: जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है , सूक्ष्म शरीर की नहीं । सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं । मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रिया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है । वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है ।
प्रश्न: मृत्यु होती ही क्यों है?
उत्तर: जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं । जिस कारण उस शरीर को बदलने की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है ।
प्रश्न: मृत्यु न होती तो क्या होता?
उत्तर: तो बहुत अव्यवस्था होती । पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती । और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता ।
प्रश्न: क्या मृत्यु होना बुरी बात है?
उत्तर: नहीं, मृत्यु होना कोई बुरी बात नहीं ये तो एक प्रक्रिया है शरीर परिवर्तन की ।
प्रश्न: यदि मृत्यु होना बुरी बात नहीं है तो लोग इससे इतना डरते क्यों हैं?
उत्तर: क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है । वे अज्ञानी हैं । वे समझते हैं कि मृत्यु के समय बहुत कष्ट होता है । उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं ।
प्रश्न: तो मृत्यु के समय कैसा लगता है? थोड़ा सा तो बतायें?
उत्तर: जब आप बिस्तर में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता । जब आपकी मृत्यु किसी हादसे से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो । तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुषुुप्तावस्था में जाने लगता है ।
प्रश्न: मृत्यु के डर को दूर करने के लिए क्या करें?
उत्तर: जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ ( उपनिषद, दर्शन आदि ) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन,मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का, मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कमतर होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा । आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये । तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे? नहीं उन्होने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था । योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था । महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ । तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाल मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है ।
प्रश्न: किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है?
उत्तर: आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता । वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य । तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है । पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है ।
प्रश्न: पुनर्जन्म कब कब नहीं होता?
उत्तर: जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है ।
प्रश्न: मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता?
उत्तर: क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है ।
प्रश्न: मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता?
उत्तर: मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता । उसके बाद होता है ।
प्रश्न: लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो फिर मोक्ष की एक निश्चित अवधि कैसे हो सकती है?
उत्तर: सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता । यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो दुबारा से ये आत्मा शरीर धारण करती है ।
प्रश्न: मोक्ष की अवधि कब तक होती है?
उत्तर: मोक्ष का समय 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष या मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है ।
प्रश्न: मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं?
उत्तर: नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है । और जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।
प्रश्न: मोक्ष के बाद आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है?
उत्तर: सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ ( सृष्टि आरम्भ ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है । जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान ( वायु , आदित्य, अग्नि , अंगिरा ) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया । क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं ।
प्रश्न: मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या जानवर का?
उत्तर: मनुष्य शरीर ही मिलता है ।
प्रश्न: क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है? जानवर का क्यों नहीं?
उत्तर: क्योंकि मोक्ष को भोगने के बाद पुण्य कर्मों को तो भोग लिया , और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो फिर जानवर बनना सम्भव ही नहीं , तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।
प्रश्न: मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों बन्द हो जाता है?
उत्तर: क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं ( अच्छे या बुरे ) वे सब कट जाते हैं । तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा??
प्रश्न: पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है?
उत्तर: पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।
प्रश्न: पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है?
उत्तर: जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा ।
प्रश्न: कर्म कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है: सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , तामसिक कर्म ।
(१) सात्विक कर्म: सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि ।
(२) राजसिक कर्म: मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।
(३) तामसिक कर्म: चोरी, जारी, जूआ, ठग्गी, लूट मार, अधिकार हनन आदि ।
और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं । इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं । जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं ।
प्रश्न: किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है?
उत्तर: सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है , यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में , यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा । जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा ।
प्रश्न: किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है?
उत्तर: तामसिक और राजसिक कर्मों के फलरूप जानवर शरीर आत्मा को मिलता है । जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनि उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है । जैसे लड़ाई स्वभाव वाले , माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है , और घोर तामसिक कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि । तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये जानवरों के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं ।
प्रश्न: तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे? या आगे क्या होंगे?
उत्तर: नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता । क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे । वही सब जानता है ।
प्रश्न: तो फिर यह किसको पता चल सकता है?
उत्तर: केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है , योगाभ्यास से उसकी बुद्धि । अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण रहस्य़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है । उस योगी को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है
वह अन्तः मन और बुद्धि से सब जान लेता है । उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं ।
प्रश्न: यह बतायें की योगी यह सब कैसे जान लेता है?
उत्तर: अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा । इसीलिये हम अगले लेख में यह विषय विस्तार से समझायेंगे कि योगी कैसे अपनी विकसित शक्तियों से सब कुछ जान लेता है? और वे शक्तियाँ कौन सी हैं? कैसे प्राप्त होती हैं? इसके लिए अगले लेख की प्रतीक्षा करें ।
प्रश्न: क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं?
उत्तर: हाँ हैं, जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, वर्ना बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता । दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को याद करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब भूल जाता है ।
प्रश्न: क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदाहरण हैं?
उत्तर: हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या TV में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को याद रखे हुए है, और सारी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में वो पैदा हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था । और इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन फिर भी अपने उस गाँव की सारी बातें याद रखे हुए है , किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है । फिर भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक पुराने जन्म की बातें बताने लग पड़ा ।
प्रश्न: लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें बेकार सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का?
उत्तर: आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे । ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है , और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं ।
प्रश्न: तो सिद्ध कीजीए ?
उत्तर: जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है , तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं । और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के बाद जाग्रत हो जाते हैं ।
इसे उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा 6 वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा के एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका दाखिला करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था । लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के हावभाव बदल गये !! और उसने एकदम फर्राटेदार French भाषा बोलनी शुरू कर दी !! उसके माता पिता बहुत डर गये और घबरा गये , तुरंत ही बच्चे को अस्पताल ले जाया गया । जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक दुभाषिये का प्रबन्ध किया । जो कि French और हिन्दी जानता था , तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उस बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मौत मेरी प्रयोगशाला में एक हादसे के कारण ( Lab. ) में हुई थी । "
तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिति से अपना वह सब याद आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था । यानि की वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब याद आया । तो ऐसे ही बहुत सी उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो ।
प्रश्न: तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?
उत्तर: ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है । वे केवल माँस और हड्डियों के समूह को ही शरीर समझते हैं , और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है । तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है । और अगर कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मानसिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथनानुसार जाँच नहीं करवाते हैं ।
प्रश्न: क्या पुनर्जन्म केवल पृथिवी पर ही होता है या किसी और ग्रह पर भी ?
उत्तर: ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, किसने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथीवियाँ हैं । तो एक पृथीवी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथीवी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं । ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है ।
प्रश्न: परन्तु यह बड़ा ही अजीब लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी ?
उत्तर: यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती । वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है । चाहे वो व्हेल मछली हो, चाहे वो एक कीड़ी हो ।
स्पिरिचुअल साइंस में मौत और पुनर्जन्म के बीच के समय पर भी हो रही रिसर्च
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बंगलूरु के स्पिरिचुअल साइंस रिसर्च फाउंडेशन मौत और पुनर्जन्म के बीच के दिनों पर भी रिसर्च हो रही है। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने इस बात को माना था कि मरने के बाद इंसान का पुनर्जन्म होता है।
बंगलूरु के स्पिरिचुअल साइंस रिसर्च फाउंडेशन मौत और पुनर्जन्म के बीच के दिनों समय पर भी रिसर्च हो रही है। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने इस बात को माना कि मरने के बाद इंसान का पुनर्जन्म होता है।
वहीं, अभी तक की शोध के मुताबिक अगर 100 लोगों की मौत होती है तो उनमें से करीब 85 लोग तुरंत (मतलब 35-44 हफ्तेे में) जन्म ले लेते हैं।
वहीं, 15 फीसदी लोगों में से 11 फीसदी लोगों को 1-3 साल के भीतर नया जन्म मिल जाता है। लेकिन 4 फीसदी आत्माओं को लंबा इंतजार करना पड़ता है और ये इंतजार 400-1000 साल या फिर हजारों साल का भी हो सकता है।
रिसर्च फाउंडेशन के मुताबिक ज्यादातर आत्माएं सामान्य शरीरधारी होती हैं और उन्हें नया जन्म लेने में ना ही इंतजार करना पड़ता है और ना ही कोई ज्यादा कठिनाई होती है।
लेकिन विलक्षण और प्रतिभाशाली व्यक्तियों की आत्माओं को नए गर्भ के लिए रुकना पड़ता है। क्योंकि विलक्षण या आसाधारण आत्माएं दोबारा उसी तरह के व्यक्तियों को माध्यम बनाती है, जिनमें विलक्षण या आसाधारण गुण हों।
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रिसर्च की रिपोर्ट में पिछले 100 साल में जन्में व्यक्तियों के जीवन, स्वभाव, परिवेश और माता-पिता की स्थिति का ब्यौरा जुटाया गया। करीब डेढ़ हजार दंपतियों के जुटाए इस ब्यौरे में करीब सभी वर्गों के साधारण लोगों के अलावा अपराधिक और साधु स्वभाव के व्यक्तियों पर भी अध्ययन किया गया है।
रिसर्च फाउंडेशन के अध्ययन में मैडम ब्लैवट्स्की और लेड बीटर की स्थापित की हुई थियोसोफिकल सोसाइटी ने भी मदद की। रिसर्च के लिए करीब 800 लोगों को पिछले जन्म की स्मृतियों में ले जाया गया।
रिसर्ज के दौरान पता चला कि उनमें से 2 फीसदी लोग या तो खूंखार अपराधी थे या संत-महात्मा। इन्हें नया जन्म लेने के लिए रुकना पड़ता है। इस तरह के व्यक्तियों को नए शरीर के माध्यम से नया जन्म पाने के पहले जैसी स्थिति और वैसे ही माता- पिता चाहिए होते हैं।
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उहाहरण के तौर पर देखा जाए तो जहां राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक जैसे अवतारी या संत-महात्मा व्यक्तियों की आत्माओं को जन्म लेने में काफी वक्त का इंतजार करना पड़ता है। वहीं, रावण, कंस, अंगुलिमाल, चंगेज खान, औरंगजेब जैसे क्रूर व्यक्ति की आत्माओं को जन्म लेने में काफी वक्त का इंतजार करना पड़ता है।
एक और उदाहरण ओशो का भी है। उन्होंने भी एक बार अपने प्रवचन में कहा था कि उनका पिछला जन्म 700 साल पहले हुआ था। उनके मुताबिक 700 साल पहले वे कोई अनुष्ठान कर रहे थे, अनुष्ठान पूरा होने के 3 दिन पहले उनकी हत्या हो गई थी और जन्म के लिए उनकी आत्मा उपयुक्त गर्भ तलाशती रही। उनका कहना था कि अनुष्ठान के 3 दिन पूरे करने के लिए उन्हें इस जीवन में 21 साल तक रुकना पड़ा।
अध्ययन के दौरान ये भी पता चला है कि आत्मा के शरीर छोड़ते वक्त ही नया जन्म नहीं मिल जाता तो कर्मों के अनुसार अलग-अलग लोकों में समय बीताना होता है। सभी लोकों में कई बार आत्माओं को अपनी गलतियां सुधारने का अवसर मिलता है।
क्या किसी भी व्यक्ति का पुनर्जन्म हो सकता है
डेस्क -क्या किसी भी व्यक्ति का पुनर्जन्म हो सकता है| भूत, प्रेत, आत्मा, से जुडी घटनाएं हमेशा से एक विवाद का विषय रही है वैसे हि पुनर्जन्म से जुड़ी घटनाय और कहानिया भी हमेशा से विवाद का विषय रही है। इन पर विश्वास और अविश्वास करने वाले, दोनो हि बड़ी संख्या मे है, जिनके पास अपने अपने तर्क है। यहुदी, ईसाईयत और इस्लाम तीनो धर्म पुनर्जन्म मे यकीन नहि करते है, इसके विपरीत हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म पुनर्जन्म मे यकीन करते है। हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य का केवल शरीर मरता है उसकी आत्मा नहीं। आत्मा एक शरीर का त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। हालांकि नया जन्म लेने के बाद पिछले जन्म कि याद बहुत हि कम लोगो को रह पाती है। इसलिए ऐसी घटनाएं कभी कभार ही सामने आती है। पुनर्जन्म की घटनाएं भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों मे सुनने को मिलती है।
पुनर्जन्म के ऊपर हुए रिसर्च
पुनर्जन्म के ऊपर अब तक हुए शोधों मे दो रिसर्च बहुत महत्त्वपूर्ण है। पहला अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. इयान स्टीवेन्सन का। इन्होने 40 साल तक इस विषय पर शोध करने के बाद एक किताब "रिइंकार्नेशन एंड बायोलॉजी" लीखी जो कि पुनर्जन्म से सम्बन्धित सबसे महत्तवपूर्ण बुक मानी जाती है। दूसरा शोध बेंगलोर की नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसीजय में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. सतवंत पसरिया द्वारा किया गया है। इन्होने भी एक बुक "श्क्लेम्स ऑफ रिइंकार्नेशनरू एम्पिरिकल स्टी ऑफ केसेज इन इंडिया" लिखी है। इसमें 1973 के बाद से भारत में हुई 500 पुनर्जन्म की घटनाओ का उल्लेख है।
पुनर्जन्म से जुडी 10 सच्ची घटनाए-
पहली घटना -
यह घटना सन 1950 अप्रैल की है। कोसीकलां गांव के निवासी भोलानाथ जैन के पुत्र निर्मल की मृत्यु चेचक के कारण हो गई थी। इस घटना के अगले साल यानी सन 1951 में छत्ता गांव के निवासी बी. एल. वाष्र्णेय के घर पुत्र का जन्म हुआ। उस बालक का नाम प्रकाश रखा गया। प्रकाश जब साढ़े चार साल का हुआ तो एक दिन वह अचानक बोलने लगा- मैं कोसीकलां में रहता हूं। मेरा नाम निर्मल है। मैं अपने पुराने घर जाना चाहता हूं। ऐसा वह कई दिनों तक कहता रहा।
प्रकाश को समझाने के लिए एक दिन उसके चाचा उसे कोसीकलां ले गए। यह सन 1956 की बात है। कोसीकलां जाकर प्रकाश को पुरानी बातें याद आने लगी। संयोगवश उस दिन प्रकाशकी मुलाकात अपने पूर्व जन्म के पिता भोलानाथ जैन से नहीं हो पाई। प्रकाश के इस जन्म के परिजन चाहते थे कि वह पुरानी बातें भूल जाए। बहुत समझाने पर प्रकाश पुरानी बातें भूलने लगा लेकिन उसकी पूर्व जन्म की स्मृति पूरी तरह से नष्ट नहीं हो पाई।
सन 1961 में भोलनाथ जैन का छत्ता गांव जाना हुआ। वहां उन्हें पता चला कि यहां प्रकाश नामक का कोई लड़का उनके मृत पुत्र निर्मल के बारे में बातें करता है। यह सुनकर वे वाष्र्णेय परिवार में गए। प्रकाश ने फौरन उन्हें अपने पूर्व जन्म के पिता के रूप में पहचान लिया। उसने अपने पिता को कई ऐसी बातें बताई जो सिर्फ उनका बेटा निर्मल ही जानता था।
दूसरी घटना :
यह घटना आगरा की है। यहां किसी समय पोस्ट मास्टर पी.एन. भार्गव रहा करते थे। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम मंजु था। मंजु ने ढाई साल की उम्र में ही यह कहना शुरु कर दिया कि उसके दो घर हैं। मंजु ने उस घर के बारे में अपने परिवार वालों को भी बताया। पहले तो किसी ने मंजु की उन बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब कभी मंजु धुलियागंज, आगरा के एक विशेष मकान के सामने से निकलती तो कहा करती थी- यही मेरा घर है।
एक दिन मंजु को उस घर में ले जाया गया। उस मकान के मालिक प्रतापसिंह चतुर्वेदी थे। वहां मंजु ने कई ऐसी बातें बताई जो उस घर में रहने वाले लोग ही जानते थे। बाद में भेद चला कि श्रीचतुर्वेदी की चाची (फिरोजाबाद स्थित चौबे का मुहल्ला निवासी श्रीविश्वेश्वरनाथ चतुर्वेदी की पत्नी) का निधन सन 1952 में हो गया था। अनुमान यह लगाया गया कि उन्हीं का पुनर्जन्म मंजु के रूप में हुआ है।
