104. विक्रम बैताल || कहानी 04 || पुतलों का रहस्य ||

104. विक्रम बैताल || कहानी 04 || पुतलों का रहस्य ||

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उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया। 

जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?” 

"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।

राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, और तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका। 

राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"

राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”

राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।

नीचे उतर कर राजा ने उसक  दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है? अब तू आराम से मेरे प्रश्नों का जवाब दे सकता है।”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा कि तू रास्ते में अब के बाद कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा। 

राजन! जिसने तुम्हें मेरे पीछे लगाया है वह एक धूर्त तांत्रिक है, परंतु तुम अपने प्राण से डिगने वालों में नहीं हो। अतः तुम मुझे उसके पास लेजाकर कर ही मानोगे। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”

एक समय की बात है जब भारत में महावीर नामक एक प्रतापी, ज्ञानी, वीर व धर्मज्ञ राजा राज्य करते थे। वह प्रजा को अपने ओरस पुत्रों की भांति रखता था। वह प्रजा को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होने देता था, लेकिन राजा को स्वयं एक कष्ट था कि उसके कोई पुत्र नहीं था। राजा बहुत दिनों से पुत्र की प्राप्ति के लिए आशा लगाए बैठा था, लेकिन पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। इसलिए वह बहुत चिंतित और दुखी रहने लगे।

एक दिन उसके सलाहकारों ने राजा को तांत्रिकों से सहयोग लेने को कहा।

तांत्रिकों ने अपनी तंत्र विद्या से जान लिया कि राजा के भाग्य में कोई संतान नहीं है। तांत्रिकों की तरफ से राजा को सुझाव दिया कि यदि किसी बच्चे की बलि दे दी जाए, तो वह बच्चा आपके यहां पुत्र रूप में उत्पन्न होगा। केवल और केवल इस प्रकार से ही आपको पुत्र की प्राप्ति हो सकती है अन्यथा नहीं।

राजा ने सोचा कि जिस प्रकार मैं जनता को बहुत प्यार करता हूं। वैसे ही जनता भी मुझे बहुत प्यार करती होगी। वह खुशी-खुशी अपने बच्चे को इस कार्य के लिए समर्पित कर देगी।

राजा ने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि राजस्थान तरीकों के अनुसार यदि किसी बच्चे की बलि दी जाए तो उसका पुनर्जन्म राजा के यहां होगा। इस कार्य के लिए जो अपना बच्चा राजा को देगा, उसे राजा की तरफ से, बहुत सारा धन दिया जाएगा।

राजा की इच्छा पूरी करने के लिए पूरे राज्य में से कोई भी आगे नहीं आया राजा बहुत दुखी हुआ।

इसी राज्य में किस्मत का मारा एक परिवार रहता था। राज्य में पूरी खुशहाली होने के बाद भी वह अपने आप को खुशहाल नहीं कर पा रहा था। उसके परिवार में कई बच्चे थे। कई बच्चे होने के कारण वह परिवार बहुत ही गरीब था। 

उसी परिवार का सबसे छोटा लड़का सन्तों की सेवा और सत्संग में अधिक समय देता था। उसका सांसारिक कर्मो में ध्यान नहीं लगता था । लेकिन उसके परिवार के लोग उसे निकम्मा, निठल्ले और न जाने किन किन नामों से पुकारते थे। वह इन बातों पर ध्यान नहीं देता था क्योंकि उसे ईश्वर पर अटूट विश्वास था।  

राजा की मुनादी सुनकर परिवार को लगा कि क्यों ना इसे राजा को दे दिया जाए ? क्योंकि ये निकम्मा है, कुछ काम -धाम भी नहीं करता है और हमारे किसी काम का भी नहीं है। सदैव साधु-संतों के चक्कर में पड़ा रहता है।

क्यों नहीं इसे ही राजा को दे दिया जाए। इससे राजा प्रसन्न होकर, हमें बहुत सारा धन देगा। जिससे हमारा और इसके भाइयों का जीवन सुख में हो जाएगा।

ऐसा ही किया गया, बिना उस बच्चे को बताए, बच्चा राजा को दे दिया गया। जब बच्चे को इस बात का पता चला कि उसके परिवार ने राजा की स्वार्थ सिद्धि के लिए, उसे बलि देने के लिए राजा को दे दिया है तो उसे बड़ा दुख हुआ।

राजा ने बच्चे के बदले, उसके परिवार को काफी धन दिया। राजा के तांत्रिकों द्वारा बच्चे की बलि देने की तैयारी हो गई।

बलि के वक्त राजा को भी बुला लिया गया। बच्चे के चेहरे पर मृत्यु का जरा भी डर नहीं था। वह केवल मुस्करा रहा था। 

बलि देने से पहले बच्चे से उसकी आखिरी इच्छा पूछी गई। " बेटा ! तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है?" 

बच्चे ने कहा कि, मृत्यु मेरे निकट है मुझे क्या चाहिए। मेरे लिए चार मिट्टी के पुतले और कुछ फूल मंगवा दो।"

राजा ने आदेश दिया, "बच्चे की इच्छा पूरी की जाये ।" अतः बच्चे के लिए चार पुतले और कुछ फूल मंगवाए गए। 

बच्चे ने चारों पुत्रों को अपने सामने रखा। उसने कुछ फूल जमीन पर बिछाए मिट्टी के पहले पुतले को उस पर रखा और तोड़ डाला। इसी प्रकार उसने दूसरे और तीसरे पुतले को भी तोड़ डाला।

वह बच्चा चौथे पुतले के सामने बैठ गया उसने वो फूल उसके चारों तरफ डाल दिए और आंख बंद कर तथा हाथ जोड़ कर बैठ गया और उसने राजा से बोला, " राजन! अब आपको जो करना है , आप लोग कर लें। मैं पूरी तरह से तैयार हूं।"

यह सब देखकर तांत्रिक डर गए परंतु राजा ने उठकर उसे गले से लगा लिया। 

बेताल ने आश्चर्य से राजा के मुख को देखा और अपनी कहानी बीच में ही रोक दी और विक्रमादित्य से हर बार की तरह सवाल पूछ बैठा कि, “बताओ विक्रमादित्य, चार पुतले पुतला का रहस्य क्या है? उसने पुतलों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया? और इस घटना को देखकर राजा ने सिंहासन से उतर कर उस बच्चे को अपने गले क्यों लगा लिया?

