107. विक्रम बैताल || कहानी 07 || *सुदामा और उसकी दरिद्रता*

          107. विक्रम बैताल 
               || कहानी 07 || 
      *सुदामा और उसकी दरिद्रता*
उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया। 

जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?” 

"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।

राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, और तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका। 

राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"

राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”

राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।

नीचे उतर कर राजा ने उसक  दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है? अब तू आराम से मेरे प्रश्नों का जवाब दे सकता है।”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा कि तू रास्ते में अब के बाद कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा। 

राजन! जिसने तुम्हें मेरे पीछे लगाया है वह एक धूर्त तांत्रिक है, परंतु तुम अपने प्राण से डिगने वालों में नहीं हो। अतः तुम मुझे उसके पास लेजाकर कर ही मानोगे। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”

विक्रम इस कहानी में, मैं तुझे कृष्ण के परम मित्र सुदामा की कहानी सुनाता हूं। जिसने अपने परम मित्र कृष्ण के हिस्से के चने भी खा लिए जबकि उसे मालूम था कि जितनी भूख उसे लगी है, उतनी ही भूख उसके मित्र कृष्ण को भी लगी होगी। इसके बावजूद भी उसने वे चने खा लिए। क्यों ? जानना नहीं चाहेगा। उसने ऐसा क्यों किया? चल, आज मैं कृष्ण के परम मित्र उसी सुदामा की कहानी सुनाता हूं।

विक्रम, सुदामा कृष्ण की मित्रता लोगों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। जो निर्धन और धनवान दोनों को ही मित्रता की सीख देती है। 

कहानी महाभारत काल की है । परीक्षित जी महाराज शुकदेव जी से पूछते है ! अगर द्वारिका में ठाकुर जी ने किसी भक्त पर कृपा हुई हो तो वृतांत मुझे सुनाईए। शुकदेव जी कहते है कि हे राजन ! मैं आपको श्री कृष्णा जी के परम भक्त सुदामा की कथा सुनाऊंगा। सुदामा जी ठाकुर जी के परम मित्र एवं बचपन सखा थे। सुदामा जी ब्रहमज्ञानी विषयों से विरक्त , शान्तचित्त और जितेन्द्रीय थे। परन्तु वे इतने ज्यादा गरीब थे कि घर में खाने का एक दाना तक नहीं होता था। कई बार तो भूखा ही सोना पड़ता था परन्तु गरीब होते हुए भी सुदामा दरिद्र नहीं थे लोग सोचते है कि जो गरीब होते है वे दरिद्र होते है परन्तु गुरूदेव जी कहते है नहीं ! नहीं ! दरिद्रता एवं निर्धनता में अन्तर है। ठाकुर जी भक्त गरीब हो सकता है पर दरिद्र नहीं हो सकता। क्योंकि दरिद्र व्यक्ति वो है जिसके पास सब कुछ हो लेकिन संतोष न हो। गुरु की दृश्टि में दरिद्र वही है जिसके मन में सब कुछ होने पर भी सन्तोष नहीं है। सुदामा जी को एक वक्त का भेजन भी ठीक से प्राप्त नहीं हो पाता था। घर में दीवार तो है पर छत का ठिकाना नहीं है। घर में टूटे फूटे पात्र थे। सुदामा जी 3-3 दिन तक अपनी पत्नी के साथ भूखे रहते थे। लेकिन कभी भी ठाकुर जी से शिकायत नहीं की। 
सुदामा का जन्म वर्तमान गुजरात के वर्तमान पोरबंदर के एक गांव में हुआ था। प्राचीन समय में उस गांव को अस्मावतीपुर के नाम से जाना जाता था। वे एक निर्धन ब्राह्मण परिवार से आते थे। उनके पिता का नाम श्री शरङधार एवं माता का नाम सत्यवती था जो अपने ग्राम अस्मावतीपुर में भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करते थे। 

सांदीपनि मुनिके उनके पितामह अर्थात दादाजी सुरंतदेव थे और पितामही श्रीमती चन्द्रकला थी। उनके पिताका नाम देवऋषि प्रबल है जो दिव्यज अग्निहोत्रके जनक थे। उनके चाचा देवप्रस्थ थे। उनकी माता का नाम पूर्णमासी था, जिनके गुरु नारद थे।

देवी पूर्णमासीको नन्द महाराज आदर प्रदान करते थे इस प्रकार व्रजभूमीमे उनकी विशेष प्रतिष्ठा थी। सांदीपनि मुनिके पत्नीका नाम श्रीमती सुमुखि देवी तथा पुत्र मधुमंगल थे जो कृष्णके बालमित्र थे। सांदीपनि मुनिके एक कन्या भी थी इस कन्याका नाम नन्दीमुखी है जो राधा तथा ललिताकी सखी है। सांदीपनि मुनि मूलतः काशीसे थे और अवंतीनगरीमे निवास करते थे।


अवंतिका (उज्जैनी) में ऋषि संदीपनी का आश्रम उस समय गुरुकुल के नाम से प्रसिद्ध था। दूर-दूर से लोग यहां शिक्षा प्राप्ति के लिए आते थे। सुदामा के माता-पिता ने भी सुदामा को यही शिक्षा लेने के लिए भेजा। सांदीपनि आश्रम में कुलगुरु सांदीपनि से शास्त्रों और वेदों का ज्ञान लिया था। इसीलिए संदीपनि आश्रम को श्री कृष्ण की विद्या अध्ययन स्थली के नाम से भी जाना जाता है।

जब 11 साल 7 दिन की आयु में भगवान कृष्ण और बलराम ने कंस का वध किया तो उनके माता-पिता ने उन्हें बाबा महाकाल की नगरी अवंतिका में कुलगुरु सांदीपनि से अस्त्र-शस्त्र और वेद आदि शास्त्रों की शिक्षा लेने के लिए  सांदीपनि आश्रम में भेजा। कहते हैं कि श्री कृष्ण जब सांदीपनि आश्रम में पढ़ने के लिए पहुंचे तो भगवान शिव उसने मिलने आए थे। इस दौरान भगवान शिव ने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं के भी दर्शन किए। कहा जाता है कि हरिहर मिलन का यह दर्लभ क्षण था ।

सुदामा यहां पहले से ही शास्त्रों और वेदों की शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। ब्राह्मण सुदामा समस्त वेद-पुराणों के ज्ञाता और बहुत बड़े विद्वान् थे। यहीं पर सुदामा की कृष्ण के साथ मुलाकात हुई थी। सुदामा ने उनका एक अतिथि की तरह स्वागत किया, जिसके व्यवहार को देखते हुए कृष्ण ने उन्हें अपना शखा अर्थात मित्र बना लिया, आगे चलकर यही मित्रता गहरी दोस्ती में बदल गई। दोस्ती भी ऐसी क जिसे लोग बरसों बरसों नहीं हजारों वर्ष बाद आज भी लोग उनकी दोस्ती की मिसाल देते हैं।

सुदामा के लिए यह दोस्ती केवल दोस्ती तक ही सीमित नहीं रही वारन् कृष्ण के कार्यों को देख कर तथा उनके व्यवहार से प्रभावित होकर सुदामा कृष्ण के परम मित्र तथा भक्त हो गए थे। 

इसी समय एक घटना घटी जिसने अनजाने में ही सुदामा के जीवन को प्रभावित किया। 

एक बार सुदामा और कृष्ण को यज्ञ समिधा के लिए जंगल में लकड़ियां एकत्रित करने के लिए भेजा गया, किंतु मौसम खराब होने के कारण उन्हें लकड़ियां नहीं मिली, तब एक पेड़ पर कृष्ण को लकड़ियां दिखाई दी । इसी बीच सुदामा को बहुत तेज भूख लगने लगी। गुरु माता ने दोनों बच्चों को खाने के लिए एक एक मुट्ठी अर्थात दो मुट्ठी चावल दिए लेकिन सुदामा ने पहली बार में एक मुट्ठी खाई कि खा लेता हूं कि कृष्ण को पता नहीं चलेगा फिर उन्होंने उसका आधा दूसरी मुट्ठी में खा लिया और बचा हुआ तीसरा भाग तीसरी बारी में खा लिया लेकिन भूख थी कि वह शांत होने का ही नाम नहीं ले रही थी। इस प्रकार सुदामा जी ने गुरु माता दो दो मुट्ठी कच्चे चावल वे एक-एक कर तीन मुट्ठी में खा गए। कहते हैं कि वही तीन मुट्ठी चावल भेट लेकर अनजाने में ही वे भगवान कृष्ण का भार उतार पाए थे। जो उन्होंने द्वारिका में उन्हें दिया था।

यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं अच्छा बहुत सर्दी लग रही है क्या? सुदामा कहता है हां। यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि मुझे भी बहुत सर्दी लग रही है। सुना है कि कुछ खाने से शरीर में गर्मी आ जाती है तो लाओ वो चने जो गुरुमाता ने हमें दिए थे। दोनों बांटकर खा लेते हैं। 

यह सुनकर सुदामा कहता है चने कहां हैं? वो तो पेड़ पर चढ़ते समय ही मेरे पल्लू से नीचे किचड़ में गिर गए थे। यह सुनकर श्रीकृष्ण समझ जाते हैं और कहते हैं ओह! यह तो बहुत बुरा हुआ। यह सुनकर नीचे की डाल पर बैठे भगवान श्रीकृष्ण अपने चमत्कार से हाथों में चने ले जाते हैं और ऊपर चढ़कर सुदामा को देकर कहते हैं कि पेड़ पर फल तो नहीं लेकिन मेरे पास ये चने हैं। सुदाम कहते हैं यह तुम्हारे पास कहां से आए? तब कृष्ण कहते हैं कि वह मुझे भूख कम लगती है ना। जब पिछली बार गुरुमाता ने जो चने दिए थे वह अब तक मेरी अंटी में बंधे हुए थे। ले लो अब जल्दी से खालो। यह सुनकर सुदामा कहता है नहीं नहीं, मैं इसे नहीं ले सकता। तब श्रीकृष्ण पूछते हैं क्यों नहीं ले सकते? सुदामा रोते हुए कहता है कि क्योंकि मैं इसका अधिकारी नहीं हूं और मैं तुम्हारी मित्रता का भी अधिकारी नहीं हूं। मैंने तुम्हें धोखा दिया है कृष्ण। मुझे क्षमा कर दो। कृष्ण कहते हैं अरे! जिसे मित्र कहते हो उससे क्षमा मांगकर उसे लज्जित न करो मित्र।... इसी प्रकार एक बार श्रीकृष्‍ण सुदामा को वचन देते हैं कि मित्र जब भी तुम संकट में खुद को पाए तो मुझे याद करना मैं अपनी मित्रता जरूर निभाऊंगा।

भगवान श्री कृष्ण तो भगवान थे उन्होंने केवल 64 दिनों के अल्प समय में सम्पूर्ण शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर ली। उन्होंने बड़ी आसानी से 1 दिन में 1 शास्त्र की शिक्षा ग्रहण कर ली। 

उन्होंने 4 दिनों में 4 वेद, 6 दिनों में 6 शास्त्र, 16 दिनों में 16 कलाएं, 18 दिनों में 18 पुराण व 20 दिनों में संपूर्ण गीता का ज्ञान अर्थात शास्त्रों के साथ युद्ध शिक्षा जैसे अस्त्र-शस्त्र, गजशिक्षा, अश्वशिक्षा आदि ग्रहण कर लिया था।

गुरु ने श्रीकृष्ण से दक्षिणा के रूप में अपने पुत्र को मांगा, जो शंखासुर राक्षस के कब्जे में था। भगवान ने उसे मुक्त कराकर गुरु को दक्षिणा भेंट की। इसके उपरांत वे गुरु माता व गुरु सांदीपनि जी को उनके मृत पुत्र को स्वर्ग से लौटा कर गुरु दक्षिणा देखकर गुरु ऋण से मुक्त हुए। पञ्चजन दैत्य का वध एवं पाञ्चजन्य शंख को धारण किया । यही नहीं, उनके गुरु महर्षि सांदिपनी श्रीकृष्ण की लगन और मेहनत से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें जगत गुरु की उपाधि दी। तभी से श्रीकृष्ण पहले जगत गुरु माने गए। इस प्रकार गुरु ऋण से उऋण होकर भगवान कृष्ण वापस लौट गए और सुदामा वही अपनी शिक्षा ग्रहण करते रहे।

शिक्षा समाप्त होने पर दोनों की शादी हो गई जिससे सुदामा अपनी पत्नी के साथ एक झोपड़ी में रहने लगे और भगवान कृष्ण द्वारका के महल में अपनी पत्नियों के साथ।

सुदामा जी के स्थिति अब अत्यंत ही दयनीय हो चुकी थी। उन्हें हमेशा कई-कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता था जिसके कारण वे और उनके परिवार वाले बहुत ज्यादा दुबले हो चुके थे। श्री सुदामा जी भगवन श्री कृष्ण के परम मित्र तथा भक्त थे। विवाह के बाद भी सुदामा प्राय: अपनी पत्नी सुशीला और बच्चों को नित्य ही श्रीकृष्ण की उदारता और उनसे अपनी मित्रता की चर्चा किया करते थे। वे बताते रहते थे कि मेरे मित्र द्वारिका के राजा श्रीकृष्ण है। वे साक्षात लक्ष्मीपति और उदार  की मूरत हैं उनके पास क्या नहीं है। जब आवे दिया बताते तो वे अपना सिर गर्व से उठाकर रखते।

एक दिन दरिद्रता की प्रतिमूर्ति दुःखिनी पतिव्रता भूख के मारे काँपती हुई अपने पतिदेव के पास गयी और मुरझाये हुए मुँह से बोली- ‘भगवन्! साक्षात् लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण आपके सखा हैं। वे भक्तवांछाकल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणों के परम भक्त हैं। परम भाग्यवान् आर्यपुत्र! वे साधु-संतों के, सत्पुरुषों के एकमात्र आश्रय हैं। आप उनके पास जाइये। जब वे जानेंगे कि आप कुटुम्बी हैं और अन्न के बिना दुःखी हो रहे हैं तो वे आपको बहुत-सा धन देंगे। आजकल वे भोज, वृष्णि और अन्धकवंशी यादवों के स्वामी के रूप में द्वारका में ही निवास कर रहे हैं और इतने उदार हैं कि जो उनके चरणकमलों का स्मरण करते हैं, उन प्रेमी भक्तों को वे अपने-आप तक का दान कर डालते हैं। ऐसी स्थिति में जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों को यदि धन और विषय-सुख, जो अत्यन्त वाञ्छनीय नहीं है, दे दें तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है?’

सुदामा जी की पत्नी का नाम सुशीला था। सुशीला का जैसा नाम वैसा ही प्रभाव भी था। सुशीला कभी भी अपने पति से गरीबी की शिकिायत नहीं करती थी।

सुदामा जी हमेशा अपनी पत्नी को बताते कि श्री कृष्ण उनके बचपन के मित्र हैं और इसी बात को लेकर उनकी पत्नी भी उनसे हमेशा कहती कि यदि भगवान श्रीकृष्ण आपके मित्र हैं तो आप जाकर उनसे कुछ मांगते क्यों नहीं जिससे आपका भी कुछ भला हो जाए।

लेकिन सुदामा जी अपने मित्र से कुछ भी मांगने के लिए कतई तैयार ना हुए। सुदामा जी ने कहा सुशीला मर जाऊंगा लेकिन मांगने नहीं जाऊंगा कैसे जाऊ ?वो मेरा मित्र है।

सुशीला ने कहा चलो ठीक है आप अपने मित्र से कुछ मांगने मत जाओ पर दर्शन तो कर आओ। अपने बचनन के मित्र से एक बार मिल तो लो।
इस प्रकार जब उन ब्राह्मण देवता की पत्नी ने अपने पतिदेव से कई बार बड़ी नम्रता से प्रार्थना की, तब उन्होंने सोचा कि ‘धन की तो कोई बात नहीं है; परन्तु भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन हो जायेगा, यह तो जीवन का बहुत बड़ा लाभ है’।

यही विचार करके उन्होंने जाने का निश्चय किया और अपनी पत्नी से बोले- ‘कल्याणी! घर में कुछ भेंट देने योग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो’।

सुशीला ये जानती थी कि घर मे खाने के लिए एक दाना नहीं है। सारे पात्र खाली पड़े है , लेकिन फिर भी रसोई घर में गई और चुपके से घर से निकल और चार घर गई और चार तरह के चार मुट्ठी चावल लेकर आई। सुदामा जी को वो चावल एक फटे दुपट्टे में बांध दिए दुपट्टा इतना ज्यादा फटा था कि चार तह करने पर भी फटा हुआ है इतनी गरीबी है। चार की आठ तह करने पर उन्होने उन चावलों की मुट्ठी को जैसे तैसे लपेटा और सुदामा जी को भेंट के लिए दे दिया। 
द्वारिका का राजा है और मैं एक गरीब ब्राहमण शायद मेरा कन्हैया मुझे ना मिले

सुदामा संकोचवश पहले तो बहुत मना करते रहे लेकिन पत्नी के आग्रह पर एक दिन करीब 6 महीने तक यात्रा करने के बाद द्वारिकापुरी पहुंच गए। 

सुदामा जी द्वारका से कुछ ही दूरी पर थे कि तभी उनके मन में एक विचार आया कि वापिस लौट चलूं। कान्हा तो द्वारिका का राजा बन गया है और मैं एक गरीब ब्राहमण, शायद मेरा कन्हैया  मुझसे ना मिले।  फिर सोचते है नहीं मेरे प्रभू तो प्रेम तो प्रेम की मूर्ति है। मैं उनसे मिलकर ही जाऊंगा।  

सुदामा जी को चलते - फिरते शाम हो गई और एक पेड़ के नीचे बैठ गए। सुदामा जी को लेकिन गुरूदेव जी कहते हैं भगवान की दृष्टि मे पैसे का कोई महत्व नहीं है। धन और बल का कोई महत्व नहीं है। कोई व्यक्ति ऊंचे ओहदे पर हो उसका कोई महत्व नहीं है। उनकी दृष्टि में तो केवल और केवल भाव का महत्व है।

सुदामा जी को चलते - फिरते शाम हो गई और एक पेड़ के नीचे बैठ गए। रात्रि का प्रहर था तो भगवान को याद करते - करते सो गए। इधर भगवान भी सुदामा को याद कर रहे थे। भगवान ने सोचा मेरा मित्र थक कर सो गया है और गहरी नींद में है। भगवान योग माया को आज्ञा दी कि तुम जाओ और मेरे मित्र सुदामा को द्वारिका में पहुंचा दो। योग माया में सुदामा को द्वारिका मे पहुंचा दिया।

जब सुबह हुई तो सुदामा जी ने देखा चारों तरफ स्वर्ण मंडित महल ही महल हैं। सुदामा जी सोचते हैं कि हम तो एक पेड़ के नीचे सोये थे तो यहां कैसे पहुंच गए ?

सुदामा जी ने राहगीर से पूछा कि भैया ये कौन सा नगर है तो लोगों ने कहा ये द्वारिका है। सुदामा जी ने पूछा अगर ये द्वारिका है तो भैया हमारे कन्हैया का मकान कौन सा है ?

सुबह से दोपहर हो गई सुदामा जी को कन्हैया का घर पूछते पूछते। दोपहर में उनके पास एक व्यक्ति आया और बोलाा, 'हे ब्राहमण देवता ! मै सुबह से देख रहा हूँ आप किसका पता पूछ रहे हैं?'

सुदामा जी बोले कि यहां कोई मेरे मित्र कन्हैया का घर नहीं जानता। अब शायद अपने मित्र से मिलन नहीं हो पाएगा।

वो बोला कि ये सब महल आपके मित्र कृष्ण के है। आप जिस भी महल जाओगे आपको आपके मित्र कन्हैया का ही दर्शन होगा। फिर भी आप वहां चले जाईए। वह सुदामा जी को इशारे से घर बताकर चला गया। अब सुदामा जी महाराज महल के दरवाजे पर जा पहुंचे।

द्वारिका में दरवाजे पर द्वारपाल ने उन्हें रोका। मात्र एक ही फटे हुए वस्त्र को लपेट गरीब ब्राह्मण जानकर द्वारपाल ने उसे प्रणाम कर यहां आने का आशय पूछा। अरे ब्राहमण ! आप कौन हो ? कहां से आये हो ? और कहां जाओगे ?

