फिरोज शाह कोटला किला

फिरोज शाह कोटला किला  

Firoz Shah Kotla Fort

फिरोज शाह कोटला किले का स्थान पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के बीच है. फिरोज शाह तुगलक ने 1351 से 1384 तक शहर पर शासन किया. उसे अपने चाचा मुहम्मद बिन तुगलक से गद्दी मिली. 

किले का निर्माण फिरोज शाह तुगलक ने 1354 में किया था. उसी वर्ष, उन्होंने फिरोजाबाद नामक एक शहर की भी स्थापना की. यह शहर पीर ग़ैब से पुराने किले तक फैला हुआ है और इसकी आबादी लगभग 1,50,000 है.

यमुना नदी के तट पर शहर और किले की स्थापना की गई थी. किले में मस्जिदों, महलों और मदरसों जैसे कई अन्य स्मारकों का निर्माण किया गया था. बाग़ भी बनाए गए जो बहुत ही ख़ूबसूरत थे. 

फ़िरोज़ शाह ने किले और शहर का निर्माण इसलिए किया क्योंकि उनकी पिछली राजधानी तुगलकाबाद में पानी की आपूर्ति में समस्या थी.

फिरोज शाह कोटला किला (Feroz Shah Kotla Fort)

किले में जिन्न

फ़िरोज़ शाह कोटला किला लोगों की मनोकामनाओं को पूरा करने वाले जिन्नों की उपस्थिति के लिए भी जाना जाता है. इस्लामी पौराणिक कथाओं के अनुसार, जिन्न धुंआ रहित आग से बने होते हैं जबकि मनुष्य मिट्टी से बने होते हैं. ऐसा माना जाता है कि जिन्नों में भी इंसानों की तरह ही सरकारी व्यवस्था होती है.

लोग एक पत्र लिखते हैं और अपनी फोटोकॉपी लाते हैं जो किले की दीवारों से जुड़ी होती हैं. इच्छा पूरी करने के लिए पत्र सही विभाग के पास जाना चाहिए. 1970 के दशक के दौरान, लड्डू सिंह नाम के एक फकीर ने यहां रहना शुरू कर दिया, जिससे जिन्नों के लिए पत्र लेखन में वृद्धि हुई.

जिन्न किसी को तरजीह नहीं देते. उनके लिए सभी समान हैं. एक किंवदंती कहती है कि जिन्नों के प्रमुख लाट वाले बाबा हैं जो मीनार-ए-ज़रीन में पिरामिड जैसी संरचना में रहते थे. लोग खंभे के चारों ओर की रेलिंग को छूने की कोशिश करते हैं क्योंकि उनका मानना ​​है कि उनकी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी होंगी.

फिरोज शाह कोटला किला (Feroz Shah Kotla Fort)

फिरोज शाह कोटला किला का वास्तुकला (Architecture of Firoz Shah Kotla Fort)

फ़िरोज़ शाह कोटला किले को ख़ुस्क-ए-फ़िरोज़ भी कहा जाता था जिसका अर्थ है फ़िरोज़ का महल. यह एक अनियमित बहुभुज आकार में बनाया गया था, किले के पूर्व में यमुना नदी है. 

मलिक गाजी और अब्दुल हक ने किले का डिजाइन तैयार किया था. किला ज्यादातर बर्बाद हो गया है लेकिन अभी भी पर्यटकों द्वारा दौरा किया जाता है. प्रवेश और निकास द्वार क्षतिग्रस्त हो गए हैं.

किले के डिजाइन से सुल्तान तैमूर प्रभावित हुआ था. तुगलक वंश की हार के बाद 1490 में किले को छोड़ दिया गया था. हालांकि किला बर्बाद हो गया है लेकिन पर्यटक अभी भी अशोक स्तंभजामी मस्जिदबावली आदि जैसे कुछ स्मारकों को देख सकते हैं.

अशोक स्तंभ

अशोक स्तंभ जामी मस्जिद के उत्तर में स्थित है. मौर्य साम्राज्य के राजा अशोक ने अंबाला के टोपरा में 273 और 236 ईसा पूर्व के बीच स्तंभ का निर्माण किया था. 