तीसरी घटना :
सन 1960 में प्रवीणचंद्र शाह के यहां पुत्री का जन्म हुआ। इसका नाम राजूल रखा गया। राजूल जब 3 साल की हुई तो वह उसी जिले के जूनागढ़ में अपने पिछले जन्म की बातें बताने लगी। उसने बताया कि पिछले जन्म में मेरा नाम राजूल नहीं गीता था। पहले तो माता-पिता ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब राजूल के दादा वजुभाई शाह को इन बातों का पता चला तो उन्होंने इसकी जांच-पड़ताल की।
जानकारी मिली कि जूनागढ़ के गोकुलदास ठक्कर की बेटी गीता की मृत्यु अक्टूबर 1559 में हुई थी। उस समय वह ढाई साल की थी। वजुभाई शाह 1965 में अपने कुछ रिश्तेदारों और राजूल को लेकर जूनागढ़ आए। यहां राजून ने अपने पूर्वजन्म के माता-पिता व अन्य रिश्तेदारों को पहचान लिया। राजूल ने अपना घर और वह मंदिर भी पहचान लिया जहां वह अपनी मां के साथ पूजा करने जाती थी।
चौथी घटना :
मध्य प्रदेश के छत्रपुर जिले में एम. एल मिश्र रहते थे। उनकी एक लड़की थी, जिसका नाम स्वर्णलता था। बचपन से ही स्वर्णलता यह बताती थी कि उसका असली घर कटनी में है और उसके दो बेटे हैं। पहले तो घर वालों ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया लेकिन जब वह बार-बार यही बात बोलने लगी तो घर वाले स्वर्णलता को कटनी ले गए। कटनी जाकर स्वर्णलता ने पूर्वजन्म के अपने दोनों बेटों को पहचान लिया। उसने दूसरे लोगों, जगहों, चीजों को भी पहचान लिया।
छानबीन से पता चला कि उसी घर में 18 साल पहले बिंदियादेवी नामक महिला की मृत्यु दिल की धड़कने बंद हो जाने से मर गई थीं। स्वर्णलता ने यह तक बता दिया कि उसकी मृत्यु के बाद उस घर में क्या-क्या परिवर्तन किए गए हैं। बिंदियादेवी के घर वालों ने भी स्वर्णलता को अपना लिया और वही मान-सम्मान दिया जो बिंदियादेवी को मिलता था।
पांचवी घटना :
सन 1956 की बात है। दिल्ली में रहने वाले गुप्ताजी के घर पुत्र का जन्म हुआ। उसका नाम गोपाल रखा गया। गोपाल जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसने बताया कि पूर्व जन्म में उसका नाम शक्तिपाल था और वह मथुरा में रहता था, मेरे तीन भाई थे उनमें से एक ने मुझे गोली मार दी थी। मथुरा में सुख संचारक कंपनी के नाम से मेरी एक दवाओं की दुकान भी थी।
गोपाल के माता-पिता ने पहले तो उसकी बातों को कोरी बकवास समझा लेकिन बार-बार एक ही बात दोहराने पर गुप्ताजी ने अपने कुछ मित्रों से पूछताछ की। जानकारी निकालने पर पता कि मथुरा में सुख संचारक कंपनी के मालिक शक्तिपाल शर्मा की हत्या उनके भाई ने गोली मारकर कर दी थी। जब शक्तिपाल के परिवार को यह पता चला कि दिल्ली में एक लड़का पिछले जन्म में शक्तिपाल होने का दावा कर रहा है तो शक्तिपाल की पत्नी और भाभी दिल्ली आईं।
गोपाल ने दोनों को पहचान लिया। इसके बाद गोपाल को मथुरा लाया गया। यहां उसने अपना घर, दुकान सभी को ठीक से पहचान लिया साथ ही अपने अपने बेटे और बेटी को भी पहचान लिया। शक्तिपाल के बेटे ने गोपाल के बयानों की तस्दीक की।
छठवी घटना :
न्यूयार्क में रहने वाली क्यूबा निवासी 26 वर्षीया राचाले ग्राण्ड को यह अलौकिक अनुभूति हुआ करती थी कि वह अपने पूर्व जन्म में एक डांसर थीं और यूरोप में रहती थी। उसे अपने पहले जन्म के नाम की स्मृति थी। खोज करने पर पता चला कि यूरोप में आज से 60 वर्ष पूर्व स्पेन में उसके विवरण की एक डांसर रहती थी।
राचाले की कहानी में सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि जिसमें उसने कहा था कि उसके वर्तमान जन्म में भी वह जन्मजात नर्तकी की है और उसने बिना किसी के मार्गदर्शन अथवा अभ्यास के हाव-भावयुक्त डांस सीख लिया था।
सातवी घटना :
पुनर्जन्म की एक और घटना अमेरिका की है। यहां एक अमेरिकी महिला रोजनबर्ग बार-बार एक शब्द जैन बोला करती थी, जिसका अर्थ न तो वह स्वयं जानती थी और न उसके आस-पास के लोग। साथ ही वह आग से बहुत डरती थी। जन्म से ही उसकी अंगुलियों को देखकर यह लगता था कि जैसे वे कभी जली हों।
एक बार जैन धर्म संबंधी एक गोष्ठी में, जहां वह उपस्थित थी, अचानक रोजनबर्ग को अपने पूर्व जन्म की बातें याद आने लगी। जिसके अनुसार वह भारत के एक जैन मंदिर में रहा करती थी और आग लग जाने की आकस्मिक घटना में उसकी मृत्यु हो गई थी।
आठवी घटना :
जापान जैसे बौद्ध धर्म को मानने वाले देशों में पुनर्जन्म में विश्वास किया जाता है। 10 अक्टूबर 1815 को जापान के नकावो मूरा नाम के गांव के गेंजो किसान के यहां पुत्र हुआ। उसका नाम कटसूगोरो था। जब वह सात साल का हुआ तो उसने बताया कि पूर्वजन्म में उसका नाम टोजो था और उसके पिता का नाम क्यूबी, बहन का नाम फूसा था तथा मां का नाम शिड्जू था।
6 साल की उम्र में उसकी मृत्यु चेचक से हो गई थी। उसने कई बार कहा कि वह अपने पूर्वजन्म के पिता की कब्र देखने होडोकूबो जाना चाहता है। उसकी दादी (ट्सूया) उसे होडोकूबो ले गई। वहां जाते समय उसने एक घर की ओर इशारा किया और बताया कि यही पूर्वजन्म में उसका घर था।
नौवी घटना :
थाईलैंड में स्याम नाम के स्थान पर रहने वाली एक लड़की को अपने पूर्वजन्म के बारे में ज्ञात होने का वर्णन मिलता है। एक दिन उस लड़की ने अपने परिवार वालों को बताया कि उसके पिछले जन्म के मां-बाप चीन में रहते हैं और वह उनके पास जाना चाहती है।
उस लड़की को चीनी भाषा का अच्छा ज्ञान भी था। जब उस लड़की की पूर्वजन्म की मां को यह पता चला तो वह उस लड़की से मिलने के लिए स्याम आ गई। लड़की ने अपनी पूर्वजन्म की मां को देखते ही पहचान लिया। बाद में उस लड़की को उस जगह ले जाया गया, जहां वह पिछले जन्म में रहती थी।
दसवी घटना :
सन 1963 में श्रीलंका के बाटापोला गांवमें रूबी कुसुमा पैदा हुई। उसके पिता का नाम सीमन सिल्वा था। रूबी जब बोलने लगी तो वह अपने पूवर्जन्म की बातें करने लगी। उसने बताया कि पूर्वजन्म में वह एक लड़का थी। उसका पुराना घर वहां से चार मील दूर अलूथवाला गांव में है। वह घर बहुत बड़ा है। उसने यह भी बताया कि पूर्वजन्म में उसकी मृत्यु कुएं में डुबने से हुई थी।
पुनर्जन्म, विज्ञान और वैज्ञानिक
एक समय ऐसा था जब अपने को तार्किक बताने वाले बुध्दिजीवी पुनर्जन्म की घटना को बकवास कहकर हँसी उड़ाते थे। पर अब समय बदल रहा है, अधिकांश तार्किक यह मानने लगे हैं कि जिसे बुध्दि समझ नहीं सकती, वैसा ही इस दुनिया में कुछ हो रहा है।
भारत के प्रखर बुध्दिवादी जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर का अनुभव कहता है कि उनकी पत्नी की मृत्यु के बाद वह रोज उनके सपने में आकर उनसे बात करतीं थीं। इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब डेथ ऑटरय में भी किया है। इस किताब को कोणार्क पब्लिकेशंस ने प्रकाशित किया है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार पुनर्जन्म का संबंध टेलीपेथी या मानवशास्त्र से हो सकता है। विद्यार्थी टेस्ट बुक के रूप में इंट्रोडक्शन टु साइकोलॉजी का अध्ययन करते हैं, उसके लेखक रिचर्ड अटिकिंसन कहते हैं- पेरासाइकोलॉजी विषय में जजो शोध हो रहे हैं, इस बारे में हमें बहुत सी शंकाएँ हैं। पर हाल ही में टेलिपेथी के संबंध में जो शोध हुए हैं, वे हमें विवश करते हैं कि हम उसे स्वीकार लें। पुनर्जन्म और टेलिपेथी पर किताब लिखने वाले डॉ. डीन रेडिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कहते हैं- इस प्रकार की घटनाओं के जितने सुबूत पेश किए गए हैं, उतने सुबूत यदि किसी अन्य विषय पर पेश किए होते, तो वैज्ञानिक कब का इसे स्वीकार चुके होते। यही विज्ञान और धर्म के बीच संघर्ष का जन्म होता है।
आज देश ही नहीं, बल्कि विश्व के कई वैज्ञानिक बड़ी उलझन में हैं। वहीं बहुत सारी धार्मिक मान्यताओं में से एक मान्यता अब वैज्ञानिक आधार प्राप्त करने लगी है। ये धार्मिक मान्यता है, पुनर्जन्म की। टीवी पर प्रसारित राज पिछले जन्म का दिनों-दिन लोकप्रिय हो रहा है। इससे लोग अपने पुनर्जन्म की घटनाओं को जानने की चाहत बढ़ गई है। वैज्ञानिक अब तो इसे पूरी तरह से नकार रहे थे, इसके लिए उनके पास तमाम दावे भी थे। पर अब वे नर्वस नजर आ रहे हैं, क्योंकि अपने ही पुराने आधारों के कारण वे पुनर्जन्म को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है, वही नई वैज्ञानिक शोधो को वे नकार नहीं पा रहे हैं, इसलिए वे इस पर कुछ बोलना भी नहीं चाहते।
हिंदू मान्यताओं के मुताबिक पुनर्जन्म होता
है लेकिन कोई भी व्यक्ति मरने के तुरंत बाद ही दूसरा जन्म ले यह संभव नहीं
है। अगर हिंदू मान्यताओं पर विश्वास किया जाए तो मृत्यु के बाद आत्मा इस
वायु मंडल में ही चलायमान होती है। स्वर्ग-नर्क जैसे स्थानों पर घूमती है।
लेकिन उसे एक न एक दिन शरीर जरूर लेना पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र इस बात को
ज्यादा मजबूती से रखता है। धर्म में जिसे प्रारब्ध कहा जाता है, यानी
पूर्व कर्मों का फल, वह ज्योतिष का ही एक हिस्सा है। इसलिए ज्योतिष की लगभग
सारी विधाएं ही पुनर्जन्म को स्वीकार करती हैं। इस विद्या का मानना है कि
हम अपने जीवन में जो भी कर्म करते हैं उनमें से कुछ का फल तो जीवन के दौरान
ही मिल जाता है और कुछ हमारे प्रारब्ध से जुड़ जाता है। इन्हीं कर्मों के
फल के मुताबिक जब ब्रह्मांड में ग्रह दशाएं बनती हैं, तब वह आत्मा फिर से
जन्म लेती है। इस प्रक्रिया में कई साल भी लग सकते हैं और कई दशक भी।
टेलीपेथी, प्रिकग्निशन, मेटाफिजिक्स आदि वैज्ञानिक पहलुओ पर चल रहे प्रयोगों एवं अन्वेषनो से अब यह तथ्य अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है की शरीर की सत्ता तक ही मानवी सत्ता सिमित नहीं है अर्थात मरने के बाद भी आत्मा का अस्तित्व किसी ना किसी रूप में बना रहता है मनुष्य का शरीर कोशिकाओं से बना है यह कोशिकाए प्रोटोप्लाज्म नामक जीवित अणुओ से बनी है यदि प्रोटोप्लाज्म को भी खंडित किया जाए तो सजीव अंतिम टूकडा होती है और उसमे चेतना का स्पंदन होता है तो उसके भी साइटोंप्लाज्म तथा न्यूक्लिअस नामक दो भाग हो जाते है
पुनर्जन्म और पूर्वजन्म विषय पर अमेरिका में इयान स्टीवंस ने जिस तरह से शोध किया है, ठीक उसी प्रकार का शोध भारत में डॉ. सतवंत पसरिया ने भी किया है। बेंगलोर की नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसीजय में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. सतवंत ने ईस्वी सन् 1973 से लेकर अभी तक भारत में प्रकाश में आई पुनर्जन्म के करीब 500 घटनाओं का संकलन किया है। इसे एक पुस्तक का आकार दिया गया है, जिसका नाम है श्क्लेम्स ऑफ रिइंकार्नेशनरू एम्पिरिकल स्टी ऑफ केसेज इन इंडिया। उल्लेखनीय है कि बेंगलोर की ये महिला वैज्ञानिक ने अपने शोध के लिए अमेरिका की वर्जिनिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रो. इयान स्टिवेंस के साथ ही काम किया है। इस किताब की प्रस्तावना भी प्रो. स्टिवेंस ने ही लिखी है। वे कहते हैं कि जो इस तरह के किस्सों को पहली बार पढ़ रहे होंगे, उनके लिए इसमें शामिल घटनाओं को सच मानने में बहुत मुश्किल होगी, इसके बाद भी पाठक यह विश्वास रखें कि इस पुस्तक में जो भी घटनाएँ शामिल की गई हैं, वे सभी काफी सावधानीपूर्वक और प्रामाणिकता के साथ लिखी गई हैं।
डॉ. सतवंत के अनुसार जिन बच्चों को अपना पूर्वजन्म याद रहता है, वे 3 से 9 वर्ष तक की उम्र के होते हैं। डॉ. सतवंत ने पहली बार 1973 में वर्जिनिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ऑफ साइकियाट्री इयान स्टिवंस के बारे में जाना, फिर उनके साथ काम किया। इस दौरान उसने जाना कि मानव विज्ञान में इंसान की कई गतिविधियाँ अभी तक समझ से बाहर हैं, ऐसे में पुनर्जन्म की थ्योरी से इसे बखूबी समझा जा सकता है। इस आधार पर उन्होंने अपना शोध शुरू किया। शुरुआत में जब उनके सामने एक के बाए एक किस्से आने लगे, तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं होता था। इतने में उनके सामने मथुरा जिले की मंजू शर्मा नाम की एक कन्या का मामला सामने आया। उसे अपने पूर्वजन्म की घटना याद की। इसका प्रमाण भी उनके सामने था, तब वे पुनर्जन्म पर विश्वास करने लगी।
बेंगलोर में डॉ. सतवंत के सहकर्मियों एवं उच्च अधिकारियों ने उनके इस शोध की उपेक्षा की। किंतु डॉ. सतवंत की तर्कबत्र कार्यपध्दति से प्रभावित होकर उनका साथ देना शुरू कर दिया। कुछ दिनों बाद उन्हें भी डॉ. सतवंत की सच्चाई पर विश्वास होने लगा। डॉ. सतवंत कहती हैं कि पुनर्जन्म, इंद्रियातीत शक्तियों और मृत्यु जैसे अनुभवों पर विश्वास करें या न करें, अब इसका सवाल ही पैदा नहीं होता। विश्वभर में इस मामले पर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं, इनका अस्तित्व अब वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो रहा है। कई बार तो ऐसे मामले सामान्य बुध्दि से भी समझे जा सकते हैं। पर जहाँ सामान्य बुध्दि की सीमा समाप्त हो जाती है, तब पुनर्जन्म की बात को स्वीकारना पड़ता है।
अपने अनुभवों से गुजरते हुए डॉ. सतवंत कहती हैं कि कल्पना करो कि कोई बच्चा यदि पानी में जाने से डरता है, तो यह तय है कि पिछले जन्म में उसकी मौत पानी में डूबने से हुई होगी, या फिर उसकी मौत के पीछे पानी ही कोई कारण रहा होगा। कई बच्चों के शरीर पर जन्म से ही कई तरह के निशान होते हैं, इससे यह धारणा सत्य साबित होती है कि पिछले जन्म में उसे किसी तरह की चोट लगी होंगी। सामान्य रूप से यह माना जाता है कि पूर्वजन्म को याद रखने वाले कम उम्र में ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं, पर नागपुर की उत्तरा का किस्सा कुछ और ही है। जब यह 30 वर्ष की थीं, तब वह कहने लगी कि वह बंगाल की शारदा है और चटोपाध्याय परिवार की सदस्य है। मराठीभाषी उत्तरा अब धाराप्रवाह रूप से बंगला बोलने लगी। यही नहीं 18 वीं सदी के रीति-रिवाजों पर बात करने लगी। पूर्वजन्म में ऐसा होता है कि मृत्यु के एक वर्ष बाद फिर से जन्म होता है। पर यहाँ तो बंगाल की शारदा की मृत्यु के 110 वर्ष बाद उसका पुनर्जन्म हो रहा है। इस मामले को विस्तार से डॉ. सतवंत ने अपनी किताब में बताया है।
मुंबई की एक महिला बासंती भायाणी अपने परिवार में हुई पुनर्जन्म की एक घटना 8 सितम्बर 2004 के एक गुजराती अखबार में प्रकाशित हुई है। इस घटना में जूनागढ़ की एक ब्राह्मण कन्या गीता का जन्म भावनगर के एक जैन परिवार में राजुल के रूप में हुआ। राजुल जब अपने पिछले जन्म को याद करने लगी, तो उसे जूनागढ़ ले जाया गया, यहाँ उसने अपना घर, स्वजन ही नहीं, बल्कि अपनी गुडिया तक को पहचान लिया। जब राजुल की शादी हुई, तब उसके पूर्वजन्म के परिजनों ने उसे बहुत सारा दहेज भी दिया। आज राजुल अहमदाबाद में अपने छोटे से परिवार में रहती है।
क्या मरने बाद दोबारा होता है जन्म? जानिए पुनर्जन्म का रहस्य
पुनर्जन्म अर्थात मरने के बाद फिर से नया जन्म होता है या नहीं, इस बारे में विज्ञान तो किसी एक नतीजे पर पहुंच ही नहीं पाया है, धर्म दर्शन भी एक मत नहीं है।
भारतीय मूल के सभी धर्म दर्शन पुनर्जन्म को मानते हैं, यहां तक कि आत्मा के अजर अमर अस्तित्व को ले कर मौन रहने वाले बौद्ध और जैन दर्शन भी पुनर्जन्म की संभावना को निश्चित मानते हैं। फिर से जन्म लेने की तकनीक पर भले ही मतभेद हों, पर दोबारा जन्म की बात को किसी न किसी रूप में सभी मान रहे हैं।
विज्ञान दूसरी तरह से मानता है कि शरीर या जीवन का अंत नहीं होता। उसका रूप बदलता रहता है क्योंकि पदार्थ और शक्ति का कभी नाश नहीं होता। विभिन्न तत्वों (पंचतत्वों) के संयोग से जो जीव बनते हैं, मृत्यु के समय वे नष्ट होते तो दिखाई देते हैं पर वास्तव में वे मिट नहीं जाते।
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विज्ञान की नजर में पुनर्जन्म
पिछली शताब्दी में अपनी अन्वेषी मेधा के कारण आधुनिक गैलीलियों कहे जाने वाले वैज्ञानिक डा. इयान स्टीवेंसन ने पहली बार वैज्ञानिक शोधों और प्रयोगों के दौरान पाया कि शरीर न रहने पर भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है।
उपयुक्त अवसर आने पर वह अपने शरीर या पार्थिव रूप को फिर से रचता है। उन्ही की टीम द्वारा किए प्रयोग और अऩुसंधानों को स्पिरिट साइंस एंड मेटाफिजिक्स में संजोते हुए लिखा है कि पुनर्जन्म काल्पनिक नहीं हैं। उसकी संभावना निश्चित सी हैं।
किसी बालक को पिछले जन्म की याद आने और जांच करने पर उन विवरणों कए सही साबित होने की बात तो मामूली से प्रमाण हैं। इन विवरणों में कई गप्प और तुकबंदी जैसे भी साबित हो सकते हैं, पर जिन समाजों और संप्रदायों में पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं किया जाता उऩमें भी उस तरह की घटनाएं हुई हैं और परखने के बाद सही साबित हुई है।
पिछले जन्म की बातो ने किया हैरान
अमेरिका के कोलोराडी प्यूएली नामक में रुथ सीमेंन्स नामक लड़की ने सन 1995 ई0 में न सिर्फ पांच साल की अवस्था में अपने पिछलो जन्म का सही हाल बता कर ईसाई पंरपरा के उन निष्ठावान अनुयायियों को हैरान कर दिया जो पुनर्जन्म को नहीं मानते।
रुथ सीमेंन्स मोरे वनस्टाइन नामक विद्या विशारद ने अपने प्रयोग से अर्धमूर्छित करके उसके पिछले जन्म की कई सूचनाएं प्राप्त कीं। उसने बताया कि 1890 में आयरलैण्ड के कार्क नगर में उसका पिछला जन्म हुआ था, तब उसका नाम ब्राइडी मर्फी और पति का नाम मेकार्थी था।
दूसरा जन्म लेकर कातिल को पकड़वाया
इस्तम्बूल(तुर्की) की विज्ञान अनुसंधान परिषद ने पुनर्जन्म की एक ऐसी घटना की पड़ताल की जो निस्संदेह पुनर्जन्म से संबंधित थी। इस मामले का प्रमुख पात्र चार वर्ष का बालक इस्माइल अतलिंट्रलिक पिछले जन्म में दक्षिण पूर्व के अदना गांव का वाशिंदा आविद सुजुलयुस था। इसकी हत्या की गई थी। उसके तीन बच्चे थे गुलशरां, लकी और हिकमत।
चार साल का इस्माइल सोते-सोते बच्चों के नाम पुकारने लगता और रोने लगता। एक दिन इस्माइल ने एक फेरी वाले को आइसक्रीम बेचते देखा। उसने अजनबी का नाम लेकर पुकारा-महमूद तो साग-सब्जी बेचते थे, अब आइसक्रीम बेचने लगे। फेरी वाला दंग रह गया।
यह बच्चा कैसे उसका नाम जानता है और कैसे उस पिछले व्यापार की चर्चा करता जब कि उसका जन्म भी नहीं हुआ था, बच्चे ने कहा तुम भूल गये मैं तुम्हारा चिर परिचित आविद हूं। कई साल पहले उसका कत्ल हो गया था।
इस तरह से पूर्व जन्म की बातों कों जानने में लगे हैं वैज्ञानिक
बच्चे को अदना नगर ले गये। वहां पहुंचा तो पिछले जन्म की बेटी गुलशरां को देखते ही पहचान गया। उसने हत्या के स्थान अस्तबल को भी दिखाया और बताया कि रमजान ने कुल्हाड़ी से हमला कर मुझे मार डाला। और विवरण भी सही पाए गए। उनके आधार पर पुलिस ने इस कत्ल की ठीक वैसी ही जांच की जैसी कि बच्चे ने बताई।
पिछले जन्म को प्रमाणित करने के लिए उनकी स्मृतियों के आधार पर परखने और सही पाने के बाद मान लेने की तकनीक बहुत पुरानी है। उस पर संदेह भी जताए गए हैं।
अब जीन्स और गुणसूत्रों के आधार पर परखने की नई तकनीक काम में लाई जा रही है। 1998 से उपयोग की जा रही इस तकनीक के और भी रोचक और ज्यादा प्रामाणिक नतीजे सामने आ रहे हैं।
पुनर्जन्म एक रहस्य
पुनर्जन्म
वैदिक सिद्धांत के अनुसार आत्मा अपने कर्मो के अनुसार शरीर बदलता रहता है। सभी शरीरो मे मात्र मनुष्य ऐसा शरीर है जिसमे आत्मा कर्म करने मे स्वतंत्र है। इस शरीर मे जहा वह अपने पिछले किये कर्मो का फल भोगता है वहा नये कर्म भी करता है। इसलिये मनुष्य शरीर को भोग योनि तथा कर्म योनि कहा जाता है। अन्य सभी योनिया केवल मात्र भोग योनि हैं क्योंकि उनमे जीव स्वतन्त्र होकर अथवा विचार कर कर्म नही कर सकता। वह या तो पराधीन होकर काम करता है या स्वभाव से करता हैं।
क्या आप जानते है कि पूर्वजन्म में आप क्या थे ?
मनुष्य से भिन्न सभी योनियो की ऐसी अवस्था हैं जैसी तलवार की। कोई व्यक्ति तलवार चलाकर के अच्छा या बुरा काम करता है तो उसका फल या दण्ड तलवार चलाने वाले को मिलता है, तलवार को नही।अतः मनुष्य जन्म मे किए हुए कर्मों के अनुसार ही आत्मा को शरीर मिलता है। यदि शुभ कर्म अधिक हो तो देव यानि विद्वान् का शरीर मिलता है। बुरे कर्म अधिक हो तो पशु, पक्षी, कीट, पतंग, आदि का जन्म मिलता है। अच्छे ओर बुरे कर्म बराबर हो तो साधारण मनुष्य का जन्म मिलता है। यह जीव मन से शुभ अशुभ किए कर्म का फल मन से भोगता है। वाणी से किये का वाणी से शरीर से किए का शरीर से भोगता है। महाऋषि मनु ने वेदो के आधार पर ऐसा ही लिखा है। आत्मा मनुष्य या पशु जिस भी योनि मे जाता है उसी के अनुसार ढल जाता है— जैसे पानी मे जो रंग डाला जाता है पानी उसी रंग का बन जाता है। पुनर्जन्म को गीता मे ऐसा लिखा है—
“जिस प्रकार मनुष्य फटे पुराने कपडो को उतार कर नये पहन लेता है ठीक उसी प्रकार यह आत्मा जीण॔ (निकम्मे )शरीर को छोडकर नया शरीर धारण कर लेता है।”
प्रश्न – हमे पूर्वजन्म याद क्यों नही ?
