44. फल वाली बुढ़िया माई

44. फल वाली बुढ़िया माई 

फल वाली बुढ़िया माई रमेश और उसके सभी साथियों को पहचानती है। जब भी वे लोग उसकी दुकान से फल खरीदने पहुंचते हैं तो वह उनको दुआ देती नही थकती।

"आखिर क्यों?"

बात उस दिन की है जब ऑफिस से निकल कर रमेश ने स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि तभी उसे याद आया कि पत्नी ने कहा था कि लौटते वक़्त एक दर्ज़न केले लेते आना।

तभी उसने सड़क किनारे बड़े, साफ और ताज़ा केले बेचते हुए एक कमजोर और बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया माई दिखई दी थी। तो उसने अपना स्कूटर उस फल वाली बुढ़िया के पास रोक दिया।

वैसे तो वह फल हमेशा "फ्रेश फ्रूट भण्डार" से ही लेते थे, पर आज रमेश को लगा कि क्यों न बुढ़िया माई से ही खरीद लूँ ?

वह बुढ़िया माई के पास गया और बोला, "माई, केले कैसे दिए"

बुढ़िया माई बोली, "बाबूजी ! 20 रूपये दर्जन" 

रमेश जानता था कि केले 20 रूपये दर्जन हीं मिलेंगे फिर भी उसने बुढ़िया माई से कहा, " माई ! 15 रूपये दूंगा।

बुढ़िया माई ने कहा, " 15 नहीं बाबू जी, 18 रूपये दे देना, दो पैसे मै भी कमा लूंगी।

रमेश बोला, "15 रूपये लेने हैं तो बोल। वरना मैं चला। "

अनमने मन और बुझे चेहरे से बुढ़िया ने, "न" मे गर्दन हिला दी।

स्कूटर स्टार्ट कर रमेश बिना कुछ कहे चल पड़ा फ्रेश फ्रूट भण्डार की तरफ और फ्रेश फ्रूट भण्डार पर ही जाकर रुका। 
रमेश ने दुकानदार से केले का भाव पूछा, "भाई ! केले कैसे दिए हैं?"

दुकानदार बोला, " 28 रूपये दर्जन हैं। कितने दर्जन दूँ ?"

रमेश बोला, "भाई पिछले 5 साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, भाव थोड़ा ठीक-ठाक लगाओ।" 

तो उसने मुंह से बिना कुछ बोले अपनी उंगली से सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया। और फिर बोला, "शायद आपने यह बोर्ड नहीं पढ़ा।" 

बोर्ड पर लिखा था, "मोल भाव करने वाले माफ़ करें"

रमेश को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा, दूसरे शब्दों में कहें तो रमेश को उसकी औकात पता लग गई। 'बाबू जी! 18 रूपए दे देना' वाले शब्द उसके दिमाग में घूम गए। 

रमेश ने कुछ  सोचकर स्कूटर को वापस ऑफिस की ओर मोड़ दिया। कुछ सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गया।

बुढ़िया ने रमेश को पहचान लिया और बोली, " केले दे दूँ बाबूजी, पर भाव 18 रूपये से कम नही लगा पाऊँगी।" 

रमेश ने मुस्कराकर कहा, "माई ! एक  नही दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।" 

बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा। केले देते हुए बोली, "बाबूजी ! मेरे पास थैली नही है।"

फिर बोली, " बाबूजी ! एक टाइम था ।जब मेरा आदमी जिन्दा था। तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी। सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर। आदमी की बीमारी मे दुकान भी चली गयी, और वह भी। अब तो खाने के भी लाले पड़े हैं।"

रमेश ने सोचा, अच्छा ही किया जो पहले इससे नहीं खरीदा। वापस आने पर कम से कम इसकी परेशानी का तो पता चला। 

वह फिर से बोली, " किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है। जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।"

इतना कहते कहते बुढ़िया रुआंसी हो गयी, और उसकी आंखों मे आंसू भर आए।

रमेश ने 50 रूपये का नोट बुढ़िया को दिया और बोला सब दिन एक से नहीं होते अच्छे दिन भी जल्दी आएंगे।" 

50 रूपये का नोट देखकर वह बोली, "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।"

रमेश बोला, "माई! छुट्टा कौन मांगता, चिंता मत करो, रख लो, आज से मैं तुमसे ही फल खरीदूंगा।"

घर पहुंचकर रमेश अपनी पत्नी से बोला, "न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से  मोल भाव करते हैं। किन्तु बड़ी दुकानों पर उससे ज्यादा और मुंह मांगे पैसे दे आते हैं।"

रमेश की पत्नी को बड़ा अजीव लगा। वह रमेश का चेहरा देखने लगी।

"शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है। गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर अधिक ध्यान देने लगे हैं।" रमेश पुनः बोला।

अगले दिन जब रमेश ऑफिस जाने लगा तो उसकी पत्नी ने रोका और बोली, "ये 500 रूपये लेते जाओ और उसे दे देना। वह अपना काम बढ लेगी। 

रमेश बहुत खुश हुआ और मुस्कुरा कर स्कूटर बैठा, स्कूटर स्टार्ट किया और ऑफिस की ओर चल दिया। उसने अपना स्कूटर बुढ़िया माई के ठिए पर रोक दिया।

बुढ़िया ने जब रमेश को देखा तो उसका चेहरा खुशी से खिल उठा वह बोली, "बाबूजी ! कुछ चाहिए क्या?"

"अभी नहीं, परंतु यह ले लो।", कहते हुए उसने 500 रूपये बुढ़िया की ओर बढ़ा दिए। बुढ़िया माई पैसे लेकर रमेश की तरफ देखने लगी तो वह बोला, " खैरात में नहीं दे रहा हूं, धीरे धीरे चुका देना और कल से बेचने के लिए मंडी से दूसरे फल भी ले आना। माई लौटाने की चिंता मत करना। जो में फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से धीरे धीरे चुक जाएंगे।"

बुढ़िया माई कुछ कह पाती उसके पहले ही रमेश स्कूटर स्टार्ट कर ऑफिस की ओर रवाना हो गया।

रमेश आज बहुत खुश लग रहा था एक तो पत्नी की चेरिटी पर दूसरा अपने अच्छे काम पर। आई है खुशी ऑफिस में छुपी नहीं रह सकी। 

उनका दोस्त उससे बोला, "लगता है भाई ! आज तो भाभी जी ने खुश करके भेजा है।" अपने साथी की इस कमेंट पर रमेश चौक उठा उसने देखा कि सभी साथ ही उसके आसपास खड़े हुए हैं और प्रश्न का उत्तर का इंतजार कर रहे हैं।

रमेश ने ऑफिस मे सारा किस्सा बता दिया तो सबने रमेश की पत्नी की प्रशंसा की। इसके साथ ही सभी ने ऑफिस से घर लौटते वक्त बुढ़िया माई से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया।

तीन महीने बाद ऑफिस स्टाफ क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट किया गया। 

बुढ़िया माई अब बहुत खुश है। उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा रहने लगा ।

रमेश की पत्नी के मन की बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता के भाव से अब वह संतुष्ट है।

लेखक
ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर
11.30/6/9/10/2021


Comments

Popular posts from this blog

संपूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा।

कैसा दिखाई देता था शताब्दियों पहले दिल्ली शहर; अनदेखी तस्वीरों में देख लीजिये

पर काया प्रवेश