38. "*आंखों देखा भृम *" (एक लघु कथा)

38. "*आंखों देखा भृम *" (एक लघु कथा)

एक समय की बात है एक सन्त रामेश्वरम भ्रमण के लिए गए। एक दिन वह धनुष्कोटी के समुद्र तट पर प्रात: काल भ्रमण कर रहे थे। 

समुद्र के तट पर उन्होने देखा कि एक पुरुष, एक स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ है। पास में शराब की खाली बोतल पड़ी हुई है। सन्त का मन बहुत दिन हुआ वे बहुत दु:खी हुए।

उन्होने विचार किया कि ये मनुष्य कितना पतित, तामसिक और विलासी है। दिन निकला नहीं कि प्रात:काल में ही समुद्र देव के निकट शराब का सेवन करके पता नहीं किस स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ है और न जाने क्या-क्या विचार उनके दिमाग में घूमने लगे।

थोड़ी देर बाद समुद्र से बचाओ, बचाओ की आवाज आई, सन्त ने देखा एक मनुष्य समुद्र में डूब रहा है, मगर वे स्वयं तैरना नहीं जानते थे। इस कारण वे उसे डूबते देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे।

तभी उन्होंने देखा कि स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ व्यक्ति उठा और डूबने वाले को बचाने हेतु समुद्र के गहरे पानी में कूद गया।

थोड़ी देर में उसने डूबने वाले को बचा लिया और किनारे ले आया। वह फिर से अपनी मां के पास आकर बैठ गया। समुद्र तट के सभी लोग उसका धन्यवाद कर रही थे।

सन्त सोच में पड़ गए कि यह व्यक्ति बुरा है या भला। उनके मन में मंथन चलने लगा। वे इसका निर्णय नहीं ले पा रहे थे इसलिए वे उसके पास गए और बोले भाई तुम कौन हो, और यहाँ क्या कर रहे हो…?

उस व्यक्ति ने उत्तर सुनकर संत का दिमाग एकदम सन्न रह गया। उसने संत से कहा, " महात्मन् ! मैं एक मछुआरा हूँ, मछली पकड़ने और बेचने का काम करता हूँ। आज कई दिनों बाद समुद्र से मछली पकड़ कर लौटा तो देखा कि मेरी माँ मेरे लिए खाना लेकर आई है पता नहीं इसे मेरे लौटने की खबर कैसे लगी, और तो और देखो जल्दबाजी में जब कोई दूसरा बर्तन खाली नहीं मिला तो पड़ोस के घर से बोतल मांग कर उस बोतल में पीने का पानी भर कर ले आई। महाराज देख रहे हो बोतल काहे की है, दारू की है।" 

कहकर वह हंसने लगा और फिर से बोला,
" उसे मालूम है कि मैं दारु नहीं पीता। इसलिए उसने बताया कि वह उसे अच्छी तरह से धो कर लाए हैं। कई दिनों की यात्रा से मैं थका हुआ था। खाना खाने और पानी पीने के बाद, भोर के सुहावने वातावरण की भीनी भीनी हवा में माँ की गोद में सिर रख कर लेट गया। न जाने कब आंख लग गई और मैं ऐसे ही सो गया।"

"महाराज ! घर चलिए और रुखा सुखा हो उसका भोग लगाइए। हमें बड़ी खुशी होगी। एक सुदूर उत्तर की तरफ से आए हुए संत को हम खाना खिला सके।" 

सन्त की आँखों में आँसू आ गए कि मैं भी कैसा अधम मनुष्य हूँ, जो देखा उसके बारे में मैंने गलत विचार किया । आज मुझे ज्ञात हुआ कि आंखों देखा भ्रम कितना गलत हो सकता है। मुझसे बड़ा संत तो यह मछुआरा है जिसने अभी-अभी भगवान के बंदे की जान बचाई और अब मुझे खाने पर आमंत्रित कर रहा है।
उनके मुख से कुछ नहीं निकला। उनके हाथ आशीर्वाद में उठे और उन दोनों को वहीं बैठे छोड़कर, उनके कदम दूसरी तरफ मुड़ गए। वे दोनों उस संत को दूर तक जाते हुए देखते रहे।

लेखक

ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
16/3/18/8/2021

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