दीपावली पर मां से प्रार्थना (एक कविता)
दीपावली आई
मन में खुशियों की सौगात लाई
किसी ने कुछ न कुछ खरीदा
किसी ने चांदी
तो किसी ने सोना
परंतु मेरे मन ने तो
कुछ और ही सोच ली
मैने एक 'सुई' खरीद ली
सपनों को बुन सकूं
उतनी 'डोरी' खरीद ली
कुछ लोग हसरते बदलते हैं
कुछ चेहरे बदलते हैं
किसी ने नोट बदले
पर
मैंने तो अपनी ख्वाहिशे बदल ली
जिन्दगी के शौक कम करके
सुकून की जिन्दगी खरीद ली
दीपावली तो हर साल आती है
न जाने कितनों को खुशी
तो कितने का दिवाला निकाल जाती है
माँ
ओम जितेंद्र सिंह तोमर की
इतनी सी ही प्रार्थना है तुझसे..
मां
धन बरसे या न बरसे..
पर
अब के बाद कोइ गरीब..
दो रोटी के लिए न तरसे..

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