उत्तर – जीव का ज्ञान दो प्रकार का होता है- 1. स्वाभाविक ओर 2. नैमित्तिक। स्वाभाविक ज्ञान सदा रहता है ओर नैमित्तिक ज्ञान बढता घटता रहता है। जीव को अपने अस्तित्व का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक है। परन्तु आंख, कान आदि इन्द्रियो से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह नैमित्तिक ज्ञान है। नैमित्तिक ज्ञान तीन कारणो से उत्पन्न होता है– देश, काल ओर वस्तु। इन तीनो कापरेरेशन जैसा जैसा इन्द्रियो से सम्बन्ध होता है वैसा वैसा संस्कार मन पर पडता है। इनसे सम्बन्ध हटने पर इनका ज्ञान भी नष्ट हो जाता है। पूर्व जन्म का देश, काल, शरीर का वियोग होने से उस समय का नैमित्तिक ज्ञान नही रहता।
मनुष्य शरीर एक घोड़ा-गाड़ी
कठोपनिषद् मे मनुष्य शरीर की तुलना एक घोड़ा-गाड़ी से की गई है। मनुष्य के शरीर मे दस इन्द्रियाँ- जिनमें-पांच ज्ञान इन्द्रिया :- आख, कान, नाक, जिव्हा, त्वचा ओर पांच कर्म इन्द्रियां :- हाथ, पाव,मुख, मल ओर मूत्र इन्द्रियां रथ को खीचने वाले दस घोड़े है।
मन लगाम, बुद्धि सारथी (रथवान्) तथा आत्मा रथ का सवार है। आत्मा रूपी सवार तभी अपने लक्ष्य तक पहुंचेगा जब बुध्दि रूपी सारथी मन रूपी लगाम को अपने वश मे रख के इन्द्रियां रूपी घोड़ों को सन्मार्ग पर चलाएगा। घोड़े अगर सारथी के वश मे नही है तो वे इधर-उधर के आकर्षणो मे उलझकर मार्ग को छोड बैठेंगे। यही अवस्था इन्द्रियो की है। ऐसी अवस्था का दु:ख रूपी दुष्परिणाम भोगना पडता है आत्मा को।
इस गाड़ी को किराये की गाड़ी बताया गया है जिसे वायु ,जल ओर भोजन के रूप मे निरन्तर किराया देना पड़ता है।
मनुष्य शरीर का उद्देश्य है – सुख प्राप्ति। ओर सुख मिलता है परोपकार आदि शुभ कर्म करने से। परोपकार करना ही सन्मार्ग पर चलना है। असत्य अन्याय आदि दुष्ट कर्मो मे पड़ जाना ही संसार मे उलझना है।
गीता मे कहा गया है – इन्द्रियो की अपेक्षा मन श्रेष्ठ है, मन की अपेक्षा बुद्धि अधिक श्रेष्ट है, बुद्धि की अपेक्षा आत्मा ओर अधिक श्रेष्ट है।
पुनर्जन्म का रहस्य जब यमराज ने बताया
पुनर्जन्म का रहस्य जब यमराज ने बताया के. के. निगम जीव के पारलौकिक जीवन को निर्धारित करने वाले यमराज जब स्वयं जीवन, मृत्यु, आत्मा के पुनरागमन, पूर्वजन्म एवं पुनर्जन्म आदि के बारे में बतायें तो इस संबंध में इससे अधिक प्रामाणिक विवरण और क्या होगा। एक बार महर्षि उद्दालक ने यश की कामना से विश्वजित नामक यज्ञ किया। इस यज्ञ में यज्ञकर्ता को अपना सर्वस्व दान कर देना होता है, इसलिए ऋषि उद्दालक ने भी अपनी समस्त संपत्ति दान कर दी तो उनके पुत्र नचिकेता ने अपने पिता से पूछा कि जब आपने समस्त संपत्ति दान कर दी है तो मुझे किसको दान में देगें क्योंकि मैं भी तो आपका धन हूं।
इस पर ऋषि पिता ने कोई उत्तर नहीं दिया परंतु नचिकेता बार-बार यही प्रश्न पिता से करने लगे तो ऋषि उद्दालक को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोध में कह दिया कि मैं तुम्हें मृत्यु को दान करता हूं। इस पर नचिकेता सोचने लगे कि मृत्यु मेरा दान लेकर क्या करेगी। नचिकेता ने सोचा कि पिता ने मुझे दान में मृत्यु को दे दिया है तो मुझे उसके पास जाना चाहिए और उन्होंने मृत्यु के पास जाने की पिता से आज्ञा मांगी, तब ऋषि को महसूस हुआ कि क्रोध में उनके मुंह से क्या अनर्थ निकल गया हैं। परंतु नचिकेता के बराबर हठ करने पर उन्होंने नचिकेता को यमराज के पास जाने दिया।
जब नचिकेता यम के द्वार पहुंचे तो ज्ञात हुआ कि यमराज कहीं बाहर गये हुए थे तब वह हारकर वहीं पर बैठकर बिना कुछ खाये-पीये प्रतीक्षा करने लगा। तीन दिन व्यतीत होने पर जब यमराज वापस आये तो उनकी पत्नी ने बताया कि एक तेजस्वी ब्राह्मण पुत्र तीन दिन से बिना कुछ खाये-पीये आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। यह सुनकर यमराज नचिकेता के पास पहुंचे। यम ने पूछा कि हे ब्राह्मण पुत्र, आप कौन हैं तथा तीन दिन से किस कारण अनशन किये बैठे हैं।
यहां आने का प्रयोजन क्या है। मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है, आप इसके बदले मुझसे कोई तीन वर मांग सकते हैं। तब नचिकेता ने पिता के घर का संपूर्ण वृत्तान्त यमराज को सुनाया। नचिकेता ने यमराज द्वारा दिये गये तीन वरों में से पहला वर यह मांगा कि पिता का क्रोध शांत हो जाए तथा उनको दृष्टि प्राप्त हो। द्वितीय वर के रूप में नचिकेता ने ''स्वर्ग अग्नि विज्ञान'' का रहस्य बताने का वर मांगा। तब यमराज ने अग्नि विद्या रहस्य जो स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली होती है का स्वरूप, कुंडादि बनाने की प्रक्रिया, विधि आदि समझाई और कहा कि आज से यह विद्या तुम्हारे नाम से ही नचिकेताग्नि के नाम से जानी जायेगी।
इसके पश्चात नचिकेता ने तीसरे वर के रूप में पुनर्जन्म एवं आत्मा का रहस्य बताने को कहा। मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है या नहीं रहता, इस विषय में ज्ञान दें। यमराज इस प्रश्न को सुनकर बहुत हतप्रभ हुये। उन्होंने अनेक प्रलोभन देकर नचिकेता से इस विषय को न जानने का आग्रह किया, परंतु नचिकेता अडिंग रहे। जब यमराज ने देखा कि नचिकेता किसी प्रकार मान नहीं रहे हैं तब विवश होकर यमराज ने बताया। यह आत्मतत्व अत्यंत सूक्ष्म है। इसको समझना बड़ा कठिन है।
पूर्व में देवताओं को भी इसका सन्देह हुआ था। मनुष्य शरीर दूसरी योनियों की भांति केवल कर्मों का फल भोगने के लिए ही नहीं मिला है, इस योनी में मनुष्य भविष्य में (पुनर्जन्म होने पर) सुख देने वाले साधन का भी अनुष्ठान कर सकता है। बहुत से मनुष्य पुनर्जन्म में विश्वास न होने के कारण इस पर विचार ही नहीं करते तथा वे सासांरिक भोगों में लिप्त होकर अपने देव दुर्लभ मनुष्य जीवन को पशुवत् भोगों को भोगने में ही समाप्त कर देते हैं। किंतु जिन मनुष्यों को पुनर्जन्म और परलोक में विश्वास होता है, वे सामने आने वाले श्रेय और प्रेय दोनों के गुण-दोषों पर विचार कर दोनों को अलग-अलग समझने का प्रयास करते हैं।
जो मनुष्य श्रेष्ठ बुद्धिमान होता है वह इन दोनों के तत्वों को समझकर नीर-क्षीर विवेक के अनुसार प्रेय की उपेक्षा करके श्रेय को ही ग्रहण करता है। परंतु जिनमें विवेक-शक्ति का लोप होता है, वे श्रेय के फल में अविश्वास करके प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले लौकिक योगक्षेम की सिद्धि के लिए प्रेय को ग्रहण करते हैं। इस प्रकार यमराज ने नचिकेता को जन्म, मृत्यु, पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्म का रहस्य बताने के बाद उसकी लगन एवं निष्ठा को देखकर परमात्म तत्व 'ऊँ' के बारे में भी बताते हुए कहा। समस्त वेद अनेकों प्रकार से और अनेकों छंदों से जिसका प्रतिपादन करते हैं, संपूर्ण तप आदि साधनों का जो एक मात्र परम लक्ष्य है तथा जिसको पाने की कामना से साधक निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान करते हैं, उस पुरुषोत्तम ईश्वर का परम तत्व 'ऊँ' है, यही 'ऊँ' परमब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति का श्रेष्ठ अवलम्बन है। आत्मा के शुद्ध स्वरूप और उसकी नित्यता का वर्णन करते हुए यमराज ने बताया ''जीवात्मा नित्य चेतन व ज्ञान स्वरूप है। अनित्य, विनाशी जड़ शरीर और भोगों से इसका कोई संबंध नहीं है। यह अनादि एवं अनंत, है यह शरीर के नाश होने पर भी नहीं मरती है तथा कर्मों के अनुसार अगले जन्म में पुनः नया शरीर धारण करती है।''
वेद और पुनर्जन्म
कुछ पाश्चात्य विद्वानों[i] की यह धारणा रही हैं की वेद पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन नहीं करते हैं। भारतीय लेखक भी पश्चिम के लेखकों का अँधा अनुसरण करते दीखते हैं[ii]। इसका एक कारण तो वेदों के अर्थो को सूक्षमता से नहीं समझना हैं और दूसरा कारण मुख्यत: रूप से सभी पाश्चात्य विद्वान ईसाई मत के थे इसलिए पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। ईसाई मत वेदों में वर्णित कर्म फल व्यस्था और पुनर्जन्म को नहीं मानता इसलिए वेदों में भी पुनर्जन्म के न होना मानता हैं।
स्वामी दयानंद अपने प्रसिद्द ग्रन्थ ऋग्वेददिभाष्यभूमिका [iii] में पुनर्जन्म के वेदों से स्पष्ट प्रमाण देते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने भी पुनर्जन्म के अन्य प्रमाण दिए हैं।
1. हे सुखदायक परमेश्वर! आप कृपा करे पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रिया स्थापित कीजिये। तथा प्राण अर्थात मन, बुद्धि, चित, अहंकार, बल, पराक्रम आदि युक्त शरीर पुनर्जन्म में कीजिये[iv]।
2. हे सर्वशक्तिमान! आपके अनुग्रह से हमारे लिए वारंवार पृथ्वी प्राण को, प्रकाश चक्षु को और अंतरिक्ष स्थानादि अवकाशों को देते रहें। पुनर्जन्म में सोम अर्थात औषधियों का रस हमको उत्तम शरीर देने में अनुकूल रहे तथा पुष्टि करनेवाला परमेश्वर कृपा करके सब जन्मों में हमको सब दुःख निवारण करनेवाली पथ्यरूप स्वस्ति को देवे[v]।
3. हे सर्वज्ञ ईश्वर! जब जब हम जन्म लेवें, तब तब हमको शुद्ध मन. पूर्ण आयु, आरोग्यता, प्राण, कुशलतायुक्त जीवात्मा, उत्तम चक्षु और श्रोत्र प्राप्त हो[vi]।
4. हे जगदीश्वर! आप की कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रिय मुझको प्राप्त हो अर्थात सर्वदा मनुष्य देह ही प्राप्त होता रहे[vii]।
5. जो मनुष्य पुनर्जन्म में धर्माचरण करता हैं, उस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारण करता और अधर्मात्मा मनुष्य नीच शरीर को प्राप्त होता हैं[viii]।
6. जीवों को माता और पिता के शरीर में प्रवेश करके जन्मधारण करना, पुन: शरीर को छोड़ना, फिर जन्म को प्राप्त होना, वारंवार होता हैं[ix]।
7. तुम तुम शरीरधारी रूप में उत्पन्न होकर अनेक योनियों में अनेक प्रकार के मुखों वाले भी हो जाते हो[x]।
8. यह जीवात्मा कभी किसी का पिता, कभी पुत्र, कभी बड़ा, कभी छोटा हो जाता हैं[xi]।
9. मैंने इन्द्रियों के रक्षक अमर इस आत्मा का साक्षात्कार किया जो जन्म-मरण के मार्गों से विचरण करता रहता हैं। वह अपने अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार और प्रीतीपूर्वक अनेक योनियों में संसार के अंदर भ्रमण करता रहता हैं[xii]।
10. हे जीवों! तुम जब शरीर को छोड़ो तब यह शरीर दाह के पीछे पृथ्वी, अग्नि आदि और जलों के बीच देह-धारण के कारण को प्राप्त हो और माताओं के उदरों में वास करके फिर शरीर को प्राप्त होता हैं[xiii]।
11. जीव माता के गर्भ में बार बार प्रविष्ट होता हैं और अपने शुभ कर्मानुसार सत्यनिष्ठ विद्वानों के घर में जन्म लेता हैं[xiv]।
इसी प्रकार से निरुक्त में यास्काचार्य ने पुनर्जन्म को माना हैं।
1. मैंने अनेक वार जन्ममरण को प्राप्त होकर नाना प्रकार के हज़ारों गर्भाशयों का सेवन किया[xv]।
2. अनेक प्रकार के भोजन किये, अनेक माताओं के स्तनों का दुग्ध पिया, अनेक माता-पिता और सुह्रदयों को देखा[xvi]।
3. मैंने गर्भ में नीचे मुख ऊपर पग इत्यादि नाना प्रकार की पीड़ाओं से युक्त होके अनेक जन्म धारण किये[xvii]।
दर्शन ग्रन्थ भी पुनर्जन्म का समर्थन करते हैं
1. हर एक प्राणियों की यह इच्छा नित्य देखने में आती हैं कि मैं सदैव सुखी बना रहूँ। मरूं नहीं। यह इच्छा कोई भी नहीं करता कि मैं न होऊं। ऐसी इच्छा पुनर्जन्म के अभाव से कभी नहीं हो सकती। यह "अभिनिवेश" क्लेश कहलाता हैं, जोकि कृमि पर्यन्त को भी मरण का भय बराबर होता हैं। यह व्यवहार पुनर्जन्म की सिद्धि को जनाता हैं[xviii]।
2. जो उत्पन्न अर्थात शरीर को धारण करता हैं, वह मरण अर्थात शरीर को छोड़ के, पुनरुत्पन्न दूसरे शरीर को भी अवश्य प्राप्त होता हैं। इस प्रकार मर के पुनर्जन्म लेने को प्रेत्यभाव कहते हैं[xix]।
गीता[xx] में आता हैं की जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रों को ग्रहण कर लेता हैं उसी प्रकार आत्मा पुराने व्यर्थ शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीरों को धारण कर लेता हैं।
इस प्रकार से रामायण, महाभारत, उपनिषद, पुराण आदि पुनर्जन्म के सिद्धांत का पुरजोर समर्थन करते हैं। पाश्चात्य विद्वान और उनकी सरणि पर चलने वाले भारतीय लेखकों को वेदों में पुनर्जन्म न मिलने का कारण उनकी वेदों के मूल अर्थों को समझने में अक्षमता हैं।
[i] The doctrine of Transmigration is entirely absent from the Vedas and the early Brahmans- The Ancient Dravidians by Shri .R.Sheshaiyengar Referring Macdonald.P.158
As he Rigvedic Aryans were full of the joie de viver (joy of life) they were not particularly interested in the life after death, much less had they any special doctrines about it. We can therefore glean only a few notices of the life beyond, that are scattered throughout the Rigveda- Vedic Age p.381-382
[ii] The Aryasamaj accepts the doctrine of Karma and rebirth though they are not Vedic.- The Encyclopedia Americana, 1971, Vol.2,p.425;Brijen K.Gupta
The Doctrine of Karma and Rebirth ,for instance, on which Dayananda insists, does not appear in the Samhitas; it makes its first appearance in the Upanishads- Hinduism, Oxford, 1962,pp.207-8,R.C.Zaehner.
[iii] ऋग्वेददिभाष्यभूमिका- स्वामी दयानंद, पुनर्जन्म विषय अध्याय 19
[iv] ऋग्वेद 8/1/23/1
[v] ऋग्वेद 8/1/23/2
[vi] यजुर्वेद 4/15
[vii] अथर्ववेद 7/67/1
[viii] अथर्ववेद 5/1/1/2
[ix] यजुर्वेद 19/47
[x] अथर्ववेद 10/8/27
[xi] अथर्ववेद 10/8/28
[xii] ऋग्वेद 1/164/31
[xiii] यजुर्वेद 12/38
[xiv] अथर्ववेद 14/4/20
[xv] निरुक्त 13/19/1
[xvi] निरुक्त 13/19/2
[xvii] निरुक्त 13/19/7
[xviii] पतंजलि योगदर्शन 2/9
[xix] न्यायदर्शन 1/1/19
[xx] गीता 2/22
क्या पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार है?
पुनर्जन्म एक ऐसा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विषय है जो हमेशा से मानने न मानने के विवाद का विषय रहा है. मसलन पुनर्जन्म को मानने वाले लोग भी रहे है और न मानने वाले भी. पर क्या पुनर्जन्म का कोई वैज्ञानिक आधार है? यदि इस सवाल पर आगे बढे तो भारतीय फोरेंसिक वैज्ञानिक विक्रम राज सिंह चौहान यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि पुनर्जन्म वास्तविक है. उन्होंने भारत में फॉरेन्सिक वैज्ञानिकों के अगस्त 2016 में एक राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने कुछ निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए थे.
चौहान ने एक छह वर्षीय लड़के की खोज की थी, जो कहता था कि वह अपने पिछले जन्म को याद करता था. वह लड़का अपना पूर्व जन्म के साथ अपने माता-पिता और उस विद्यालय का नाम भी जानता था जहाँ वह पढता था. घटना 10 सितंबर, 1992 की थी उस समय वह अपनी बाइक से घर पर जा रहा था. दुर्घटना हुई लडकें के सिर में चोटें आई और अगले दिन मर गया.
इस घटना के बाद लड़के का अगला जन्म हुआ और लडकें ने परिवार को अपनी कहानी सुनाई, उसके पिता ने बताया कि उनके बेटे ने दावा किया कि जब वह दुर्घटना हुई थी, तब उसकी किताबों पर खून के निशान लगे थे उसने यह भी बताया कि उसके पर्स में कितना पैसा था. जब यह दावा उसकी पूर्व माँ तक पहुंचा तो उसने रोना शुरू किया और कहा कि उसने अपने बेटे की याद में उसकी खून के दाग लगी किताबें और उसका पर्स ज्यों का त्यों रख लिया था. यही नहीं लडकें ने यह भी बताया था कि उस दुर्घटना के दिन उसनें दुकानदार से उधार में एक रजिस्टर भी खरीदा था.
सबसे पहले विक्रम चौहान ने इस कहानी पर विश्वास करने से इनकार कर दिया लेकिन वह अंततः उसने जिज्ञासु बनकर इस मामले की जांच करने का फैसला किया. चौहान ने उस दुकानदार के उधारी की बही चेक की तो 10 सितंबर, 1992 को लड़के के नाम पर एक रजिस्टर खरीदा गया था. चौहान ने दोनों लड़कों की लिखावट का नमूना लिया और उनकी तुलना की. उन्होंने पाया कि वे समान थी. यह फोरेंसिक विज्ञान का एक बुनियादी सिद्धांत है कि कोई भी दो लिखावट शैली समान नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की लिखावट में विशिष्ट विशेषता होती है. एक व्यक्ति की लिखावट शैली व्यक्तिगत व्यक्तित्व लक्षणों से तय होती है. चौहान ने इसके बाद कहा ऐसा माने यदि आत्मा एक व्यक्ति से दूसरे में स्थानांतरित होती तो मन-और इस तरह लिखावट एक ही रहेगी. कई अन्य फोरेंसिक विशेषज्ञों ने इस हस्तलिपि के नमूने की जांच की और वे सहमत हुए कि वे समान थे. जाँच जब आगे बड़ी तो वैज्ञानिक जो बच्चे के बोद्धिक विकास की निगरानी कर रहे थे. के सामने सबसे चौकाने वाला पहलू यह था बच्चा इस जन्म में गरीब परिवार में था जहाँ वह कभी स्कूल नहीं गया लेकिन जब उसे अंग्रेजी और पंजाबी वर्णमाला लिखने के लिए कहा गया तो उसने उन्हें सही तरीके से लिखा.
इयान स्टीवेन्सन एक मनोचिकित्सक थे जिन्होंने 50 वर्षों के लिए वर्जीनिया स्कूल ऑफ मेडिसिन के लिए काम किया था. वह 1957 से 1967 तक मनोचिकित्सा विभाग के अध्यक्ष थे, 1967 से 2001 तक कार्लसन के मनोचिकित्सा के प्रोफेसर और अपनी मौत से 2002 तक मनोचिकित्सा के एक शोध प्रोफेसर थे. उन्होंने अपने पूरे जीवन को पुनर्जन्म शोध में समर्पित किया था. उन्होंने निम्न सवाल जैसे क्या मृत्यु के बाद जीवन का कोई ठोस प्रमाण है? क्या पुनर्जन्म वास्तव में होता है? क्या मृत्यु के बाद जीवन है और क्या वह जीवन वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है? इन सभी सवालों के बाद वह अंत में अपना पक्ष रखते हुए कहते है कि मौत का अनुभव, मौत के दृश्य, आत्मिक चेतना, यादें और शारीरिक चोटें एक जीवनकाल से दूसरी तक स्थानांतरित हो सकती हैं.
इयान स्टीवेन्सन ने दुनिया भर के बच्चों के 3,000 मामलों की जांच की जो पिछले जन्मों को याद करते हुए पाए गये 40 वर्षों की लम्बी अवधि में बड़े पैमाने पर इयान ने अनेक देशों की यात्रा की. उनके सूक्ष्म शोध ने कुछ सबूतों को प्रस्तुत किया कि ऐसे बच्चों में कई असामान्य क्षमताएं, बीमारियाँ, और आनुवंशिक लक्षण पूर्व जन्म के साथ सामान पाए गये.
स्टीवेन्सन समस्त जन्मों को पूर्वजन्म बताते हुए अपना पक्ष रखते है कि आमतौर पर बच्चे दो और चार की उम्र के बीच अपनी यादों के बारे में बात करना शुरू करते हैं जब बच्चा चार और सात साल के बीच होता है तो ऐसे समय में शिशु की यादें धीरे-धीरे कम होती जाती हैं. हमेशा कुछ अपवाद होते हैं, जैसे कि एक बच्चा अपने पिछले जीवन को याद रखना जारी रखता है लेकिन इसके बारे में विभिन्न कारणों से नहीं बोल रहा है.
अधिकांश बच्चे अपनी पिछली पहचान के बारे में बहुत तीव्रता और भावना के साथ बात करते हैं. अक्सर वे खुद के लिए नहीं तय कर सकते हैं कि दुनिया असली है या नकली. वे एक तरह का दोहरा अस्तित्व अनुभव करते हैं, जहां कभी-कभी एक जीवन अधिक महत्वपूर्ण होता है, और कभी-कभी दूसरा जीवन. बच्चें की यह अवस्था उस समय ऐसी होती हैं जैसे एक समय में दो टीवी पर अलग-अलग धारावाहिक देखना. लेकिन समय के साथ एक स्मृति धुंधली हो जाती है.