फ़िरोज़ शाह तुगलक ने अंबाला से स्तंभ लाकर किले में स्थापित किया. स्तंभ की ऊंचाई 13 मीटर थी. स्तंभ को सफलतापूर्वक स्थापित करने के लिए तीन मंजिला पिरामिड संरचना का निर्माण किया गया था.

फिरोज शाह कोटला किला (Feroz Shah Kotla Fort)

स्तंभ के शीर्ष पर कलश के साथ काले और सफेद पत्थरों का उपयोग करके पिरामिड संरचना का निर्माण किया गया था. स्तंभ को खूबसूरती से सजाया गया था और इसका नाम मीनार-ए-जरीन रखा गया था. 

अशोक स्तंभ में कुछ शिलालेख पाए जा सकते हैं जो प्राकृत और ब्राह्मी लिपियों में लिखे गए थे. बुद्ध की दस आज्ञाएँ भी हैं जिनके कारण मौर्य काल में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ. 

स्तंभ को देखने का सबसे अच्छा समय उस दिन का होता है जब सूर्य की किरणें सीधे उस पर पड़ती हैं और वह सोने की तरह चमकती है.

बावली

फिरोज शाह कोटला किला (Feroz Shah Kotla Fort)

एक बावली है जिसमें पानी भरा हुआ था. बावली त्रिस्तरीय है और कई पाइपलाइनों से जुड़ी हुई है. तुगलक के काल में नदी प्राचीर के नीचे बहती थी. कुंड नदी से जुड़े थे जो बावली को पाइपलाइनों के माध्यम से पानी प्रदान करते थे.

हवा महल

हवा महल पिरामिड के आकार का महल है जो निजी कमरों से जुड़ा हुआ था. महल के फर्श एक गलियारे के माध्यम से निजी कमरों से जुड़े हुए हैं. इमारत में तीन मंजिल हैं और कोने पर एक सीढ़ी है जो इमारत की छत तक जाती है.

जामी मस्जिद

जामी मस्जिद अशोक स्तंभ के बहुत करीब है और सबसे पुरानी मस्जिदों में से एक है जो आज भी उपयोग में है. मस्जिद को बनाने के लिए क्वार्टजाइट पत्थर का इस्तेमाल किया गया था जिस पर चूने का प्लास्टर किया गया था. 

एक प्रार्थना कक्ष के साथ एक बहुत बड़ा प्रांगण था जिसका उपयोग शाही महिलाओं द्वारा किया जाता था. प्रार्थना कक्ष अब पूरी तरह से बर्बाद हो गया है.

इस मस्जिद में एक मुगल प्रधानमंत्री इमादुल मुल्क ने मुगल बादशाह आलमगीर सानी की हत्या कर दी थी. 1398 में तैमूर ने आकर मस्जिद में नमाज अदा की. वह डिजाइन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ईरान के समरकंद में उसी डिजाइन के साथ एक मस्जिद का निर्माण किया.

पांच सौ वर्ष पुराने इस किले को कुंवर उमराय सिंह ने सहेजा था। यह एक ऐतिहासिक किला है जो फिरोजाबाद जिले के इतिहास को गौरवान्वित करता है कोटला रियासत के राजा कुंवर उमराय सिंह ने बड़े पुत्र कुशलपाल सिंह को कोटला रियासत का राजा बनाया।

किले को सुरक्षित रखने को कई मजबूत बुर्जियां बनवाई गईं। जिन पर तोपों को रखा जाता था। पूजा अर्चना को सीताराम लक्ष्मीनारायण व रामश्याम मंदिर की स्थापना की थी। राजा कुशलपाल ने 30 वर्ष की आयु में अन्न को त्याग दिया था। 

कुशल प्रशासक के कारण जिला बोर्ड आगरा के वह चेयरमैन भी रहे थे। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान राजा कुशलपाल को 1933 में शिक्षा मंत्री बनाया गया। राजा कुशलपाल के बेटे गजेंद्र की मृत्यु हो गई थी। उसके नाम से गजेंद्र नाट्य रामलीला समिति का गठन किया गया। यह समिति आज भी कायम है। 

