सातों वारों से सात प्रकार का सुख मिलता है

*रविवार आदि सातों वारों से सात प्रकार का सुख मिलता है।* 
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 *शिवपुराण की प्रथम"विद्येश्वर संहिता"के 14 वें अध्याय के 21 वें और 22 वें श्लोक में शौनकादि ऋषियों से सूत जी ने रविवार आदि सातों वारों से सात प्रकार के सुखों की प्राप्ति का उपाय बताते हुए कहा कि -* 

 *स्वस्ववारे हि तेषां तु पूजा स्वस्वफलप्रदा ।20।।* 

 *स्वस्व वार अर्थात जिस देवता का जो वार होता है,* उस देवता की उस वार में पूजा उपासना करने से वे देवता अपने अपने वार में पूजा करनेवाले भक्त को फल प्रदान करते हैं।

अब क्रम से 21 वें श्लोक में देखिए -

 *आरोग्यं सम्पदश्चैव व्याधीनां शान्तिरेव च।* 
 *पुष्टिरायुस्तथा भोगो मृतेर्हानिर्यथाक्रमम्।।21।।* 

इस श्लोक में सातों वारों में पूजा करने का फल भी सातवारों के क्रम से कहा गया है।

 *(1) आरोग्य (2) संपदा अर्थात सम्पत्ति। (3)व्याधि अर्थात मानसिक अशान्ति की शान्ति। (4) पुष्टि अर्थात शारीरिक पुष्टता(5)आयु अर्थात पूर्ण आयु की निर्विघ्न प्राप्ति।*
*(6)भोग अर्थात भोग्य पदार्थों की प्राप्ति। (7) अकालमृत्यु की निवृत्ति।* 

इन सातों फलों को सातों वारों के साथ लिख लीजिए।

 *(1) रविवार - आरोग्य* 

रविवार के दिन सूर्य भगवान की पूजा करने से आरोग्य अर्थात स्वास्थ्य सुख प्राप्त होता है।

 *(2) सोमवार- सम्पदा* 

सोमवार के दिन चन्द्रमा की पूजा करने से सम्पत्ति प्राप्त होती है। दरिद्रता दूर होती है। जिनके आय तो बहुत होती है, किन्तु रुपयों की बचत नहीं हो पाती है।‌कहीं न कहीं खर्च हो जाता है। धन बचाने के लिए सोमवार के दिन चन्द्रमा की पूजा उपासना करना चाहिए।

 *(3) मंगलवार- व्याधि शान्ति।*
 
मानसिक दुख को व्याधि कहते हैं।
घर में आपस में बहुत कलह होता हो,पति पत्नी,पिता पुत्र,या पड़ोसी के साथ, इत्यादि जिस प्रकार की भी मानसिक अशांति हो तो इस व्याधि से ग्रस्त स्त्री पुरुषों को मंगल ग्रह की पूजा मंगलवार के दिन करना चाहिए।

 *(4) बुधवार -पुष्टि* 

जिनके घर में अन्न जल आदि की सदा ही कमी बनी रहती है,उसको अपुष्टि कहते हैं। घर में कभी भी किसी भी प्रकार की अन्न धन वस्त्र की कमी नहीं होती है,उसको पुष्टि कहते हैं।

 *धन धान्य की समृद्धि के लिए बुधवार के दिन,बुध ग्रह की पूजा उपासना करना चाहिए।* 

 *(5) गुरुवार -आयु* 

गुरुवार के दिन देवगुरु बृहस्पति ग्रह का पूजन करने से पूर्ण आयु होती है।  घर में किसी सदस्य की अकालमृत्यु नहीं होती है। भयानक एक्सीडेंट से अंगभंग नहीं होता है।

 *(6) शुक्रवार -भोग।* 

गाड़ी,भवन,पद,नौकरी, व्यापार आदि को भोग कहते हैं। इन सभी की प्राप्ति के लिए शुक्रवार के दिन दैत्यगुरु शुक्राचार्य जी की पूजा उपासना करना चाहिए।

 *(7) शनिवार - अकालमृत्यु की हानि।* 

किसी परिवार में किसी न किसी कारण से आपसी संघर्ष में, अथवा शत्रुता आदि के कारण,तथा एक्सीडेंट में और रोग आदि से यदि घर का कोई न कोई सदस्य हर वर्ष समाप्त हो जाता है तो उनको शनिवार के दिन शनि की पूजा उपासना करना चाहिए।

इस प्रकार से सातों वारों में सातों ग्रहों की उसी के वार में पूजा अर्चना करना चाहिए।

अब 23 वें श्लोक में उन ग्रहों की पूजा उपासना विधि भी देखिए -

 *देवानां प्रीतये पूजा पञ्चधैव प्रकल्पिता।* 
 *तत्तन्मन्त्रजपो होमो दानं चैव तपस्तथा।।* 

सभी देवताओं की पूजा पांच प्रकार से ही कही गई है।

देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जिस देवता की या जिस ग्रह की पूजा करते हैं तो उस दिन उपवास करना चाहिए। उनके मंत्र का जप करना चाहिए। उनके मंत्र से *होम अर्थात हवन करवाए।* उस ग्रह से संबंधित वस्तुओं का ब्राह्मण को दान करना चाहिए। उस दिन व्यर्थ भाषण और असत्य भाषण नहीं करना चाहिए। क्रोध नहीं करना चाहिए।

जिस दिन उपवास किया है,उस दिन,दिन में नहीं सोना चाहिए। ये पांच प्रकार की पूजा ही की जाती है।

 *जिस दिन जिस ग्रह का पूजन करें,उस दिन ब्राह्मण भोजन अवश्य करवाना चाहिए।* 

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए सोमवार के दिन लक्ष्मी-गणेश पूजन करके चंद्रमा ग्रह का पूजन करके  पत्नी सहित ब्राह्मण को भोजन करवाना चाहिए।

इसी 14 वें अध्याय 42 वें श्लोक में सूत जी ने कहा कि -
 *यथाशक्त्यनुरूपेण कर्तव्यं सर्वदा नरै:।।* 
 *सप्तस्वपि च वारेषु नरै:शुभफलेप्सुभि:।।42।।* 

शुभफलेप्सु अर्थात स्त्री पुरुषों को शुभफल की इच्छा हो,सुखी जीवन व्यतीत करने की इच्छा हो तो *यथाशक्ति धन के अनुसार और तन की शक्ति के अनुसार समय समय पर देवताओं का पूजन तथा सातों वारों के ग्रहों का विधि-विधान से पूजन उपवास आदि करते रहना चाहिए।* 

 *आरोग्य, सम्पत्ति, दैहिक, दैविक, भौतिक सुख प्राप्त होता रहे, और सन्तान की उन्नति हो, पारिवारिक सम्बन्ध, सुख शांति समृद्धि से सम्पन्न रहें, इसके लिए ब्राह्मण भोजन तथा देवताओं का आवाहन पूजन करते रहना चाहिए।*
*क्यों कि इस मृत्युलोक पर देवताओं का और ग्रहों का ही शासन चलता है। इनके क्रुद्ध होने पर मनुष्य जाति का विनाश ही होता है, विकास नहीं होता है।* 


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