इसके बाद अगर व्यवहार से उदाहरण ले तो यदि बच्चे का जन्म भारत जैसे देश में बहुत गरीब और निम्न जाति के परिवार में हुआ है जबकि अपने पिछले जीवन में उच्च जाति का वह सदस्य था, तो यह अपने नए परिवार में असहज महसूस कर सकता है. बच्चा किसी के सामने हाथ पैर जोड़ने से मना कर सकता है और सस्ते कपड़े पहनने से इनकार कर सकता है. स्टीवनसन इन असामान्य व्यवहारों के कई उदाहरण बताते हैं. 35 मामलों में उन्होंने जांच की, जिन बच्चों की मौत हो गई उनमें एक अप्राकृतिक मौत का विकास हुआ था. उदाहरण के लिए, यदि वे पिछली जिन्दगी में डूब गए तो उन्होंने अक्सर पानी में नदी आदि में जाने के बारे में डर व्यक्त किया. अगर उन्हें गोली मार दी गई थी, तो वे अक्सर बंदूक से डर सकते हैं. यदि वे सड़क दुर्घटना में मर गए तो कभी-कभी कारों, बसों या लॉरी में यात्रा करने का डर पैदा होता था.
यही नहीं स्टीवेन्सन ने अपने अध्यन में पाया कि शुद्ध शाकाहारी बच्चा किसी मांसहारी परिवार में जन्म ले तो वह मांसाहार के प्रति अरुचि पैदा कर अलग-अलग भोजन खाने की इच्छा व्यक्त करता हैं. अगर किसी बच्चे को शराब, तम्बाकू या मादक पदार्थों की लत तो वे इन पदार्थों की आवश्यकता व्यक्त कर सकते हैं और कम उम्र में अभिलाषाएं विकसित कर सकते हैं. अक्सर जो बच्चे अपने पिछले जीवन में विपरीत लिंग के सदस्य थे, वे नए लिंग के समायोजन में कठिनाई दिखाते हैं. लड़कों के रूप में पुनर्जन्म होने वाली पूर्व लड़कियों को लड़कियों के रूप में पोशाक करना या लड़कों की बजाए लड़कियों के साथ खेलना पसंद हो सकता है.
स्टीवेन्सन कहते है कि पुनर्जन्म सिर्फ एक गान नहीं है, यह सबूत के छोटे-छोटे टुकड़े जोड़कर एक बड़ा शोध का विषय है. यह अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के मानने न मानने की सिद्धांत नहीं है. यह एक विषय है जो पुनर्जन्म के सम्बन्ध में सभी अवधारणाओं के साथ आत्मा स्थानान्तरण के लौकिक सत्य को स्वीकार करता है…
कुछ लोग पुनर्जन्म आत्मा की थ्योरी को मानते हैं– एक सफ़ेद झूठ !
हमारे देश में अंधविश्वास इतना ज्यादा प्रचलित है कि लोग किसी के मुँह से कुछ भी सुन लें, तो उस पर आँख मूँद कर विश्वास कर लेते हैं। फिर चाहे वह किसी चमत्कार के बारे में हो अथवा पुनर्जन्म जैसी एकदम फालतू कल्पनाओं के बारे में।
आपने बहुत ऐसे किस्से सुने होंगे जिसमे किसी इंसान के ‘पुनर्जन्म ‘की दावे किये जाते हैं की अमुक व्यक्ति का पुनर्जनम हुआ था / है । हिंदी फिल्मो की तो भरमार है जिसमें पुनर्जन्म’के किस्से लेके कहानिया बना दी जाती हैं। पर वास्तव में ऐसा है क्या ? क्या पुनर्जन्म की कहानियां सच होती हैं? क्या जो दावे किये जाते हैं वे प्रमाणित होते हैं ?
नहीं … हरगिज नहीं।
पुनर्जन्म की कहानियां केवल कपोल कल्पनायें और झूठी अफवाहे के सिवा कुछ
नहीं होती।
देखिये किस प्रकार पुनर्जन्म की कहानिया झूठ के सिवा कुछ नहीं होती-
1- आज तक किसी पुनर्जन्म लिए बच्चे ने यह
क्यों नहीं कहा की वह पिछले जन्म में मुर्गा,सूअर , गधा ,ऊंट या कोई अन्य पशु पक्षी था? जबकि पंडो ने बताया है कि ८४ लाख योनियो के बाद मनुष्य जन्म मिलता है।
2- आज तक किसी मुस्लिम का पुनर्जन्म
क्यों नहीं हुआ? क्या आत्माए भी हिन्दू मुस्लिम आदि हो सकती हैं?
हिन्दू आत्मा फिर से हिन्दू के घर ही जन्म लेती है जबकि ४२०० के आस पास धर्म और संप्रदाय दुनिया में मौजूद हैं।
3- आज तक कोई अंतराष्ट्रीय स्तर पर पुनर्जन्म क्यों नहीं हुआ , अर्थात
किसी सऊदी अरब के नागरिक की भारत के किसी गाँव में पुनर्जन्म क्यों नहीं हुआ ?
किसी भारतीय हिन्दू का किसी ब्रिटिश राज्य में पुनर्जन्म क्यों नहीं हुआ ?
पुनर्जन्म के जितने भी किस्से होते हैं वे 100% मामलो में मृतक के और पुनर्जन्म लिए बच्चे के निवास स्थान से कुछ सौ किलो मीटर के दायरे में ही क्यों होते हैं?
दोनों ही परिवार वाले किसी न किसी बिंदु पर एक दूसरे से या संस्कृति से परिचित या मेल मिलाप वाले होते हैं ।
4- याद रखने की शक्ति केवल मस्तिष्क में
होती है , मृत्यु के बाद मस्तिष्क नष्ट हो जाता है ।
आत्मा को निर्लेप चेतन बताया गया है , फिर वह स्मृति कैसे रख सकती है ?
क्या आत्मा का भी मस्तिष्क होता है जो शरीर से अलग होता है और सारे डेटा उसमें स्टोर होते रहते हैं?
5- मृतक की आत्मा ने जिस व्यक्ति के रूप में जन्म लिया होता है , क्या ऐसा आत्मा की मर्जी से होता है? यदि आत्मा अपनी’ मर्जी ‘ से जन्म ले सकती है तो वह अपनी मर्जी से मर
भी तो सकती है ?
यदि आत्मा अपनी मर्जी से जन्म ले सकती है तो सारे गरीब इंसानो की आत्माओं को अमीर के घर जन्म लेना चाहिए था । हमें ज्यादातर पुनर्जन्म के किस्से मध्य या गरीब परिवार में ही सुनने को मिलते हैं।
अत: पुनर्जन्म एक झूठ है जो धर्म गुरुओ द्वारा बोला और सुनाया जाता है जिसके चक्कर में आके भोली भाली जनता हजारो सालो से मुर्ख बनती आ रही है ।
हमें हमारे धार्मिक ग्रंथो और विज्ञान ने बताया कि समय के प्रारंभ में इस धरती पर कुछ नहीं था ये धरती सूर्य का एक अंग थी फिर वो अंग अलग हो कर सूर्य के चारो ओर चक्कर काटने लगा इसलिए धरती के अन्दर आज भी भीषण गर्मी हैं। उस ठन्डे हिस्से को भुप्रष्ट या भूपटल कहते हैं जिस पर हम रहते हैं इस भूपटल के ठंडा होने के बहुत अन्तराल के बाद, इस पर पानी बरसा, फिर भिन्न-भिन्न प्रकार कि वनस्पति उगी, फिर एक लम्बी अवधि के उपरान्त, जानवर आये फिर वनस्पति व जानवरों कि दीर्घावधि के बाद मनुष्य इस धरती पर आया। ये पूरी कार्यप्रणाली एक ज्ञात सत्य हैं।
हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य का केवल शरीर मरता है उसकी आत्मा नहीं। आत्मा एक शरीर का त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। हालांकि नया जन्म लेने के बाद पिछले जन्म कि याद बहुत हि कम लोगो को रह पाती है। इसलिए ऐसी घटनाएं कभी कभार ही सामने आती है।लेकिन यदि कोई इंसान चाहे तो वो अपने पूर्वजन्म की घटनाओं को देख सकता है। माना जाता है कि मनुष्य अगर प्रयास करे वर्तमान जीवन से पहले के 9 जन्मों तक के बारे में जान सकता। हालांकि इसके लिए एक प्रशिक्षित गुरु और कठिन अभ्यास की जरुरत पड़ती है। इसके लिए मुख्यतः तीन तरीके है जो इस प्रकार है-
सम्मोहन से पूर्वजन्म का सफर
पूर्वजन्म की घटनाओं का साक्षात्कार करने के लिए सम्मोहन का भी प्रयोग किया जाता है। भारतीय ऋषियों ने सम्मोहन को योगनिद्रा कहा है। सम्मोहन की प्रकिया आप खुद भी कर सकते हैं इसे स्वसम्मोहन कहा जाता है।
दूसरों के द्वारा भी आप सम्मोहन की स्थिति में पहुंच सकते हैं इसे परसम्मोहन कहा जाता है और तीसरा तरीका है योग है जिसमें त्राटक द्वारा व्यक्ति सम्मोहन की स्थिति में पहुंच जाता है।
सम्मोहन के द्वारा आप गहरी निद्रा में पहुंच जाते हैं और अपने पूर्वजन्म की स्मृतियों को टटोल सकते हैं।
इसके लिए आपको किसी शांत कमरे में पलथी मारक बैठना चाहिए इसके बाद अपना ध्यान दोनों भौहों के मध्य में केन्द्रित करें।
आपको चारों ओर अंधेरा दिखेगा और एक गुदगुदी सी महसूस होगी। लेकिन अपना ध्यान केन्द्रित रखें।
नियमित अभ्यास से अंधेरा छंटने लगेगा और उजला बढ़ने लगेगा और आप इस शरीर की सीमाओं से पार निकलकर पूर्वजन्म की घटनाओं में झांकने लगेंगे।
कायोत्सर्ग द्वारा प्रवेश करें पूर्वजन्म में
पूर्वजन्म की यादों में प्रवेश करने का एक साधन कायोत्सर्ग है। अपने नाम के अनुसार इस प्रक्रिया में व्यक्ति को अपनी काया यानी शरीर की चेतना से मुक्त होना पड़ता है। कायोत्सर्ग शरीर को स्थिर, शिथिल और तनाव मुक्त करने की प्रक्रिया है।
इसमें शरीर की चंचलता दूर होकर शरीर स्थिर होने लगता है। शरीर का मोह और सांसारिक बंधन ढीला पड़ने लगता है और शरीर एवं आत्मा के अलग होने का एहसास होता है। इसके बाद व्यक्ति पूर्वजन्म की घटनाओं के बीच पहुंच जाता है।
अनुप्रेक्षा से पूर्वजन्म का ज्ञान
पूर्वजन्म की स्मृतियों में प्रवेश करने का एक तरीका अनुप्रेक्षा है। जैन परंपरा में बताया गया है कि अनुप्रेक्षा ऐसी प्रक्रिया है जिसके प्रयोग से व्यक्ति स्वतः सुझाव और बार-बार भावना से पूर्वजन्म की स्मृति में प्रवेश कर जाता है। अनुप्रेक्षा से भावधारा निर्मल बनती है। पवित्र चित्त का निर्माण होता है।
साधन ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है कि उसे ज्ञात भी नहीं रहता कि वह कहां है। अतीत की घटनाओं का अनुचिंतन करते-करते वे स्मृति पटल पर अंकित होने लगती है और साधक उनका साक्षात्कार करता है।
इन तीन तरीकों से देखि जा सकती है पूर्वजन्म की घटनाएं
हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य का केवल शरीर मरता है उसकी आत्मा नहीं। आत्मा एक शरीर का त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। हालांकि नया जन्म लेने के बाद पिछले जन्म कि याद बहुत हि कम लोगो को रह पाती है। इसलिए ऐसी घटनाएं कभी कभार ही सामने आती है।लेकिन यदि कोई इंसान चाहे तो वो अपने पूर्वजन्म की घटनाओं को देख सकता है। माना जाता है कि मनुष्य अगर प्रयास करे वर्तमान जीवन से पहले के 9 जन्मों तक के बारे में जान सकता। हालांकि इसके लिए एक प्रशिक्षित गुरु और कठिन अभ्यास की जरुरत पड़ती है। इसके लिए मुख्यतः तीन तरीके है जो इस प्रकार है- सम्मोहन से पूर्वजन्म का सफर पूर्वजन्म की घटनाओं का साक्षात्कार करने के लिए सम्मोहन का भी प्रयोग किया जाता है। भारतीय ऋषियों ने सम्मोहन को योगनिद्रा कहा है। सम्मोहन की प्रकिया आप खुद भी कर सकते हैं इसे स्वसम्मोहन कहा जाता है। दूसरों के द्वारा भी आप सम्मोहन की स्थिति में पहुंच सकते हैं इसे परसम्मोहन कहा जाता है और तीसरा तरीका है योग है जिसमें त्राटक द्वारा व्यक्ति सम्मोहन की स्थिति में पहुंच जाता है। सम्मोहन के द्वारा आप गहरी निद्रा में पहुंच जाते हैं और अपने पूर्वजन्म की स्मृतियों को टटोल सकते हैं। इसके लिए आपको किसी शांत कमरे में पलथी मारक बैठना चाहिए इसके बाद अपना ध्यान दोनों भौहों के मध्य में केन्द्रित करें। आपको चारों ओर अंधेरा दिखेगा और एक गुदगुदी सी महसूस होगी। लेकिन अपना ध्यान केन्द्रित रखें। नियमित अभ्यास से अंधेरा छंटने लगेगा और उजला बढ़ने लगेगा और आप इस शरीर की सीमाओं से पार निकलकर पूर्वजन्म की घटनाओं में झांकने लगेंगे। कायोत्सर्ग द्वारा प्रवेश करें पूर्वजन्म में पूर्वजन्म की यादों में प्रवेश करने का एक साधन कायोत्सर्ग है। अपने नाम के अनुसार इस प्रक्रिया में व्यक्ति को अपनी काया यानी शरीर की चेतना से मुक्त होना पड़ता है। कायोत्सर्ग शरीर को स्थिर, शिथिल और तनाव मुक्त करने की प्रक्रिया है। इसमें शरीर की चंचलता दूर होकर शरीर स्थिर होने लगता है। शरीर का मोह और सांसारिक बंधन ढीला पड़ने लगता है और शरीर एवं आत्मा के अलग होने का एहसास होता है। इसके बाद व्यक्ति पूर्वजन्म की घटनाओं के बीच पहुंच जाता है। अनुप्रेक्षा से पूर्वजन्म का ज्ञान पूर्वजन्म की स्मृतियों में प्रवेश करने का एक तरीका अनुप्रेक्षा है। जैन परंपरा में बताया गया है कि अनुप्रेक्षा ऐसी प्रक्रिया है जिसके प्रयोग से व्यक्ति स्वतः सुझाव और बार-बार भावना से पूर्वजन्म की स्मृति में प्रवेश कर जाता है। अनुप्रेक्षा से भावधारा निर्मल बनती है। पवित्र चित्त का निर्माण होता है। साधन ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है कि उसे ज्ञात भी नहीं रहता कि वह कहां है। अतीत की घटनाओं का अनुचिंतन करते-करते वे स्मृति पटल पर अंकित होने लगती है और साधक उनका साक्षात्कार करता है।
क्या पुनर्जन्म होता है?
पुनर्जन्म यह धारणा है कि व्यक्ति मृत्यु के पश्चात पुनः जन्म लेता है। हम ये कहें कि कर्म आदि के अनुसार कोई मनुष्य मरने के बाद कहीं अन्यत्र जन्म लेता है।
पाश्चात्य मत में सामान्यतः पुनर्जन्म स्वीकृत नहीं है क्योंकि वहाँ ईश्वरेच्छा और यदृच्छा को ही सब कुछ मानते हैं। कहा जाता है, यदि व्यक्ति का पुनर्जन्म होता है तो उसे अपने पहले जन्म की याद क्यों नहीं होती? भारतीय मत इसका उत्तर देता है कि अज्ञान से आवृत्त होने के कारण आत्मा अपना वर्तमान देखती है और भविष्य बनाने का प्रयत्न करती है, पर भूत को एकदम भूल जाती है। यदि अज्ञान का नाश हो जाए तो पूर्वजन्म का ज्ञान असंभव नहीं है। भारत की पौराणिक कथाओं में इस तरह के अनेक उदाहरण हैं और योगशास्त्र में पूर्वजन्म का ज्ञान प्राप्त करने के उपाय वर्णित हैं।
पुनर्जन्म पर हमेशा से ही भ्रम रहा है। कई लोगों ने इसे माना है तो कई लोगो को आज भी इस पर संदेह है। विज्ञान की बात करें तो विज्ञानिकों में भी अभी तक इसपर भ्रम ही है। हिंदू धर्म के अनुसार मनुष्य का केवल शरीर मरता है उसकी आत्मा नहीं। आत्मा एक शरीर का त्याग कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। हालांकि नया जन्म लेने के बाद पिछले जन्म कि याद बहुत हि कम लोगो को रह पाती है। इसलिए ऐसी घटनाएं कभी कभार ही सामने आती है। पुनर्जन्म की घटनाएं भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों मे सुनने को मिलती है।
इतिहास एवं विकास
आत्मा के अमरत्व तथा शरीर और आत्मा के द्वैत की स्थापना से यह शंका होती है कि मरण के बाद आत्मा की गति क्या है। अमर होने से वह शरीर के साथ ही नष्ट हो तो नहीं सकती। तब निश्चय ही अशरीर होकर वह कहीं रहती होगी। पर आत्माएँ एक ही अवस्था में रहती होंगी, यह नहीं स्थापित किया जा सकता, क्योंकि सबके कर्म एक से नहीं होते। अतएव ऋग्वेदकालीन भारतीय चिंतन में आत्मा के अमरत्व, शरीरात्मक द्वैत तया कर्मसिद्धांत की उपर्युक्त प्रेरणा से यह निर्णय हुआ कि मनुष्य के मरण के बाद, कर्मों के शुभाशुभ के अनुसार, स्वर्ग या नरक प्राप्त होता है।
आईए जानते है पुनर्जन्म से जुड़ी कुछ और रोचक जानकारी:-
1). ऐसा नहीं हैं कि हर मौत के बाद को इंसान इंसान के रुप में ही जन्म ले. वो अगले जन्म में क्या बनेगा ये उसके कर्मों पर भी निर्भर करता है, कई बार मनुष्य को पशु योनि भी मिलती हैं।
2). अधिकतर बार मनुष्य, मनुष्य के रूप में जन्म लेता है. लेकिन कई बार वो पशु रूप में भी जन्म लेता है जो कि उसके कर्मों पर निर्भर करता है।
3). कई बार हम देखते हैं कि हम किसी का बुरा नहीं चाहते है, लेकिन फिर भी हमारे साथ बुरा होता है. इसकी वजह है पिछले जन्मों के कर्म जो कि मनुष्य को भोगना ही पड़ते हैं. ये बात अलग है कि अच्छे कर्मों की वजह से सुख भी मिलता हैं।
4). हिन्दू मानते हैं कि केवल यह शरीर ही नश्वर है जो कि मरने के बाद नष्ट हो जाता है. शायद इसीलिए मृत्यु क्रिया के समय सिर पर मारकर उसे तोड़ दिया जाता है जिससे कि व्यक्ति इस जन्म की सारी बातें भूल जाये और अगले जन्म में इस जन्म की बातें उसे याद ना रहे. उनका मानना है कि आत्मा बहुत ऊंचाई में आकाश में चली जाती है जो कि मनुष्य की पहुँच से बाहर है और यह नए शरीर में ही प्रवेश करती है।
5). कहा जाता है कि मुक्ति सिर्फ मानव जन्म में ही मिलती है. कहते है कि मानव जीवन अनमोल है, इसके लिए उसे 84 लाख योनियों से गुजरना पड़ता हैं, तब जाकर मनुष्य जीवन मिलता हैं।
6). पुराणों में कई कथाएं भी मि्लती हैं जो यह बताती हैं किर मृत्यु के समय व्यक्तिण की जैसी चाहत और भावना होती है उसी अनुरूप उसे नया जन्म मि लता है. एक कथा राजा भारत की है जो हि रण के बच्चे के मोह में ऐसे फंसे किय अपने आखिरी वक्त में उसके ख्यालों में खोए रहे. इसका परिणाम ये हुआ किे पुण्यात्मा होते हुए भी वो अगले जन्म में पशु योनी में पहुंच गए और हिारण बने।
7). सबसे चौंकाने वाला तथ्य ये हैं कि इंसान सात बार पुरुष या स्त्री बनकर ये शरीर धारण करता है और उसे यह अवसर मिलता है कि वह अच्छे या बुरे कर्मों द्वारा अपना अगला भाग्य लिखे।
8). कुछ ऋषियों के अनुसार पूर्वजन्म के समय हमारे दिमाग में हर चीज रहती है लेकिन बहुत कम बार ही ऐसा होता है कि इंसान को उसके पिछले जन्म की बातें याद रहें इसका मतलब है कि हमारे पूर्व जन्मों की बातें हमारे दिमाग में रिकॉर्ड रहती हैं लेकिन हम इन्हें कभी याद नहीं कर पाते हैं।
9). पुनर्जन्म के लिए महाभारत में एक कथा का उल्लेख है कि भीष्म श्रीकृष्ण से पूछते हैं – आज मैं वाणों की शैय्या पर लेटा हुआ हूं, आखिर मैंने कौन सा ऐसा पाप किया था जिसकी ये सजा है. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – आपको अपने छः जन्मों की बातें याद हैं लेकिन सातवें जन्म की बात याद नहीं है जिसमें आपने एक नाग को नागफनी के कांटों पर फेंक दिया था. यानी भीष्म के रुप में जन्म लेने से पहले उनके कई और जन्म हो चुके थे।
यह सवाल बहुत जटिल है कि भगवान् ने हमे क्यों बनाया ?
क्योकि भगवान् तो अनादि काल से है जब तक इस ब्रह्माण्ड की रचना तक भी नही हुई थी तो अचानक उसके मन में इस सृष्टि की रचना का ख्याल क्यों आया
मैंने इस बारे में बहुत सोचा कि भगवान् ने हमें क्यों बनाया होगा कुछ कारण मेरे दिमाग में आये जैसे
1. क्या भगवान् ने अपना अकेलापन दूर करने के लिए सृष्टि का निर्माण किया
2. क्या भगवान् ने हमे इस लिए बनाया ताकि हम उसकी पूजा करें और उसका पूरी दुनिया में नाम हो
3. क्या उसने इस सृष्टि का निर्माण इस लिए किया ताकि वो अपनी महानता और पराक्रम किसी को दिखा सके और लोग उसकी जय जयकार करें
4. या क्या भगवान् एक निर्दयी तानासाह है जिसने इस सृष्टि का निर्माण इस लिए किया ताकि वो लोगो और इस सृष्टि को अपने इशारे पर चलाये, और अपना गुणगान कराये ,और उसकी पूजा या जय जयकार न करने पर लोगो को दण्डित करे या लोगो से खेल सके किसी को दुःख तो किसी को अचानक सुख, जैसा उसका दिल करे वो वही करे या फिर हम इतने बुद्धिमान या सक्षम नही हैं जो इस बात को सोच सकें कि भगवान् ने हमे क्यों बनाया होगा ?