कोटला का प्राचीन किला देख-रेख के अभाव में बदहाल होता जा रहा है। तोपों के रखने की बुर्जियां ढह गई हैं। किला का भवन खंडहर में तब्दील हो गया। आज किले की देखभाल करने वाला कोई नहीं है। 

किले के अधिकांश भवन गिरासू हालत में पहुंच गए। 1884 के गजेटियर के अनुसार कोटला का किला जिसकी खाई 20 फ़ीट चोडी, 14 फुट गहरी, 40 फुट ऊँची दर्शाई गई है भूमि की परधि 284 फ़ीट उत्तर 220 फ़ीट दक्षिण तथा 320 फ़ीट पूर्व तथा 480 फ़ीट पछिम में थी वर्तमान में ये किला नस्ट हो गया है किन्तु अब भी उसके अभिषेश देखने को मिलते है। इस किले मे जो मन्दिर है उस मन्दिर मे राम-लक्ष्मन-सीता हनुमान शिव पार्वति की मूर्ति है जिनकी कीमत करोडो रुपये है जो अष्टधातू से निर्मित है।

फिरोजशाह कोटला में पिरामिड के आकार में बनी जिस तीन मंजिला इमारत के ऊपर करीब साढ़े 7 सौ साल से अशोक स्तंभ लगा हुआ है। 
इस गोलाकार इमारत के भूतल सहित सभी मंजिलों पर हो चुकी टूटफूट ठीक की जाएगी। टूट चुकी दरारें दूर की जाएंगी। दीवारों पर झड़ चुका प्लास्टर फिर से किया जाएगा।

तीसरी मंजिल के ऊपर अशोक स्तंभ लगा है। जिसका भी काफी वजन है। इस इमारत की प्रत्येक मंजिल पर चौड़ाई कम होती चली गई है। किले के अंदर जामे मस्जिद के उत्तर में यह इमारत स्थित है। इमारत में मेहराबयुक्त प्रवेश द्वारों सहित कक्ष हैं। यहां जो अशोक स्तंभ है इसे अंबाला के टोपरा से लाया गया था। जिसे फिरोजशाह ने यहां लगवाया था। इस स्तंभ पर अंकित राजाज्ञाओं को सबसे पहले 1837 में जेम्स ¨प्रसेज ने पढ़ा था।

फिरोजशाह तुगलक द्वारा अंबाला और मेरठ से 1351 से 1366 के बीच दिल्ली दो स्तंभ लाए गए थे। इन स्तंभों का महत्व ऐतिहासिक है। संस्कृति और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी ये स्तंभ महत्वपूर्ण हैं। इनमें से एक स्तंभ उत्तरी दिल्ली में हिन्दूराव अस्पताल के पास है और दूसरा स्तंभ फिरोजशाह कोटला किले में है। इस स्तंभ पर अशोक के सातों अभिलेख अंकित हैं।

यह स्तंभ किले के अंदर एक गुंबदनुमा तीन मंजिला इमारत के ऊपर लगा हुआ है। दोनों स्तंभ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन हैं यानी इनके रखरखाव और संरक्षण की जिम्मेदारी इसी पर है। फिरोजशाह कोटला को लेकर जो इतिहास में वर्णित है उसके अनुसार दिल्ली दिल्ली के पांचवें शहर फिरोजाबाद का निर्माण फिरोजशाह तुगलक ने कराया था। जो हौजखास से लेकर उत्तर में पीर गायब तक था। 

दिल्ली का यह अशोक स्तम्भ तीन शताब्दी ईसा पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप में महान् सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गये भगवान बुद्ध की शिक्षाओं पर शिलालेखों की एक श्रृंखला है।