सुदामा जी बोले भैया आप अन्दर जाकर कन्हैया से केवल इतना कह देना कि तेरा बचपन का मित्र सुदामा मिलने आया है। मेरा कन्हैया सब कुछ समझ जायेगा । प्यारे मेरे कन्हैया को ज्यादा बताने की आवश्यकता नहीं है।

द्वारपाल को आश्चर्य हुआ। फिर भी उसने नियमानुसर सुदामा जी को वहीं ठहरने का कहा और द्वारपाल महल में गया । भगवान सिंहासन पर बैठे है। उस द्वारपाल ने भगवान को प्रणाम किया उस दीन ब्राह्मण का वर्णन किया और क्या कहा ? 

द्वारपाल ने ठाकुर जी से कहा  
हे प्रभु द्वार एक फटेहाल दीन 
और दुर्बल ब्राह्मण  खड़ा है।
जिसके सर पर न पगड़ी 
और न तन पर जामा, 
बसे हैं न जाने कौन से गामा। 
धोती फटी सी 
शरीर मलिन और दुर्बल सा। 
देह की नसें सारी पड़ती दिखायी। 
जूते भी नहीं है पर पैरों में है बिवाईयां 
वो आश्चर्य से द्वारका को देख रहा है 
कन्हैया का घर पूछता है।
अपना नाम बताता दीन सुदामा 

द्बारका का वैभव 
उसे चकित कर रहा है।
कैहता है सखा आपका 
कथन चकित कर रहा है।

जैसे ही श्री कृष्ण ने सुदामा नाम सुना तो ठाकुर जी अपने सिहांसन से कूद पड़े और सुदामा सुदामा कहते हुए द्वार की ओर दोड़े पड़े। रास्ते में क्या रहा है इस बात पर ध्यान दिए बिना बस दौड़े जा रहे हैं।

भगवान श्री कृष्ण के पैरों में न कोई चप्पल ना कोई खड़ाऊ। बस ज्यों ही सुदामा जी का नाम सुना  नंगे पांव दौड़े। शुधबुध भूल गए मुकुट गिर गया, पिताम्बर उलझ गया। ठाकुर जी का मन सुदामा जी से मिलने के लिए इतना बेचैन हो गया कि वे बावरे से होकर, मतवारे से होकर मित्र से मिलने की खुशी के मारे भागे जा रहे है। दौड़ जा रहे है, गिर पड़ भी रहे है। 

रानियों और द्वारपालों ने जब कन्हैया की यह दशा देखी तो सब देखते रह गए। सभी सोच रहे हैं कि आखिर यह कौन है आया है जिससे मिलने के लिए द्वारकाधीश शुधबुध खोकर दौड़े जा रहे हैं। 

मित्र सुदामा कहां हो? देखो तुम्हारा मित्र कान्हा तुमसे मिलने आ रहा है। आज वर्षों बाद मित्र सुदामा मिलने आ रहा हैै। 
द्वार पर खड़ा सुदामा व्यग्र होकर अपने मित्र के आने का इंतजार कर रहा है। उसे एक-एक पल वर्षों जैसा बीतता प्रतीत हो रहा है। उसे लगा कि शायद उसका कान्हा, उसे भूल गया है। अब वह उससे मिलने नहीं आएगा। इसलिए वह निराश होकर वापस चल दिया।

जैसे ही कृृष्ण द्वार पर पहुंचे तो सुदामा जी वहां नहीं थे। मेरे पैरों तुम इतनी शिथिल कैसे हो गए मेरे मित्र के जाने से पहले उसके पाठक मुझे घर पहुंचा सके। है मेरी द्वारिका तुम मेरे मित्र सुदामा को पहचान न सकी तूने उसे लौटने क्यों दिया? 

द्वारपालों से पूछा मेरा मित्र सुदामा कहां है ?
द्वारपालों ने बताया कि अभी अभी सुदामा जी यहां से इधर को निकले है। 
पुकारते जा रहे हैं। कहां गया मेरा मित्र सुदामा। रुक जा मेरे मित्र सुदामा । मेरी विनती सुनो सुदामा। रुक जाओ मेरे मित्र सुदामा। 

भगवान दौड़े जा रहे हैं और द्वारकापुरी के लोग उनके पीछे उनके प्रिय मित्र सुदामा से मिलने के लिए दौड़े जा रहे हैं। वे जिधर सेे भी निकल जाते । द्वारका का मार्ग खाली हो जाताा। लोग उनके पीछे पीछे हो लेेत थे।

बीच द्वारिका में उन्हे सुदामा दिखाई दिया। एक अच्छा नहीं लगी उसे पहचान ने में। भगवान ने जोर से आवाज लगाई सुदामा मेरे मित्र सुदामा। जब सुदामा ने मुड़ कर देखा तो देखते है कि कन्हैया नंगे पांव दौड़े चले आ रहे हैं, कन्हैया ने देखते ही सुदामा जी को अपने अंक में भर लिया और गले से लगा लिया। भगवान रोये जा रहे हैं।
पूरी द्वारिका यह दृश्य देखकर हतप्रभ सी खड़ी है। यह द्वारकाधीश जी का कौन सा मित्र आ गया है। जिसको बलराम जी जितना सम्मान दिया जा रहा है।

भगवान ने कहा सुदामा तुम्हे अब याद आई मेरी। सुदामा जी बोले कि कन्हैया याद तो बहुत आती थी। पर तुमसे मिल नहीं पाया। मुझे माफ कर दो कन्हैया।  

दोनों के भरत और राम जैसे मिलाप को देखकर सभी स्तब्ध खड़े थे। तभी कन्हैया ने आवाज दी सैनापति रथ तैयार करो। हम रथ के द्वारा राजमहल जाएंगे । द्वारका वासी भी तो जाने हमारी बचपन के मित्र को। 
जय जय कार के बीच दोनों राज महल पहुंचे। 

रानियां यह दृश्य देख आश्चर्य में पड़ गई कि द्वारकाधीश अपने मित्र सुदामा को अन्दर महल में तो लेकर आए ही और उसे अपने सिंहासन पर बिठाकर, भगवान द्वारकाधीश स्वयं सुदामा जी के चरणों में बैठ गए है। वास्तव में कितने आश्चर्य की बात है कि स्वयं भगवान भी एक ब्राहमण का सत्कार कर रहे हैं। 

विद्वान पुरुष कहते है कि घर में कोई भी बड़ा व्यक्ति, संत जन या गुरूजन आएं तो उनके चरण जरूर पखारने चाहिए। क्योंकि शास्त्र बताया करते हैं कि संतो के चरणों में सब तीर्थ और सब धाम निवास करते हैं। उनके चरणों में बहुत भक्ति होती है। इसी कारण कन्हैया भी रुक्मिणी संग अपने ब्राह्मण मित्र के चरण पखार रहे हैं। सुदामा की दीन और करूना भरी दसा देखकर करके करूनानिधि भी रो पड़े हैं। उनके चरणों की दशा देखकर भगवान कृष्ण अपने आंसू न रोक सके और बोले, 

हाय सखा ! तुम महादुख पाये, 
आये इतै न किते दिन खोये।।
कष्ट भयो दारून तुमको 
इस सखा को रहे भुलाए
चों चार कदम इतको न आए।
चों चार कदम इतको न आए।

क्या तकरार रही सुदामा
क्यों इतने दिन रहे विसराए
टोटे की मार लगी सुहानी
जो अपने तोकू याद ना आए
सहत रहा अकेला अकेला
हाय सखा ! तुम महादुख पाये, 
आये इतै न किते दिन खोये।।

भगवान ने रोते-रोते कहा सुदामा तुम्हे अब याद आई मेरी। सुदामा जी बोले कि कन्हैया याद तो बहुत आती थी। पर तुमसे मिलने की हिम्मत जुटा नहीं पाया।मैं तो सोच रहा था कि आप मिलोगे भी या नहीं ? मुझे माफ कर दो कन्हैया। इतना कह कर सुदामा जी भी रोने लगे और कहते हैं। 

'अपने कन्हैया से मिलने के लिए भी हिम्मत' कहते कहते उनका गला भर आया और आंखों से अश्रु धारा बह निकली। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी आंखो के आंसुओं से अपने मित्र सुदामा जी के पैर धोये हैं। 

रुकमणी जी बोली भाई जी ने सुबह से कुछ नहीं खाया होगा। कृपया, उन्हें भोजन तो करवाइए। बाकी बातें बाद में भी कर सकते हैं।

सुदामा जी, ' कन्हैया! मैने सुबह से स्नान नहीं किया। पहले मुझे आप कुआं बताओ कहां पर है और एक रस्सी और एक बाल्टी दे दो। मैं स्नान करके अभी आता हूँ।' 

'कितने भोले है सुदामा जी ?' भगवान कहते है। 'मित्र आपको किसी कुंए पर जाने की जरूरत नहीं है। मै आपको यही स्नान करवा देता हूंँ।' भगवान ने उसी समय अपनी रानियों को आज्ञा दी कि हमारे मित्र आये है तुम जाओ और हमारे मित्र के स्नान के लिए जल लेकर आओ।

सभी रानियां दौड़ कर गई ओर एक - एक कलश जल लेकर आई। अब सुदामा जी महाराज ने दूर से लम्बी लाइन देखी जिसका छोर भी नहीं दिखाई दे रहा है।

सुदामा जी को लगा कि द्वारिका की स्त्रियां है और भगवान का अभिषेक करने के लिए जल लेकर आती होंगी। सुदामा जी महाराज ने पूछा, ' मित्र ! ये सब कौन हैं ?' 

कृष्ण जी बोले, ' ये सब आपकी भाभियां है।'

सुदामा जी बोले, 'इत्ती ............... (मुंह खुला का खुला रह गया और कृष्ण की तरफ देखकर इशारे से बोले) .............. कित्ती हैं ?

कृष्ण बोले, ' बस, थोड़ी सी हैं।' 

'कित्ती '

'16108 '

सुदामा जी बोले भैया मैं तेरी भाभी से मिलकर भी नहीं आया। एक कलश हो तो स्नान करूं। दो कलश हो तो स्नान करूं। यहां तो 16108 कलश है। यदि इतने कलशों से स्नान करूंगा तो जो यह शरीर है इसका तो यहीं गोविन्दाय नमो नमः हो जायेगो। कन्हैया मै घर तक भी नहीं पहुंच पाऊंगा।

तब भगवान ने सभी रानियों से कहा, ' देखो री हमारे मित्र सुदामा बैठे है और तुम मे से कोई एक हमारे मित्र पर जल डाल दो।'

रानियां बोली, 'आप आज्ञा कीजिए कौन सौभाग्यवती जल डाले ?'

भगवान बोले, ' अरे मित्र सुदामा तुम्हारे स्नान के चक्कर में तो, धर्म संकट में पड़ गया। एक नाम लिया तो दूसरी नाराज हो जाएगी। अच्छा भगवान इसी रानी से ज्यादा प्रेम करते हैं। अब तुम ही इस धर्म संकट से निकालो।'

पास में उद्धव जी महाराज खड़े थे सुदामा जानते थे कि उधर जी बड़े ज्ञानवान है उन्होंने उद्धव जी की तरफ इशारा करके कहा यह भैया आपको धर्म संकट से उबारेंगे। उन्होने एक खाली कलश मंगाया सभी रानियों के कलश से एक चम्मच जल लिया और उस खाली कलश को भर दिया और भगवान को दिया कि प्रभु अब स्नान करवाईए। 

भगवान नें अब सुदामा जी को स्नान करवाया। सुंदर कपड़े पहनाये और धूप दीप से अपने मित्र की आरती करने लगे। सुदामा जी बोले की यार तूं आरती उतार रहा है। यहां पेट में चूहे कूद रहे है। मुझे भूख लगी है। 

वे रुकमणी की तरफ देखते हुए बोलि, ' देखिए सुदामा जी कितने भोले हैं। कोई संकोच नहीं है। भगवान को कह दिया कि मुझे भूूख लगी है। जबकि मुझसे नहीं, दाऊ जी से ज़्यादा भूख सुदामा को लगती है। '   

भगवान बोले ठीक है आप बैठिए आपके लिए भोजन का प्रबंध कर देता हूँ। महल में हजारों सेेेेवक है लेकिन भगवान ने किसी से सेवा नहीं ली। खुद ही सुदामा जी के लिए आसन बिछाये। दो चैंकियां लगाई और खाना परोसा है और भोजन परोस रहे हैं और इस प्रकार ठाकुर जी और सुदामा जी का मिलन हुआ जो की बड़ा ही आनन्दमय था।

फिर भगवान श्री कृष्ण ने एक-एक करके अपनी सभी पत्नियों से सुदामा जी को मिलवाया यह करते-करते सुदामा जी इतने थक गए कि थकान और अनिद्रा के कारण से श्री कृष्ण की सभी पत्नियों से मिलने से पहले ही बार बार बिस्तर पर लुढ़क जाते फिर थोड़ा होश आने पर श्री कृष्ण उन्हें फिर से कहते अभी तो तुम मेरी सिर्फ इतनी ही पत्नियों से मिले हो तनिक इनसे भी तो मिलो।

भगवान कृष्ण तो भगवान है वे तो कई रूप बनाकर अपनी सभी पत्नियों के साथ रह लेते हैं किंतु एक साधारण सुदामा जी का अपने इतनी सारी भाभियों से मिलकर हाल बेहाल हो गया फिर भी वह बहुत प्रसन्न थे।

किसी तरह जब मिलने मिलाने का कार्यक्रम पूरा हुआ तो फिर सुदामा जी विश्राम करने लगे और भगवान श्री कृष्णा उनके चरण अपनी गोद में रखकर दबाने लगे और इसी बीच माता रुक्मणी बगल में बैठकर सुदामा जी को हवा करने लगी।

यद्यपि इस कार्य के लिए उनके पास हजारों दास दासिया थी किंतु प्रेम वस भगवान भी अपने भक्तों के लिए वह सब करना चाहते हैं जो एक भक्त अपने भगवान के लिए करना चाहता है।

सुदामा जी को ऐसा आनंद कभी नहीं आया उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे वे धरती पर नहीं स्वयं वैकुंठ लोक में निवास कर रहे हैं, और ऐसा लगे भी क्यों ना जब स्वयं भगवान श्री कृष्ण और माता रुक्मणी उनके साथ थी तो फिर व्यक्ति को और किस बात की कामना होगी। किसी तरह फिर दिन गुजर गया और सब ने विश्राम किया।

अगले दिन स्नान, भोजन आदि के बाद सुदामा को पलंग पर बिठाकर श्रीकृष्ण उनकी चरणसेवा करने लगे और गुरुकुल में बिताए दिनों की बातें करने लगे। 

'रुकमणी तुम जानते हो कि दाऊजी और मित्र सुदामा दोनों एक काम में एक से ही हैं।'
रुकमणी ने प्रश्नवाचक दृष्टि से कृष्ण की और देखा तो कृष्ण मुस्कुरा कर बोले, ' ना ना ना मैं बल की बात नहीं कर रहा। मैं तो पेट की बात कर रहा हूं। जब भूख लगती है तो दोनों को कुछ भी सुझाई नहीं देता।' कहकर कृष्ण के साथ सभी ठहाके मारकर हंस पड़े। जिसमें सुदामा भी शामिल था।

बातों ही बातों में यह प्रसंग भी आया कि किस तरह दोनों मित्र वन में समिधा लेने गए थे और रास्ते में मूसलधार वर्षा होने लगी तो दोनों मित्रों एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गए। सुदामा के पास एक पोटली में दोनों के खाने के लिए गुरुमाता के दिए कुछ चने थे। किंतु वृक्ष पर सुदामा अकेले ही चने खाने लगे। चने खाने की आवाज सुनकर श्रीकृष्ण ने पूछा, ' क्या खा रहे हैं सखा?' 

जानते हो सुदामा ने यह सोचकर झूठ बोल दिया कि कुछ चने कृष्ण को भी देने पड़ेंगे। उन्होंने कहा, कुछ खा नहीं रहा हूं। यह तो ठंड के मारे मेरे दांत कड़कड़ा रहे हैं।
 
'अरे हां! मुझे कुछ याद आया। आप अपनी भाभियों से तो मिल लिए। आप यह बताओ कि हमारी कितनी भाभी है.....?

' कितनी ? क्या मतलब एक ही है सुशीला?' 

सुनते ही एक बार फिर से ठहाके गूंज उठे।
'तो हमारी भाभी है ना तो उसने हमें कुछ उपहार अवश्य दिया होगा, दीजिए।' कहते हुए कृष्ण ने हाथ फैला दिए।

अब सुदामा को अपने चावल के पोटली की याद आई। उसने उसे उठाकर झट से वस्त्रों में छुपा लिया। 

सुदामा संकोचवश अपनी पोटली छिपा रहे थे कि द्वारका के लोग क्या कहेंगे कि भगवान जिसको इतना सम्मान दे रहे हैं। वह उनके लिए तीन मुट्ठी चावल ही लेकर आया है। द्वारका की जनता उन्हें ताने मारेगी। ऐसा मैं कभी नहीं होने दूंगा। मैं यह चावल उन्हें कभी नहीं दूंगा। 

भगवान हंसकर बोले, ' सखा ! तुम्हारी छुपाने की आदत गई नहीं। उस दिन चने छिपा रहे थे और आज तन्दुल छिपा रहा हो।' 

कृष्ण मन ही मन कहने लगे, 'सुदामा यदि यह भेट प्यारी भाभी ने नहीं दी होती तो मैं तुमसे कभी नहीं लेता। इसमें भाभी का आशा, प्यार और विश्वास छिपा हुआ है। यह तो मुझे तुमसे छीनना हीं पड़ेंगा।'

सोचते हुए वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली और खोल कर बोले, 'अरे वाह ! भाभी ने तो मेरी सबसे प्रिय तंदुल भेजें हैं। खीर का स्वाद तो राधा के साथ ही रह गया। जो मुझे इतनी स्वादिष्ट लगती थी कि उसके सिवा कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। इन तंदुलों ने राधा की याद ताजा कर दी। मेरे मित्र यहां मैं राधा शब्द सुनने के लिए तरस गया यदि गई मुख से रा शब्द का उच्चारण करता है तो मैं उसके पीछे पीछे हूं लेता हूं शायद वह राधा बोले और भाभी जी ने तो राधा की याद ही दिला दी और तुम मेरी इतनी प्रिय चीज तो मुझसे छुपा रहे थे।'

जब श्री कृष्ण सुदामा जी से इस तरह वार्तालाप कर रहे थे तब उन्होंने झट से पोटली में से एक मुट्ठी चावल उठाया और तुरंत मुंह में डाल लिया और उसका चबा चबाा कर स्वाद लेते हुए कहने लगे, 'हे सुदामा ! इस एक मुट्ठी चावल पर तों मैं सारे स्वर्ग का ऐश्वर्य वार दूं। तू इसे तुच्छ वस्तु समझ रहा है।' कहते हुए कृष्ण ने स्वर्ग का ऐश्वर्य सुदामा के नाम कर दिया। सुदामा बेचारा कुछ भी समझ नहीं पाया। वह तो प्रेम विभोर हो अपने मित्र को देख रहा था। उसकी आंखों से अश्रु धारा बह रही थी।

अब श्री कृष्ण ने पोटली में से एक मुट्ठी चावल ओर उठाया और पुनः मुंह में डाल लिया और उसका चबा चबा कर स्वाद लेते हुए पुनः कहने लगे, 'हे सुदामा ! इस एक मुट्ठी चावल पर तों मैं सारी पृथ्वी का ऐश्वर्य वार दूं। तू इसे तुच्छ वस्तु समझ रहा है।' कहते हुए कृष्ण ने सम्पूर्ण पृथ्वी का ऐश्वर्य सुदामा के नाम कर दिया। इस प्रकार उन्होंने संपूर्ण संसार की ऐश्वर्य आदि सुदामा जी के घर में स्थापित कर दिया।

अभी व्यक्ति दूसरी मुट्ठी चावल चबा ही रहे थे कि सभी देवता घबरा गए। आप इस पोटली में मात्र एक मुट्ठी चावल ही रह गए हैं यदि भगवान कृष्ण ने ये चावल भी खा लिया तो यह पृथ्वी तो वे अपना वैकुंठ भी सुदामा को अर्पण कर देंगे। इधर भगवान श्री कृष्ण चावल खाने में मग्न थे और उधर सभी देव माता रुक्मणी की तरफ हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे कि प्रभु को तीसरी मुट्ठी चावल खाने से रोको।