कितना जानते हैं आप पुनर्जन्म के बारे में
हर कोई शख्स अपने पिछले जन्म और आने वाले जन्म के बारे में जानने को उत्सुक रहता है। ज्योतिष में मनुष्य के जन्म से लेकर, उसकी मृत्यु तक और फिर मृत्यु से लेकर, उसके पुनर्जन्म तक की हर बात को ग्रहों और नक्षत्रो के आधार पर बताया गया है।
ज्योतिष के पास हर सवाल का है जवाब
शास्त्रों और पुरानो में लिखा है कि मनुष्य को अपने कर्मों के फल इसी धरती पर भोगने पड़ते हैं क्योंकि मनुष्य की आत्मा अमर होती है तो वो एक शरीर के नाश होने के बाद दूसरे शरीर में प्रवेश कर लेती है और इस तरह से वो आत्मा अपने पाप और पुण्य कर्मो का फल भोगने के लिए ही पुनर्जन्म लेती है। पुराणों में ये भी लिखा है कि मनुष्य को अपने कर्मो के अनुसार 84 लाख योनियों को भोगना पड़ता है। पुनर्जन्म के बारे में सभी सवालों के जवाब आपको आपकी कुंडली के आधार पर ज्यो्तिष देता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली का पंचम भाव, पंचम भाव का स्वामी और पंचम भाव से स्थित बलवान ग्रह (सूर्य या चंद्रमा) का द्रेष्काण और उसकी स्थिति ही पुनर्जन्मन के बारे में बता सकता है। महर्षि पराशर के ग्रंथ बृहतपराशर होरा शास्त्र के अनुसार आपके जन्म से ही जो ग्रह (सूर्य या चंद्रमा) बलवान होगा, वो ग्रह जिस ग्रह के द्रेष्काण में स्थित हो, उस ग्रह के अनुसार ही जातक का संबंध उस लोक से था अर्थात आपकी कुंडली के पंचम भाव के स्वामी ग्रह से ही आपके पुनर्जन्म के निवास स्थान के बारे में पता चलता है।
जातक की दिशा का ज्ञान जरूरी
किसी भी जातक की पुनर्जन्म की दिशा का ज्ञान उस जातक की कुंडली के पंचम भाव में स्थित राशि के अनुसार पता चलता है।
पुनर्जन्म और जातक की जाति
जातक की पुनर्जन्म के जाति का पता भी जातक की कुंडली में उसके पंचमेश ग्रह की जाति से पता चलता है अर्थात पंचमेश ग्रह की जो जाति आपकी कुंडली में है वो जाति जातक की पिछले जन्म में थी।
🔴मृत शरीर जलाने का रहस्य..एक तर्कपूर्ण विवेचना ..ओशो
हिंदू जलाते हैं शरीर को। क्योंकि जब तक शरीर जल न जाए, तब तक आत्मा शरीर के आसपास भटकती है। पुराने घर का मोह थोड़ा सा पकड़े रखता है।तुम्हारा पुराना घर भी गिर जाए तो भी नया घर बनाने तुम एकदम से न जाओगे। तुम पहले कोशिश करोगे, कि थोड़ा इंतजाम हो जाए और इसी में थोड़ी सी सुविधा हो जाए, थोड़ा खंभा सम्हाल दें, थोड़ा सहारा लगा दें। किसी तरह इसी में गुजारा कर लें। नया बनाना तो बहुत मुश्किल होगा, बड़ा कठिन होगा।
जैसे ही शरीर मरता है, वैसे ही आत्मा शरीर के आसपास वर्तुलाकार घूमने लगती है। कोशिश करती है फिर से प्रवेश की। इसी शरीर में प्रविष्ट हो जाए। पुराने से परिचय होता है, पहचान होती है। नए में कहां जाएंगे, कहां खोजेंगे? मिलेगा, नहीं मिलेगा?इसलिए हिंदुओं ने इस बात को बहुत सदियों पूर्व समझ लिया कि शरीर को बचाना ठीक नहीं है। इसलिए हिंदुओं ने कब्रों में शरीर को नहीं रखा। क्योंकि उससे आत्मा की यात्रा में निरर्थक बाधा पड़ती है। जब तक शरीर बचा रहेगा थोड़ा बहुत, तब तक आत्मा वहां चक्कर लगाती रहेगी।
इसलिए हिंदुओं के मरघट में तुम उतनी प्रेतात्माएं न पाओगे, जितनी मुसलमानों या ईसाइयों के मरघट में पाओगे। अगर तुम्हें प्रेतात्माओं में थोड़ा रस हो, और तुमने कभी थोड़े प्रयोग किए हों–किसी ने भी प्रेतात्माओं के संबंध में, तो तुम चकित होओगे; हिंदू मरघट करीब-करीब सूना है। कभी मुश्किल से कोई प्रेतात्मा हिंदू मरघट पर मिल सकती है। लेकिन मुसलमानों के मरघट पर तुम्हें प्रेतात्माएं ही प्रेतात्माएं मिल जाएंगी। शायद यही एक कारण इस बात का भी है, कि ईसाई और मुसलमान दोनों ने यह स्वीकार कर लिया, कि एक ही जन्म है। क्योंकि मरने के बाद वर्षों तक आत्मा भटकती रहती है कब्र के आस-पास।
हिंदुओं को तत्क्षण यह स्मरण हो गया कि जन्मों की अनंत शृंखला है। क्योंकि यहां शरीर उन्होंने जलाया कि आत्मा तत्क्षण नए जन्म में प्रवेश कर जाती है। अगर मुसलमान फिर से पैदा होता है, तो उसके एक जन्म में और दूसरे जन्म के बीच में काफी लंबा फासला होता है। वर्षों का फासला हो सकता है। इसलिए मुसलमान को पिछले जन्म की याद आना मुश्किल है।
इसलिए यह चमत्कारी बात है, और वैज्ञानिक इस पर बड़े हैरान होते हैं कि जितने लोगों को पिछले जन्म की याद आती है, वे अधिकतर हिंदू घरों में ही क्यों पैदा होते हैं? मुसलमान घर में पैदा क्यों नहीं होते? कभी एकाध घटना घटी है। ईसाई घर में कभी एकाध घटना घटी है। लेकिन हिंदुस्तान में आए दिन घटना घटती है। क्या कारण है?कारण है। क्योंकि जितना लंबा समय हो जाएगा, उतनी स्मृति धुंधली हो जाएगी पिछले जन्म की। जैसे आज से दस साल पहले अगर मैं तुमसे पूछूं, कि आज से दस साल पहले उन्नीस सौ पैंसठ, एक जनवरी को क्या हुआ? एक जनवरी उन्नीस सौ पैंसठ में हुई, यह पक्का है; तुम भी थे, यह भी पक्का है। लेकिन क्या तुम याद कर पाओगे एक जनवरी उन्नीस सौ पैंसठ?
तुम कहोगे कि एक जनवरी हुई यह भी ठीक है। मैं भी था यह भी ठीक है। कुछ न कुछ हुआ ही होगा यह भी ठीक है। दिन ऐसे ही खाली थोड़े ही चला जाएगा! ज्ञानी का दिन भला खाली चला जाए, अज्ञानी का कहीं खाली जा सकता है? कुछ न कुछ जरूर हुआ होगा। कोई झगड़ा-झांसा, उपद्रव, प्रेम, क्रोध, घृणा–मगर क्या याद आता है?
कुछ भी याद नहीं आता। खाली मालूम पड़ता है एक जनवरी उन्नीस सौ पैंसठ, जैसे हुआ ही नहीं।
जितना समय व्यतीत होता चला जाता है, उतनी नई स्मृतियों की पर्ते बनती चली जाती हैं, पुरानी स्मृति दब जाती है। तो अगर कोई व्यक्ति मरे आज, और आज ही नया जन्म ले ले तो शायद संभावना है, कि उसे पिछले जन्म की थोड़ी याद बनी रहे। क्योंकि फासला बिलकुल नहीं है। स्मृति कोई बीच में खड़ी ही नहीं है। कोई दीवाल ही नहीं है।
लेकिन आज मरे, और पचास साल बाद पैदा हो तो स्मृति मुश्किल हो जाएगी। पचास साल! क्योंकि भूत-प्रेत भी अनुभव से गुजरते हैं। उनकी भी स्मृतियां हैं; वे बीच में खड़ी हो जाएंगी। एक दीवाल बन जाएगी मजबूत।
इसलिए ईसाई, मुसलमान और यहूदी; ये तीनों कौमें जो मुर्दो को जलाती नहीं, गड़ाती हैं; तीनों मानती हैं कि कोई पुनर्जन्म नहीं है, बस एक ही जन्म है। उनके एक जन्म के सिद्धांत के पीछे गहरे से गहरा कारण यही है, कि कोई भी याद नहीं कर पाता पिछले जन्मों को।
हिंदुओं ने हजारों सालों में लाखों लोगों को जन्म दिया है, जिनकी स्मृति बिलकुल प्रगाढ़ है। और उसका कुल कारण इतना है कि जैसे ही हम मुर्दे को जला देते हैं–घर नष्ट हो गया बिलकुल। खंडहर भी नहीं बचा कि तुम उसके आसपास चक्कर काटो। वह राख ही हो गया। अब वहां रहने का कोई कारण ही नहीं। भागो और कोई नया छप्पर खोजो।
आत्मा भागती है; नए गर्भ में प्रवेश करने के लिए उत्सुक होती है। वह भी तृष्णा से शुरुआत होती है। इसलिए तो हम कहते हैं, जो तृष्णा के पार हो गया, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। क्योंकि पुनर्जन्म का कोई कारण न रहा। सब घर कामना से बनाए जाते हैं। शरीर कामना से बनाया जाता है। कामना ही आधार है शरीर का। जब कोई कामना ही न रही, पाने को कुछ न रहा, जानने को कुछ न रहा, यात्रा पूरी हो गई, तो नए गर्भ में यात्रा नहीं होती-- ओशो
ओशो ♣️
परकाया प्रवेश क्या सत्य है
पुनर्जन्म की तरह परकाया प्रवेश अर्थात् एक भौतिक शरीर से दूसरे भौतिक शरीर में प्रवेश करना भी पूर्णतया सत्य है।
एक बार वेदांत के महाज्ञाता आद्य शंकराचार्य का एक विदूषी महिला भारती से शास्त्रार्थ हुआ। धर्म दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान अन्य विषयों में तो जीत गए परन्तु एक विषय में शास्त्रार्थ उनको बीच में ही रोकना पड़ा।
महिला ने कामशास्त्र विषय छेड़कर परिस्थिति ही बिल्कुल विपरीत कर दी थी। विषयक चर्चा के लिए शंकराचार्य जी बिल्कुल ही अबोध और अन्जान थे।
व्यवहार में आए बिना इस विषय पर चर्चा करना भी उनके लिए असम्भव था। उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने के लिए समय मांगा।
इस समयावधि में उन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर को एक राजा के शरीर प्रवेश करवाया। दो शरीरों के मिलन का अनुभव अर्जित किया और तदनुसार भारती से चर्चा करके उसको शास्त्रार्थ में पराजित किया। परकाया प्रवेश का यह एक बहुत बड़ा उदाहरण है।
हमारे दो शरीर हैं। एक स्थूल जो दृष्ट है और दूसरा सूक्ष्म शरीर जो सर्व साधारण को दृष्ट नहीं है। इसके रूप-स्वरूप की अलग-अलग तरीकों से परिकल्पनाएं की गयी हैं। परन्तु शास्त्र सम्मत सूक्ष्म शरीर की लम्बाई मात्र अंगूठे के बराबर मानी गयी है। इसका स्वरूप इतना अधिक पारदर्शी है कि प्रकाश भी उसके आर-पार जा सकता है।
जैन धर्म में सूक्ष्मतर शरीर अर्थात् आत्मा को अरूप, अगन्ध, अव्यक्त, अशब्द, अरस, चैतन्यस्वरूप और इन्द्रियों द्वारा अग्राह्य कहा गया है। स्थूल और सूक्ष्म के अतिरिक्त आत्मा को धर्म में संसारी और मुक्त रूप से जाना गया है।
पुनर्जन्म और परकाया प्रवेश दोनों का वस्तुतः एक ही अर्थ है - एक को छोड़कर दूसरा नवीन शरीर धारण करना। अन्तर केवल इतना है कि पुनर्जन्म विधिगत नियमों अर्थात प्रारब्ध और संचित कर्मानुसार प्राकृतिक रूप से होता है।
परन्तु परकाया प्रवेश स्वेच्छा से धारण किया जा सकता है और यह सरल नहीं है। कोई बिरला योगी, संत महात्मा तथा सिद्ध पुरूष आदि ही अपनी प्रबल इच्छा शक्ति अथवा योगक्रियाओं के द्वारा परकाया प्रवेश कर सकता है।
भौतिक वाद से दूर सत्कमरें और पूर्णतयः अध्यात्म से जुड़ा कोई साधारण सा साधक भी अपनी स्वेच्छा से किसी दूसरे भौतिक शरीर में प्रवेश कर सकता है।
प्राणायाम और योग साधना के पारगंत रेचक प्राणायाम पर पूर्ण नियत्रंण के बाद कुण्डलनी से सूक्ष्म शरीर अर्थात् आत्मा को बाहर निकालकर वांछित किसी भी अन्य भौतिक शरीर में प्रवेश करवा सकते हैं। शंकराचार्य जी ने ऐसे ही राजा के शरीर में अपने सूक्ष्मतम शरीर का परकाया प्रवेश करवाया था।
रामायण, महाभारत, पुराण आदि मान्य ग्रंथों के अतिरिक्त अन्य प्रामाणिक ग्रंथों में भी परकाया प्रवेश के अनेकों विवरण मिलते हैं।
- ‘अष्टांग योग’ के अनुसार इन्द्रियों को नियंत्रित करके, निष्काम कर्मानुसार साधक के सूक्ष्म शरीर अर्थात् आत्मा को अन्य किसी जीवित अथवा मृत शरीर में प्रवेश करवाया जा सकता है।
- ‘योग वशिष्ठ’ के अनुसार रेचक प्राणायाम के सतत् अभ्यास के बाद अन्य शरीर में आत्मा का प्रवेश किया जा सकता है।
- ‘भगवान् शंकराचार्या घ्’ के अनुसार यदि सौन्दर्य लहरी के 87वें क्रमांक का श्लोक नित्य एक सहस्त्र बार जप कर लिया जाए तो परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
- ‘तंत्र सार’, ‘मंत्र महार्णव’, ‘मंत्र महोदधि’ आदि तंत्र सम्बधी प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार आकाश तत्त्व की सिद्धि के बाद परकाया प्रवेश सम्भव होने लगता है। खेचरी मुद्रा का सतत् अभ्यास और इसमें पारंगत होना परकाया सिद्धि प्रक्रिया में अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होता है।
- ‘व्यास भाष्य’ के अनुसार अष्टांग योग अर्थात यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभ्यास और निष्काम भाव से भौतिक संसाधनों का त्याग और नाड़ियों में संयम स्थापित करके चित्त के उनमें आवागमन के मार्ग का आभास किया जाता है।
चित्त के परिभ्र्रमण मार्ग का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद साधक, योगी, तपस्वी अथवा संत पुरूष अपनी समस्त इन्द्रियों सहित चित्त को निकालकर परकाया प्रवेश कर जाते हैं।
- ‘भोजवृत्ति’ के अनुसार भौतिक बन्धनों के कारणों को समाधि द्वारा शिथिल किया जाता है। नाड़ियों में इन बन्धनों के कारण ही चित्त अस्थिर रहता है। नाड़ियों की शिथिलता से चित्त को अपने लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त होने लगता है। इस अवस्था में पहुँचने के बाद योगी, साधक अथवा अन्य अपने चित्त को इन्द्रियों सहित दूसरे अन्य किसी शरीर में प्रविष्ट करवा सकता है।
- यूनानी पद्धति के अनुसार परकाया प्रवेश को छाया पुरूष से जोड़ा गया है। परकाया सिद्धि के लिए विभिन्न त्राटक क्रियाओं द्वारा इसको सिद्ध किया जा सकता है। हठ योगी परकाया प्रवेश सिद्धि में त्राटक क्रियाओं द्वारा मन की गति को स्थिर और नियंत्रित करने के बाद परकाया प्रवेश में सिद्ध होते हैं।
परकाया प्रवेश ध्यान योग, ज्ञान योग और योग निंद्रा द्वारा सम्भव हो सकता है। सांसारिक बंधनों से मुक्ति के मार्ग तलाशना और उनसे धीरे-धीरे विरक्त होते जाना तथा मौन, अल्पाहार और आत्मकेन्द्रित मनः स्थिति द्वारा ध्यान योग में सिद्धहस्त होकर परकाया प्रवेश सिद्धि का एक अच्छा उपक्रम है।
कुल सार-सत यह है कि आत्मा के तीन स्वरूप है-जीवात्मा जो भौतिक शरीर में वास करता है। जीवात्मा जब वासनामय शरीर में निवास करता है तो वह प्रेतात्मा स्वरूप कहलाता है।
इन दोनों से अलग आत्मा का तीसरा स्वरूप है सूक्ष्म आत्मा। ज्ञान योग के द्वारा चित्त की वृत्तियों और संचित कर्मों का शमन करके आत्मज्ञान अर्थात् स्वयं के शरीर को एक देह न मानकर आत्मा मानना।
जब यह भावना बलवती हो जाती है तब ही ध्यान भी लगता है और धीरे-धीरे यह अभ्यास चित्त को ध्यान की एक चरम अवस्था में ले जाता है। ऐसे में भौतिक शरीर का आभास तो स्वतः ही पूर्णतया समाप्त हो जाता है और तब सूक्ष्म शरीर का आभास होने लगता है।
यहाँ से भी अनेक अवस्थाएं सामने आती हैं। साधक या तो चिर निद्रा में चला जाता है अथवा अर्धचेतन अवस्था में समाधिस्थ हो जाता है। यही कहीं एक ऐसी अवस्था भी आती है जो सूक्ष्म आत्मा को वायव्य गुणों से पूर्ण कर देती है और तब इच्छानुसार उसको किसी अन्य शरीर में प्रवेश करवाया जा सकता है।
👉पुनर्जन्म की मान्यता
👉महाभारत युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- हे कुंतीनंदन! तेरे और मेरे कई जन्म हो चुके हैं। फर्क ये है कि मुझे मेरे सारे जन्मों की याद है, लेकिन तुझे नहीं। तुझे नहीं याद होने के कारण तेरे लिए यह संसार नया और तू फिर से आसक्ति पाले बैठा है।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयातिनवानि देही।। -गीता 2/22
👉अर्थात : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।
| 👉यहूदी, ईसाइयत, इस्लाम पुनर्जन्म के सिद्धांत को नहीं मानते हैं। उक्त तीनों धर्मों के समानांतर- हिन्दू, जैन और बौद्ध ये तीनों धर्म मानते हैं कि पुनर्जन्म एक सच्चाई है। योरप और भारत में ऐसे ढेरों किस्से मिल जाएंगे जिनको अपने पिछले जन्म की याद है। विज्ञान इस संबंध में अभी तक खोज कर रहा है, लेकिन वह किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा है। पूर्व जन्म के कई वृत्तांत पत्र-पत्रिकाओं व अखबारों में प्रकाशित हुए हैं। इस विषय पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं और बहुत सी फिल्में भी बनी है। प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात, प्लेटो और पायथागोरस भी पुनर्जन्म पर विश्वास करते थे। दुनिया की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताएं भी पुनर्जन्म में विश्वास करती थीं।
| 👉हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। इसका अर्थ है कि आत्मा जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन की शिक्षात्मक प्रक्रिया से गुजरती हुई अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। उसकी यह भी मान्यता है कि प्रत्येक आत्मा मोक्ष प्राप्त करती है, जैसा कि गीता में कहा गया है।
वेदों में पुनर्जन्म को मान्यता है। उपनिषदकाल में पुनर्जन्म की घटना का व्यापक उल्लेख मिलता है। योग दर्शन के अनुसार अविद्या आदि क्लेशों के जड़ होते हुए भी उनका परिणाम जन्म, जीवन और भोग होता है। सांख्य दर्शन के अनुसार 'अथ त्रिविध दुःखात्यन्त निवृति ख्यन्त पुरुषार्थः।' पुनर्जन्म के कारण ही आत्मा के शरीर, इंद्रियों तथा विषयों से संबंध जुड़े रहते हैं। न्याय दर्शन में कहा गया है कि जन्म, जीवन और मरण जीवात्मा की अवस्थाएं हैं। पिछले कर्मों के अनुरूप वह उसे भोगती है तथा नवीन कर्म के परिणाम को भोगने के लिए वह फिर जन्म लेती है।
|| 👉पुनर्जन्म पर कई लोगों और संस्थाओं ने शोध किए हैं। ओशो रजनीश ने पुनर्जन्म पर बहुत अच्छे प्रवचन दिए हैं। उन्होंने खुद के भी पिछले जन्मों के बारे में विस्तार से बताया है। हालांकि आधुनिक युग में पुनर्जन्म पर अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. इयान स्टीवेंसन ने 40 साल तक इस विषय पर शोध करने के बाद एक किताब 'रिइंकार्नेशन एंड बायोलॉजी' लीखी थी जिसे सबसे महत्वपूर्ण शोध किताब माना गया है।
| 👉वैज्ञानिक डॉ. इयान स्टीवेंसन ने पहली बार वैज्ञानिक शोधों और प्रयोगों के दौरान पाया कि शरीर न रहने पर भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है। उपयुक्त अवसर आने पर वह अपने शरीर या पार्थिव रूप को फिर से रचता है। उन्हीं की टीम द्वारा किए प्रयोग और अनुसंधानों को स्पिरिट साइंस एंड मेटाफिजिक्स में संजोते हुए लिखा है कि पुनर्जन्म काल्पनिक नहीं हैं। उसकी संभावना निश्चित-सी है।
