40. मां किसको मिलेगी? (एक अनोखा मुकदमा)
40. मां किसको मिलेगी ? (एक अनोखा मुकदमा)
💢एकअनोखा मुकदमा💢
यह कलयुग है। इसमें क्या कुछ देखने को नहीं मिलता परंतु सतयुग की कुछ मर्यादाएं आज भी जीवित हैं। उन्हीं में से एक मैं आपके सामने रखने का प्रयास कर रहा हूं।
अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग था। न्यायालय में एक मुकद्दमा आया जिसने सभी को झकझोर दिया।
एक 60 साल के व्यक्ति ने, अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था।
मुकदमा कुछ यूं था कि "मेरा 75 साल का बड़ा भाई, अब बूढ़ा हो चला है, इसलिए वह खुद अपना ख्याल तो ठीक से रख नहीं सकता । मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है।
मैं अभी भी ठीक ठाक हूंँ, सक्षम हूँ। इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय"।
न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग माता जी को अपने साथ 15 -15 दिन के लिए रख लो ।
मगर कोई टस से मस नहीं हुआ, बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ । अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी है या मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो उन्हें आप अवश्य ही छोटे भाई को दे देना।
छोटा भाई कहता कि पिछले 35 साल से, जब से मैं नौकरी के लिए बाहर गया तब से ये अकेले ही सेवा किये जा रहे हैं, जैन साहब आप ही बताइए की आखिर मैं अपना कर्तव्य कब पूरा करूँगा। जबकि आज मैं स्थायी हूं, बेटा बहू सब है, तो मां भी चाहिए।
परेशान न्यायाधीश महोदय ने सभी प्रयास कर लिये , मगर कोई हल नहीं निकला। आखिर उन्होंने बुजुर्ग मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है।
मां अब महा कहां रह गई थी वह तो केवल कुल मिलाकर 30-35 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी । उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान बराबर हैं। मैं किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाकर , दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती।
साहब ! आप तो न्यायाधीश हैं , निर्णय करना आपका काम है । जो आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।
न्यायधीश महोदय कहने लगे कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो तो, इस स्तर का हो। परंतु यहां तो विवाद भी दूसरे तरीके के आते हैं कि 'माँ तेरी है या बाप तेरा है इन्हें मैं नहीं रखूंगा, तू नहीं रखेगा तो इन्हें मैं भी नहीं रखूंगा की लड़ाई होती है। और जब फैसला हुआ तो पता चलता है कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं । मेरे विचार से यह पाप है। '
धन, दौलत, गाडी, बंगला आदि सब होकर भी यदि माँ बाप सुखी नही तो आप से बडा पापी भी कोई नहीं, आपका पुण्य जीरो (0) है जीरो ।'
आखिर में न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से कुछ लिखा और फिर भारी मन से अनिर्णय दिया कि न्यायालय दोनों भाइयों की भावनाओं का सम्मान करता है । परंतु हम छोटे भाई की भावनाओं से अधिक सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है। ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।
फैसला सुनकर बड़े भाई ने छोटे को गले लगाकर रोने लगा । यह सब देख अदालत में मौजूद न्यायाधीश समेत सभी गदगद हो गए।

Comments
Post a Comment