जैसे ही वे तीसरी मुट्ठी खाने लगे और रुक्मणी अन्य रानियों ने आकर उनका हाथ पकड़ लिया और भगवान से मन ही मन प्रार्थना करते हुए कहा, 'हे प्रभु आपकी अर्धांगिनी होने के कारण इन तंदुलों पर हमारा भी कुछ हक बनता है। आपने दो मुट्ठी चावल खा कर दो लोक तो सुदामा को दे दिए, अब तीसरा लोक भी उन्हें दे देंगे तो हम कहां रहेंगे। इससे तो सुदामा पर अन्याय ही होगा क्योंकि यदि हमारी कृपा उस पर नहीं होगी तो वह खुश कैसे रह पाएगा।'

'यह क्या तुम मुझे भाभी के दिए सारे तंदुल नहीं खाने दोगी।'

भाग्यलक्ष्मी माता रुकमणी देवी ने श्री कृष्ण का हाथ पकड़े पकड़े ही कहा जब सुदामा जी की पत्नी यदि आपकी भाभी है, तो वे हमारी भी भाभी हुई ना, तो इन स्वादिष्ट चावलों पर सिर्फ आपका ही हक कैसे हो सकता है। यही कहते हुए सभी ने मिलकर झट से भगवान कृष्ण के हाथों से चावलों की पोटली छीन ली और सभी मिल बांट कर खाने लगी। सुदामा इस छीना झपटी का आनंद मुग्ध होकर आनंद ले रहा था।

देवी रुक्मणी के ऐसा करते ही समस्त दुर्लभ ऐश्वर्य सुदामा जी को स्वयं ही प्राप्त हो गए। जिसके कारण वे धन-धान्य से परिपूर्ण हो गए।

कृष्ण सुदामा की ओर देखकर बोले, 'वाह ! सुदामा वाह ! इतनी सारी भाभियां मिली तो अपने मित्र को ही भूला दिया। तुमने इस बार अपनी भाभियों के लिए एक बार फिर से अपने परम मित्र का साथ छोड़ दिया। अभी मुझसे तंदुल छीन कर ले गई और तुमने उन्हें एक बार भी उन्हें नहीं रोका।'

रुकमणी बोली, ' सुदामा आपका इतना प्रिय मित्र है हमें अब एहसास हुआ कि आपके लिए मित्रता से बढ़कर कुछ भी नहीं है।'

हां रुकमणी तुमने सही कहा कि मित्रता से बढ़कर एक मित्र के लिए कुछ भी नहीं होता जानते हो कि आज मैं द्वारिका का राजा हूं यह सब इसी मित्र सुदामा के कारण हूँ। कहानी उस समय की है जब हम गुरुदेव संदीपनी जी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण किया करते थे।

पास ही में एक ब्राह्मणी रहती थी जो बहुत निर्धन थी। भिक्षा माँग कर जीवन-यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिक्षा नहीं मिली। वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी। छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चना मिले। उसे कुटिया पर पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी।

ब्राह्मणी ने सोंचा अब ये चने रात मे कैसे भोग लगाऊंगी। चलो कल प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर ही खाऊँगी। यह सोंचकर ब्राह्मणी ने चनों को कपडे़ की पुटकी (पोटली) में बाँधकर रख दिया और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी।

देखिये समय का खेल...

ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आये। इधर उधर बहुत ढूँढा, कुछ नही मिला। अंत मे चोरों को चने की वहीं बँधी पुटकी (पोटली) मिली । चोरों ने समझा इसमें सोने के सिक्के हैं ।

इतने मे ब्राह्मणी जाग गयी और शोर मचाने लगी। गाँव के सारे लोग चोरों को पकडने के लिए दौडे़। चोर वह पुटकी लेकर भाग गए। हमारा आश्रम गाँव के निकट था। पकडे़ जाने के डर से चोर हमारे आश्रम में छिप गये।

अब तक ब्रहम मुहूर्त का समय होने आया था। गुरुमाता को लगा कि कोई आश्रम के अन्दर आया है। गुरुमाता देखने के लिए आगे बढीं तो चोर समझ गये कोई आ रहा है। चोर डर गये और आश्रम से भागे ! भागते समय चोरों से वह पुटकी वहीं छूट गयी। और सारे चोर भाग गये।

उधर प्रात:काल गुरु माता आश्रम मे झाडू़ लगाने लगीं तो झाडू लगाते समय गुरु माता को वही चने की पुटकी मिली। गुरु माता ने पुटकी खोल के देखी तो उसमे चने थे। उन्होंने सोचा कि यह किसी छात्र की होगी सो उन्होंने उसे उठाकर रख लिया।

इसी समय हम दोनों (सुदामा जी और कृष्ण भगवान) जंगल से लकडी़ लाने जा रहे थे। ( रोज की तरह ) गुरु माता ने आनजाने में चोरों वाली वह चने की पुटकी सुदामा जी को दे दी। और कहा, 'बेटा ! जब वन मे भूख लगे तो दोनो लोग यह खा लेना।' 

बेताल ने फिर से कृष्ण के शब्दों को दोहराया, 'उन चनों के साथ मेरे भाग्य के भी चनें अकेले खाने के कारण मेरा मित्र अत्यंत गरीब और गरीब होता गया और मेरे ऐश्वर्य में तो दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती गई।'

जानती हो रुकमणी मेरा यह मित्र गरीबी की चरम सीमा को पार कर चुका है। जिसे वीर से वीर का डोल जाते, लेकिन गरीबी की ऐसी दुर्दशा भी सुदामा की आस्था को नहीं हिला पाई।

ऐसे होते हैं मित्र.. 
कलियुग में जो मित्र सुदामा जैसी मित्रता करेगी तो खुश रहेंगे अन्यथा वह भी परेशान रहेंगे।

सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि हम रात दिन  साथ ही रहते थे। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते।

जानती हो एक दिन हम दोनों वन में समिधा के लिए गए तो रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक सुंदर सा फल लगा था।  

यह तो ठहरा मेरा मित्र तो मैने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। मैने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा ब्राह्मण मित्र सुदामा को दिया।

जानते हो कैसे मुझसे ज्यादा भूख लगती है। सुदामा ने पहला टुकड़ा खाया और बोला, 'बहुत स्वादिष्ट! ऐसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दें।' 

दूसरा टुकड़ा भी सुदामा को मिल गया। सुदामा ने एक टुकड़ा और कृष्ण से मांग लिया। इसी तरह सुदामा ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए।

जब सुदामा ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो कृष्ण ने कहा, 'यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते। मुझे मालूम है कि तुम्हें मुझसे ज्यादा भूख लगती है परंतु इसका मतलब यह नहीं कि मित्रता के व्यवहार को ही भुला दिया जाए।' और कृष्ण ने जैसे ही फल का टुकड़ा मुंह में रख तो मुंह में रखते ही कृष्ण ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था।

कृष्ण बोले, 'सुदामा ! तुम पागल तो नहीं हो, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?'

उस सुदामा का उत्तर था, 'मेरे मित्र ! मैं इतने ऊंचे पेड़ पर चढ़ने का साहस नहीं कर सकता था, जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, अब बताओ कि एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करता ?

जानती हो रुकमणी, ' यह सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि मुझे पता न चले और उसका मित्र कड़वा फल खाने से बच जाए।' 

रुक्मणी ने कृष्ण की तरफ देखा और उनसे बोली, ' प्रभु ! आपने एक बात और कही थी कि मुझसे नहीं, दाऊ जी से ज़्यादा भूख सुदामा को लगती है। ऐसा कैसे?

कृष्ण बोले,  'लो मुझे अब एक और कहानी सुनानी पड़ेगी? सुदामा तुम नाराज तो नहीं हो जाओगे क्योंकि यह तुम से जुड़ी हुई ही कहानी है।'

'कैसी बात करते हो कान्हा! मैं तुमसे कहीं नाराज हो सकता हूं। सुनाओ मुझे भी आनंद आएगा।' सुदामा ने कहा।

तब श्री कृष्ण ने कहानी शुरू की ' मुझे, दाऊ जी और सुदामा तीनों को आश्रम में भिन्न-भिन्न कार्य करने को मिलते थे। एक बार हम तीनों एक साथ भिक्षा मांगने के लिए गए। एक द्वार पर खड़े होकर तीनों ने भिक्षाम्देही की अलख जगाई, तभी एक महिला अपनी बेटी के साथ भिक्षा लेकर बाहर आती है और बोली, ' हे ब्रह्मचारियों ! आज आने में बहुत देर कर दी?' 

यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं, ' माता ! आज सारे आश्रम में सफाई करनी थी। बहुत काम था इसलिए विलंब हो गया। आपको प्रतीक्षा करना पड़ी उसके लिए क्षमा करें।' 

यह सुनकर वह महिला बोली, 'अरे ! क्षमा कैसी? मैं तो इसलिए प्रतीक्षा कर रही थी कि रोज तुम रूखी सूखी रोटी लेकर जाते हो आज घर में मालपुआ बने थे तो मैंने सोच तुम जल्दी आ जाओगे तो गरम-गरम खाओगे। देखो मैंने तुम्हारे लिए गरम गरम मालपुआ कपड़े से  ढंककर रखे हैं ।'
 
मालपुए देखकर सुदामा का मन ललचा गया, अनायास ही वह कह गया, ' मालपुए, आज मालपुए बने हैं।' 

वह महिला बोली, ' हां, आज घर में पूर्णमासी की पूजा थी।' 

फिर वह तीनों को मालपुए देकर बोली, 'अब इसे जल्दी से खाओ। गरम-गरम खाने में आनंद आता है। 

ढाबे सुदामा गीत में बोल पड़ा भाभी जी जानते हो कि मैं तो मालपुए खाने ही वाला था कि तभी कान्हा बीच में बोल बैठा, ' नहीं, माता ! आपके प्रेम के लिए धन्यवाद। हम यहां नहीं खा सकते।' 

उस महिला ने पूछा, 'क्यूं ? '
तब श्रीकृष्ण बोले ' माता ! आश्रम का यही नियम हैं कि सारी भिक्षा गुरु चरणों में अर्पित कर दी जाए। फिर वह उसमें से जितना दें। वही हमें खाना चाहिए।' 

यह सुनकर मुझको अच्‍छा नहीं लगा। यह सुनकर उस महिला ने गुरु के लिए भी मालपुए का एक पैकेट दे दिया। अब हमारे पास चार पैकेट हो गए। और हम तीनों वहां से चले दिए। 

रास्ते में एक नदी के किनारे रुककर दाऊ और मैं हाथ मुंह धोने जाते हैं कि इसी दौरान मित्र सुदामा मालपुए निकालकर चुपचाप खाने लगा। 

मैं मित्र को मालपुए खाते हुए देख कर मुस्कुरा दिया और चुपचाप उसके पास पहुंचकर बोला, ' मैंने कुछ नहीं देखा?' 

तभी सुदामा ने पत्तल को मोड़कर पालपुए ढांक दिए और बोला, 'नहीं नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं खा रहा हूं।' 

' मित्र झूठ बोलना पाप है।' 
यह सुनकर सुदामा बोला, 'ब्राह्मण को भूखा रखना, जब वह परम मित्र भी हो पाप नहीं है।' 

यह सुनकर दाऊजी बोले, ' क्या ? हम तुम्हें भूखा रख रहे हैं?' 

इस पर सुदामा बोले, 'और नहीं तो क्या ?, उन माता जी ने कितनी ममता से कहा था कि मेरे सामने खालो और तुमने आश्रम के सारे नियम बता दिए।'
 
तब श्रीकृष्ण बोले, "नियम तो यही है। गुरुदेव को पता चलेगा तो वे क्या कहेंगे?' 

यह सुनकर सुदामा बोला, 'गुरुदेव को कैसे पता चलेगा? रोज हम तीन रोटी लेकर जाते हैं तो आज भी तीन रोटी लेकर जाएंगे। और हां यदि तुमने गुरुदेव को न बताया तो। '

यह सुनकर कृष्ण बोले, ' देखो मैं तुम्हारा मित्र हूं और मित्रता का धर्म कहता है कि मित्र की कमजोरी पर परदा डालना चाहिए।' 

यह सुनकर सुदामा बोला, ' सच कान्हा, तो तुम नहीं कहोगे?' 

श्रीकृष्ण  'कदापि नहीं।' 

'तो फिर सारे मालपुए खा लूं?' 

दाऊजी बोले, 'हां खा लो। एक ज्ञानवान ब्राह्मण को भूखा रखकर पाप का भागी थोड़े ही बनना है।' 

जानते हो भाभी जी, जब मैंने पेट भर खा लिया तो श्रीकृष्ण ने मालपुए कि एक पत्तल निकालकर सुदामा को देते हुए कहा, ' ये तुम्हारे हिस्से की भिक्षा हो गई। इसे गुरुमाता को दे देना।' 

यह देखकर सुदामा ने प्रसन्न होकर क्या कहा था जानते हो उसने कहा था, 'कुछ भी कहो, तुम दोनो मित्र बड़े खरे हो।'

बेताल ने फिर से कृष्ण के शब्दों को दोहराया, 'उन चनों के साथ मेरे भाग्य के भी चनें अकेले खाने के कारण मेरा मित्र अत्यंत गरीब और गरीब होता गया और मेरे ऐश्वर्य में तो दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती गई।'

विक्रम मेरी समझ में नहीं आया कि भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा को स्वर्ग और पृथ्वी का वैभव तो दे दिया लेकिन उन्होंने यह शब्द क्यों दोहराए।

 'उन चनों के साथ मेरे भाग्य के भी चनें अकेले खाने के कारण मेरा मित्र अत्यंत गरीब और गरीब होता गया और मेरे ऐश्वर्य में तो दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती गई।'

यह कहते हुए बेताल पुनः सोच में डूब गया और उत्तर की आशा में विक्रम के मुख की ओर देखने लगा। 

विक्रम मुस्कराया और इशारों में ही बेताल से कहा, 'क्यों प्रश्न पूछना चाहते हो? लेकिन मैं जवाब नहीं दूंगा ।' कहकर विक्रम आगे की तरफ चलता रहा। 

बेताल ने आश्चर्य से राजा के मुख को देखा और बोला, 'मैंने अपनी कहानी सुना दी अब मेरी चिंता दूर नहीं करेंगा। विक्रमादित्य हर बार की तरह आज फिर तुझसे सवाल करता हूं कि बता कि सुदामा के भाग्य में दिन दूनी रात चौगुनी गरीबी की वृद्धि हुई जबकि भगवान कृष्ण के भाग्य में दिन दूनी रात चौगुनी ऐश्वर्य की वृद्धि हुई क्यों?

सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बेताल को कंधे पर लादे आगे बढ़ता रहा। इस पर गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा। फिर तू मुझे उस धूर्त के पास कभी नहीं ले जा पाएगा।"

तब विक्रमादित्य ने जवाब देते हुए कहा, ' सुन, बेताल ! इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने जब पाया कि उसकी चने की पुटकी चोर उठा ले गये । गोपाल मुझ गरीब के घर आज छठवें दिन भी  भूखे रहेंगे तो उसे गुस्सा आ गया, उसी गुस्से में ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया कि... मुझ दीनहीन असहाय के चने मेरे गोपाल को भोग लगाए बिना जो कोई भी खायेगा, वह दरिद्र हो जायेगा .... दरिद्र हो जायेगा.... दरिद्र हो जायेगा।

बेताल तुम तो जानते ही हो कि गुरु माता सुदामा को पुटकी दे रही थी तो उस वक्त यह बात गुरु जी भी देख रहे थे। जब उन्होंने गुरु माता को रोकना चाहा तो कृष्ण बोले कि नियति तो होकर ही रहती है। इसमें हमें कुछ नहीं कर सकते। गुरु संदीपन इस बात को सुनकर रुक गए।

सुदामा, कृष्ण की इस बात पर ध्यान नहीं दे पाए क्योंकि उनके हाथ में चने की पुटकी थी और सुदामा जी जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे। ज्यों ही  चने की पुटकी को सुदामा जी ने हाथ में लिया त्यों ही उन्हे सारा रहस्य पता चल गया। 

अब सुदामा जी को यह पहले से पता हो चुका था कि जो भी गोपाल को भोग लगाए बिना इस पोटली के चने खाएगा वह दारूड़ गरीब हो जाएगा। लेकिन गुरु माता के दी हुई श्रापित पोटली को श्रद्धा के कारण फेंक भी ना सके। इस बीहड़ वन में गोपाल या उनकी प्रतिमा कहां मिलेगी जो उन्हें भोग लगाकर इसे श्राप मुक्त किया जा सके। अगर कृष्ण नीचे उतरे तो अवश्य इसका आधा भाग खा लेंगे। मजबूरन उन्हें भी इस श्राप को भोगना पड़ेगा। 

बेताल सुदामा की सोच तो इससे भी ज्यादा पढ़कर थी। सुदामा ने सोचा ! गुरु माता ने कहा है यह चने दोनों लोग बराबर बाँट के खाना। लेकिन ये चने अगर मैंने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो सारी सृष्टि दरिद्र हो जायेगी। नहीं-नहीं मैं ऐसा नही करुँगा। मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा ।

मैं ये चने स्वयं खा जाऊँगा लेकिन कृष्ण को नहीं खाने दूँगा। दोनों बारिश से बचने के लिए पास के दो अलग-अलग पेड़ों के ऊपर चढ़ गए क्योंकि ब्रह्मज्ञानी महात्मा और मन ही मन अपने मित्र श्री कृष्ण के भले के लिए यह विचार करके कि मैं गरीब हूं तो हूं लेकिन मेरा मित्र गरीब नहीं होना चाहिए। ऐसा सोच कर सुदामा ने वे दो मुट्ठी चने तीन मुट्ठी करके चुपचाप खा लिए।

चने खाकर दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं पर ले लिया। । लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चना नही दिया।

रुकमणी जिस श्राप में मैं भी साझेदार होने वाला था। एक ढाई अक्षर के शब्द मित्र में ढाई अक्षर के शब्द प्रेम के द्वारा मुझे चुप रहने के लिए विवश कर दिया। जो श्राप कान्हा को भी लगने वाला था। सुदामा ने उन श्रापित चानों को खाकर मुझे दरिद्रता के श्राप से बचा लिया। यह मित्रता नहीं तो और क्या है?

इसी श्राप के फलीभूत होने पर सुदामा जी अत्यंत गरीब हो गए और भगवान कृष्ण, उनके ऐश्वर्य में तो दिन-रात वृद्धि होती गई। रुकमणी अब सुदामा और उसके परिवार के दुख के दिन बीत चुके हैं अबे सुखी जीवन व्यतीत करें हमें ऐसी व्यवस्था करनी है।

विक्रम रुक गए और बेताल की तरफ देख कर बोले, 'बेताल ! एक मित्रता के कारण सुदामा के भाग्य में दिन दूनी रात चौगुनी गरीबी की वृद्धि हुई जबकि भगवान कृष्ण के भाग्य में दिन दूनी रात चौगुनी ऐश्वर्य की वृद्धि हुई। बेताल तुम ठहरे एक प्रेम तुम क्या जानो की मित्रता क्या होती है?' 