| 👉इसी प्रकार बेंगलुरु की नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत डॉ. सतवंत पसरिया द्वारा इस विषय पर शोध किया गया था। उन्होंने अपने इस शोध को एक किताब का रूप दिया जिसका नाम है- 'श्क्लेम्स ऑफ रिइंकार्नेशनरू एम्पिरिकल स्टी ऑफ कैसेज इन इंडियास।' इस किताब में 1973 के बाद से भारत में हुई 500 पुनर्जन्म की घटनाओं का उल्लेख मिलता है।
| 👉इसी प्रकार गीता प्रेस गोरखपुर ने भी अपनी एक किताब 'परलोक और पुनर्जन्मांक' में ऐसी कई घटनाओं का वर्णन किया है जिससे पुनर्जन्म होने की पुष्टि होती है। वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा 'आचार्य' ने एक किताब लिखी है, 'पुनर्जन्म : एक ध्रुव सत्य।' इसमें पुनर्जन्म के बारे में अच्छी विवेचना की गई है। पुनर्जन्म में रुचि रखने वाले को ओशो की किताबें जैसे 'विज्ञान भैरव तंत्र' के अलावा उक्त दो किताबें जरूर पढ़ना चाहिए।
| 👉पहला रहस्य, पंच तत्वों का स्थूल शरीर और मन : - हमारा यह शरीर पंच तत्वों से मिलकर बना है- आकाश, वायु, अग्नि, जल, धरती। शरीर जब नष्ट होता है तो उसके भीतर का आकाश, आकाश में लीन हो जाता है, वायु भी वायु में समा जाती है। अग्नि में अग्नि और जल में जल समा जाता है। अंत में बच जाती है राख, जो धरती का हिस्सा है। इसके बाद में कुछ है, जो बच जाता है उसे कहते हैं आत्मा। आत्मा कभी नहीं मरती।
| 👉जन्म और मृत्यु के बीच में जिंदगी मानी गई है लेकिन जिंदगी तो मरने के बाद भी जारी रहती है। जन्म और मृत्यु के बीच जो सबसे बड़ी कड़ी है वह है आत्मा। आत्मा शरीर में है तो संसार है और आत्मा ने शरीर को छोड़ दिया, तो पारलौकिक संसार है। विज्ञान के लिए जन्म और मृत्यु के बीच की कड़ी आत्मा सबसे उलझा रहस्य है।
| 👉इस आत्मा से जब स्थूल शरीर छूट जाता है या इसका स्थूल शरीर जलकर नष्ट हो जाता है, तब भी उसके पास दो चीजें बच जाती हैं जिसे मन और सूक्ष्म शरीर कहते हैं। शरीर तो भौतिक जगत का हिस्सा है, लेकिन मन अभौतिक है। यह मन ही आत्मा के साथ आकाशरूप में विद्यमान रहता है। इस मन में उसकी बुद्धि, सभी स्मृतियां और अनुभव संरक्षित रहते हैं। मृत्यु के बाद आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहकर अगले जन्म मिलने का इंतजार करते रहती है।
| 👉इस इंतजार में कुछ आत्मा भूत बनकर भटकती है, तो कुछ गहरी सुषुप्ति अवस्था में रहती है, कुछ पितृलोक चली जाती है और कुछ देवलोक। लेकिन सभी को फिर से धरती पर पुन: किसी पशु, पक्षी या मनुष्य की योनि प्राप्त करने के लिए लौटना होता। जिसके जैसे कर्म और विचार उसको मिलते हैं, वैसी योनि। जन्म, मृत्यु और फिर से जन्म का यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक कि आत्मा मोक्ष प्राप्त न कर ले। मोक्ष प्राप्त आत्मा ब्रह्मलोक में स्थिर रहती है।
| 👉कर्म और पुनर्जन्म एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कर्मों के फल के भोग के लिए ही पुनर्जन्म होता है तथा पुनर्जन्म के कारण फिर नए कर्म संग्रहीत होते हैं। इस प्रकार पुनर्जन्म के दो उद्देश्य हैं- पहला, यह कि मनुष्य अपने जन्मों के कर्मों के फल का भोग करता है जिससे वह उनसे मुक्त हो जाता है। दूसरा, यह कि इन भोगों से अनुभव प्राप्त करके नए जीवन में इनके सुधार का उपाय करता है जिससे बार-बार जन्म लेकर जीवात्मा विकास की ओर निरंतर बढ़ती जाती है तथा अंत में अपने संपूर्ण कर्मों द्वारा जीवन का क्षय करके मुक्तावस्था को प्राप्त होती है।
👉जिस प्रकार इस संसार में आपाधापी और धक्का देकर अवसर छीन लेने की होड़ है उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में धक्का देकर दुष्टात्मा श्रेष्ठ गर्भ छीन लेती है जिससे कोई दुष्ट चरित्र व्यक्ति किसी कुलीन और संस्कारित परिवार में जन्म ले लेता है, कोई गाली-गलौज करने वाला बालक अच्छे और कुलीन गर्भ में जन्म ले लेता है वहीं किसी असभ्य कुसंस्कारित माता के गर्भ से कोई शांत बालक जन्म ले लेता है।
| 👉आपको यह भी जानना चाहिए कि आत्मा मृत्यु के तुरंत बाद नया जन्म नहीं लेती है। कुछ सालों के बाद जब स्थिति अनुकूल होती है तभी आत्मा नए शरीर में प्रवेश करती है।
👉दूसरा रहस्य,पुनर्जन्म और ज्योतिष : - कहते हैं कि कुंडली में आपके पिछले जन्म की स्थिति लिखी होती है। यह कि आप पिछले जन्म में क्या थे। कुंडली, हस्तरेखा या सामुद्रिक विद्या का जानकार व्यक्ति आपके पिछले जन्म की जानकारी के सूत्र बता सकता है।
👉ज्योतिष के अनुसार जातक के लग्न में उच्च या स्वराशि का बुध या चंद्र स्थिति हो तो यह उसके पूर्व जन्म में सद्गुणी व्यापारी (वैश्य) होने का सूचक है। किसी जातक के जन्म लग्न में मंगल उच्च राशि या स्वराशि में स्थित हो तो इसका अर्थ है कि वह पूर्व जन्म में क्षत्रिय योद्धा था।
👉ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब भी कोई जातक पैदा होता है तो वह अपनी भक्ति और भोग्य दशाओं के साथ पिछले जन्म के भी कुछ सूत्र लेकर आता है। ऐसा कोई भी जातक नहीं होता है, जो अपनी भुक्त दशा और भोग्य दशा के शून्य में पैदा हुआ हो।
👉ज्योतिष धारणा के अनुसार मनुष्य के वर्तमान जीवन में जो कुछ भी अच्छा या बुरा अनायास घट रहा है, उसे पिछले जन्म का प्रारब्ध या भोग्य अंश माना जाता है। पिछले जन्म के अच्छे कर्म इस जन्म में सुख दे रहे हैं या पिछले जन्म के पाप इस जन्म में उदय हो रहे हैं, यह खुद का जीवन देखकर जाना जाता सकता है।
👉हो सकता है इस जन्म में हम जो भी अच्छा या बुरा कर रहे हैं, उसका खामियाजा या फल अगले जन्म में भोगेंगे या पाप के घड़े को तब तक संभाले रहेंगे, जब तक कि वह फूटता नहीं है। हो सकता है इस जन्म में किए गए अच्छे या बुरे कर्म अगले जन्म तक हमारा पीछा करें।
👉तीसरा रहस्य, मनोवैज्ञानिक और पुनर्जन्म : मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि व्यक्ति का जीवन कई कड़ियों में बंधा है और प्रत्येक कड़ी दूसरी कड़ी के साथ जुड़ी हुई है इसलिए एक जन्म के कार्यों का प्रभाव दूसरे जन्म के कार्यों पर भी पड़ता है। इस जन्म के संस्कार सूक्ष्म रूप से अंतरमन में प्रवेश होकर सूक्ष्म आत्मा से घुल-मिल जाते हैं और मरने के बाद भी वे संस्कार अगले जन्म को स्थानांतरित हो जाते हैं।
| 👉पिछले जन्म को प्रमाणित करने के लिए उनकी स्मृतियों के आधार पर परखने और सही पाने के बाद मान लेने की तकनीक बहुत पुरानी है। उस पर संदेह भी जताए गए हैं। अब जीन्स और गुणसूत्रों के आधार पर परखने की नई तकनीक काम में लाई जा रही है। 1998 से उपयोग की जा रही इस तकनीक के और भी रोचक और ज्यादा प्रामाणिक नतीजे सामने आए हैं।
| 👉चौथा रहस्य,पुनर्जन्म और स्वप्न : - व्यक्ति के मन या मस्तिष्क में उसके पूर्व जन्म की स्मृति सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहती है। यह स्मृति कभी स्वप्न में तो कभी जाग्रत में स्वत: ही प्रकट होती रहती है। व्यक्ति इस पर कभी ध्यान नहीं दे पाता है।
👉कभी वह स्वन्न में किसी ऐसे शहर, गांव, गलियों में घूम रहा होता है जिसे उसने इस जन्म में भले ही नहीं देखा हो। कभी किसी को स्वप्न में बार-बार उफनती नदी का दृश्य, तो किसी को हथकड़ी नजर आती है। यह अकारण नहीं है। कभी किसी जन्म में किसी व्यक्ति ने कोई दुष्कर्म किया होगा जिसकी स्मृति में उसके साथ हथकड़ी चलती रहती है। कहीं किसी जन्म की आत्महत्या की स्मृति व्यक्ति के साथ कभी रस्सी के रूप में तो कभी नदी के रूप में चलती रहती है। इसी तरह कोई स्थान उसे हमेशा दिखाई देता रहता है जिसका संबंध उसके पिछले जन्म से होता है।
👉इसी तरह कभी जाग्रत अवस्था में भी व्यक्ति को कोई अनजाना व्यक्ति जाना-पहचाना लगता है। किसी गांव या शहर में वो कभी गया नहीं होगा, लेकिन वहां पहली बार जाने पर लगता होगा कि शायद वह पहले भी यहां आया था। कोई लगातार इस पर आंतरिक खोज करता रहे तो हो सकता है कि वह अपने पिछले जन्म का गांव, शहर या कोई एक घटना याद कर ले।
👉पांचवां रहस्य,धर्मगुरु दलाईलामा : - तिब्बत में जन्मे बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा कई जन्मों से अपने संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। ऐसी मान्यता है कि उन्हें अपने पिछले जन्म और अगले जन्म का पूरा ही वृत्तांत याद है। पिछले जन्म में वे कहां पैदा हुए थे और इस शरीर को त्यागने के बाद उनका अगला जन्म कहां होगा, वे शरीर त्यागने से पहले ही अपने शिष्यों को बता जाते हैं। उनके शिष्य उनके देह त्याग के तत्काल बाद उनके अगले जन्म के रूप की खोजबीन कर पहचान लेते हैं और मठ आदि में लाकर उसे बाल्यकाल से ही श्रेष्ठ धर्मगुरु की पदवी मिल जाती है।
👉यह एक विशेष तकनीक द्वारा होता है। उनका दर्शन और ज्ञान और भाषा आदि का जप उच्चारण जन्म-जन्मांतर से उनके साथ जुड़ा हुआ रहता है और यह भी कहते हैं कि वे जहां भी जाते हैं, उस देश की ही भाषा में बात करते हैं। इसी तरह हिन्दुओं के नाथ और नागा साधुओं के संप्रदाय में कई साधुओं को अपने पिछले कई जन्मों की याद है।
👉किसी के पूर्व जीवन के बारे में जानकर वर्णन करने की व्यवस्था उस समय से थी जब स्वयं शाक्य मुनि बुद्ध जीवित थे। विनयवस्तु, जातक, विज्ञमूर्ख सूत्र और कर्मशतक इत्यादि अधिकतर सूत्र और तंत्र में कई विवरण मिलते हैं जिसमें तथागत द्वारा कर्मफल की व्यवस्था देते समय किस कर्म के संचय से आज इस फल का अनुभव किया जा रहा है, इसे विस्तार से दिखाया गया है। साथ ही भारतीय आचार्यों की जीवन कथाओं में जिनका जीवन बुद्ध के बाद था, कई अपने जन्म के पहले के स्थान को प्रकट करते हैं। ऐसी कई कहानियां हैं, पर उनके पहचान और उनके अवतरण की संख्या की व्यवस्था भारत में नहीं हुई, क्योंकि भारतीय राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था में भारी परिवर्तन हो चुका था। यह प्रथा तिब्बत में जारी रही।
| 👉छठा रहस्य,पुनर्जन्म और पशु-पक्षी : - सभी ने 'नागिन' फिल्म तो देखी ही होगी। ऐसा माना जाता है कि सर्प यानी नाग को अपने 7 जन्मों की संपूर्ण स्मृति रहती है। ऊंट भी अपने 3 जन्मों का पूरा हाल जानते हैं। ऊंट और नाग योनि में ऐसे उदाहरण आते हैं, जब ऊंट अपने पुराने क्रूर स्वामी को इस जन्म में भी पहचान लेता है।
👉कोई सर्प किसी को भी अनावश्यक नहीं काटता। वह दो स्थिति में ही लोगों को काटता है पहला जबकि उसे लगे कि ये व्यक्ति मेरा लिए खतरा है और दूसरा जबकि उसे लगे कि यह व्यक्ति मेरे पिछले जन्म का दुश्मन है। वह जब भी आपको आक्रमण करेगा तो यही सोचकर करेगा कि पिछले जन्मों में आपने भी उसे कहीं पर तंग किया होगा।
👉अपने शत्रु से बदला लेने के लिए मगरमच्छ, ऊदबिलाव और भालू जैसे जानवर भी हैं, जो अपने पर उपकार करने वाले पिछले जन्मों के पात्रों को भी नहीं भूलते हैं और हमला करने वाले शत्रुओं को भी कई जन्मों तक दिमाग में संजोए हुए रहते हैं। उनका यह व्यवहार उनके मित्र या शत्रु के मिलने पर जाहिर हो जाता है।
| 👉सातवां रहस्य : - आठ कारणों से लेती आत्मा पुनर्जन्म : शास्त्रों के अनुसार आत्मा के पुनर्जन्म के संबंध में बताए गए 8 कारण--------
👉1. भगवान की आज्ञा से : - भगवान किसी विशेष कार्य के लिए महात्माओं और दिव्य पुरुषों की आत्माओं को पुन: जन्म लेने की आज्ञा देते हैं।
👉2. पुण्य समाप्त हो जाने पर : - संसार में किए गए पुण्य कर्म के प्रभाव से व्यक्ति की आत्मा स्वर्ग में सुख भोगती है और जब तक पुण्य कर्मों का प्रभाव रहता है, वह आत्मा दैवीय सुख प्राप्त करती है। जब पुण्य कर्मों का प्रभाव खत्म हो जाता है तो उसे पुन: जन्म लेना होता है।
👉3. पुण्य फल भोगने के लिए : - कभी-कभी किसी व्यक्ति द्वारा अत्यधिक पुण्य कर्म किए जाते हैं और उसकी मृत्यु हो जाती है, तब उन पुण्य कर्मों का फल भोगने के लिए आत्मा पुन: जन्म लेती है।
👉4. पाप का फल भोगने के लिए।
👉5. बदला लेने के लिए : - आत्मा किसी से बदला लेने के लिए पुनर्जन्म लेती है। यदि किसी व्यक्ति को धोखे से, कपट से या अन्य किसी प्रकार की यातना देकर मार दिया जाता है तो वह आत्मा पुनर्जन्म अवश्य लेती है।
👉6. बदला चुकाने के लिए।
👉7. अकाल मृत्यु हो जाने पर।
👉8. अपूर्ण साधना को पूर्ण करने के लिए।
👉आठवां रहस्य : - कहते हैं कि मीराबाई द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की ललिता नामक सखी थी, जो इस कलयुग में परम कृष्णभक्त के रूप में राणा सांगा के घर में अवतरित हुईं। वैसे तो वे पूर्णरूप से श्रीकृष्ण में तल्लीन रहीं लेकिन हजारों वर्षों तक उसकी आत्मा वायुमंडल में तैरती रही।
👉पुराणों के अनुसार त्रेतायुग में बालि, द्वापर युग में जरा व्याध के रूप में और लक्ष्मण द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भ्राता बलराम के रूप में अवतरित हुए। नर और नारायण ऋषि ने ही क्रमश: अर्जुन और श्रीकृष्ण के रूप में इस धरा पर अवतार लिया। श्री रामकृष्ण परमहंस और मां शारदा मणि ने अनेक जन्मों तक साथ रहकर भागवत कार्यों में हाथ बंटाया। इस प्रकार प्राचीन ग्रंथों में पुनर्जन्म की घटनाओं के उल्लेख भरे पड़े हैं।
तीन उदाहरण प्रस्तुत हैं
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👉शांतनु : - पितामह भीष्म के पिता का नाम शांतनु था। उनका पहला विवाह गंगा से हुआ था। पूर्व जन्म में शांतनु राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिसमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित थे। उसी समय वहां गंगा का आना हुआ और गंगा को देखकर राजा मोहित हो गए और एकटक उन्हें देखने लगे। तब ब्रह्माजी ने कहा कि महाभिष, तुम मृत्युलोक जाओ। जिस गंगा को तुम देख रहे हो, वह तुम्हारा अप्रिय करेगी और तुम जब उस पर क्रोध करोगे, तब इस शाप से मुक्त हो जाओगे।
👉भीष्म : - हिन्दू धर्म में 33 प्रमुख देवता हैं। उनमें 8 वसु भी हैं। उन्हीं 8 वसुओं ने गंगा की कोख से जन्म लिया थे जिनको गंगा नदी में बहाती जा रही थी, लेकिन गंगा के 8वें पुत्र को राजा शांतनु ने नहीं बहाने दिया। इन आठों को गुरु वशिष्ठ ऋषि ने मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दिया था। गंगा ने अपने सातों पुत्रों को जन्म लेते ही मनुष्य योनि से मुक्त कर दिया था, लेकिन 8वां पुत्र रह गया। यही 8वां पुत्र भीष्म कहलाया।
👉विदुर : - यमराज को ऋषि मांडव्य ने श्राप दिया था जिसके चलते यमराज को मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा। विदुर को यमराज का अवतार माना जाता है। ये धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में निपुण थे। उन्होंने जीवनभर कुरु वंश के हित के लिए कार्य किया।
👉गौतम बुद्ध : - कहते हैं कि गौतम बुद्ध जब बुद्धत्व प्राप्त कर रहे थे तब उन्हें बुद्धत्व प्राप्त करने के पहले पिछले कई जन्मों का स्मरण हुआ था। गौतम बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियां जातक कथाओं द्वारा जानी जाती हैं।
👉 नौवां रहस्य, मरने के 20 मिनट बाद ही ले लिया जन्म : - समाचार पत्रों में कुछ माह पूर्व छपी खबर के अनुसार ऐसी ही एक चमत्कारी घटना मैनपुरी (उत्तरप्रदेश) के तिलयानी गांव की है। साल 2010 में सत्यभान सिंह यादव के पुत्र मनोज को एक बिच्छू ने काट लिया। उस समय मनोज महज 8 साल का था।
👉मनोज को मिनी पीजीआई, सैफई में भर्ती कराया गया। इसी दिन तिलियानी के ही राजू की पत्नी को प्रसव पीड़ा होने पर मिनी पीजीआई में भर्ती कराया गया। यह अजब संयोग था कि रात के 10.40 बजे मनोज की मौत हो गई और लगभग 11 बजे राजू की पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम 'छोटू' रखा गया।
👉परिवार वालों का कहना है कि छोटू जब ढाई साल का हुआ तो वह मनोज के पिता सत्यभान को पापा कहकर बुलाने लगा। छोटू को अपने पूर्व जन्म के रिश्तेदार और उनसे जुड़ी बातें याद हैं।
👉सत्यभान का दावा है कि छोटू ने ऐसी कई बातें बताई हैं, जो मनोज या उसके घर वाले ही जानते थे। अब पुनर्जन्म को मानते हुए छोटू को सत्यभान और उसका परिवार मनोज की तरह प्यार करते हैं। छोटू के मां-बाप को इससे कोई ऐतराज नहीं है। उनका कहना है कि छोटू को दो-दो मां-बाप का प्यार मिल रहा है।
👉एसएन मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल सिन्हा का कहना है कि साइंस और मनोविज्ञान पिछले जन्म में विश्वास नहीं करता। लेकिन विज्ञान और मनोविज्ञान से परे एक और विज्ञान है जिसे 'परामनोविज्ञान' कहते हैं, जो इस तरह की घटनाओं का अध्ययन करता है।
👉दसवां रहस्य : - अमेरिका के कोलोराडी प्यूएली नामक गांव में रुथ सीमेंस नामक लड़की ने सन् 1995 ईस्वी में सिर्फ 5 साल की अवस्था में अपने पिछलों जन्म का सही हाल बताकर सभी को हैरान कर दिया था।
👉मोरे वनस्टाइन नामक विद्या विशारद ने अपने प्रयोग से रुथ सीमेंस को अर्द्धमूर्छित करके उसके पिछले जन्म की कई सूचनाएं प्राप्त की थीं। उसने बताया कि 1890 में आयरलैंड के कार्क नगर में उसका पिछला जन्म हुआ था, तब उसका नाम ब्राइडी मर्फी और पति का नाम मेकार्थी था।
| 👉ग्यारहवां रहस्य: - तुर्की के इस्तांबुल की विज्ञान अनुसंधान परिषद ने पुनर्जन्म की एक ऐसी घटना की पड़ताल की, जो निस्संदेह पुनर्जन्म से संबंधित थी। इस मामले का प्रमुख पात्र 4 वर्ष का बालक इस्माइल अतलिंट्रलिक पिछले जन्म में दक्षिण-पूर्व के अदना गांव का बाशिंदा आविद सुजुलयुस था। इसकी हत्या की गई थी। उसके 3 बच्चे थे- गुलशरां, लकी और हिकमत।