  • 13.1 मीटर लम्बा यह स्तम्भ पोलिश किये हुए बलुआ पत्थर से बना हुआ है जो तीन शताब्दी ईसा पूर्व का है और यह फिरोजशाह द्वारा अम्बाला से उठवाकर दिल्ली लाया गया है।
  • यह स्तम्भ फ़िरोज़शाह कोटला, दिल्ली में स्थित है।
दिल्ली का यह अशोक स्तम्भ तीन शताब्दी ईसा पूर्व महान् सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया था। सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया स्तंभ दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला में स्थित है। यह स्तम्भ 13.1 मीटर ऊंचा है और यह पॉलिश किए गये बलुआ पत्थर से निर्मित है। अशोक ने इसे तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बनवाया था। पहले यह स्तंभ मेरठ में स्थित था लेकिन फिरोज शाह तुगलक जब सन् 1364 के आसपास मेरठ आया तो इस स्तंभ की खूबसूरती देखकर मोहित हो गया। इसके बाद वह मेरठ में लगे इस अशोक स्तंभ को दिल्ली

कभी मेरठ की शान रहा अशोक स्तंभ अब राजधानी दिल्ली का मान बढ़ा रहा है। दिल्ली विवि के नॉर्थ कैंपस के पास हिंदूराव के सामने लगा अशोक स्तंभ कभी मेरठ की शान हुआ करता था। जिसे हिंदुस्तान पर राज करने वाला अंतिम मुस्लिम शासक फिरोज़ शाह तुगलक दिल्ली ले गया। आज हम आपको बता रहे हैं अशोक स्तंभ से जुड़े ऐसे ही फैक्ट जिन्हें आप शायद ही जानते होंगे:- 
फिरोज़ शाह तुगलक सन 1364 के आसपास मेरठ आया था। मेरठ भ्रमण के वक्त उसकी नज़र अशोक स्तंभ पर पड़ी। स्वयं सम्राट अशोक द्वारा स्थापित कराए गए इस स्तंभ की खूबसूरती पर फिरोज़ शाह तुगलक रीझ गया। जिसके बाद उसने तय किया कि खिज्राबाद की तरह मेरठ में लगे इस अशोक स्तंभ को भी वो अपने किले में स्थापित कराएगा।

इसी इरादे को पूरा करने के लिए फिरोज़ शाह ने 42 पहियों की एक खास गाड़ी तैयार कराई। इस गाड़ी में 4 हजार से ज्यादा मजदूरों को लगाया गया। जो मेरठ से इस अशोक स्तंभ को उठाकर दिल्ली ले गए। रुई और मखमल के थान में लपेटकर स्तंभ को ससम्मान दिल्ली ले जाया गया। जहां फिरोज़ शाह के किले में उस-ए-शिकार (हंटिंग लॉज) में लगाया गया। 

पांच भागों में बंट गई थी मीनार
इतिहासकारों के अनुसार सन 1713 या 1719 के बीच यह मीनार पांच भागों में बंट गई थी। इतिहासकारों के मुताबिक उस-ए-शिकार में जहां फिरोज़ शाह ने मीनार को लगवाया था वहां एक बार बारुद के कारण आग लग गई थी। आग लगने से मीनार के पांच टुकड़े हो गए। फिर अंग्रेजों ने 1857 में इन पांचों टुकड़ों को जोड़कर इस मीनार को बड़ा हिंदूराव के सामने लगवा दिया। जहां यह आज भी लगी है। इतिहासकारों कें अनुसार यह स्तंभ शहर के समीप दो स्थानों पर लगे होने के प्रमाण मिलते हैं। शहर के भीतर टीले वाला कोतवाली का हिस्सा व शहर के बाहर जहां अब हापुड़ अड्डा है वहां यह मीनार लगी थी।  
स्तंभ पर लगा शिलालेख बयां करता पूरी कहानी

आज भी अशोक स्तंभ पर लगे शिलालेख में इस बात का जिक्र है कि इसे मेरठ से लाकर दिल्ली में फिरोज़शाह तुगलक ने स्थापित किया। स्तंभ के नीचे लगे पत्थर में अंग्रेज़ी में पूरा विवरण दर्ज है जिसमें लिखा है कि थर्ड सेंचुरी में सम्राट अशोक ने इस स्तंभ को स्थापित कराया था। पूरी कहानी शिलालेख बयां करता है। 


पर्यटन का बन सकती थी हिस्सा

मेरठ से अशोक स्तंभ दिल्ली ले जाकर वहां स्थापित कर दिया गया। अगर यह मेरठ में ही होता तो मेरठ का ऐतिहासिक महत्व व पर्यटन महत्व और विस्तृत होता।

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