विक्रम का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन ! तुम बहुत बड़े ज्ञानी हो। बिल्कुल सही। तुमने एक एक बात को अच्छे से समझा दिया। पर कभी-कभी प्रोतों के साथ मित्रता भी बहुत लाभदायक होती है। जैसे कि तुम्हारी और मेरी तुम मुझे कितने प्रेमवस अपने कंधे पर बिठा कर लिये जा रहे हो। और मैं मस्त तुम्हारे कंधे पर यात्रा कर रहा हूं। परंतु ...." कहते हुए बेताल चौंक पड़ा।

"परंतु, राजन ! शर्त के मुताबिक आपको चुप रहना था। आपने मुंह खोल दिया, और अब मैं चला।” 

इतना कहकर बेताल तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटकने के लिए चल दिया। 

'बेताल तू अगर जिद्दी है, तो मैं भी वचनबद्ध हूं। तुझे लेकर ही जाऊंगा।' और विक्रम पुनः उसे पेड़ से उतारने के लिए श्मशान की ओर चल दिए।


लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
22/2/17/5/2022
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अब प्रातः काल सुदामा जी के अपने घर वापस लौटने का समय हो गया और वे अपने मित्र श्री कृष्ण से विदा लेकर चल पड़े किंतु भगवान कृष्ण ने उन्हें विदाई की के समय कुछ भी नहीं दिया।
किंतु सुदामा जी को इससे तनिक भी क्रोध नहीं हुआ और उन्होंने सोचा व्यक्ति थोड़ी से भी धन आ जाने पर घमंड करने लगता है और धन के लोभ के वशीभूत हो जाता है इसी से बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने मुझे कुछ भी नहीं दिया है।

वह बार-बार यही सोच रहे थे कि उन्होंने मेरे समान दरिद्र ब्राह्मण को अपने गले से लगा लिया जबकि वह रुकमणी देवी के अतिरिक्त किसी अन्य को अपने हृदय से नहीं लगाते।

मुझ जैसे दरिद्र पापी ब्राह्मण एवं भगवान के बीच क्या तुलना की जा सकती है जो भाग्य देवी के एकमात्र शरण हैं तथापि उन्होंने मुझे अपना मित्र मानकर अपने दोनों दिव्य भुजाओं से मेरा आलिंगन किया

श्री कृष्ण मेरे प्रति इतने उदार थे कि उन्होंने मुझे उसी शैया पर बैठने का अवसर दिया जिस पर स्वयं भाग्य देवी विश्राम करती हैं।
उन्होंने मुझे अपना वास्तविक भ्राता माना।
अपने प्रति मै उनके समर्पण की प्रशंसा किस प्रकार कर सकता हूं जब मैं थक गया था तब भाग्य देवी श्रीमती रुकमणी ने अपने हाथ से चामर पकड़कर मुझे हवा करने लगी।

उन्होंने श्रीकृष्ण की प्रथम पत्नी के रूप में अपनी श्रेष्ठ स्थिति का कभी ध्यान नहीं किया।
श्री कृष्णा ने पवित्र ब्राह्मणों के प्रति अपने आदर के कारण मेरी सेवा भी की पैरों की मालिश की तथा अपने हाथों से मुझे भोजन खिला कर एक तरह से मेरी उपासना की।

इस संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रत्येक प्राणी भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों की उपासना अपने सभी भौतिक ऐश्वर्य तथा रहस्य में योगिक सिद्धियों की कामना की पूर्ति के लिए करते हैं लेकिन फिर भी भगवान मेरे प्रति इतने दयालु थे कि उन्होंने मुझे कुछ नहीं दिया क्योंकि उन्हें पता था कि धन की प्राप्ति करने पर मैं खुश हो जाऊंगा और, पागल होकर अपना धर्म भूल जाऊंगा।

एक साधारण व्यक्ति की तरह से देखा जाए तो सुदामा जी का कथन बिल्कुल सत्य है कोई भी मनुष्य भगवान से भौतिक ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करता है और जब उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है तो वह तत्काल ही श्री भगवान के प्रति अपनी कृतज्ञता को भूल जाता है। यदि कोई भक्त निष्ठा पूर्वक भगवान की सेवा करता है और भौतिक ऐश्वर्य की कामना करता है तो भगवान उसे तभी सब कुछ देखते हैं जब वह इसमें लिप्त ना हो।

इस प्रकार विचार करके सुदामा धीरे-धीरे अपने निवास स्थान पर पहुंच गए किंतु वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि प्रत्येक वस्तु आश्चर्यजनक रूप से बदल चुकी है और उनकी कुटिया के स्थान पर भव्य महल खड़ा है, जिसमें अनेक बहुमूल्य रत्न लगे हुए हैं यह देखकर सुदामा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था और उन्होंने आसपास के लोगों से पूछना शुरू कि यहां पर मेरी कुटिया रहती थी यह था, वह था वह सब कहां गया।

महल के सेवकों को कुछ भी ना पता था कि यह व्यक्ति कौन है और कहां से आया है इसलिए उन्होंने इसकी खबर तुरंत ही सुदामा जी की पत्नी सुशीला को दी जो उस महल की मालकिन थी।
सेवकों ने कहा महारानी जी यहां कोई एक दरिद्र ब्राह्मण आया है और कह रहा है कि यहां पर मेरी कुटिया थी यहां पर हम ऐसा करते थे, वैसा करते थे यह सब कहां गया।

यह सब सुनकर सुशीला जी अत्यंत खुश हो गई और कहा वह कोई और नहीं बल्कि तुम्हारे महाराज ही हैं और तुम सब जल्दी से उनकी आने स्वागत की तैयारियां करो, तत्पश्चात वे स्वयं अपने हाथों में आरती की थाली लेकर सुदामा जी के सामने आए।

पहली बार अपनी पत्नी को गहनों से इतना लदा हुआ देखकर सुदामा जी की आंखें चौंधिया गई और वह समझ नहीं पा रहे थे कि यह कौन देवी है जो स्वयं स्वर्गीय देवियों की तरह दिख रही है सुदामा जी को देखते ही उनकी पत्नी ने उनके चरण पकड़ लिए और अपना परिचय दिया तब जाकर सुदामा जी को पता चला, यह कोई और नहीं बल्कि उनकी स्वयं की पत्नी सुशीला ही है।

इसके बाद सुशीला जी, सुदामा जी का हाथ पकड़कर महल के अंदर ले गई और उन्हें अपना निजी भवन दिखाया किंतु उस महल को देखते ही सुदामा जी एक तरफ से अपने परिवार के लिए खुश थे कि उन्हेंउन्हें अब गरीबी का सामना नहीं करना पड़ेगा लेकिन अंदर ही अंदर बहुत दुखी हो रहे थे कि यदि मैं इन सब में लिप्त हो गया तो भगवान के लिए तो समय ही नहीं निकाल पाऊंगा मैं भी आलसी, लोभी हो जाऊंगा।

वे सब कुछ समझ गए कि यह किसी और का नहीं बल्कि उनके मित्र श्री कृष्ण का ही सब किया धरा है और इसीलिए उन्होंने मुझे आते समय कुछ भी नहीं दिया कि मार्ग में मुझे परेशानी ना हो, अब सुदामा जी की आंखों से आंसू बहने लगे थे और वे दुखी मन से महल के बाहर निकल आए।

और कहने लगे हे भगवान मैं क्या करूंगा इन सब का मुझे तो इन भौतिक वस्तुओं और ऐश्वर्या की तनिक भी चाह नहीं है, मैं तो केवल आपकी भक्ति में ही खुश रहना चाहता हूं मैं इस बड़े महल में नहीं रहना चाहता। सुदामा जी की इस प्रेम पूर्ण भक्ति को देखकर स्वयं श्रीकृष्ण वहां प्रगट हो गए और कहा प्रिय सुदामा तुम तो मेरे सच्चे भक्त हो।

तुमने अपने जीवन में बहुत दरिद्रता, गरीबी देखी है किंतु अब मैं चाहता हूं कि तुम अब और बिल्कुल दुख ना सहो।
मेरी इच्छा है कि आज से जब तक तुम्हारा जीवन शेष है, तुम इस महल में निवास करो और मेरा यह वरदान है तुम्हें कि तुम कभी यहां मोह माया से लिप्त नहीं होगे और मृत्यु उपरांत तुम्हें परमधाम प्राप्त होगा।

सुदामा जी ने भगवान कृष्ण की इच्छा और आज्ञा का सम्मान किया और उन्हें प्रणाम करके वापस महल में चले गए किंतु महल की चकाचौंध ने उन्हें कभी प्रभावित नहीं किया।

यही है सच्ची मित्रता जो एक दूसरे को कभी भी संकट में नहीं देख सकते।

हरिओम नमो नारायणा।



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*🙏जय श्री राम ~ जय श्री कृष्णा🙏*
           
            

जिनका वध भगवान शिव ने किया, शास्त्रों की अचंभित करने वाली कहानी

गोकुलवासी श्री कृष्ण के मित्र ‘सुदामा’ अपनी मित्रता की वजह से शास्त्रों में जाने जाते हैं. शांत व सरल स्वभाव, कृष्ण के हृदय में अपनी एक अलग ही छवि बनाने वाले सुदामा को दुनिया मित्रता के प्रतिरूप के रूप में याद करती है, लेकिन इनका एक रूप ऐसा भी था जिसकी वजह से भगवान शिव ने उनका वध किया था. इस तथ्य पर विश्वास करना कठिन तो है परंतु यदि हम इतिहास के पन्ने पलटें तो यह सच उभर कर सामने आता है. तो ऐसा क्या किया था सुदामा ने जिस कारण भगवान शिव को विवश होकर उनका वध तक करना पड़ा?

सुदामा का पुनर्जन्म हुआ राक्षस शंखचूण के रूप में 

स्वर्ग के विशेष भाग गोलोक में सुदामा और विराजा निवास करते थे. विराजा को कृष्ण से प्रेम था किंतु सुदामा स्वयं विराजा को प्रेम करने लगे. एक बार जब विराजा और कृष्ण प्रेम में लीन थे तब स्वयं राधा जी वहां प्रकट हो गईं और उन्होंने विराजा को गोलोक से पृथ्वी पर निवास करने का श्राप दिया. इसके बाद किसी कारणवश राधा जी ने सुदामा को भी श्राप दे दिया जिससे उन्हें गोलोक से पृथ्वी पर आना पड़ा. मृत्यु के पश्चात सुदामा का जन्म राक्षसराज दम्भ के यहां शंखचूण के रूप में हुआ तथा विराजा का जन्म धर्मध्वज के यहां तुलसी के रूप में हुआ.

शंखचूण ने तीनों लोकों पर किया था राज
मां तुलसी से विवाह के पश्चात शंखचूण उनके साथ अपनी राजधानी वापस लौट आए. कहा जाता है कि शंखचूण को भगवान ब्रह्मा का वरदान प्राप्त था और उन्होंने शंखचूण की रक्षा के लिए उन्हें एक कवच दिया था और साथ ही यह भी कहा था कि जब तक तुलसी तुम पर विश्वास करेंगी तब तक तुम्हें कोई जीत नहीं पाएगा. और इसी कारण शंखचूण धीरे-धीरे कई युद्ध जीतते हुए तीनों लोकों के स्वामी बन गए.

शंखचूण के क्रूर अत्याचार से परेशान होकर देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से सुझाव की प्रार्थना की. ब्रह्मा जी द्वारा भगवान विष्णु से सलाह लेने की बात कहे जाने पर देवतागण विष्णु के पास गए. विष्णु ने उन्हें शिव जी से सलाह लेने को कहा. देवताओं की परेशानी को समझते हुए भगवान शिव ने उन्हें शंखचूण को मार कर उसके बुरे कर्मों से मुक्ति दिलाने का वचन दिया. लेकिन इससे पहले भगवान शिव ने शंखचूण को शांतिपूर्वक देवताओं को उनका राज्य वापस सौंपने का प्रस्ताव रखा परंतु हिंसावादी शंखचूण ने शिव को ही युद्ध लड़ने के लिए उत्तेजित किया.

और फिर किया शिव ने सुदामा का वध 

शंखचूण यानि कि सुदामा के पुनर्जन्म के रूप से युद्ध के प्रस्ताव के पश्चात भगवान शिव ने अपने पुत्रों कार्तिकेय व गणेश को युद्ध के मैदान में उतारा. इसके बाद भद्रकाली भी विशाल सेना के साथ युद्ध के मैदान में उतरीं. शंखचूण पर भगवान ब्रह्मा के वरदान के कारण उन्हें मारना काफी कठिन था तो अंत में भगवान विष्णु युद्ध के दौरान शंखचूण के सामने प्रकट हुए और उनसे उनका कवच मांगा जो उन्हें ब्रह्माजी ने दिया था. शंखचूण ने तुरंत ही कवच भगवान विष्णु को सौंप दिया.

तत्पश्चात मां पार्वती के कहने पर भगवान विष्णु ने कुछ ऐसा किया कि युद्ध का पूरा दृश्य ही बदल गया. वे शंखचूण के कवच को पहनकर उस अवतार में मां तुलसी के समक्ष उपस्थित हुए. उनके रूप को देखकर मां तुलसी उन्हें अपना पति मान बैठीं और बेहद प्रसन्नता से उनका आदर सत्कार किया. जिस कारण मां तुलसी का पातिव्रत्य खंडित हो गया. शंखचूण की शक्ति उनकी पत्नी के पातिव्रत्य पर स्थित थी किंतु इस घटना के पश्चात वह शक्ति निष्प्रभावी हो गई. वरदान की शक्ति के समापन पर भगवान शिव ने शंखचूण का वध कर देवताओं को उसके अत्याचार से मुक्त किया. तो इस प्रकार से सुदामा के पुनर्जन्म के अवतरण शंखचूण का विनाश भगवान शिव के हाथों संपन्न हुआ था.

तुलसी के श्राप से विष्णु बने शालिग्राम विष्णु द्वारा छले जाने पर तुलसी ने उन्हें पत्थर बन जाने का श्राप दिया. तुलसी के रूदन से प्रभावित भगवान विष्णु द्वारा भगवान शिव से मुक्ति की प्रार्थना की गई, तब शिव ने तुलसी को विष्णुप्रिया बनने का वरदान दिया तथा यह कहा कि जहां तुलसी की पूजा होगी वहीं पत्थर रूपी विष्णु की शालिग्राम के रूप में पूजा होगी. इसलिए आज भी तुलसी और शालिग्राम की एक साथ उपस्थिति और पूजा अनिवार्य रूप से प्रचलित है.




सुदामा ने एक बार श्रीकृष्ण ने पूछा कान्हा, मैं आपकी माया के दर्शन करना चाहता हूंकैसी होती है?” 
श्री कृष्ण ने टालना चाहा, लेकिन सुदामा की जिद पर श्री कृष्ण ने कहा,

“अच्छा, कभी वक्त आएगा तो बताऊंगा” और फिर एक दिन कहने लगे… सुदामा, आओ, गोमती में स्नानकरने चलें। दोनों गोमती के तट पर गए। वस्त्र उतारे। दोनों नदी में उतरे… श्रीकृष्ण स्नान करके तट पर लौट आए।

पीतांबर पहनने लगे… सुदामा ने देखा, कृष्ण तो तट पर चला गया है, मैं एक डुबकी और लगा लेता हूं… और जैसे ही सुदामा ने डुबकी लगाई… भगवान ने उसे अपनी माया का दर्शन कर दिया।

सुदामा को लगा, गोमती में बाढ़ आ गई है, वह बहे जा रहे हैं, सुदामा जैसे-तैसे तक घाट के किनारे रुके। घाट पर चढ़े। घूमने लगे। घूमते-घूमते गांव के पास आए। वहां एक हथिनी ने उनके गले में फूल माला पहनाई।

ऐसे दिखाई थी श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपनी माया 

सुदामा हैरान हुए। लोग इकट्ठे हो गए। लोगों ने कहा, “हमारे देश के राजा की मृत्यु हो गई है। हमारा नियम है, राजा की मृत्यु के बाद हथिनी, जिस भी व्यक्ति के गले में माला पहना दे, वही हमारा राजा होता है।

हथिनी ने आपके गले में माला पहनाई है, इसलिए अब आप हमारे राजा हैं। "सुदामा हैरान हुआ। राजा बन गया। एक राजकन्या के साथ उसका विवाह भी हो गया। दो पुत्र भी पैदा हो गए।

एक दिन सुदामा की पत्नी बीमार पड़ गई… आखिर मर गई… सुदामा दुख से रोने लगा… उसकी पत्नी जो मर गई थी, जिसे वह बहुत चाहता था, सुंदर थी, सुशील थी… लोग इकट्ठे हो गए… उन्होंने सुदामा को कहा, आप रोएं नहीं, आप हमारे राजा हैं… लेकिन रानी जहां गई है, वहीं आप को भी जाना है, यह मायापुरी का नियम है।

आपकी पत्नी को चिता में अग्नि दी जाएगी… आपको भी अपनी पत्नी की चिता में प्रवेश करना होगा… आपको भी अपनी पत्नी के साथ जाना होगा। सुना, तो सुदामा की सांस रुक गई… हाथ-पांव फुल गए… अब

मुझे भी मरना होगा… मेरी पत्नी की मौत हुई है, मेरी तो नहीं… भला मैं क्यों मरूं… यह कैसा नियम है? सुदामा अपनी पत्नी की मृत्यु को भूल गया… उसका रोना भी बंद हो गया।

ऐसे डूबे गए चिंता में 

अब वह स्वयं की चिंता में डूब गया… कहा भी, ‘भई, मैं तो मायापुरी का वासी नहीं हूं… मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता… मुझे क्यों जलना होगा।’ लोग नहीं माने, कहा, ‘अपनी पत्नी के साथ आपको भी चिता में जलना होगा… मरना होगा… यह यहां का नियम है।’

आखिर सुदामा ने कहा, ‘अच्छा भई, चिता में जलने से पहले मुझे स्नान तो कर लेने दो…’ लोग माने नहीं… फिर उन्होंने हथियारबंद लोगों की ड्यूटी लगा दी… सुदामा को स्नान करने दो… देखना कहीं भाग न जाए… रह-रह कर सुदामा रो उठता।

सुदामा इतना डर गया कि उसके हाथ-पैर कांपने लगे… वह नदी में उतरा… डुबकी लगाई… और फिर जैसे ही बाहर निकला… उसने देखा, मायानगरी कहीं भी नहीं, किनारे पर तो कृष्ण अभी अपना पीतांबर ही पहन रहे थे… और वह एक दुनिया घूम आया है।

मौत के मुंह से बचकर निकला है…सुदामा नदी से बाहर आया… सुदामा रोए जा रहा था। श्रीकृष्ण हैरान हुए… सबकुछ जानते थे… फिर भी अनजान बनते हुए पूछा, "सुदामा तुम रो क्यों रो रहे हो? " सुदामा ने कहा, "कृष्ण मैंने जो देखा है, वह सच था या यह जो मैं देख रहा हूं।"

श्रीकृष्ण मुस्कराए, कहा, “जो देखा, भोगा वह सच नहीं था। भ्रम था… स्वप्न था… माया थी मेरी और जो तुम अब मुझे देख रहे हो… यही सच है… मैं ही सच हूं…मेरे से भिन्न, जो भी है, वह मेरी माया ही है।

और जो मुझे ही सर्वत्र देखता है, महसूस करता है, उसे मेरी माया स्पर्श नहीं करती। माया स्वयं का विस्मरण है…माया अज्ञान है, माया परमात्मा से भिन्न… माया नर्तकी है… नाचती है… नचाती है…

लेकिन जो श्रीकृष्ण से जुड़ा है, वह नाचता नहीं… भ्रमित नहीं होता… माया से निर्लेप रहता है, वह जान जाता है, सुदामा भी जान गया था… जो जान गया वह श्रीकृष्ण से अलग कैसे रह सकता है!!! 



सुदामा के श्राप से बिछड़ गए थे राधा-कृष्ण, 100 साल तक विरह की ये थी वजह

आज भी ये सवाल लोगों को कचोटता है कि राधा और कृष्ण का प्रेम कभी शादी के बंधन में क्यों नहीं बंध पाया. जिस शिद्दत से कृष्ण और राधा ने एक दूसरे को चाहा, वो रिश्ता विवाह तक क्यों नहीं पहुंचा. क्यों संसार की सबसे बड़ी प्रेम कहानी विरह का गीत बनकर रह गई

.राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी सदियों बाद भी लोगों के दिलोदिमाग में ताजा है. एक ऐसा प्रेम जिसमें किसी ने कृष्ण भक्ति की राह देखी, तो किसी ने इस कहानी को विरह का गीत समझकर गुनगुनाया. कृष्ण और राधा का प्रेम जितना चंचल और निर्मल रहा, उतना ही जटिल और निर्मम भी. सदियों से भले ही कृष्ण के साथ राधा का नाम लिया जाता रहा है, लेकिन प्रेम की ये कहानी कभी पूरी नहीं हो पाई.

आज भी ये सवाल लोगों को कचोटता है कि राधा और कृष्ण का प्रेम कभी शादी के बंधन में क्यों नहीं बंध पाया. जिस शिद्दत से कृष्ण और राधा ने एक दूसरे को चाहा, वो रिश्ता विवाह तक क्यों नहीं पहुंचा. क्यों संसार की सबसे बड़ी प्रेम कहानी विरह का गीत बनकर रह गई. क्या वजह है कि राधा से सच्चे प्रेम के बावजूद कृष्ण ने रुकमणी को अपना जीवनसाथी चुना था. उनकी कुल 8 पत्नियों का जिक्र मिलता है, लेकिन उनमें राधा का नाम नहीं है. इतना ही नहीं कृष्ण के साथ तमाम पुराणों में राधा का नाम नहीं मिलता है.