👉चार साल का इस्माइल सोते-सोते बच्चों के नाम पुकारने लगता और रोने लगता। एक दिन इस्माइल ने एक फेरी वाले को आइसक्रीम बेचते देखा। उसने अजनबी का नाम लेकर पुकारा- महमूद तुम तो साग-सब्जी बेचते थे, अब आइसक्रीम बेचने लगे। फेरी वाला दंग रह गया।
👉यह बच्चा कैसे उसका नाम जानता है और कैसे उससे पिछले व्यापार की चर्चा करता जबकि उसका जन्म भी नहीं हुआ था? बच्चे ने कहा कि तुम भूल गए मैं तुम्हारा चिर-परिचित आविद हूं। कई साल पहले उसका कत्ल हो गया था।
👉बच्चे को अदना नगर ले गए। वहां पहुंचा तो वह पिछले जन्म की बेटी गुलशरां को देखते ही पहचान गया। उसने हत्या के स्थान अस्तबल को भी दिखाया और बताया कि रमजान ने कुल्हाड़ी से हमला कर मुझे मार डाला। और विवरण भी सही पाए गए। उनके आधार पर पुलिस ने इस कत्ल की ठीक वैसी ही जांच की जैसी कि बच्चे ने बताई।
👉बारहवां रहस्य,पुनर्जन्म की स्मृति भुलाने का उपाय : - उत्तर भारत में यह मान्यता है कि जो बच्चे अपने पिछले जन्म के बारे में जानकारी रखते हैं, उनकी मृत्यु छोटी उम्र में ही हो जाती है। इसलिए जो बच्चे पुनर्जन्म की घटनाओं को याद रखते हैं, उनके लिए पालक उसकी इस स्मृति को भुलाने के लिए कई तरह के जतन करते हैं। कई बार तो उसे कुम्हार के चाक पर बैठाकर चाक को उल्टा घुमाया जाता है ताकि उसकी स्मृति का लोप हो जाए।
शास्त्रों से जानें, मृत्यु के बाद आत्मा दूसरा शरीर कितने वक्त में करती है धारण
लोगों में यह धारणा बनी हुई है कि जिनकी अकाल मृत्यु होती है अर्थात जिनकी दुर्घटना से या अस्वाभाविक मृत्यु होती है वे लोग अपने शेष जीवन में भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं। यह सर्वमान्य बात है कि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है। यह बात भूत-प्रेत पर भी लागू होनी चाहिए। जीव ने यदि भूत-प्रेत की योनि में जन्म लिया है तो उसकी मृत्यु भी होनी चाहिए परन्तु उनके मरने की बात कभी सुनने में नहीं आई। अर्थात मृत्यु प्राप्त जीव भूत-प्रेत की योनि में जाते हैं, यह सिद्धांत कीट-पतंग, पशु-पक्षी और अनेकों अदृश्य जीवों पर भी लागू होनी चाहिए जो प्रतिदिन मनुष्यों द्वारा मार दिए जाते हैं या प्राकृतिक आपदाओं-आंधी, तूफान, भूकम्प, बाढ़ आदि में मर जाते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार इनको भी भूत-प्रेत की योनि में जाना चाहिए? तब कल्पना करें कि इस संसार में भूतों की संख्या मनुष्यों की आबादी से भी कई गुना अधिक होनी चाहिए परन्तु ऐसा देखने में नहीं आता है। अत: यह कहना कि अकाल मृत्यु प्राप्त जीव भूत-प्रेत की योनि में जन्म लेते हैं न तर्क सम्मत और न ही विज्ञान सम्मत है।
भूत-प्रेत की योनि होती ही नहीं : जीव का स्थूल शरीर, मन व इंद्रिय आदि साधनों के साथ ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार संयोग जन्म है। अर्थात सूक्ष्म शरीर युक्त जीव का स्थूल शरीर के साथ संयोग का नाम ही योनि है। केवल सूक्ष्म शरीर के आधार पर भूत-प्रेत योनि को प्रमाणिक नहीं माना जा सकता है क्योंकि बिना शरीर के कोई भी योनि नहीं होती है। स्थूल शरीर के बिना कोई भी सूक्ष्म शरीर न तो दिखाई देता है और न कोई भौतिक क्रिया ही कर सकता है। प्रजनन की विधाओं के आधार पर योनियों को चार भागों में विभाजित किया गया है-जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज।
जरायुज का तात्पर्य है जोर से होने वाले प्राणी जैसे मनुष्य, गाय, भैंस। अंडज का तात्पर्य है अंडे से होने वाले प्राणी जिसमें अधिकतर पक्षी आ जाते हैं। स्वेदज का तात्पर्य मैल या गंदगी में पैदा होने वाले प्राणी, जैसे जुएं, पानी नाली के कीटाणु। उद्भिज्ज का तात्पर्य है, जमीन से उगने वाले प्राणी जैसे पेड़-पौधे। इन्हीं चार योनियों में समस्त प्राणियों का समावेश हो जाता है। इसके अतिरिक्त पांचवीं योनि का कोई विधान नहीं है। यह ईश्वर प्रणीत शाश्वत सिद्धांत हैं। इसका उल्लंघन करने की शक्ति किसी भी जीव में नहीं है।
कहा यह जाता है कि जिनकी दुर्घटना से या अस्वाभाविक मृत्यु होती है वे लोग शेष जीवन में भूत-प्रेत योनि में चले जाते हैं और इधर-उधर भटकते रहते हैं। कभी-कभी ये भूत-प्रेत परकाया में प्रवेश कर जाते हैं और उनको सताते हैं या कष्ट देते हैं। वे सामान्यत: अपने परिचितों और स्वजनों को ही अधिक परेशान करते हैं या कष्ट देते हैं। दिवंगत आत्मा का इधर-उधर भटकना, संभव नहीं क्योंकि वह ईश्वराधीन होने के कारण स्वतंत्रता से कुछ भी नहीं कर सकता। परकाया में प्रवेश करना भी ईश्वरीय नियम के विरुद्ध है, क्योंकि एक शरीर में एक ही आत्मा रह सकती है। आत्मा प्रलय काल और मोक्षावस्था को छोड़ कर बिना शरीर के कभी नहीं रहती है। इन दोनों अव्यवस्थाओं में वह अदृश्य रहती है। यह र्निववाद सत्य है कि मृत्यु के पश्चात ईश्वरीय व्यवस्थानुसार जीव या तो दूसरे शरीर को धारण कर लेता है या मोक्ष को प्राप्त होता है। इस बीच उसके किसी अन्य के शरीर में प्रविष्ट होने या इधर-उधर घूमकर लोगों के जीवन में अच्छा-बुरा दखल देने का प्रश्र ही नहीं उठता। मोक्ष प्राप्त जीवात्माएं पवित्र और आनंद मग्र रहती हैं परकाया में प्रवेश कर किसी मनुष्य को कष्ट या यातनाएं दें यह मानना अस्वाभाविक है।
मृत्यु के पश्चात जीव को एक शरीर से निकल कर दूसरे शरीर में जाने में कितना समय मिलता है इसका निर्देश वेदांत दर्शन 6/1/13 बृहदारण्यक उपनिषद तथा गरुड़ पुराण-प्रेत अध्याय 10, श्लोक 65 में लिखा है कि आत्मा अपने पहले शरीर को छोडऩे से पूर्व ईश्वर की न्याययुक्त कर्मफल व्यवस्था में अगले शरीर में स्थिति कर लेने के पश्चात ही अपने इस शरीर को छोड़ती है। स्थूल शरीर के बिना कार्य करना संभव नहीं अत: ईश्वर की व्यवस्था में यह आत्मा एक शरीर को छोड़ कर दूसरे शरीर को तुरन्त ग्रहण कर लेती है। महाभारत वनपर्व में कहा है- आयु पूर्ण होने पर आत्मा अपने जर्जर शरीर का परित्याग करके उसी क्षण किसी दूसरे शरीर में प्रकट होती है। एक शरीर को छोडऩे और दूसरे शरीर को ग्रहण करने के मध्य में उसे क्षण भर का समय भी नहीं लगता। अत: वैदिक सिद्धांत के अनुसार मृत्यु और जन्म के बीच कोई ऐसा समय ही नहीं बचता कि जिसमें जीवात्मा इधर-उधर भटक सके या भूत-प्रेत बन सके। सच्चाई यह है कि शरीर छोडऩे के पश्चात जीवात्मा परमात्मा के अधीन रहती है और वह स्वतंत्रता से कुछ नहीं कर सकती।
सच्चाई यह है कि दुर्घटना या अस्वाभाविक मृत्यु प्राप्त व्यक्ति अपनी बाकी की उम्र अगली योनि में व्यतीत करता है अर्थात उसकी जो अगली योनि में जितनी उम्र निर्धारित होती है उसमें पहले वाली बाकी उम्र जोड़ दी जाती है। अब प्रश्र उठता है कि मृत्यु प्राप्त व्यक्ति यदि मनुष्य योनि में भी उसी स्तर में जन्म लेता है तब तो यह बात लागू हो सकती है। पर वह यदि अन्य योनियों में यानी पशु-पक्षी व कीट-पतंग की योनि में जाता है या पहले वाले मनुष्य जीवन के ऊंचे या नीचे स्तर जो मनुष्य योनि ही पाता है तो उसकी आयु ईश्वर की कर्म न्याय व्यवस्था के अनुसार कट या बढ़ भी सकती है। यह लेख मैंने अति उपयोगी समझ कर ‘मानव निर्माण प्रथम सोपान’ नामक पुस्तक के उद्धृत किया है जिसमें अंत की 4-6 लाइनें मैंने अपने स्वयं के विचार से यह स्पष्ट करने के लिए लिखी हैं कि भूत-प्रेत सिर्फ वहम हैं।
जन्म लेने के साथ ही व्यक्ति के मौत का समय भी तय हो जाता है
जीवन का शाश्वत सत्य है मृत्यु। जन्म लेने के साथ ही व्यक्ति के मौत का समय भी तय हो जाता है। मौत से हर कोई डरता है लेकिन मौत का अनुभव व्यक्ति को जीवन की सच्चाई बता जाता है। लोगों को यह जानने की जिज्ञासा कम नहीं होती कि आखिर मृत्यु के बाद क्या होता है। ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्हें मृत्यु का पहले से ही आभास हो गया था। यहां आपको ऐसे आभासों और अनुभवों के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि मृत्यु के तुरंत पहले महसूस किए जाते हैं। जब आपको यह महसूस हो जाए कि आपकी जिंदगी अब कुछ ही पलों की है तो उनका वह अनुभव अदभूत होता है।
मृत्यु पूर्व आभासों के बारे में अलग-अलग तरह से उल्लेख मिलता है। बहुत लोग मृत्युपूर्व आभासों को नहीं मानते। लेकिन साइंस ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि मरने के कुछ पल पहले इंसान कुछ सोचता है।
वैज्ञानिकों द्वारा किए सर्वे के मुताबिक मौत के पास पहुंचकर जो अनुभव होते हैं वे एक व्यक्ति का भौतिक दुनिया से जुड़ाव तो कम करते ही हैं साथ ही उसे उस रास्ते पर चलने के लिए भी प्रेरित करते हैं जो आत्मा को गंतव्य स्थान तक पहुंचाता है।
मौत के करीब पहुंच व्यक्ति शरीर के साथ आत्मा के मरने का भी अनुभव करता है। कई बार ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जब मौत के मुंह में पहुंचने के बाद व्यक्ति को जीवनदान मिल जाता है। आपने ऐसे भी कई किस्से सुने होंगे जब अंतिम संस्कार के समय ही व्यक्ति दोबारा जीवित हो उठता है। इन्हीं लोगों के साक्षात्कार के आधार पर प्राप्त परिणामों को वैज्ञानिकों ने अपने शोध की स्थापनाएं बनाया है।
आत्मा को उड़ते देखा
ऐसे कुछ किस्सों में से एक है अमेरिका में रहने वाली एक महिला जोकि वेंटिलेटर पर अपनी आखिरी सांसे ले रही थी। इस महिला की आंखों की रोशनी बहुत कमजोर थी, बावजूद इसके उसने महसूस किया कि अपने पीछे रखी मशीन पर लिखे अंक देख पा रही है। यही नहीं उसने खुद को ऊपर की ओर उड़ता हुआ देखा। कुछ देर बाद उसकी आत्मा ने फिर से शरीर में प्रवेश कर लिया। डॉक्टरों के अनुसार वह किसी भी क्षण मर सकती थी लेकिन मृत्यु के समीप पहुंचकर वापस आ गई। इसे विज्ञान की भाषा में आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियेंस कहा जाता है।
मायने रखता है माहौल
वैज्ञानिकों के अनुसार व्यक्ति जिस वातावरण में पला-बढ़ा है, उसका धर्म और धार्मिक मान्यताएं, उसके मौत के निकट पहुंचकर होने वाले अनुभवों को बयां करते है। एक वयस्क जब नीयर डेथ एक्सपीरियंस का अनुभव करता है तो इस अनुभव में उसका मौत का डर, सामाजिक और धार्मिक वातावरण बहुत मायने रखता है। लेकिन जब एक छोटा बच्चा इन अनुभवों से गुजरता है तो उसे कैसा महसूस होता है, क्योंकि उसे ना तो मौत का अर्थ पता होता है और ना ही उसे किसी प्रकार से धर्म का कोई जुड़ाव होता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि पांच से सात साल तक के बच्चे मृत्यु को नहीं समझते और ना ही उन्हें पूर्वजन्म की अवधारणा से कुछ लेना-देना होता है इसलिए उनके भीतर किसी प्रकार का भय नहीं होता। उन्हें भी कुछ ऐसे ही अनुभव होते हैं जो किसी वयस्क को हो सकते हैं।
स्वर्ग-नरक का फेर
हर धर्म में आत्मा के दो गंतव्य स्थानों का जिक्र किया गया है, एक नरक और दूसरा स्वर्ग। ऐसा कहा जाता है कि जीवन में अच्छे कर्म करने वाले लोगों की आत्माएं स्वर्ग की ओर प्रस्थान करती हैं वहीं बुरे कर्म करने वाली आत्माएं नर्क जाती हैं। व्यक्ति बहुत अच्छे से जानता है कि जीवनभर उसके कर्म अच्छे थे या बुरे। शायद उससे बेहतर कोई और यह बात जान भी नहीं सकता, इसलिए जब मौत उसके निकट होती है तब उसकी आत्मा अपने कर्मों के आधार पर ही स्वर्ग या नरक जाने की यात्रा शुरू कर देती है।
ऐसी भी मान्यताएं
मौरो के अनुसार हिंदुओं में अजीब मान्यता है। वे स्वर्ग को एक विशाल नौकरशाही के तौर पर देखते हैं। भैंसे को कर्मों का हिसाब रखने वाले मृत्यु देव यमराज की सवारी माना जाता है इसलिए हिन्दू धर्म से जुड़े ऐसे लोग जिन्होंने मौत को बहुत नजदीकी से देखा है, का कहना है कि वह एक भैंसे के ऊपर बैठकर अपनी अंतिम यात्रा कर रहे थे। बौद्ध धर्म से जुड़े लोग, जिन्होंने नीयर डेथ एक्सपीरियंस किया है उनके अनुसार उनकी अंतिम यात्रा काले पहाड़ों, गहरे समुद्र और आसपास रंगीन फूलों के रास्ते से गुजरी। उन्होंने इस दौरान महात्मा बुद्ध को अपने साथ देखा। वहीं हिन्दू धर्म के लोगों ने रास्ता तो यही बताया लेकिन उन्होंने बुद्ध को नहीं बल्कि कृष्ण को देखा था।
जीवित व्यक्तियों के मृत्यु के निकट होने जैसे आभास को समझने के बाद यह कहा जा सकता है कि जीवित अवस्था में आपके विचार, विश्वास, मरने के बाद आपकी यात्रा को बहुत प्रभावित करते हैं और इन सभी में धर्म भी एक बड़ा रोल निभाता है।
‘जन्म-मृत्यु रहस्य’
हम संसार में मनुष्य जन्म और मृत्यु दोनों को समय समय पर होते देखते हैं। यदि हम अपने परिवार के सदस्यों पर विचार करें तो हमें ज्ञात होता है कि हमारे माता, पिता हैं, उनके माता-पिता भी होते हैं या रहे होंगे और जिन्हें हम दादा-दादी कहते थे उनके भी माता-पिता अर्थात् परदादी व परदादा थे। आज जब हम इन सभी संबंधियों को देखते हैं तो किसी परिवार में दादा-दादी यदि हैं भी तो परदादा व परदादी तो बहुत ही कम परिवारों में होने की आशा की जाती है। वह और उनसे पूर्व के सभी सम्बन्धी मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। इससे हमें यह ज्ञान मिलता है कि संसार में जन्म और मृत्यु का चक्र चल रहा है। यह चक्र कब से आरम्भ हुआ ? यदि इस पर विचार करें तो विवेक से ज्ञात होता है कि यह जन्म-मृत्यु का चक्र तभी से चल रहा है जब से कि यह सृष्टि बनी है और पृथिवी पर अमैथुनी प्राणी सृष्टि हुई। उसके बाद से मैथुनी सृष्टि हुई और अमैथुनी के सभी प्राणी अपनी आयु पूरी होने पर मृत्यु को प्राप्त हुए। मैथुनी सृष्टि के प्राणी भी जन्म लेने के बाद अपनी-अपनी आयु भोग कर मृत्यु को प्राप्त होते आ रहे हैं। आज भले ही हम स्वस्थ हों, परन्तु हम यह नहीं कह सकते कि हम मरेंगे नहीं। मृत्यु तो एक दिन आनी ही है, वह कब आयेगी यह निश्चित रूप से वर्ष, महीने व दिन के रूप में नहीं बता सकते परन्तु यह कभी भी आ सकती है।
जन्म व मृत्यु का चक्र अन्य प्राकृतिक नियमों की तरह परमात्मा ने बनाया है।
जन्म व मृत्यु की यह व्यवस्था सृष्टि की अटल व्यवस्था है। संसार में यह नियम काम कर रहा है कि जिसका जन्म व उत्पत्ति होती है उसकी मृत्यु व नाश अवश्य होता है। संसार में भौतिक पदार्थों से जो भी वस्तुयें बनी हैं, वह बनने के बाद से ही पुरानी व क्षीण होने लगती हैं और कुछ काल बाद वह नष्ट हो जाती हैं। हम अपने लिये अच्छे वस्त्र सिलवाते हैं। यह बनने के समय नवीन व आकर्षक होते हैं। दिन प्रतिदिन हम इनका उपयोग करते हैं। इससे यह पुराने होते जाते हैं और जीर्ण होकर नष्ट हो जाते हैं। इसी को इनका नाश होना ,कहते हैं। ऐसा ही अन्य सभी भौतिक पदार्थों के विषय में होता है। हमारी यह सृष्टि भी 1.96 अरब वर्ष पहले बनी है। इसकी कुल आयु 4.32 अरब वर्ष है। जब इसका काल पूरा हो जायेगा तो परमात्मा इसकी प्रलय व नाश कर देंगे। प्रलय के बाद यह पुनः अपने मूल स्वरूप सत्व, रज, तम की साम्यावस्था को प्राप्त होती है और इतनी ही अवधि तक प्रलय अवस्था में रहकर ईश्वर के द्वारा इससे पुनः नई सृष्टि का सृजन किया जायेगा। सृष्टि में सृष्टि-प्रलय-सृष्टि का क्रम व चक्र अनादि काल से चल रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा। कभी इस सृष्टि-प्रलय क्रम का अन्त होने वाला नहीं है। इसी को सृष्टि का प्रवाह से अनादि होना कहते है।
मनुष्य का शरीर जड़ है और यह प्रकृति के परमाणुओं व कणों से बना हुआ है।
शरीर को बनाने वाला परमात्मा है। कोई भी ज्ञानपूर्वक रचना किसी निमित्त चेतन ज्ञानवान सत्ता से ही होती है। जीवात्मा स्वयं अपने व दूसरों के शरीर की रचना नहीं कर सकते। हां, वह इस कार्य में सहायक हो सकते हैं।
परमात्मा जीवात्माओं को सुख व उनके कर्मों का भोग कराने के लिये उनके पूर्व जन्म के कर्मानुसार शरीर को बनाते है। यदि पूर्वजन्म में हमने आधे से अधिक शुभ व पुण्य कर्म किये हैं तो जीवात्मा को मनुष्य का शरीर मिलता है अन्यथा पशु, पक्षी आदि प्राणियों के शरीर मिलतें हैं। मनुष्य योनि उभय योनि हैं जहां वह शुभाशुभ कर्म करने के साथ पूर्व किये हुए कर्मों का फल भी भोगता है जबकि सभी मनुष्येतर योनियों में जीवात्माओं को अपने कर्मों का भोग करना होता है। वह स्वतन्त्र कर्ता नहीं होते जिसका कारण यह है कि उनके पास विचार शक्ति वा बुद्धि नहीं है। उनके पास कर्म करने के लिये हाथ भी नहीं हैं और न ही बोलने व अपनी बात को किसी दूसरे पशु को कहने के लिए वाणी ही है। यही कारण है कि कोई मनुष्य पशु बनना नहीं चाहता परन्तु ज्ञान व संकल्प की कमी के कारण वह अशुभ व पाप करते है जिससे उन्हें परजन्मों में पशु-पक्षियों आदि अनेकानेक यानियों में जन्म लेना पड़ता है। मनुष्यों को पशु आदि निम्न योनियों व मनुष्यों में भी अशिक्षित व अज्ञानी तथा निर्धन व दुर्बल माता-पिता के यहां जन्म मिले, इसके लिये सृष्टिकर्ता ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में ही वेद ज्ञान दिया था। वह ज्ञान आज भी सुरक्षित एवं उपलब्ध है। उस ज्ञान को पढ़कर व उन पर ऋषियों के भाष्य व टीकायें पढ़कर तथा उनके अनुसार अपना जीवन बनाकर हम पशु-पक्षी योनियों में जाने से बच सकते हैं और मनुष्य योनि में भी अच्छे ज्ञानी व वेद धर्मनिष्ठ माता-पिता से जन्म लेकर अपने जीवन को वेद मार्ग पर चला कर सुखी व सम्पन्न रहकर सुख भोग सकते हैं।
मनुष्य का जन्म हमें पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर मिलता है।
