नंदगांव के सखा कृष्ण को उलाहना देते हैं कि तुमने ही बरसाना में बहुत पिटवाया।
नंदगांव के सखा कृष्ण को उलाहना देते हैं कि तुमने ही बरसाना में बहुत पिटवाया।
इसका बदला लेने के लिए कृष्ण बरसाना की गोपियों को नंदगांव बुलाते हैं...
श्रीजी मन्दिर के प्रांगण में गायन, वादन एवं नृत्य की त्रिवेणी के साथ टेसू के फूलों से बने रंग की दिव्य सुगन्ध, रंग की बौछार, रंग-बिरंगे गुलाल के बादलों की छटा निराली होती है।
यह सब लठामार होली में तब परिवर्तित हो जाता है जब बरसाने की रंगीली गली में नंदगांव के गोप (कृष्णसखा) जिन्हें ‘हुरियारे’ कहते हैं, श्रीराधाजी की सखियों (गोस्वामी समाज की महिलाएं जो सोलह श्रृंगार किये, गोटा लगे रंग-बिरंगे लहंगा पहने, घूँघट काढ़े, हाथ में प्रेमपगे लट्ठ लिए) से होली खेलती हैं।
हुरियारे जब इनसे परिहास करते हैं तो हुरियारिनें लाठियों से उनका स्वागत करती हैं और उनको मजा चखाने के लिए बेताब रहती हैं।
नंदगांव के हुरियारे मुढ़ासा (सिर पर बड़ी सी पगड़ी) बांधे मजबूत ढालों से अपने सिर और शरीर की रक्षा करते हैं और घुटनों के बल फुदक-फुदककर बचाव करते हैं और हुरियारिनों से कहते हैं:-’अई भाभी लग जावेंगी, नैक प्रेम ते दई दै।’
यह कशमकश दो-तीन घंटे चलती है, इस अलौकिक लीला के लिए हुरियारिनें सूरज से गुहार लगाती हैं:- ’सूरज छिप मत जइयो आज, श्याम संग होरी खेलूंगी।’
इस लठामार होली में हुरियारों व हुरियारिनों के बीच हंसी-ठिठोली व छींटाकशी होती है पर मर्यादा में रहकर।
इस हुरदंग के मध्य रसिया भी गाये जाते हैं:-
फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं, नटवर नन्दकिशोर...
घेर लई सब गली रंगीली, छाय रही छवि छटा छबीली,
जिन ढप ढोल मृदंग बजाये हैं, बंशी की घनघोर॥
जुर मिलकें सब सखियाँ आईं, उमड़ घटा अम्बर में छाई,
जिन अबीर-गुलाल उड़ाये हैं, मारत भर-भर झोर॥
फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं, नटवर नन्दकिशोर...
लै रहे चोट ग्वाल ढालन पै, केशर कीच मलै गालन पै,
जिन हरियल बांस मँगाये हैं, चलन लगै चहुँ ओर॥
भई अबीर की घोर अँधियरी, दीखत नाय कोऊ नर अरु नारी,
जिन राधे सैन चलाये हैं, पकरे माखन चोर॥
फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं, नटवर नन्दकिशोर...
जो लाला घर जानौ चाहौं, तो होरी कौ फ़गुआ लाऔ,
जिन श्याम ने सखा बुलाये हैं, बाँटत भर भर झोर॥
राधे जू के हा-हा खाओ, सब सखियन के घर पहुँचाऔ,
जिन ‘घासीराम’ कथ गाये हैं, भयौ होरी कौ जोर॥
फ़ाग खेलन बरसाने आये हैं, नटवर नन्दकिशोर...
बरसाने की हुरियारिनों (स्रियों) को एक महीने पहले से विशेष खाना (घी, दूध, मेवा आदि) दिया जाता है जिससे वह होली में अच्छी तरह से लाठी से हुरियारों पर प्रहार कर सकें।
इस लठामार खेल में यदि किसी को चोट लग जाये और खून निकल आये तो केवल व्रजरज ही लगा देने से वह ठीक हो जाता है।
लाड़ली लाल (राधाकृष्ण) की जयकार के साथ यह होली सम्पन्न होती है।
होली के समय रंग-गुलाल डालने पर ऐसा प्रतीत होता है, मानो होली का यह मौसम सदा के लिए स्थिर हो गया हो।
इसीलिए:- ऐसो रंग बरसे बरसाने में, जो रंग तीन लोक में नायँ।
देवता भी इस आनंद को प्राप्त करने के लिए तरसते हैं।
तारी दे गारी गावहीं,
एकते एक बनी व्रजवनिता नाना रंग बरसावहीं।
बाजत ताल मृदंग झांझ डफ मोहन वेणु बजावहीं,
चोवाचंदन अगर कुंकुमा सुरंग गुलाल उडावही।
इत मोहन उत सखी समूह मिस खेलें हँसें हँसावहीं,
सूरदास प्रभु तुम बहुनायक फगुवा दे घर आवहीं।
बरसाना से होली खेलकर जब ये युवक नंदगांव लौटते हैं तो बरसाना की गोपियां उनसे होली का फगुआ (नेग) मांगती हैं।
वे उन्हें नंदगाँव में होली खेलने का आमन्त्रण देते हैं।
जिसके बाद बरसाना की गोपियां फगुआ मांगने नंदगांव जाती हैं तो युवक उन्हें अपनी भाभियों से छड़ी से पिटवाते हैं।
इसका भाव यह है कि बरसाना में लाठियों से पिटाई पर नंदगांव के सखा कृष्ण को उलाहना देते हैं कि तुमने ही बरसाना में बहुत पिटवाया।
इसका बदला लेने के लिए कृष्ण बरसाना की गोपियों को नंदगांव बुलाते हैं।
बरसाना की होली के अगले दिन सायंकाल ऐसी ही लठामार होली नंदगांव में नंदचौक पर होती है।
यहाँ नंदगांव की स्रियाँ होती हैं और बरसाने के पुरुष (पुरुष लोग सखी वेष में जाते हैं)।
अगले दिन एकादशी से व्रज-वृन्दावन के सारे मन्दिरों और नगर-गाँवों में रंगीली होली आरम्भ हो जाती है।
इस रंगीली होली में बाहर से डाला गया रंग-गुलाल तो थोड़े समय के पश्चात् छूट जाता है, किन्तु मन के भीतर पड़ चुकने वाला कृष्णप्रेम का रंग स्थायी हो जाता है।
फागुन मास सुहायो रसिया, होरी खेलन आयो।
अबीर गुलाल भरे फेंटन में, दौरि बदन लपटायो॥
गारिन गावै भाव बतावै, बातन ही भरमायों।
'कृष्णजीवन लछीराम' के प्रभु कों, नाना भांत नचायो॥
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