भगवत गीता से महाभारत तक कहीं नहीं राधा का नाम
राधा का अंतिम समय कहां बीता और किन हालात में राधा ने जीवन के अंतिम क्षण बिताए. जिस राधा को कृष्ण की परछाई समझा जाता था, उसका क्या हुआ. ये सब एक रहस्य बन चुका है. राधा का नाम भगवत गीता से लेकर महाभारत तक कहीं नहीं मिलता. राधा के बिना जिस कृष्ण को अधूरा माना गया है, उनकी कथाओं में राधा का नाम तक नहीं है. इस रहस्य को समझने के लिए उनके धरती पर उतरने की वजहों को जानना होगा.

ऐसा कहा जाता है कि राधा धरती पर कृष्ण की इच्छा से ही आई थीं. भादो के महीने में शुक्ल पक्ष की अष्टमी के अनुराधा नक्षत्र में रावल गांव के एक मंदिर में राधा ने जन्म लिया था. यह दिन राधाष्टमी के नाम से मनाया जाता है. कहते हैं कि जन्म के 11 महीनों तक राधा ने अपनी आंखें नहीं खोली थी. कुछ दिन बाद वो बरसाने चली गईं. जहां पर आज भी राधा-रानी का महल मौजूद है.

राधा और कृष्ण की पहली मुलाकात भांडिरवन में हुई थी. नंद बाबा यहां गाय चराते हुए कान्हा को गोद में लेकर पहुंचे थे. कृष्ण की लीलाओं ने राधा के मन में ऐसी छाप छोड़ी कि राधा का तन-मन श्याम रंग में रंग गया. कृष्ण-राधा की नजरों से ओझल क्या होते, वो बेचैन हो जाती. वो राधा के लिए उस प्राण वायु की तरह थे जिसके बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल था.

सुदामा ने दिया था राधा को श्राप
कहते हैं कि राधा को कृष्ण से विरह का श्राप किसी और से नहीं बल्कि सुदामा से मिला था. वही सुदामा जो कृष्ण के सबसे प्रिय मित्र थे. सुदामा के इस श्राप के चलते ही 11 साल की उम्र में कृष्ण को वृन्दावन छोड़कर मथुरा जाना पड़ा था. श्रीकृष्ण और राधा गोलोक एकसाथ निवास करते थे. एक बार राधा की अनुपस्थिति में कृष्ण विरजा नामक की एक गोपिका से विहार कर रहे थे. तभी वहां राधा आ पहुंची और उन्होंने कृष्ण और विरजा को अपमानित किया.

इसके बाद राधा ने विरजा को धरती पर दरिद्र ब्राह्मण होकर दुख भोगने का श्राप दे दिया. वहां मौजूद सुदामा ये बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने उसी वक्त राधा को कृष्ण से बरसों तक विरह का श्राप दे दिया. 100 साल बाद जब वे लौटे तब बाल रूप में राधा कृष्ण ने यशोदा के घर में प्रवेश किया, वहां रहे और बाद में सबको मोक्ष देकर खुद भी गोलोक लौट गए.

श्रीकृष्ण ने क्यों नहीं किया राधा से विवाह?
कृष्ण की होकर भी उनकी न हो पाने का मलाल राधा को हमेशा रहा. अंतिम समय में जब राधा ने खुद को अपनी अर्धांगनी न बनाने का कारण कृष्ण पूछा तो कृष्ण वहां से बिना कुछ कहे चल पड़े. राधा क्रोधित हो गईं और चिल्लाकर ये सवाल दोबारा किया. राधा के क्रोध को देख कृष्ण मुड़े तो राधा भी हैरान रह गईं. कृष्ण राधा के रूप में थे. राधा समझ गईं कि वो भी कृष्ण ही हैं और कृष्ण ही राधा हैं. दोनों में कोई फर्क नहीं है. राधा कृष्ण की न होकर आज भी उनके साथ पूजनीय हैं. राधा-कृष्ण के प्रेम की ये कहानी अधूरी होकर भी अमर है.

क्या दो सुदामा थे?

श्रीमद्भागवत पुराण में श्रीकृष्ण और सुदामा का पूरी कथा का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इसी पुराण के अनुसार, सुदामा गरीब ब्राह्मण थे। सुदामा की पत्नी सुशीला अपने पति से कहतीं, 'आप अपने अमीर मित्र कृष्ण से कुछ धन ले आओ ताकि हम सुख पूर्वक रह सकें।' लेकिन जन्म से संतोषी स्वभाव के सुदामा किसी से कुछ नहीं मांगते थे। इस तरह वह दरिद्रता में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे।

तो क्या दो थे सुदामा

अंततः सुदामा, श्रीकृष्ण से द्वारिका में मिले और कृष्ण ने उनके परिवार को धन- धान्य से पूर्ण कर दिया था। श्रीमद्भागवत में उल्लेख में ही उल्लेखित है कि सुदामा नाम का एक और व्यक्ति था। वह मथुरा में रहता था।


तब कृष्ण तथा बलराम पहली बार मथुरा आए थे। वह वहां के सौंदर्य को देखकर काफी मोहित हो गए। उसी समय बलराम और कृष्ण सुदामा के घर गए। सुदामा से अनेक साज-सज्जा लेकर फूलों से उन्होंने साज-सज्जा की। और सुदामा को वर दिया, 'उसकी लक्ष्मी, बल, कीर्ति का हमेशा विकास होगा।'

वहीं सुदामा नाम का जिक्र सांदीपनी आश्रम के वर्णन में भी आता है, जहां बलराम-कृष्ण ने शिक्षा हासिल की थी। लेकिन श्रीकृष्ण के वास्तविक मित्र सांदीपनी आश्रम में मिले 'सुदामा' ही थे।

पांच पांडवों को साथ लेकर महाभारत के युद्ध में कोरवों को परास्त कर विजयश्री प्राप्त करने वाले भगवान श्रीकृष्ण को जगत गुरु की उपाधि उज्जैन में ही मिली थी। बात, 5 हजार वर्ष पुरानी है, जब भगवान श्रीकृष्ण, उनके सखा सुदामा और भाई बलराम ने सांदिपनी आश्रम ने शिक्षा ग्रहण की थी, यही नहीं, उनके गुरु महर्षि सांदिपनी श्रीकृष्ण की लगन और मेहनत से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें जगत गुरु की उपाधि दी। तभी से श्रीकृष्ण पहले जगत गुरु माने गए।

सांदिपनी आश्रम: तक्षशिला, नालंदा के बाद अवंति (उज्जैन) का सांदिपनी आश्रम

देश ही नहीं दुनिया में तक्षशिला, नालंदा को ही शिक्षा के पहले केंद्रों में माना गया है। इसी दौरान अवंति (उज्जैन) का सांदिपनी आश्रम भी हुआ, जहां भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण की। तीनों ने यहां गुरुकुल परंपरा के अनुसार विद्याअध्ययन कर्र 15 विद्या या 64 कलाएं सीखी थी।

अंकपात भी था प्रचलित नाम

सांदिपनी आश्रम को अंकपात भी कहा जाता था। माना जाता है कि भगवानकृष्ण यहां स्लेट पर लिखे अंक धोकर मिटाते थे। इसलिए इसका नाम अंकपात पड़ा। गोमीकुंड भी यहां की लोकप्रिय जगह है, माना जाता है कि 1 से 100 अंकों को एक पत्थर पर गुुरु सांदिपनी द्वारा ही अंकित किया गया था।


कृष्ण माने जाते हैं पहले जगतगुरु

भगवान कृष्ण, सुदामा और उनके भाई बलराम ने सांदिपनी आश्रम में शिक्षा ली थी। महर्षि सांदिपनी ने भगवान कृष्ण को जगत गुरु की उपाधि दी थी। यह बात लगभग 5 हजार वर्ष पुरानी है। इसके प्रमाण आज भी आश्रम में मौजूद हैं।-  


भगवान श्रीकृष्ण का ऐसा परिचय जिसे शायद आपने पहले कभी सूना या पढ़ा होगा । 3228 ई.पू., श्रीकृष्ण संवत् में श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, 21 जुलाई, बुधवार के दिन मथुरा में कंस के कारागार में माता देवकी के गर्भ से जन्म लिया, पिता- श्री वसुदेव जी थे । उसी दिन वासुदेव ने नन्द-यशोदा जी के घर गोकुल में छोड़ा ।


1- मात्र 6 दिन की उम्र में भाद्रपद कृष्ण की चतुर्दशी, 27 जुलाई, मंगलवार, षष्ठी-स्नान के दिन कंस की राक्षसी पूतना का वध कर दिया ।
2- 1 साल, 5 माह, 20 दिन की उम्र में माघ शुक्ल चतुर्दशी के दिन अन्नप्राशन- संस्कार हुआ ।
3- 1 साल की आयु त्रिणिवर्त का वध किया ।

4- 2 वर्ष की आयु में महर्षि गर्गाचार्य ने नामकरण-संस्कार किया ।

5- 2 वर्ष 6 माह की उम्र में यमलार्जुन (नलकूबर और मणिग्रीव) का उद्धार किया ।


6- 2 वर्ष, 10 माह की उम्र में गोकुल से वृन्दावन चले गये ।
7- 4 वर्ष की आयु में वत्सासुर और बकासुर नामक राक्षसों का वध किया ।
8- 5 वर्ष की आयु में अघासुर का वध किया ।
9- 5 साल की उम्र में ब्रह्माजी का गर्व-भंग किया ।
10- 5 वर्ष की आयु में कालिया नाग का मर्दन और दावाग्नि का पान किया


11- 5 वर्ष, 3 माह की आयु में गोपियों का चीर-हरण किया ।
12- 5 साल 8 माह की आयु में यज्ञ-पत्नियों पर कृपा की ।
13- 7 वर्ष, 2 माह, 7 दिन की आयु में गोवर्धन को अपनी उंगली पर धारण कर इन्द्र का घमंड भंग किया ।
14- 7 वर्ष, 2 माह, 14 दिन का उम्र में में श्रीकृष्ण का एक नाम ‘गोविन्द’ पड़ा ।
15- 7 वर्ष, 2 माह, 18 दिन की आयु में नन्दजी को वरुणलोक से छुड़ाकर लायें ।


16- 8 वर्ष, 1 माह, 21 दिन की आयु में गोपियों के साथ रासलीला की ।
17- 8 वर्ष, 6 माह, 5 दिन की आयु में सुदर्शन गन्धर्व का उद्धार किया ।
18- 8 वर्ष, 6 माह, 21 दिन की उम्र में शंखचूड़ दैत्य का वध किया ।
19- 9 वर्ष की आयु में अरिष्टासुर (वृषभासुर) और केशी दैत्य का वध करने से ‘केशव’ पड़ा ।
20- 10 वर्ष, 2 माह, 20 दिन की आयु में मथुरा नगरी में कंस का वध किया एवं कंस के पिता उग्रसेन को मथुरा के सिंहासन दोबारा बैठाया ।


21- 11 वर्ष की उम्र में अवन्तिका में सांदीपनी मुनि के गरुकुल में 126 दिनों में छः अंगों सहित संपूर्ण वेदों, गजशिक्षा, अश्वशिक्षा और धनुर्वेद (कुल 64 कलाओं) का ज्ञान प्राप्त किया, पञ्चजन दैत्य का वध एवं पाञ्चजन्य शंख को धारण किया ।
22- 12 वर्ष की आयु में उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार हुआ ।
23- 12 से 28 वर्ष की आयु तक मथुरा में जरासन्ध को 17 बार पराजित किया ।
24- 28 वर्ष की आयु में रत्नाकर (सिंधुसागर) पर द्वारका नगरी की स्थापना की एवं इसी उम्र में मथुरा में कालयवन की सेना का संहार किया ।


25- 29 से 37 वर्ष की आयु में रुक्मिणी- हरण, द्वारका में रुक्मिणी से विवाह, स्यमन्तक मणि - प्रकरण, जाम्बवती, सत्यभामा एवं कालिन्दी से विवाह, केकय देश की कन्या भद्रा से विवाह, मद्र देश की कन्या लक्ष्मणा से विवाह । इसी आयु में प्राग्ज्योतिषपुर में नरकासुर का वध, नरकासुर की कैद से 16 हजार 100 कन्याओं को मुक्तकर द्वारका भेजा, अमरावती में इन्द्र से अदिति के कुंडल प्राप्त किए, इन्द्रादि देवताओं को जीतकर पारिजात वृक्ष (कल्पवृक्ष) द्वारका लाए, नरकासुर से छुड़ायी गयी 16, 100 कन्याओं से द्वारका में विवाह, शोणितपुर में बाणासुर से युद्ध, उषा और अनिरुद्ध के साथ द्वारका लौटे. एवं पौण्ड्रक, काशीराज, उसके पुत्र सुदक्षिण और कृत्या का वध कर काशी दहन किया ।

shree krishna biography

26- 38 वर्ष 4 माह 17 दिन की आयु में द्रौपदी-स्वयंवर में पांचाल राज्य में उपस्थित हुए ।
27- 39 व 45 वर्ष की आयु में विश्वकर्मा के द्वारा पाण्डवों के लिए इन्द्रप्रस्थ का निर्माण करवाया ।
28- 71 वर्ष की आयु में सुभद्रा- हरण में अर्जुन की सहायता की ।
29- 73 वर्ष की उम्र में इन्द्रप्रस्थ में खाण्डव वन - दाह में अग्नि और अर्जुन की सहायता, मय दानव को सभाभवन-निर्माण के लिए आदेश भी दिया ।
30- 75 साल की उम्र में धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ के निमित्त इन्द्रप्रस्थ में आगमन हुआ ।


31- 75 वर्ष 2 माह 20 दिन की आयु में जरासन्ध के वध में भीम की सहायता की ।
32- 75 वर्ष 3 माह की आयु में जरासन्ध के कारागार से 20 ,800 राजाओं को मुक्त किया, मगध के सिंहासन पर जरासन्ध-पुत्र सहदेव का राज्याभिषेक किया ।

33- 75 वर्ष 6 माह 9 दिन की आयु में शिशुपाल का वध किया ।
35- 75 वर्ष 7 माह की आयु में द्वारका में शिशुपाल के भाई शाल्व का वध किया ।


36- 75 वर्ष 10 माह 24 दिन की उम्र में प्रथम द्यूत-क्रीड़ा में द्रौपदी (चीरहरण) की लाज बचाई ।
37- 75 वर्ष 11 माह की आयु में वन में पाण्डवों से भेंट, सुभद्रा और अभिमन्यु को साथ लेकर द्वारका प्रस्थान किया ।
38- 89 वर्ष 1 माह 17 दिन की आयु में अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह में बारात लेकर विराटनगर पहुँचे ।
39- 89 वर्ष 2 माह की उम्र में विराट की राजसभा में कौरवों के अत्याचारों और पाण्डवों के धर्म-व्यवहार का वर्णन करते हुए किसी सुयोग्य दूत को हस्तिनापुर भेजने का प्रस्ताव, द्रुपद को सौंपकर द्वारका-प्रस्थान, द्वारका में दुर्योधन और अर्जुन— दोनों की सहायता की स्वीकृति, अर्जुन का सारथी-कर्म स्वीकार करना किया ।
40- 89 वर्ष 2 माह 8 दिन की उम्र में पाण्डवों का सन्धि-प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर गयें ।


41- 89 वर्ष 3 माह 17 दिन की आयु में कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को ‘भगवद्गीता’ का उपदेश देने के बाद महाभारत-युद्ध में अर्जुन के सारथी बन युद्ध में पाण्डवों की अनेक प्रकार से सहायता की

42- 89 वर्ष 4 माह 8 दिन की उम्र में अश्वत्थामा को 3, 000 वर्षों तक जंगल में भटकने का श्राप दिया, एवं इसी उम्र में गान्धारी का श्राप स्वीकार किया ।
43- 89 वर्ष 7 माह 7 दिन की आयु में धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करवाया ।

44- 91-92 वर्ष की आयु में धर्मराज युधिष्ठिर के अश्वमेध-यज्ञ में सम्मिलित हुए ।
45- 125 वर्ष 4 माह की उम्र में द्वारका में यदुवंश कुल का विनाश हुआ, एवं 125 वर्ष 5 माह की उम्र में उद्धव जी को उपदेश दिया ।
46- 125 वर्ष 5 माह 21 दिन की आयु में दोपहर 2 बजकर 27 मिनट 30 सेकंड पर प्रभास क्षेत्र में स्वर्गारोहण और उसी के बाद कलियुग का प्रारम्भ हुआ ।


भगवान श्री कृष्ण ने जीवन में प्रत्येक व्यक्ति से कुछ न कुछ सिखा है। उन्होंने अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से कुछ लोगों को अपना गुरु माना और कुछ को बनाया था। ऋषि गर्गाचार्य उनके प्रथम गुरु थे। उन गुरुओं के कारण ही उन्हें अपार शक्ति मिली थी। आओ जानते हैं इसका राज।
 
 
1. सांदीपनी : भगवान श्रीकृष्ण के सबसे पहले गुरु सांदीपनी थे। उनका आश्रम अवंतिका (उज्जैन) में था। देवताओं के ऋषि को सांदीपनि कहा जाता है। वे भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा के गुरु थे। उन्हीं के आश्रम में श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा के साथ ही 64 कलाओं की शिक्षा ली थी। गुरु ने श्रीकृष्ण से दक्षिणा के रूप में अपने पुत्र को मांगा, जो शंखासुर राक्षस के कब्जे में था। भगवान ने उसे मुक्त कराकर गुरु को दक्षिणा भेंट की।
 
 
2. नेमिनाथ : कहते हैं कि उन्होंने जैन धर्म में 22वें तीर्थंकर नेमीनाथजी से भी ज्ञान ग्रहण किया था। नेमिनाथ का उल्लेख हिंदू और जैन पुराणों में स्पष्ट रूप से मिलता है। शौरपुरी (मथुरा) के यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ। अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वासुदेव से उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण। इस प्रकार नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे। आपकी माता का नाम शिवा था।

3. घोर अंगिरस : उनके तीसरे गुरु घोर अंगिरस थे। ऐसा कहा जाता है कि घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में दिया था जो गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है।
 
4. वेद व्यास : यह भी कहा जाता है कि उन्होंने महर्षि वेद व्यास से बहुत कुछ सिखा था। पांडु, धृतराष्ट्र और विदुर को वेद व्यास का ही पुत्र माना जाता है। वेद व्यास ही महाभारत के रचनाकार हैं और वे कई तरह की दिव्य शक्तिों से सम्पन्न थे।
 
 
5. परशुराम : पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और अंगराज कर्ण तीनों ही परशुराम के शिष्य थे। श्रीकृष्ण के पास कई प्रकार के दिव्यास्त्र थे। कहते हैं कि भगवान परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, तो दूसरी ओर वे पाशुपतास्त्र चलाना भी जानते थे। पाशुपतास्त्र शिव के बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास ही था। इसके अलावा उनके पास प्रस्वपास्त्र भी था, जो शिव, वसुगण, भीष्म के पास ही था। इसके अलावा उनके पास खुद की नारायणी सेना और नारायण अस्त्र भी था।
 
 
शक्ति का स्रोत
अंत में भगवान श्रीकृष्ण का भगवान होना ही उनकी शक्ति का स्रोत है। वे विष्णु के 10 अवतारों में से एक आठवें अवतार थे, जबकि 24 अवतारों में उनका नंबर 22वां था। उन्हें अपने अगले पिछले सभी जन्मों की याद थी। सभी अवतारों में उन्हें पूर्णावतार माना जाता है।
 
 
भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे। उनके पास सुदर्शन चक्र था। एक ओर वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे तो दूसरी ओर वे द्वंद्व युद्ध में भी माहिर थे। इसके अलावा उनके पास कई अस्त्र और शस्त्र थे। उनके धनुष का नाम 'सारंग' था। उनके खड्ग का नाम 'नंदक', गदा का नाम 'कौमौदकी' और शंख का नाम 'पांचजञ्य' था, जो गुलाबी रंग का था। श्रीकृष्ण के पास जो रथ था उसका नाम 'जैत्र' दूसरे का नाम 'गरुढ़ध्वज' था। उनके सारथी का नाम दारुक था और उनके अश्वों का नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक था। जय श्रीकृष्णा

सांदीपनि मुनिके माता का नाम पूर्णमासी था, जिनके गुरु नारद थे। देवी पूर्णमासीको नन्द महाराज आदर प्रदान करते थे और व्रजभूमीमे उनकी विशेष प्रतिष्ठा थी। सांदीपनि मुनिके पिताका नाम देवऋषि प्रबल है जो दिव्यज अग्निहोत्रके जनक थे। उनके चाचा देवप्रस्थ थे। उनके पितामह अर्थात दादाजी सुरंतदेव थे और पितामही श्रीमती चन्द्रकला थी। सांदीपनि मुनिके पत्नीका नाम श्रीमती सुमुखि देवी था। पुत्र मधुमंगल थे जो कृष्णके बालमित्र थे। बाल कृष्णकी बाललीलाओंमें इनका संबोधन कई बार मिलता है। उनका वर्ण नीला है, और उन्हें स्वादिष्ट भोजन बहुत पसंद है। उनकी रोचक हरकतोंसे वह गोपमित्रों और कृष्णको हमेशा आनंदी रखनेका प्रयास करते है। सांदीपनि मुनिके कन्याका नाम नन्दीमुखी है जो राधा तथा ललिताकी सखी है। सांदीपनि मुनि मूलतः काशीसे थे और अवंतीनगरीमे निवास करते थे।


मुनि वह व्यक्ति है जो आत्मनिरीक्षण करता है या जो विचारशील है। मूल रूप से, एक मुनि कुछ ऐसे दार्शनिक की तरह होता है जो इस बारे में सोचता है कि चीजें कैसे और क्यों होती हैं। ऋषि वह व्यक्ति है जिसे आमतौर पर उनके सैकड़ों वर्षों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है।

वेद महान ज्ञान के स्रोतों में प्रतिष्ठित हैं। वास्तव में, शब्द 'वेद' का अर्थ वास्तव में संस्कृत में "ज्ञान, ज्ञान" है, और यह मूल vid- से निकला है, जो "जानने के लिए" के रूप में अनुवादित होता है।

वेद एक महान संग्रह है, और किसी भी संग्रह के साथ, यह कई महान पुरुषों को संदर्भित करता है, जिसमें विभिन्न ऋषि और मुनि शामिल हैं। हालांकि, जो लोग ग्रंथों से गहन रूप से परिचित नहीं हैं, उन लोगों के इन दो समूहों के बीच अंतर करने में कठिन समय हो सकता है। ऋषि और मुनि कौन हैं? दोनों शीर्षकों के बीच क्या अंतर है?