हम इस जन्म में मनुष्य बने हैं, अतः हमारा कर्तव्य है कि हम अपने कर्तव्यों व अकर्तव्यों का ज्ञान प्राप्त करें। वेद और ऋषि मुनियों के वेदानुकूल ग्रन्थों जैसा निर्भ्रान्त ज्ञान मत-मतान्तरों के ग्रन्थों से प्राप्त नहीं होता। इसके लिये मुख्य आश्रय केवल वेद व वेदानुकूल ग्रन्थ हैं जो ऋषियों के बनाये हुए हैं। इनका स्वाध्याय कर इनसे लाभ उठाया जा सकता है। इसका लाभ यह होता है कि मनुष्य इन ग्रन्थों में उपदिष्ट कर्तव्यों का पालन करके शुभ व पुण्य कर्मों का संग्रह कर सकता है जिससे उसे इस जीवन में सुख मिलता है और उसका परजन्म भी श्रेष्ठ मनुष्य योनि में होने के साथ माता-पिता भी वेद ज्ञानी व देव कोटि के मिलते हैं।
हमारा मानव शरीर पृथिवी, अग्नि, जल, वायु और आकाश इन पंच भौतिक तत्वों से बना है। यह शरीर अमर नहीं हो सकता। यह अधिक से अधिक 1 सौ या तीन चार सौ वर्ष ही जीवित रह सकता है जिसका आधार जीवात्मा का प्रारब्ध और इस जन्म में उसका ज्ञान व कर्म होते हैं। महाभारत काल में 100 वर्ष व उससे अधिक 200 वर्ष तक की आयु के मनुष्य रहे हैं। भीष्म पितामह की आयु लगभग 180 वर्ष थी। आजकल भी 100 व 150 वर्ष की बीच की आयु के मनुष्य जापान व चीन आदि देशों में हैं। इससे अधिक आयु के मनुष्य वर्तमान में किसी देश में नहीं हैं। अतः मनुष्य कितना भी ध्यान रखे, उसे 100 व 150 से अधिक वर्ष की आयु प्राप्त नहीं हो सकती। इस बीच तो मृत्यु आयेगी और आत्मा को अपने शरीर को छोड़कर जाना ही होगा। वेदों में बताया गया है कि परमात्मा ही जीवात्मा को शरीर से युक्त करता है व मृत्यु के समय पर उसे शरीर से वियुक्त करता है। शरीर से वियुक्त करने का कारण यह है मानव शरीर जीवात्मा के रहने योग्य नहीं रहा। उसमें अनेक विकार आ चुके हैं। अब जीवात्मा शरीर में रहकर कर्मों का भोग नहीं कर सकता।
यही मृत्यु का कारण प्रतीत होता है। मृत्यु होने के बाद जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार परमात्मा की कृपा से नये माता–पिता, परिवार व नया देह प्राप्त करता है और शिशु अवस्था में जन्म से उन्नत होता हुआ पुनः युवा व वृद्धावस्था तक जाता है। इस नये जीवन में उसे पुनः शिशु, किशोर, कुमार, युवा आदि अवस्थाओं में मिलने वाले सुख पुनः प्राप्त होते हैं जो पूर्वजन्म के शरीर में सम्भव नहीं थे। इससे मनुष्य का पुनर्जन्म भी सिद्ध होता है। जिस प्रकार रात्रि के बाद दिन और दिन के बाद रात्रि अवश्य आती है उसी प्रकार जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म भी निश्चित रूप से होता है। जब तक कर्मों का क्षय और मनुष्य को ईश्वर का साक्षात्कार होकर विवेक प्राप्त नहीं होगा, जन्म व मरण का चक्र चलता ही रहेगा। जन्म मरण का चक्र मोक्ष पर विराम पाता है। मोक्ष मिलने पर मनुष्य का जन्म व मरण लम्बी अवस्था के लिये बन्द हो जाता है और जीवात्मा ईश्वर के सान्निध्य में रहकर आनन्द का भोग करता है। यही जीवात्मा की चरम सुख की अवस्था होती है। इसके बाद जीवात्मा की कोई अभिलाषा शेष नहीं रहती। समाधि अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार होने पर उसे जीवन का सबसे बड़ा सुख व आनन्द मिलता है। यह आनन्द सभी भौतिक सुखों से परिमाण व अनुभव में सर्वश्रेष्ठ होता है।
जीवात्मा के विषय में यह भी जानना है कि ईश्वर ही इसका सनातन व शाश्वत साथी है। ईश्वर जीवात्मा का पिता, माता, बन्धु व सखा है। वही जीवात्मा का वरणीय व उपासनीय है। जीवात्मा को ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव का ध्यान कर उसे अपनाना और अपने दुष्ट कर्मों का त्याग करना ही जीवात्मा की उन्नति है। इसके विपरीत जीवात्मा दुःख व अवनति को प्राप्त होकर अपना परजन्म बिगाड़ता है। जीवात्मा का अपने परिवारजनों व सामाजिक व्यक्तियों से शारीरिक सम्बन्ध होता है परन्तु दो जीवात्माओं का आपस में माता-पिता-भाई-बहिन-मित्र व अन्य कोई सम्बन्ध नहीं होता। मृत्यु होने पर मृतक की जीवात्मा के अपने परिवार व देशवासियों से सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं। परिवार के जो लोग जीवित रहते हैं उनका भी मृतक जीवात्मा से कोई सम्बन्ध शेष नहीं रहता। अतः अन्त्येष्टि संस्कार के बाद मृतक की जीवात्मा के लिये कुछ भी किया जाना उचित नहीं होता और न ही वेदों में इसका कहीं विधान है। हां, परिवार के जीवित व्यक्तियों के सुख व शान्ति के लिये हम ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र-यज्ञ, परोपकार व दान आदि के काम कर सकते हैं। यह भी जान लें कि ईश्वर व जीवात्मा स्वरूप से सत्य, चित्त, अनादि, नित्य हैं। इनका परस्पर सर्वज्ञ-अल्पज्ञ, व्याप्य-व्यापक, स्वामी-सेवक का सम्बन्ध है। ईश्वर अजन्मा है तथा जीव जन्म-मरण में फंसा हुआ है। मनुष्य ईश्वरोपासना, यज्ञ, दान व परोपकार आदि कर्म करके बन्धनों से मुक्त होता है व ऐसा न करने से बन्धनों में फंसता है। ईश्वर सदा मुक्त और आनन्द से युक्त रहता है। जीवात्मा के जीवन का उद्देश्य वैदिक विधि से उपासना करके ईश्वर को पाना है। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं।
पुनर्जन्म की कहानियाँ
(एक)
बरेली के एक अध्यापक थे इशमतुल्ला अंसारी। उनका पाँच साल का बेटा करीमउल्ला था। एक दफा ईद के मौके पर वे इकराम अली के यहाँ तशरीफ ले गए। साथ में करीम को भी ले गए। करीम ने जैसे ही इकराम को देखा, उन्हें अपना वालिद बताया। अपने आपको उनका बेटा मोहम्मद फारूक कहा। फारूक की मौत 1954 में हो चुकी थी। यही नहीं इकराम के घर में उसने अपनी पिछले जन्म की बीवी फातिमा को भी पहचान लिया। फातिमा जज्बाती हो गईं थीं उसकी बातें सुनकर। वह करीम काे अपनी गोद में बिठाने लगीं तो करीम संभलकर बोला था, तुम तो मेरी बीवी फातिमा हो, मैं अपनी कुर्सी पर ही बैठूँगा…
पुनर्जन्म की ऐसी अनगिनत कहानियाँ हैं। सभी धर्मों के उदाहरण हैं। भले ही उस धर्म में पुनर्जन्म को लेकर मान्यताएँ कुछ भी हों, लेकिन पिछले जन्म की स्मृतियाँ किसी-किसी बच्चे को कहीं याद रह गईं और एक और रोचक कहानी सामने आई। कभी-कभी अखबारों और पत्रिकाओं में ये कहानियाँ जगह बनाती रही हैं। लेकिन इन सतही अखबारी पड़ताल में होता क्या है? एक बच्चे ने कहीं अपने बारे में कुछ अटपटी बातें कहीं। खुद को कहीं और का निवासी बताया। अपने माँ-बाप के बारे में बताया। कुछ जिज्ञासु उन सूचनाओं के आधार पर उन स्थानों पर संपर्क किए और इस तरह कहानी के तार दूसरी तरफ जा जुड़े। मगर सृष्टि की इस अद्भुत लीला में कई प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं हर बार।
जन्म के पहले हम कहाँ थे? मृत्यु के बाद क्या होता है? क्या आत्मा जैसी कोई चीज है, जो एक शरीर से दूसरे शरीर में अपनी यात्रा को जारी रखती है? ये बड़े ही रोचक सवाल हैं। भारतीय परंपरा पुनर्जन्म को मानती है। गीता में बहुत स्पष्ट कथन है कि जैसे हम वस्त्रों को बदलते हैं। वैसे ही आत्मा नए शरीर में चली जाती है। यह जन्म और मृत्यु की अनंत यात्रा है। पतंजलि योगसूत्र जन्म और मृत्यु के इस चक्कर से ही मुक्त होने का मार्ग बताता है ताकि आत्मा अनंत में लीन हो और फिर किसी शरीर में उसे लौटना ही न पड़े।
यह विषय जितना रोचक है, उतना ही जटिल भी। दुनिया में कई विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने सृष्टि की इस लीला को समझने में ही जीवन लगा दिया। 82 साल के डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत ने जीवन के 50 साल इस विषय को समझने में लगाए हैं। इस दौरान उनकी फाइलों में 512 केस ऐसे जमा हुए, जिनमें किसी का कहीं पुनर्जन्म होता है। इनमें से लगभग दो सौ केसों की स्टडी उन्होंने खुद की है। जहाँ से भी कोई केस आया, वे उसकी गहराई में गए और तथ्यों की गहरी पड़ताल के बाद सिद्ध किया कि ऐसी किसी भी कहानी का दूसरा सिरा बीते किसी जन्म की कहानी से कैसे जुड़ा हुआ है।
(दो)
औसत 3.7 साल के बच्चों के केस थे, जिनमें बोलना सीख चुके बच्चे कुछ ऐसी बातें करते, जिनमें उनकी पूर्व जन्म की स्मृतियों के बेबूझ इशारे होते। ऐसे ख्ुलासों में ज्यादातर यह हुआ कि इस उम्र के बच्चे को पिछले जन्म से जुड़ा कोई व्यक्ति या स्थान नज़र आया तो चौंककर अचानक बच्चे ने अपने परिजनों से कुछ कहा। कुछ ऐसा, जो पहली बार अटपटा लगा। अप्रत्याशित। किंतु रोचक। डॉ. रावत कहते हैं कि मैंने अध्ययन के बाद 98 फीसदी मामले विश्वसनीय पाए। सिर्फ तीन केस ही ऐसे थे, जिनमें मृत्यु के फौरन बाद पुनर्जन्म हो गया। कुछ केसों में मृत्यु और अगले जन्म के बीच दस साल तक का फासला मिला। ये सवाल अनुत्तरित हैं कि एक बार शरीर से अलग होने के बाद आत्मा इस अवधि में कहाँ रही?
(तीन)
संत और राजा की कहानी-
डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत का जन्म 7 जनवरी 1936 को ब्यावर, राजस्थान में हुआ था। राजस्थान विश्वविद्यालय से 1959 में दर्शनशास्त्र में एमए के बाद उन्होंने समाजशास्त्र में भी एमए किया। भरतपुर में 1961 में वे व्याख्याता हुए। 1963 में विभागाध्यक्ष बनकर ब्यावर आ गए। प्राचार्य रहे। जालौर के भीनमाल से 1994 में सेवानिवृत्त हो गए। कई किताबें लिखी हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर में रहते हैं। उनके पिता आनंदस्वरूप रावत चाहते थे कि कीर्ति डॉक्टर बनें। इसलिए साइंस लिया। बीएससी का पहला ही साल था। रावत की रुचि जन्म, मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म जैसे विषय में जागी। कठोर निर्णय लेकर उन्होंने उसी साल बीए करने का फैसला किया। अब उनका विषय था-दर्शनशास्त्र। फिर हरेक इंटरव्यू में एक सवाल जरूर पूछा जाता था कि आपकी रुचि का विषय क्या है? रावत बताते कि पुनर्जन्म उनकी गहरी का विषय है। सौ साल पुरानी एक कहानी का वे जिक्र करते हैं। यह उनके अपने दादा से जुड़ी है। ब्यावर के पास सात किलोमीटर दूर दिलवाड़ा गाँव है। करीब पाँच सौ की आबादी की बस्ती। वहाँ एक संत खाकी बाबा हुआ करते थे। दस साल का एक बालक उनकी सेवा में था। एक दिन बाबा ने उसे बुलाकर कहा-तीन दिन में मैं चोला बदलूँगा। कहीं राजा बनने वाला हूँ। 12 साल बाद तू दीवान बनेगा। अब डूंगरपुर आइए। यहाँ ठीक 12 साल बाद राजा की मृत्यु हुई। सिंहासन का वारिस तय करने के लिए एक कमेटी बनी। गणेशराम रावत इसके प्रमुख थे। रावत कीर्तिस्वरूप के दादा थे। उनका देहावसान 1936 के पहले हो चुका था। तब राजा का बेटा 12 साल का ही था। खाकी बाबा की भविष्यवाणी सच हुई। वे अपने नए जन्म में थे।
पुनर्जन्म को ही विषय बनाया- अपनी लेक्चररशिप के दौरान रावत 1967 में नीम का थाना नाम की जगह पर पदस्थ थे। कॉलेज की पत्रिका के संपादक बने। उन दिनों राजस्थान विश्वविद्यालय के पैरा साइकोलॉजी विभाग के प्रमुख थे हेमेंद्रनाथ बनर्जी। पुनर्जन्म पर लिखे गए उनके आलेख देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपते थे। रावत उन दिनों बनर्जी से मिले और अपनी दिलचस्पी इसी विषय में जाहिर की। उन्हें याद है कि 16 अप्रैल 1967 को उनकी पहली बार मुलाकात बनर्जी से हुई। बनर्जी का नाम बड़ा था। एक किताब उन्होंने दी-व्हाट इज पैरा साइक्लॉजी? रावत याद करते हैं कि इस किताब को पढ़कर यह पक्का हो गया कि यही मेरा विषय है! उस दिन से रावत पूरी तरह अपने विषय में रम गए। बाद में बनर्जी पुनर्जन्म को लेकर अपने अध्ययन और तथ्यों को लेकर कुछ विवादों में आ गए लेकिन रावत ने तथ्यों की पड़ताल में हर ज़रूरी सावधानी को अपना मंत्र बनाया। उन्हीं दिनों इंदौर से एक कहानी किसी पत्रिका में छपी। यह एक ऐसे बच्चे की कहानी थी, जो किसी परिवार को कहीं मिला। वह हूबहू उनके मृत बच्चे जैसा था। वह परिवार उस बच्चे को अपने घर लेकर गया। रावत ने इस केस का अध्ययन किया। उनके लेख का शीर्षक था-क्या वह स्वर्ग से लौटकर आया? रावत बताते हैं कि उस दौर में ऐसी कहानियाँ जिन पत्रिकाओं में छपती थीं, उनमें अक्सर मामले को और रोचक बनाने के लिए तथ्यों को मनमाने ढंग से प्रस्तुत कर दिया जाता था लेकिन मैंने इसमें सावधानी बरती और तथ्यों से छेड़छाड़ कभी पसंद नहीं की।
स्टीवेंशन के साथ काम- 1982 से 87 के बीच दिल्ली में शांतिदेवी का एक केस चर्चा में आया। उनके पूर्व जन्म की स्मृतियाँ मथुरा से जुड़ती थीं। रावत ने यह केस स्टडी की। स्पेन में पुनर्जन्म पर हुई एक कॉन्फ्रेंस में इस केस पर चर्चा की गई। रावत की केस स्टडी अमेरिका से प्रकाशित पत्रिका वेंचर इनवर्ड में भी छपे और इनके जरिए मुलाकात वर्जीनिया के आईएन स्टीवेंशन से हुई। स्टीवेंशन की हैसियत इस विषय के आंइस्टीन की थी। सवाल यह उठा कि मानवीय व्यक्तित्व बनते कैसे हैं? इसमें अनुवांशिकता की भूमिका कितनी है और परिवेश या माहौल की कितनी? स्टीवेंशन की पहली किताब भारत और श्रीलंका में पुनर्जन्म की बीस कहानियों पर थी, जो 1966 में छपकर आई थी। स्टीवेंशन ने बाद में बीबीसी लंदन और मेरी रोज नाम की एक लेखिका से जोड़ा। मेरी रोज के साथ दिल्ली के एक बच्चे की कहानी पर एकसाथ काम किया। रावत के साथ उन्होंने भारत में पुनर्जन्म के केसों के अध्ययन की ख्वाहिश जाहिर की। दिसंबर 1985 में इलेस्ट्रेटड वीकली में इस विषय पर एक विशेषांक छपकर आया-लाइफ डेथ लाइफ, इज रिइनकार्नेशन पॉसीबल? इसमें भी दिल्ली की शांतिदेवी का केस था।
सबसे चर्चित केस: शांतिदेवी का जन्म 1928 में हुआ था। उनके पिता का नाम था रंगबहादुर माथुर। रावत पहली बार उनसे स्टीवेंशन के साथ ही मिले। यह मुलाकात भी शांतिदेवी की मृत्यु के ठीक चार दिन पहले ही हुई थी। अब तक उनके बारे में पढ़ा ही था। तब शांतिदेवी की उम्र 62 साल हो चुकी थी। वे चार साल की उम्र तक बोली नहीं थीं। एक दिन भगवान कृष्ण की तस्वीर घर में नहीं मिली तो बोली कि फोटो लाकर दो। वह तो मथुरा में चौबे थीं। वहां ले चलो। शांति के चाचा ने पूछा कि कहां ले चलें? पति का नाम बताओ? शांति ने जवाब दिया-केदारनाथ चौबे। मथुरा में द्वारकाधीश मंदिर के पास में हैं। यहां मथुरा के पते पर चिट्ठी लिखी गई। जवाब एक कजिन वहां से आया। शांति नाम की इस बच्ची से मिलकर गया। बातें हुईं दोनों में जैसे पुराने परिचित होंे। उसने जाकर मथुरा में बताया। मथुरा के घर वाले हैरत में थे। पूर्व जन्म के पति केदारनाथ चौबे की शादी हो चुकी थी। वे नवंबर 1935 में पत्नी सहित शांति के परिवार में आए। शांति ने उन्हें झट से पहचान लिया। केदारनाथ हैरत से भरे थे। सात साल की एक बच्ची, जो बता रही थी कि पिछले जन्म में वही उनकी पत्नी थी। रात के समय शांति ने उनसे पूछा कि आपको मृत्यु शैया पर किया गया वादा याद है और वो पास के कमरे में जो महिला आपके साथ आईं हैं, वो कौन हैं? केदारनाथ से शांति ने कई एेसी बातें कीं, जो यह भरोसा दिलाने के लिए काफी थीं कि शांति को बहुत कुछ याद रह गया था। केदारनाथ ने बाद में बताया कि उनकी पहली पत्नी के घुटने खराब हो गए थे। सुबह तक यह बात फैल गई। शांति का मामला देश ही नहीं दुनिया भर में चर्चित हुआ था। यह आजादी के पहले का किस्सा है। शांति को महात्मा गांधी ने भी बुलाया था और अपने आश्रम में रहने को कहा था। रावत ने शांतिदेवी से बातचीत को रिकॉर्ड किया था और वे बाद में मथुरा में उनके पिछले जन्म के भाई-भाभी से भी मिले थे।
सुसनेर के बच्चे की कहानी- यह 12 साल के बच्चे की कहानी है। सुसनेर का रहने वाला था। उसने बताया कि पिछले जन्म में उसकी हत्या हुई थी। जन्म चिन्ह उसके गाल पर था। वैज्ञानिक परीक्षण के लिए बच्चे को एक डॉक्टर को दिखाया गया। यह देखने के लिए कि गाल पर आया निशान जन्म के बाद का है या जन्मजात है? स्किन टेस्ट में वह निशान जन्मजात पाया गया। उस बच्चे ने अपने पिछले जन्म के माता-पिता को भी पहचान लिया था। पिछले जन्म में उसकी मृत्यु की घटना भी इस जन्म के छह-सात साल पहले की थी। लेकिन बच्चे की स्मृति में वह घटना बची रह गई। रावत दोनों ही परिवारों से मिलकर आए थे।
किताबों में रिकॉर्ड: वर्ष 1997 में रावत की एक किताब आई-अलौकिक कहानियाँ। इसमें 15 कहानियाँ छपकर आईं और नामवरसिंह ने इस पर अनुकूल टिप्पणी की। वर्ष 2001 में उनकी एक और महत्वपूर्ण किताब आई थी-पुनर्जन्म, एक वैज्ञानिक विवेचना। इसमें उन्होंने विभिन्न धर्मों, जनजातियों में पुनर्जन्म को लेकर स्थापित मान्यताओं का विश्लेषण किया है। साथ ही कुछ केसों में दोनों जन्मों में व्यक्ति के व्यक्तित्व की भी गहराई से पड़ताल की है। इसमें शांतिदेवी के केस का विस्तार से विवरण है। इस किताब में एक ऐसा भी उदाहरण है, जिसमें अहमद नाम का एक ड्राइवर 40 साल की उम्र में किसी सड़क हादसे में मौत का शिकार हो गया। ब्यावर, राजस्थान की यह 14 जनवरी 1973 की घटना है। दस दिन बाद सेंदड़ा गांव के मिट्ठूसिंह को सपना आया। इसमें अहमद मियां कह रहे हैं कि वह उनके यहाँ पैदा होने वाले हैं। नौ महीने बाद मिट्ठूसिंह के यहाँ एक बेटा हुआ। दो-ढाई साल की उम्र में वह कहने लगा कि अपने घर जा रहा हूँ। पूछताछ में उसने अपना एक और घर केसरपुरा गाँव में बताया। बाद में उसकी पहचान अहमद के रूप में ही हुई। उसने अपनी बीवी को पहचाना। पिछले जन्म में सड़क हादसे में हुई मौत की बात का सच भी उसने बताया कि पाँच लोगों ने पैसे छीनने की कोशिश में उसकी हत्या की थी…
(डॉ. कीर्तिस्वरूप रावत इंदौर में रहते हैं। उनका पता- 69ए/2, गोयलनगर, इंदौर, मप्र-452001)
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