तथ्य यह है कि लोगों के दो समूह काफी समान हैं। वास्तव में, वे परस्पर जुड़े हुए हैं। एक व्यक्ति को सबसे पहले मुनि बनना चाहिए, ऋषि बनने की दिशा में। इस संबंध में, यह कहा जा सकता है कि मुनि एक प्रकार का ऋषि है।मुनि वह व्यक्ति है जो आत्मनिरीक्षण करता है या जो विचारशील है। मूल रूप से, एक मुनि कुछ ऐसे दार्शनिक की तरह होता है जो इस बारे में सोचता है कि चीजें कैसे और क्यों होती हैं। परंपरागत रूप से एक मुनि के पास चीजों को देखने और देखने का एक गैर-पारंपरिक तरीका होना चाहिए।

दूसरी ओर एक ऋषि, कुछ हद तक साधु या संत के समान होता है। ऋषि वह व्यक्ति है जिसे आमतौर पर उनके सैकड़ों वर्षों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है। तप के माध्यम से, ऋषि आत्मज्ञान के लिए लक्ष्य बनाते हैं। कहानियों में, उन्हें अक्सर उन देवताओं द्वारा वरदान भी दिया जाता है जो उनके समर्पण और ध्यान से प्रभावित होते हैं या जिनके नाम पर वे तप कर रहे हैं।

मूल रूप से, ऋषि शब्द ने कवियों को संदर्भित किया, समय के साथ इस परिभाषा का अर्थ संतों से था। कहानी के अनुसार, जैसा कि ऋषियों ने ध्यान किया, उन्होंने अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त किया। यह वह ज्ञान है जो उन्होंने कविताओं के माध्यम से दुनिया के साथ संगठित और साझा किया। इन सभी कविताओं को फिर से मिलाकर वेद बनाया गया।

जैसा कि वेदों में वर्णित है, ऋषियों के चार अलग-अलग स्तर हैं:

राजऋषि वे ऋषि हैं जो एक बार 1000 वर्षों तक शासन करने वाले राजा थे, लेकिन फिर मानसिक रूप से अलग आध्यात्मिक जीवन की ओर मुड़ने के लिए अपनी प्रसिद्धि और धन का त्याग कर दिया।

देवऋषि नारद जैसे खगोलीय संत हैं जो भविष्य को देखने और विभिन्न लोकों या दुनियाओं की यात्रा करने की क्षमता रखते हैं। अपने ज्ञान को साझा करना और दूसरों की मदद करना उनका काम और कर्तव्य है।

महर्षि एक उन्नत ज्ञानी (ज्ञान के व्यक्ति) हैं, जिन्हें ब्रह्मऋषि की स्थिति तक पहुँचने की कमी है। यह प्राप्त करने के लिए एक अत्यंत कठिन स्थिति है, क्योंकि किसी को हजारों वर्षों के तपस की आवश्यकता होती है, और यह सभी आसानी से किसी भी धर्म के सरल कार्य द्वारा पूर्ववत कर सकते हैं जैसे क्रोध का दूसरा विभाजन या जुनून और भावनाओं पर नियंत्रण की कमी। इसका एक उदाहरण महान ऋषि विश्वामित्र होंगे, जो 3000 साल की तपस्या के बाद राजा से महर्षि के स्तर तक उठे।

ब्रह्मऋषि उच्चतम स्तर है जो ऋषि के रूप में पहुंच सकता है, और यह वह स्थिति है जिसके लिए प्रत्येक ऋषि का लक्ष्य होता है। एक ब्रह्मऋषि एक संत है, जो आध्यात्मिकता की उच्चतम स्थिति तक पहुंच गया है जिसे एक व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। यह कुछ हद तक आत्मज्ञान की अवधारणा के समान है। ब्रह्मऋषि के उदाहरणों में वशिष्ठ और विश्वामित्र शामिल हैं।

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सांदीपनि मुनिके माता का नाम पूर्णमासी था, जिनके गुरु नारद थे। देवी पूर्णमासीको नन्द महाराज आदर प्रदान करते थे और व्रजभूमीमे उनकी विशेष प्रतिष्ठा थी। सांदीपनि मुनिके पिताका नाम देवऋषि प्रबल है जो दिव्यज अग्निहोत्रके जनक थे। उनके चाचा देवप्रस्थ थे। उनके पितामह अर्थात दादाजी सुरंतदेव थे और पितामही श्रीमती चन्द्रकला थी। सांदीपनि मुनिके पत्नीका नाम श्रीमती सुमुखि देवी था। पुत्र मधुमंगल थे जो कृष्णके बालमित्र थे। बाल कृष्णकी बाललीलाओंमें इनका संबोधन कई बार मिलता है। उनका वर्ण नीला है, और उन्हें स्वादिष्ट भोजन बहुत पसंद है। उनकी रोचक हरकतोंसे वह गोपमित्रों और कृष्णको हमेशा आनंदी रखनेका प्रयास करते है। सांदीपनि मुनिके कन्याका नाम नन्दीमुखी है जो राधा तथा ललिताकी सखी है। सांदीपनि मुनि मूलतः काशीसे थे और अवंतीनगरीमे निवास करते थे।

"ऋषि दुर्वासा का नाम सुनते ही मन में श्राप का भय पैदा हो जाता है की कंही हमको कोई श्राप न दे दे उनका खौफ्फ़ तो देवो में भी रहता है तो हम तो साधारण इंसान है. जाने "

"दुर्वासा" नाम तो सुना ही होगा? इसका अर्थ है जिसके साथ न रहा जा सके, वैसे भी क्रोधी व्यक्ति से लोग दूर ही रहते है लेकिन दुर्वासा ऋषि के तो हजारो शिष्य थे जो साथ ही रहते थे. कब जन्मे कैसे पले बढ़े और अब कहा है दुर्वासा ऋषि ये तो आपको बिलकुल भी पता नहीं होगा.
सबसे पहले जाने दुर्वासा के जन्म और नामकरण की कथा, ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार एक बार शिव और पारवती में तीखी बहस हुई. गुस्से में आई पारवती ने शिव जी से कह दिया की आप का ये क्रोधी स्वा

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*ऋषि पराशर बहुत विद्वान और योग सिद्धि संपन्न प्रसिद्ध ऋषि थे। एक दिन वे यमुना पार करने के लिए नाव पर सवार हुए। वह नाव एक मछुआरे धीवर की पुत्री सत्यवती चला रही थी। ऋषि पराशर उसके रूप और यौवन को देखकर विचलित और व्याकुल हो उठे।

*ऋषि पराशर ने उस निषाद कन्या सत्यवती से प्यार करने की इच्छा जताई। सत्यवती ने कहा कि यह तो अनैतिक होगा। मैं किसी भी प्रकार के अनैतिक संबंध से संतान पैदा करने के लिए नहीं हुई हूं, लेकिन ऋषि पराशर नहीं माने और उससे प्रणय निवेदन करने लगे।

*तब सत्यवती ने ऋषि के सामने 3 शर्तें रखीं। पहली यह कि उन्हें ऐसा करते हुए कोई नहीं देखे। ऐसे में तुरंत ही ऋषि पाराशर ने एक कृत्रिम आवरण बना दि

Abhijeet Karkare की प्रोफाइल फ़ोटो

वाल्मीकि शब्द "वाल्मीक" से लिया गया है जिसका अर्थ है चींटियों का घर, इसका मतलब है कि वह इतने गहरे ध्यान में चले जातेथे कि चींटियों ने उसके चारों ओर अपना घर बना दिया। अगर वाल्मीकि इतने गहरे ध्यान में चले गए तो वे एक साधारण ऐतिहासिक पाठ क्यों लिखेंगे।

शंबुक की कहानी इस प्रकार है:

एक ब्राह्मण एक बार भगवान राम के दरबार में आता है। वह दावा करता है कि उसके आठ साल के बेटे की मृत्यु हो गई, वह इतनी कम उम्र में मर गया क्योंकि राम ने एक पाप किया है।

भगवान राम को आश्चर्य होता है और ऋषि वशिष्ठ को बुलाते हैं, वे भी यही बात कहते हैं। अब राम पाप को जानना चाहते हैं, इसलिए वशिष्ठ उन्हें बताते हैं कि उनके राज्य के


भगवान के गुरू होने का गौरव मिलना कोई साधारण बात तो नहीं! भगवान ने सांदिपानि ऋषि को अपना गुरू बनाया और उनके आश्रम में रहकर अध्ययन किया. आखिर सांदीपनि ऋषि ने ऐसा क्या पुण्य किया था? जिनके दर्शन, जिनसे शिक्षा लेने के लिए भगवान मथुरा से इतनी दूर उज्जियनी तक गए. भगवान ने सांदीपनि मुनि की गुरू रूप में पूजा की. संसार के समस्त ऐश्वर्य, धन-धान्य की स्वामिनी साक्षात् माता लक्ष्मी जिनकी चरण सेवा करती हैं उन भगवान ने सांदीपनि ऋषि की चरण सेवा की.

आपको सांदिपनी ऋषि के पूर्वजन्म के पुण्यों की कथा सुनाता हूं जिसके कारण मिला उन्हेंं यह सौभाग्य .

संचित पुण्यकर्म ही जीव के भावीजन्मों की गति तय करते हैं. सांदीपनि के पूर्वजन्म के कर्म ही कुछ ऐसे थे कि उसका ऋण चुकाने के लिए भगवान को उनका शिष्य बनना पड़ा. कथा सांदिपानि के बाल्यावस्था से शुरू होती है. किसी भी अन्य ब्राह्णण बालक की तरह सांदीपनि भी अपने गुरु के आश्रम में रहकर अध्ययन किया करते थे.

सांदीपनि तपोनिष्ठ शिष्य थे. अध्ययन के कार्यों को मनोयोग से पूर्ण करते थे. गुरू पर अखंड विश्वास था. उनका अद्भुत सेवाभाव देखकर गुरु भी चकित थे कि साधारण बालक ऐसा कर्मनिष्ठ कैसे हो सकता है.

गुरु को प्रतीत होता कि यह कोई साधारण बालक नहीं है. सभी विद्यार्थियों में सांदिपानि की गुरूभक्ति विशेष थी. गुरु ने सोचा कि इस बालक की परीक्षा लेकर देखा जाए तो सत्य प्रत्यक्ष हो कि आखिर यह है कौन!

परीक्षा लेने का उचित अवसर गुरु तलाश रहे थे. एक दिन वह अवसर मिला. आश्रम के अन्य विद्यार्थी बाहर गए हुए थे. गुरु का बालक वहीं खेल रहा था. जब गुरु ने देखा कि अन्य विद्यार्थी आश्रम की ओर चले आ रहे और बस आश्रम में प्रवेश करने को ही हैं तो उन्होंने सांदीपनि को पुकारा.

सांदीपनि गुरु सेवा में पहुंचे तो गुरू ने अपने पुत्र की ओर संकेत करते हुए कहा- सांदीपनि मेरे पुत्र को तत्काल कुएं में फेंक दो. यह मेरा आदेश है.

सांदिपानि ने गुरू के आदेश का पालन किया. बालक को उठाकर कुएं में डाल दिया. अन्य विद्यार्थी आश्रम में प्रवेश कर ही रहे थे. उन्होंने गुरुपुत्र को संकट में देखा तो दौड़ते-भागते आए.

कुएं का जल नजदीक ही था. तत्काल दो विद्यार्थी उसमें कूदे और अन्य साथियों की सहायता से बालक को सुरक्षित बाहर निकाल लाए. उसके बाद उन्होंने सांदिपानि को गुरूद्रोही समझकर खूब पिटाई की.


सांदिपानि आश्रम के संगियों की मार सहते रहे पर यह नहीं बताया कि ऐसा स्वयं गुरुजी का आदेश था. उन्हें लगा कहीं विद्यार्थी आवेश में गुरुदेव को कुछ न बोल पड़ें इसलिए मार सहते रहे. गुरुजी दूर से छिपकर यह सब देख रहे थे. कुछ देर में वह आए और विद्यार्थियों को यह कहकर रोका कि इसे मत मारो, यह मूर्ख तुम्हारा गुरुभाई है.

गुरूजी की परीक्षा अभी पूर्ण नहीं हुई थी.

एक दिन विद्यार्थी कहीं से आ रहे थे. उनको आते देखकर गुरुजी ने सांदिपानि से कहा- सांदीपनि आश्रम के इस छप्पर में आग लगा दो.

सांदिपानि ने चट आग लगा दी. छप्पर जलने लगा. विद्यार्थियों ने दौड़कर आग तो बुझा दी पर क्रोध से तमतमाए फिर सांदिपानि को मारने लगे. सांदिपानि कुछ बोले नहीं और चुपचाप मार सहते रहे.

गुरुजी को दया आ गई. उन्होंने विद्यार्थियों को रोका.

सांदिपानि गुरु की हर आज्ञा को अक्षरशः तुरंत पूरी करते थे. जब विद्याध्यन समाप्त हुआ, तब विद्यार्थी अपने अपने घर चले गए. उनमें से कुछ विख्यात पंडित बन गए. सांदिपानि भी अपने घर चले गए.

एक दिन गुरुजी बहुत बीमार पड गए. उनकी बीमारी का समाचार सुनकर सारे शिष्य उनके दर्शन के लिए आये. विद्यार्थियों ने गुरुजी की सेवा की. गुरु के शरीर छोड़ने का समय आया तो उन्होंने अपने शिष्यों को अपनी कुछ-कुछ वस्तुएं प्रदान कीं.

किसी को उन्होंने पंचपात्र दिया, किसी को आचमनी दे दी. किसी को अपना आसन दे दिया, किसी को माला दे दी. किसी को गोमुखी दे दी. इस प्रकार गुरुजी के पास जो भी संपत्ति शेष थी वह उन्होंने शिष्यों में बांटी.

शिष्यों ने भी उन वस्तुओं को बड़े आदर से लिया कि यह गुरूजी की प्रसादी है!

जब सांदिपानि गुरु के सामने आए तो गुरुजी चुप हो गए.

फिर बोले- पुत्र सांदीपनि! मैं तुमझे क्या दूँ? अब तो कोई वस्तु मेरे पास शेष है ही नहीं देने को. तुम्हारी जो गुरुभक्ति है, उसके समान मेरे पास कुछ नहीं है. मैं तुम्हें कुछ ऐसा प्रदान करता हूं जिसके लिए संसार लालायित रहता है.

गुरूदेव ने कहा- मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि पृथ्वी के कष्टों का उद्धार करने के लिए त्रिलोकीनाथ भगवान का शीघ्र ही अवतार होने वाला है. वह भगवान तुम्हारे शिष्य बनेंगे!

सांदिपनी के लिए इससे बड़ी भेंट, इससे बड़ा वरदान क्या होता! उन्होंने गुरूजी की अंत समय में भी बड़ी सेवा की. भगवान ने जब श्रीकृष्ण अवतार लिया तो ऋषिवर के दिए वरदान को फलीभूत करने वह मथुरा से उतनी दूर उज्जैन स्थित सांदिपनी ऋषि के आश्रम में बलरामजी के साथ आए और इनके शिष्य बने!

गुरु एवं श्रेष्ठ पुरूषों की सबसे बड़ी सेवा है. उनकी आज्ञा का पालन करना. गुरू की आज्ञा पालन करने से उनकी शक्ति हमारे अंदर आ जाती है. ईश्वर पहले देखते हैं कि गुरू कैसा है, फिर देखते हैं कि शिष्य गुरू की कसौटी पर खरा उतरा क्या! यदि हां तो वह ईश्वर का चहेता हो जाता है.





संदीपन  
संदीपन कृष्ण और बलराम को शिक्षा देते हुए

संदीपन परम तेजस्वी तथा सिद्ध ऋषि थे। श्रीकृष्ण ने कंस का वध करने के पश्चात् मथुरा का समस्त राज्य अपने नाना उग्रसेन को सौंप दिया था। इसके उपरांत वसुदेव और देवकी ने कृष्ण को यज्ञोपवीत संस्कार के लिए संदीपन ऋषि के आश्रम में भेज दिया, जहाँ उन्होंने चौंसठ दिनों में चौंसठ कलाएँ सीखीं। संदीपन ऋषि के आश्रम में ही कृष्ण और सुदामा की भेंट हुई थी, जो बाद में अटूट मित्रता बन गई।

  • संदीपन ऋषि द्वारा कृष्ण और बलराम ने अपनी शिक्षाएँ पूर्ण की थीं।
  • आश्रम में कृष्ण-बलराम और सुदामा ने एक साथ वेद-पुराण का अध्ययन प्राप्त किया था।
  • दीक्षा के उपरांत कृष्ण ने गुरुमाता को गुरु दक्षिणा देने की बात कही। इस पर गुरुमाता ने कृष्ण को अद्वितीय मान कर गुरु दक्षिणा में उनका पुत्र वापस माँगा, जो प्रभास क्षेत्र में जल में डूबकर मर गया था।
  • गुरुमाता की आज्ञा का पालन करते हुए कृष्ण ने समुद्र में मौजूद शंखासुर नामक एक राक्षस का पेट चीरकर एक शंख निकाला, जिसे "पांचजन्य" कहा जाता था। इसके बाद वे यमराज के पास गए और संदीपन ऋषि का पुत्र वापस लाकर गुरुमाता को सौंप दिया।

मुनि वह व्यक्ति है जो आत्मनिरीक्षण करता है या जो विचारशील है। मूल रूप से, एक मुनि कुछ ऐसे दार्शनिक की तरह होता है जो इस बारे में सोचता है कि चीजें कैसे और क्यों होती हैं। ऋषि वह व्यक्ति है जिसे आमतौर पर उनके सैकड़ों वर्षों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है।

वेद महान ज्ञान के स्रोतों में प्रतिष्ठित हैं। वास्तव में, शब्द 'वेद' का अर्थ वास्तव में संस्कृत में "ज्ञान, ज्ञान" है, और यह मूल vid- से निकला है, जो "जानने के लिए" के रूप में अनुवादित होता है।

वेद एक महान संग्रह है, और किसी भी संग्रह के साथ, यह कई महान पुरुषों को संदर्भित करता है, जिसमें विभिन्न ऋषि और मुनि शामिल हैं। हालांकि, जो लोग ग्रंथों से गहन रूप से परिचित नहीं हैं, उन लोगों के इन दो समूहों के बीच अंतर करने में कठिन समय हो सकता है। ऋषि और मुनि कौन हैं? दोनों शीर्षकों के बीच क्या अंतर है?

तथ्य यह है कि लोगों के दो समूह काफी समान हैं। वास्तव में, वे परस्पर जुड़े हुए हैं। एक व्यक्ति को सबसे पहले मुनि बनना चाहिए, ऋषि बनने की दिशा में। इस संबंध में, यह कहा जा सकता है कि मुनि एक प्रकार का ऋषि है।मुनि वह व्यक्ति है जो आत्मनिरीक्षण करता है या जो विचारशील है। मूल रूप से, एक मुनि कुछ ऐसे दार्शनिक की तरह होता है जो इस बारे में सोचता है कि चीजें कैसे और क्यों होती हैं। परंपरागत रूप से एक मुनि के पास चीजों को देखने और देखने का एक गैर-पारंपरिक तरीका होना चाहिए।

दूसरी ओर एक ऋषि, कुछ हद तक साधु या संत के समान होता है। ऋषि वह व्यक्ति है जिसे आमतौर पर उनके सैकड़ों वर्षों के तप या ध्यान के कारण सीखने और समझने के उच्च स्तर पर माना जाता है। तप के माध्यम से, ऋषि आत्मज्ञान के लिए लक्ष्य बनाते हैं। कहानियों में, उन्हें अक्सर उन देवताओं द्वारा वरदान भी दिया जाता है जो उनके समर्पण और ध्यान से प्रभावित होते हैं या जिनके नाम पर वे तप कर रहे हैं।

मूल रूप से, ऋषि शब्द ने कवियों को संदर्भित किया, समय के साथ इस परिभाषा का अर्थ संतों से था। कहानी के अनुसार, जैसा कि ऋषियों ने ध्यान किया, उन्होंने अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त किया। यह वह ज्ञान है जो उन्होंने कविताओं के माध्यम से दुनिया के साथ संगठित और साझा किया। इन सभी कविताओं को फिर से मिलाकर वेद बनाया गया।

जैसा कि वेदों में वर्णित है, ऋषियों के चार अलग-अलग स्तर हैं:

राजऋषि वे ऋषि हैं जो एक बार 1000 वर्षों तक शासन करने वाले राजा थे, लेकिन फिर मानसिक रूप से अलग आध्यात्मिक जीवन की ओर मुड़ने के लिए अपनी प्रसिद्धि और धन का त्याग कर दिया।

देवऋषि नारद जैसे खगोलीय संत हैं जो भविष्य को देखने और विभिन्न लोकों या दुनियाओं की यात्रा करने की क्षमता रखते हैं। अपने ज्ञान को साझा करना और दूसरों की मदद करना उनका काम और कर्तव्य है।

महर्षि एक उन्नत ज्ञानी (ज्ञान के व्यक्ति) हैं, जिन्हें ब्रह्मऋषि की स्थिति तक पहुँचने की कमी है। यह प्राप्त करने के लिए एक अत्यंत कठिन स्थिति है, क्योंकि किसी को हजारों वर्षों के तपस की आवश्यकता होती है, और यह सभी आसानी से किसी भी धर्म के सरल कार्य द्वारा पूर्ववत कर सकते हैं जैसे क्रोध का दूसरा विभाजन या जुनून और भावनाओं पर नियंत्रण की कमी। इसका एक उदाहरण महान ऋषि विश्वामित्र होंगे, जो 3000 साल की तपस्या के बाद राजा से महर्षि के स्तर तक उठे।

ब्रह्मऋषि उच्चतम स्तर है जो ऋषि के रूप में पहुंच सकता है, और यह वह स्थिति है जिसके लिए प्रत्येक ऋषि का लक्ष्य होता है। एक ब्रह्मऋषि एक संत है, जो आध्यात्मिकता की उच्चतम स्थिति तक पहुंच गया है जिसे एक व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। यह कुछ हद तक आत्मज्ञान की अवधारणा के समान है। ब्रह्मऋषि के उदाहरणों में वशिष्ठ और विश्वामित्र शामिल हैं।


वैदिक संस्कृत मे "त्रषि" शब्द का मूल क्रियापद "रष्टा" है. "संकलन" और "संपादन" दोनोँ शब्द "रष्टा" के अर्थ हो सकते हैं. हजारों "ऋषि" लोगों ने, हजारों साल तक भारतवर्ष के कोने कोने घूम कर विभिन्न विषयों के बारे मे जानकारी प्राप्त कर के, संकलित की. उन विषयों को संपादित कर के उन्होने, जिस ग्रन्थ को रचाया, उसी ग्रन्थ को हम "वेद" बुलाते हैं.

इसलिए "ऋषि" वह लोग हैं, जिन्होने वेदों का संकलन और संपादन कर के रचाये. वे अप्नी बुध्दि से अपना काम कर रहे थे.

"मुनि" शब्द का मूल "मौना", अर्थात कामोशी है. मुनि लोगों का लक्ष्य कामोश रह कर, तपस्या इत्यादि से, "आतमानुभव" प्राप्त करना था. उनका प्रमुख उपकरण उन्की अनुभूति है.

पुरानों के अनुसार विश्वामित्र, "गायत्री" जैसे मंत्रों को रचाकर पहले "ऋषि" बन गये. परन्तु उसके बाद, उन्को "मुनि" होने के लिये काफी समय लगा!

"ऋषि", "मुनि" भी हो सकते हैं. वैसे ही "मुनि" भी "ऋषि" हो सकते हैं. परन्तु यह आवश्यक नही है कि सब "त्रषि" "मुनि" हो या सब "मुनि" "ऋषि" हो!


आज भगवान श्रीकृष्ण के गुरु श्री सांदीपनि ऋषि जी की जयंती हैं।


सांदीपनि ऋषि परम तेजस्वी तथा सिद्ध ऋषि थे, सांदीपनि, का अर्थ ‘देवताओं के ऋषि’ होता है।


उज्जैन ऋषि सांदीपनि की तप स्थली रही, यहां महर्षि ने घोर तपस्या की थी।

इसी स्थान पर महर्षि सांदीपनि ने वेद, पुराण, शास्त्रादि की शिक्षा हेतु आश्रम का निर्माण करवाया था।


महाभारत, श्रीमद्भागवत, ब्रम्ह्पुराण, अग्निपुराण तथा ब्रम्हवैवर्तपुराण में सांदीपनि

आश्रम का उल्लेख मिलता है।


गुरु सांदीपनि अवन्ति के कश्यप गोत्र में जन्मे ब्राह्मण थे।

वे वेद, धनुर्वेद, शास्त्रों, कलाओं और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाण्ड विद्वान थे।


महर्षि सांदीपनि के गुरुकुल में वेद-वेदांतों और उपनिषदों सहित चौंसठ कलाओं की शिक्षा दी जाती थी।

साथ ही न्याय शास्त्र, राजनीति शास्त्र, धर्म

शास्त्र, नीति शास्त्र, अस्त्र-शस्त्र संचालन की शिक्षा भी दी जाती थी।

गुरुकुल में दूर-दूर से शिष्यगण शिक्षा प्राप्त करने आते थे।


सांदीपनि आश्रम में प्रवेश के पहले यज्ञोपवीत संस्कार करवाया जाता था एवं शिष्यों को आश्रम व्यवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना होता था।

आश्रम में प्रवेश के समय शिष्यों को गुरु को गोत्र के साथ पूरा परिचय देना होता था।


भगवान श्रीकृष्ण, उनके सखा सुदामा और बड़े भाई बलराम ने सांदिपनी ऋषि के आश्रम से शिक्षा ग्रहण की थी।


सांदिपनी ऋषि के आश्रम में श्रीकृष्ण ने पट्टी पर अंक लिखकर धोया था।

अंकों का पात होने से सांदिपनी आश्रम को अंकपात तीर्थ भी कहा जाता है।


गुरु महर्षि सांदिपनी श्रीकृष्ण की लगन और मेहनत से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें जगत गुरु की उपाधि दी, तभी से भगवान श्रीकृष्ण पहले जगत गुरु माने गए।


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्री कृष्ण लगभग ५५०० वर्ष पूर्व द्वापर युग में सांदीपनि आश्रम आये थे।

भगवान श्री कृष्ण ने ६४ दिनों के अल्प समय में सम्पूर्ण शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर ली थी। 


१८ दिनों में १८ पुराण, ४ दिनों में ४ वेद , ६ दिनों में ६ शास्त्र, १६ दिनों में १६ कलाएं, २० दिनों में गीता का ज्ञान, उसके साथ ही गुरु दक्षिणा और गुरु सेवा।


६४ दिनों में शिक्षा पूर्ण हो जाने के बाद महर्षि सांदीपनि ने श्रीकृष्ण से कहा,” मेरे पास जो भी ज्ञान था वो तो में आपको दे चुका हुं, आपकी शिक्षा पूर्ण होती है”।


फिर श्री कृष्ण के गुरु दक्षिणा देने की बात पर महर्षि बोले- “आप तो स्वयं प्रभु हैं, मैंने क्या दिया है आपको?"


तब गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह करने के लिए श्री कृष्ण ने कहा- “पर गुरुदेव गुरु दक्षिणा स्वरूप कुछ आदेश तो करना ही होगा”।


उत्तर स्वरुप महर्षि ने अपनी पत्नी सुषुश्रा को उनके बदले कुछ माँगने को कहा।


गुरु माँ ने गुरु दक्षिणा के रूप में अकाल मृत्यु को प्राप्त अपने पुत्र का जीवनदान माँगा।


सारी सृष्टि के रचयिता विष्णु रूपी भगवान श्री कृष्ण अपनी गुरुमाता के दुःख को कैसे देख सकते थे।

भगवान सीधे समुद्र किनारे पहुंचे जहाँ सांदीपनि का पुत्र पुनर्दत्त खोया था, भगवान ने समुद्र का आह्वान किया और सागर हाजिर हो गए।

भगवान ने सागर से सांदीपनि का पुत्र लौटने

कहा तो सागर ने बताया के मेरे गर्भ में एक दैत्य रहता है उसने ही गुरु सांदीपनि के पुत्र को निगल लिया है।

इस पर भगवान तुरंत समुद्रतल में उतर गए, वंहा उन्होंने पाञ्चजन्य नाम के राक्षस को मार दिया पर फिर भी गुरु पुत्र नहीं मिला।

इस पर भगवान यमपुरी पहुँच गए और यमराज से गुरु पुत्र की मांग की तो यमराज ने पहले अनजाने में युद्ध किया और समझ आने पर गुरु पुत्र लौटा दिया।

कृष्ण ने गुरुमाता को उनका खोया पुत्र सौंपा और अपनी गुरु दक्षिणा पूर्ण की।


मेरे मन में सुदामा के सम्बन्ध में एक बड़ी शंका थी कि एक विद्वान् ब्राह्मण अपने बाल सखा कृष्ण से छुपाकर चने कैसे खा सकता है? आज भागवत के इस प्रसंग  में छुपे रहस्य को आपसे साझा करना जरुरी समझता हूँ ताकि आप भी समाज में फैली इस भ्रान्ति को दूर कर सकें।

अभिशापित चने खाकर सुदामा ने स्वयं दरिद्रता ओढ़ ली लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को बचा लिया।

अद्वितीय त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करने वाले सुदामा,  चोरी-छुपे चने खाने का अपयश भी झेलें तो यह बहुत अन्याय है , परंतु मित्र धर्म निभाने का इससे बड़ा अप्रतिम उदाहरण नहीं मिल सकता। वास्तव में यही सच्चे मित्र की पहचान है यही सीख हमें इस प्रसंग से लेनी चाहिए..!!

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     🙏🏻  *जय श्री कृष्ण*🙏🏻

         🙏।। हरि ओम ।।🙏



आश्रम में जहां गुरू संदीपनि बैठते थे वहां उनकी प्रतिमा और चरण पादुकाएं स्थापित हैं.






आश्रम के पास एक पत्थर पर 1 से 100 तक गिनती लिखी है ओर ऐसा माना जाता है कि यह गिनती गुरु संदीपनी द्वारा लिखी गई थी। महर्षि सांदीपनि आश्रम शिप्रा नदी के गंगा घाट पर स्थित है। 

इस स्थान पर गोमती कुंड भी बना हुआ है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण ने गुरू सांदीपनि स्नान के लिए गोमती नदी का जल उपलब्ध कराया था। इसलिए इसका नाम गोमती कुंड पड़ गया। 

यहां पर गुरु संदीपनी के साथ ही कृष्ण, बलराम और सुदामा की मूर्तियां स्थापित हैं।


अंकपात क्षेत्र

कहा जाता है कि गुरु सांदीपनि से जो ज्ञान श्रीकृष्ण को मिलता था, वह उसे अपनी पाटी में लिखते थे और उसके याद हो जाने पर गोमती कुंड के जल से पाटी को धोते थे। इस कारण से उनकी पाटी से अंक गोमती कुंड में गिरते थे और इसीलिए यह इलाका अंकपात क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

आश्रम परिसर में स्थित श्री सर्वेश्वर महादेव मंदिर में 6000 वर्ष पुराना शिवलिंग स्थापित है। मान्यता है कि इसे महर्षि सांदीपनि ने बिल्व पत्र से इसे अपने तप से उत्पन्न किया था। इस शिवलिंग की जलाधारी में पत्थर के शेषनाग के दर्शन होते हैं, जो संभवतः पूरे देश में कहीं और देखने को नहीं मिलते हैं।

मंदिरों में नंदी की मूर्ति बैठी हुई अवस्था में ही होती है, लेकिन यहां के शिवलिंग के सामने खड़े हुए नंदी की दुर्लभ मूर्ति भी है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के आश्रम आने पर नंदी ने खड़े होकर उनका स्वागत किया था।



श्रीकृष्ण के गरीब सखा सुदामाजी की रोचक कहानी


भगवान श्रीकृष्ण के कई मित्र थे। जैसे 1. मधुमंगल 2. सुबाहु 3. सुबल 4. भद्र 5. सुभद्र 6. मणिभद्र 7. भोज 8. तोककृष्ण 9. वरूथप 10. श्रीदामा 11. सुदामा 12. मधुकंड 13. अर्जुन 14. विशाल 15. रसाल 16. मकरन्‍द 17. सदानन्द 18. चन्द्रहास 19. बकुल 20. शारद 21. बुद्धिप्रकाश आदि। आओ इन्हीं में से एक सुदामा के बारे में जानते हैं खास बातें।
 
 
1. उज्जैन (अवंतिका) में स्थित ऋषि सांदीपनि के आश्रम में बचपन में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम पढ़ते थे। वहां उनके कई मित्रों में से एक सुदामा भी थे। सुदामा श्रीकृष्‍ण के खास मित्र थे। वे एक गरीब ब्राह्मण के पुत्र थे। सुदामा और श्रीकृष्ण आश्रम से भिक्षा मांगने नगर में जाते थे। आश्रम में आकर भिक्षा गुरु मां के चरणों में रखने के बाद ही भोजन करते थे। परंतु सुदामा को बहुत भूख लगती थी तो वे चुपके से कई बार रास्ते में ही आधा भोजन चट कर जाते थे। 
 
2. एक बार गुरु मां ने सुदामा को चने देकर कहा कि इसमें से आधे चने श्रीकृष्‍ण को भी दे देना और तुम दोनों जाकर जंगल से लकड़ी बिन लाओ। फिर दोनों जंगल में लकड़ी बिनने चले गए। वहां बारिश होने लगी और तभी दोनों एक शेर को देखर कर वृक्ष पर चढ़ जाते हैं। ऊपर सुदामा और नीचे श्रीकृष्ण।  फिर सुदामा अपने पल्लू से चने निकालकर चने खाने लगता है। चने खाने की आवाज सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं, अरे ये कट-कट की आवाज कैसी आ रही है। कुछ खा रहे हो क्या? सुदामा कहता है नहीं, ये तो सर्दी के मारे मेरे दांत कट-कटा रहे हैं। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं अच्छा बहुत सर्दी लग रही है क्या? सुदामा कहता है हां। यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि मुझे भी बहुत सर्दी लग रही है। सुना है कि कुछ खाने से शरीर में गर्मी आ जाती है तो लाओ वो चने जो गुरुमाता ने हमें दिए थे। दोनों बांटकर खा लेते हैं। 

यह सुनकर सुदामा कहता है चने कहां हैं? वो तो पेड़ पर चढ़ते समय ही मेरे पल्लू से नीचे किचड़ में गिर गए थे। यह सुनकर श्रीकृष्ण समझ जाते हैं और कहते हैं ओह! यह तो बहुत बुरा हुआ। यह सुनकर नीचे की डाल पर बैठे भगवान श्रीकृष्ण अपने चमत्कार से हाथों में चने ले जाते हैं और ऊपर चढ़कर सुदामा को देकर कहते हैं कि पेड़ पर फल तो नहीं लेकिन मेरे पास ये चने हैं। सुदाम कहते हैं यह तुम्हारे पास कहां से आए? तब कृष्ण कहते हैं कि वह मुझे भूख कम लगती है ना। जब पिछली बार गुरुमाता ने जो चने दिए थे वह अब तक मेरी अंटी में बंधे हुए थे। ले लो अब जल्दी से खालो। यह सुनकर सुदामा कहता है नहीं नहीं, मैं इसे नहीं ले सकता। तब श्रीकृष्ण पूछते हैं क्यों नहीं ले सकते? सुदामा रोते हुए कहता है कि क्योंकि मैं इसका अधिकारी नहीं हूं और मैं तुम्हारी मित्रता का भी अधिकारी नहीं हूं। मैंने तुम्हें धोखा दिया है कृष्ण। मुझे क्षमा कर दो। कृष्ण कहते हैं अरे! जिसे मित्र कहते हो उससे क्षमा मांगकर उसे लज्जित न करो मित्र।... इसी प्रकार एक बार श्रीकृष्‍ण सुदामा को वचन देते हैं कि मित्र जब भी तुम संकट में खुद को पाए तो मुझे याद करना मैं अपनी मित्रता जरूर निभाऊंगा।

3. बलराम और श्रीकृष्ण को आश्रम में भिन्न-भिन्न कार्य करते थे। एक बार श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा भिक्षा मांगने के लिए जाते हैं। एक द्वार पर खड़े होकर तीनों भिक्षाम्देही कहते हैं तो एक महिला अपनी बेटी के साथ भिक्षा लेकर बाहर आती है और कहती हैं ब्रह्मचारियों आज आने में बहुत देर कर दी? यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं माता आज सारे आश्रम में सफाई करनी थी। बहुत काम था इसलिए विलंब हो गया। आपको प्रतीक्षा करना पड़ी उसके लिए क्षमा करें। यह सुनकर वह महिला कहती हैं अरे क्षमा कैसी। मैं तो इसलिए प्रतीक्षा कर रही थी कि रोज तुम रूखी सूखी रोटी लेकर जाते हो आज घर में मालपुआ बने थे तो मैंने सोच तुम जल्दी आ जाओगे तो गरम-गरम खाओगे। देखो मैंने कपड़े से ढंककर मालपुआ गरम गरम रखे हैं तुम्हारे लिए।
 
यह देखकर सुदामा का मन ललचा जाता है। वह कहता है मालपुआ, आज मालपुए बने हैं। वह महिला कहती हैं हां आज घर में पूरणमासी की पूजा थी। फिर वह तीनों को मालपुए देकर कहती है अब इसे जल्दी से खाओ। गरम-गरम खाने में आनंद आता है। सुदामा तो खाने ही वाला रहता है कि तभी श्रीकृष्ण कहते हैं नहीं माता, हम यहां नहीं खा सकते। वह महिला पूछती हैं क्यूं? तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि आश्रम का यही नियम हैं कि सारी भिक्षा गुरु चरणों में अर्पित कर दी जाए। फिर वह उसमें से जितना दें वही हमें खाना चाहिए। यह सुनकर सुदामा को अच्‍छा नहीं लगता है। यह सुनकर वह महिला गुरु के लिए भी मालपुए का एक पैकेट दे देती हैं। अब उन तीनों के पासे चार पैकेट हो जाते हैं।
 
फिर तीनों वहां से चले जाते हैं। रास्ते में एक नदी के किनारे रुककर बलराम और श्रीकृष्ण हाथ मुंह धोने जाते हैं इसी दौरान सुदामा मालपुए निकालकर चुपचाप खाने लगता है। तभी श्रीकृष्ण उसे मालपुए खाते हुए देख लेते हैं और मुस्कुरा देते हैं। फिर वह चुपचाप उनके पास पहुंचकर कहते हैं तुम समझते हो कि मैंने कुछ नहीं देखा? तभी सुदामा पत्तल को मोड़कर पालपुए ढांक देता है और कहता है नहीं नहीं, मैं तो कुछ भी नहीं खा रहा हूं। तब श्रीकृष्ण कहते हैं देखो झूठ बोलना पाप है। यह सुनकर सुदामा कहता है और ब्राह्मण को भूखा रखना भी पाप है। यह सुनकर कृष्ण कहते हैं मैं तुम्हें भूखा रख रहा हूं? तब सुदामा कहते हैं और क्या, उसने कितनी ममता से कहा था कि मेरे सामने खालो और तुमने आश्रम के सारे नियम बता दिए।
 
तब श्रीकृष्ण कहते हैं नियम तो है। गुरुदेव को पता चलेगा तो वे क्या कहेंगे? यह सुनकर सुदामा कहता है गुरुदेव को कैसे पता चलेगा? रोज हम तीन रोटी लेकर जाते हैं तो आज भी तीन रोटी लेकर जाएंगे। हां यदि तुमने गुरुदेव को न बता दिया तो। यह सुनकर कृष्ण कहते हैं कि देखो मैं तुम्हारा मित्र हूं और मित्रता का धर्म कहता है कि मित्र की कमजोरी पर परदा डालना चाहिए। यह सुनकर सुदामा कहता है तो तुम नहीं कहोगे? श्रीकृष्ण कहते हैं कदापि नहीं। यह सुनकर सुदामा कहता है तो फिर सारे मालपुए खा लूं? श्रीकृष्ण कहते हैं हां खा लो। फिर सुदामा खा लेता है तो श्रीकृष्ण मालपुए कि एक पत्तल निकालकर सुदामा को देते हैं और कहते हैं ये तुम्हारे हिस्से की भिक्षा हो गई। गुरुमाता को दे देना। यह देखकर सुदामा प्रसन्न होकर कहता है कुछ भी कहो, तुम मित्र बड़े खरे हो।
 
4. कहते हैं कि सुदामा जी शिक्षा और दीक्षा के बाद अपने ग्राम अस्मावतीपुर (वर्तमान पोरबन्दर) में भिक्षा मांगकर अपना जीवनयापन करते थे। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी सुशीला और बच्चों को बताते रहते थे कि मेरे मित्र द्वारिका के राजा श्रीकृष्ण है जो बहुत ही उदार और परोपकारी हैं। यह सुनकर एक दिन उनकी पत्नी ने डरते हुए उनसे कहा कि यदि आपने मित्र साक्षात लक्ष्मीपति हैं और उदार हैं तो आप क्यों नहीं उनके पास जाते हैं। वे निश्‍चित ही आपको प्रचूर धन देंगे जिससे हमारी कष्टमय गृहस्थी में थोड़ा बहुत तो सुख आ जाएगा। सुदामा संकोचवश पहले तो बहुत मना करते रहे लेकिन पत्नी के आग्रह पर एक दिन वे कई दिनों की यात्रा करके द्वारिका पहुंच गए। 
 
5. द्वारिका में द्वारपाल ने उन्हें रोका। मात्र एक ही फटे हुए वस्त्र को लपेट गरीब ब्राह्मण जानकर द्वारपाल ने उसे प्रणाम कर यहां आने का आशय पूछा। जब सुदामा ने द्वारपाल को बताया कि मैं श्रीकृष्ण को मित्र हूं दो द्वारपाल को आश्चर्य हुआ। फिर भी उसने नियमानुसर सुमादाजी को वहीं ठहरने का कहा और खुद महल में गया और श्रीकृष्ण से कहा, हे प्रभु को फटेहाल दीन और दुर्बल ब्राह्मण आपसे मिलना चाहता है जो आपको अपना मित्र बताकर अपना नाम सुदामा बतलाता है। 
 
6. द्वारपाल के मुख से सुदामा नाम सुनकर प्रभु सुध बुध खोकर नंगे पैर ही द्वार की ओर दौड़ पड़े। उन्होंने सुदामा को देखते ही अपने हृदय से लगा लिया और प्रभु की आंखों से आंसू निकल पड़े। वे सुदामा को आदरपूर्वक अपने महल में ले गए। महल में ले जाकर उन्हें सुंदर से आस पर बिठाया और रुक्मिणी संग उनके पैर धोये। कहते हैं कि प्रभु को उनके चरण धोने के जल की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। उनकी दीनता और दुर्बलता देखकर उनकी आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी।
 
स्नान, भोजन आदि के बाद सुदामा को पलंग पर बिठाकर श्रीकृष्ण उनकी चरणसेवा करने लगे और गुरुकुल में बिताए दिनों की बातें करने लगे। बातों ही बातों में यह प्रसंग भी आया कि किस तरह दोनों मित्र वन में समिधा लेने गए थे और रास्ते में मूसलधार वर्षा होने लगी तो दोनों मित्रों एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गए। सुदामा के पास एक पोटली में दोनों के खाने के लिए गुरुमाता के दिए कुछ चने थे। किंतु वृक्ष पर सुदामा अकेले ही चने खाने लगे। चने खाने की आवाज सुनकर श्रीकृष्ण ने पूता कि क्या खा रहे हैं सखा? सुदामा ने यह सोचकर झूठ बोल दिया कि कुछ चने कृष्ण को भी देने पड़ेंगे। उन्होंने कहा, कुछ खा नहीं रहा हूं। यह तो ठंड के मारे मेरे दांत कड़कड़ा रहे हैं।
 
7. इस प्रसंग के दौरान ही श्रीकृष्ण ने पूछा, भाभी ने मेरे लिए कुछ तो भेजा होगा? सुदामा संकोचवश एक पोटली छिपा रहे थे। भगवान मन में हंसते हैं कि उस दिन चने छिपाए थे और आज तन्दुल छिपा रहा है। फिर भगवान ने सोचा कि जो मुझे कुछ नहीं देता मैं भी उससे कुछ नहीं देता लेकिन मेरा भक्त है तो अब इससे छीनना ही पड़ेगा। तब उन्होंने तन्दुल की पोटली छीन ली और सुदामा के प्रारब्ध कर्मों को क्षीण करने के हेतु तन्दुल को बेहद चाव से खाया था। फिर सुदामा ने अपने परिवार आदि के बारे में तो बताया लेकिन अपनी दरिद्रा के बारे में कुछ नहीं बताया। अंत में प्रभु ने सुदामा को सुंदर शय्या पर सुलाया। 
 
8. फिर दूसरे दिन भरपेट भोजन कराने के बाद सुदामा को विदाई दी। किंतु विदाई के दौरान उन्हें कुछ भी नहीं दिया। रास्तेभर सुदामा सोचते रहे कि हो सकता है कि उन्हें इसी कारण से धन नहीं दिया गया होगा कि कहीं उनमें अहंकार न आ जाए। यह विचार करते करते सुदाम अपने मन को समझाते हुए जब घर पहुंचे तो देखा, उनकी कुटिया के स्थान पर एक भव्य महल खड़ा है और उनकी पत्नी स्वर्णाभूषणों से लदी हुई तथा सेविकाओं से घिरी हुई हैं। यह दृश्य देखकर सुदामा की आंखों से आंसू निकल आया और वे सदा के लिए श्री कृष्ण की कृपा से अभिभूत होकर उनकी भक्ति में लग गए। जय श्रीकृष्णा।

सार

 सुदामा   चरित    के   पदों   में   नरोत्तम   दास   जी   ने   श्री   कृष्ण   और   सुदामा   के   मिलन ,  सुदामा   की   दीन   अवस्था      कृष्ण   की   उदारता   का   वर्णन   किया   है।   सुदामा   जी   बहुत   दिनों   के   बाद   द्वारिका   आए।   कृष्ण   से   मिलने   के   लिए   कारण   था ,  उनकी   पत्नी   के   द्वारा   उन्हें   जबरदस्ती   भेजा   जाना।   उनकी   अपनी   कोई   इच्छा   नहीं   थी।   बहुत   दिनों   के   बाद   दो   मित्रों   का   मिलना   और   सुदामा   की   दीन   अवस्था   और   कृष्ण   की   उदारता   का   वर्णन   भी   किया   गया   है।   किस   तरह   से   उन्होंने   मित्रता   धर्म   निभाते   हुए   सुदामा   के   लिए   उदारता   दिखाई ,  वह   सब   किया   जो   एक   मित्र   को   करना   चाहिए।   साथ   ही   में   उन्होंने   श्री   कृष्ण   और   सुदामा   की   आपस   की   नोक - झोक   का   बड़ी   ही   कुशलता   से   वर्णन   किया   है।   इसमें   उन्होंने   यह   भी   दर्शाया   है   कि   श्री   कृष्ण   कैसे   अपने   मित्रता   धर्म   का   पालन   बिना   सुदामा   के   कहे   हुए   उनके   मन   की   बात   जानकर   कर   देते   हैं।   मित्र   का   यह   सबसे   प्रथम   कर्तव्य   रहता   है   कि   वह   अपनी   मित्र   के   बिना   कहे   उसके   मन   की   बात   और   उसकी   अवस्था   को   जान   ले   और   उसके   लिए   कुछ   करें   और   उदारता   दिखाऐं   यही   उसकी   महानता   है।










आओ सुनाऊँ तुमको कहानी कृष्ण सुदामा की, राजा रंक की दोस्ती, झोपड़ी-वसुधा अभिराम की ! सीखने को विद्या थे गुरु आश्रम मेँ दोनों बच्चे, सदा साथ साथ रहते थे, तन मन के थे सच्चे 

नरोतम दास की मार्मिक कविता - "कृष्ण-सुदामा" की जब बहुत बरसों उपरांत सुदामा जी अपने मित्र कृष्ण जी से मिलने द्वारका गए ! वे प्रवेश द्वार पर द्वारपाल से भगवान कृष्ण से मिलने की इच्छा बताते हैं, द्वारपाल कृष्ण जी से सुदामा का परिचय इन मार्मिक पंक्तियों से देते हैं" ! "शीश पगा न झगा तन मेँ, प्रभु जाने को आए बसे केही ग्रामा, धोती फटी सी लट्टी दुपट्टी और पाँव उपानऊ की नहीं सामा ! द्वार खड़ो द्वीज दुर्बल एक, रहिओ चकिसी वसुधा अभिरामा, पूछत दीन दयाल को धाम बटावत आफ्नो नाम सुदामा " !

विप्र सुदामा बसत हैं, सदा आपने धाम। भीख माँगि भोजन करैं, हिये जपत हरि-नाम॥३॥

ताकी घरनी पतिव्रता, गहै वेद की रीति। सलज सुशील सुबुद्धि अति, पति सेवा सौं प्रीति॥४॥

कह्यौ सुदामा एक दिन, कृस्न हमारे मित्र। करत रहति उपदेस गुरु, ऐसो परम विचित्र॥५॥


(सुदामा की पत्नी) लोचन-कमल, दुख मोचन, तिलक भाल, स्रवननि कुंडल, मुकुट धरे माथ हैं। ओढ़े पीत बसन, गरे में बैजयंती माल, संख-चक्र-गदा और पद्म लिये हाथ हैं। विद्व नरोत्तम संदीपनि गुरु के पास, तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं। द्वारिका के गये हरि दारिद हरैंगे पिय, द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं॥८॥


(सुदामा) सिच्छक हौं, सिगरे जग को तिय, ताको कहाँ अब देति है सिच्छा। जे तप कै परलोक सुधारत, संपति की तिनके नहि इच्छा॥ मेरे हिये हरि के पद-पंकज, बार हजार लै देखि परिच्छा। औरन को धन चाहिये बावरि, ब्राह्मन को धन केवल भिच्छा॥९॥


(सुदामा की पत्नी) कोदों, सवाँ जुरितो भरि पेट, तौ चाहति ना दधि दूध मठौती। सीत बितीतत जौ सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती॥ जो जनती न हितू हरि सों तुम्हें, काहे को द्वारिका पेलि पठौती। या घर ते न गयौ कबहूँ पिय, टूटो तवा अरु फूटी कठौती॥१०॥


(सुदामा) छाँड़ि सबै जक तोहि लगी बक, आठहु जाम यहै झक ठानी। जातहि दैहैं, लदाय लढ़ा भरि, लैहैं लदाय यहै जिय जानी॥ पाँउ कहाँ ते अटारि अटा, जिनको विधि दीन्हि है टूटि सी छानी। जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तौ, काहु पै मेटि न जात अयानी॥१३॥


(सुदामा की पत्नी) विप्र के भगत हरि जगत विदित बंधु, लेत सब ही की सुधि ऐसे महादानि हैं। पढ़े एक चटसार कही तुम कैयो बार, लोचन अपार वै तुम्हैं न पहिचानि हैं। एक दीनबंधु कृपासिंधु फेरि गुरुबंधु, तुम सम कौन दीन जाकौ जिय जानि हैं। नाम लेते चौगुनी, गये तें द्वार सौगुनी सो, देखत सहस्त्र गुनी प्रीति प्रभु मानि हैं॥२०॥

(सुदामा) द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै झक तेरे। जौ न कहौ करिये तो बड़ौ दुख, जैये कहाँ अपनी गति हेरे॥ द्वार खरे प्रभु के छरिया तहँ, भूपति जान न पावत नेरे। पाँच सुपारि तै देखु बिचार कै, भेंट को चारि न चाउर मेरे॥२३॥


यह सुनि कै तब ब्राह्मनी, गई परोसी पास। पाव सेर चाउर लिये, आई सहित हुलास॥२४॥


सिद्धि करी गनपति सुमिरि, बाँधि दुपटिया खूँट। माँगत खात चले तहाँ, मारग वाली बूट॥२५॥


दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई, एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं। पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करे बात, देवता से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं। देखत सुदामा धाय पौरजन गहे पाँय, कृपा करि कहौ विप्र कहाँ कीन्हौ गौन हैं। धीरज अधीर के हरन पर पीर के, बताओ बलवीर के महल यहाँ कौन हैं?॥३०॥


(श्रीकृष्ण का द्वारपाल) सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानै को आहि बसै केहि ग्रामा। धोति फटी-सी लटी दुपटी अरु, पाँय उपानह की नहिं सामा॥ द्वार खड्यो द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकिसौं वसुधा अभिरामा। पूछत दीन दयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा॥II३५II


बोल्यौ द्वारपाल सुदामा नाम पाँड़े सुनि, छाँड़े राज-काज ऐसे जी की गति जानै को? द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय, भेंटत लपटाय करि ऐसे दुख सानै को? नैन दोऊ जल भरि पूछत कुसल हरि, बिप्र बोल्यौं विपदा में मोहि पहिचाने को? जैसी तुम करौ तैसी करै को कृपा के सिंधु, ऐसी प्रीति दीनबंधु! दीनन सौ माने को?II ३६II


ऐसे बेहाल बेवाइन सों पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोये। हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न किते दिन खोये॥ देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये। पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये॥ II४२II


(श्री कृष्ण) कछु भाभी हमको दियौ, सो तुम काहे न देत। चाँपि पोटरी काँख में, रहे कहौ केहि हेत॥II ४६II


आगे चना गुरु-मातु दिये त, लिये तुम चाबि हमें नहिं दीने। श्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सों, चोरि कि बानि में हौ जू प्रवीने॥ पोटरि काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस भीने। पाछिलि बानि अजौं न तजी तुम, तैसइ भाभी के तंदुल कीने॥ II४७II


देनो हुतौ सो दै चुके, बिप्र न जानी गाथ। चलती बेर गोपाल जू, कछू न दीन्हौं हाथ॥II ६०II


वह पुलकनि वह उठ मिलनि, वह आदर की भाँति। यह पठवनि गोपाल की, कछू ना जानी जाति॥II६१II


घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज। कहा भयौ जो अब भयौ, हरि को राज-समाज॥II६२II


हौं कब इत आवत हुतौ, वाही पठ्यौ ठेलि। कहिहौं धनि सौं जाइकै, अब धन धरौ सकेलि॥II६३II


वैसेइ राज-समाज बने, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ। वैसेइ कंचन के सब धाम हैं, द्वारिके के महिलों फिरि आयौ। भौन बिलोकिबे को मन लोचत सोचत ही सब गाँव मँझायौ। पूछत पाँड़े फिरैं सबसों पर झोपरी को कहूँ खोज न पायौ॥II७०II


कनक-दंड कर में लिये, द्वारपाल हैं द्वार। जाय दिखायौ सबनि लैं, या है महल तुम्हार॥II७३II


टूटी सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर, तामैं परो दुख काटौं कहाँ हेम-धाम री। जेवर-जराऊ तुम साजे प्रति अंग-अंग, सखी सोहै संग वह छूछी हुती छाम री। तुम तो पटंबर री ओढ़े किनारीदार, सारी जरतारी वह ओढ़े कारी कामरी। मेरी वा पंडाइन तिहारी अनुहार ही पै, विपदा सताई वह पाई कहाँ पामरी?II८०II


कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ, कंचन के सब धाम सुहावत। कै पग में पनही न हती कहँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥ भूमि कठोर पै रात कटै कहाँ, कोमल सेज पै नींद न आवत। कैं जुरतो नहिं कोदो सवाँ प्रभु, के परताप तै दाख न भावत॥ II११९II 

तब उन्होंने तन्दुल की पोटली छीन ली और सुदामा के प्रारब्ध कर्मों को क्षीण करने के हेतु तन्दुल को बेहद चाव से खाया था।
 
फिर सुदामा ने अपने परिवार आदि के बारे में तो बताया लेकिन अपनी दरिद्रा के बारे में कुछ नहीं बताया। अंत में प्रभु ने सुदामा को सुंदर शय्या पर सुलाया। फिर दूसरे दिन भरपेट भोजन कराने के बाद सुदामा को विदाई दी। किंतु विदाई के दौरान उन्हें कुछ भी नहीं दिया। रास्तेभर सुदामा सोचते रहे कि हो सकता है कि उन्हें इसी कारण से धन नहीं दिया गया होगा कि कहीं उनमें अहंकार न आ जाए। यह विचार करते करते सुदाम अपने मन को समझाते हुए जब घर पहुंचे तो देखा, उनकी कुटिया के स्थान पर एक भव्य महल खड़ा है और उनकी पत्नी स्वर्णाभूषणों से लदी हुई तथा सेविकाओं से घिरी हुई हैं। यह दृश्य देखकर सुदामा की आंखों से आंसू निकल आया और वे सदा के लिए श्री कृष्ण की कृपा से अभिभूत होकर उनकी भक्ति में लग गए।


अपनी पत्नी के कहने पर सहायता के लिए द्वारिकाधीश श्री कृष्ण के पास गए। परन्तु संकोचवश उन्होंने अपने मुख से श्री कृष्ण से कुछ नहीं माँगा। परन्तु श्री कृष्ण तो अन्तर्यामी हैं, उन्होंने भी सुदामा को खली हाथ ही विदा कर दिया। जब सुदामा जी अपने नगर पहुंचे तो उन्होंने पाया की उनकी टूटी-फूटी झोपडी के स्थान पर सुन्दर महल बना हुआ है तथा उनकी पत्नी और बच्चे सुन्दर, सजे-धजे वस्त्रो में सुशोभित हो रहे हैं। अब अस्मावतीपुर का नाम सुदामापुरी हो चुका था। इस प्रकार श्री कृष्ण ने सुदामा जी की निर्धनता का हरण किया।वे श्री कृष्ण के अच्छे मित्र थे। वे दोनों दोस्ती की मिसाल है।



लेखक

ॐ जितेन्द्र सिंह तोमर
15/1/11/7/2021

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