सवाल सुनने के बाद भी राजा विक्रमादित्य ने कोई जवाब नहीं दिया। इस पर गुस्से में बेताल ने कहा, “राजन जवाब पता होने पर भी आप उत्तर नहीं देंगे, तो मैं अपने तेज से तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा और मुक्त हो जाऊंगा।"

तब विक्रमादित्य ने जवाब देते हुए कहा कि बेताल ! राजा बच्चे के मंतव्य को समझ गया इसलिए वह सिंहासन से उठा और दौड़ कर उस बच्चे को गले से लगा लिया। जबकि तांत्रिक बुरी तरह से डर गए। उन्हें लगा कि संतो के बीच रहने वाले बच्चे ने कहीं कोई तंत्र तो नहीं कर दिया।

बेताल सुन, पुतलो का रहस्य क्या है ? यही प्रश्न राजधानी उस बच्चे से पूछा था, "बेटा ! बताओ कि तुमने पुतलों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया?" क्या मैंने जो अनुमान लगाया है वह सही है।

" राजन! पहला पुतला मेरे माता-पिता का प्रतीक था जिनका कर्तव्य अपनी संतान की रक्षा करना था । परंतु उन्होंने अपने कर्त्तव्य का पालन न करके, पैसे के लोभ के लिए मुझे बेच दिया। इसलिए मैंने यह पहला पुतला तोड़ दिया।

....... दूसरा पुतला, मेरे सगे-सम्बन्धियों का प्रतीक था। जिन्हें मेरे माता-पिता को समझाना चाहिए था परंतु उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नहीं समझाया। अतः मैंने दूसरे पुतले को भी तोड़ दिया।

.... और तीसरा पुतला.....", कहते हुए बच्चा चुप हो गया।

राजा ने कहा बेटा डरने की कोई बात नहीं है सब बात सच सच बताओ।

बच्चा बोला," महाराज! मृत्यु एक बार आती है वह आप मेरे लिए चुन चुके हो तो फिर मुझे आपसे अब क्या डरना।" राजा उस बच्चे के मुख की तरफ देख रहा था। 

"हे  महाराज! यह तीसरा पुतला आपका है, जानते हो क्यों? क्योंकि राज्य की प्रजा की रक्षा करना, राजा का ही धर्म होता है, परन्तु जब राजा ही, मुझे प्रजा की बलि देना चाह रहा है तो, इस तीसरे पुतले को भी मैंने तोड़ दिया।"

राजा बोला, "बेटा ! मैं जानता हूं कि यह चौथा पुतला किसका है ?" बच्चा चुप हो गया राजा ने अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए बच्चे से पूछा, " यह चौथा पुतला ईश्वर का है ना?"
 
" हां राजन! मुझे अब केवल चौथे और अंतिम इन ईश्वर पर ही भरोसा है अब वही मेरे जीवन की रक्षा करेंगे। इसीलिए मैंने इस पुतले को छोड़ दिया पुष्प अर्पित करके इसके सामने अपने आप को समर्पित कर दिया। और ईश्वर के होते हुए कोई मेरा बाल भी बांका नहीं कर सकता।" 

सभी राजा और बच्चे के उस संवाद को देख सुनकर हतप्रभ रह गए। बेताल, अब सुन राजा ने सिंहासन से उतरकर उस बच्चे को अपने गले से क्यों लगा लिया? 

राजा उस बच्चे का हाथ पकड़कर अपने सिंहासन के पास तक ले गया और फिर राजा ने घोषणा की " मुझे नहीं मालूम कि इस बच्चे की बलि देने के उपरांत, पुनर्जन्म में इसका मेरे घर में ही जन्म होगा भी या नहीं "
पूरी सभा सन्न थी। केवल राजा की घोषणा जारी थी। 
" इस बच्चे ने मेरी आंखें खोल दी मेरा ईश्वर में विश्वास जगा दिया और अब मैं इस बच्चे को अपने राज्य का भावी उत्तराधिकारी चुनता हूं।"

कहकर राजा घुटनों के बल नीचे बैठ गया और हाथ फैला कर बोला, "बेटा ! मुझे माफ कर दो और मेरे पुत्र बन जाओ। इस राज्य को आपके जैसा समझदार और ईश्वर-भक्त और अच्छा बच्चा कहाँ मिलेगा ?"

बच्चा दौड़कर राजा के बाजू में लिपट गया और रोने लगा। इसके बाद ,राजा ने उस बच्चे को अपना पुत्र बना लिया। 

"बेताल ! जो व्यक्ति ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, उनका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता, यह एक अटल सत्य है।" 

राजा का जवाब सुनकर बेताल बेहद खुश हुआ और बोला, “राजन ! तुम बहुत बड़े ज्ञानी हो। बिल्कुल सही। तुमने एक एक बात को अच्छे से समझा दिया। तुम्हें आगे की कहानी भी पता लग गई । तुम बहुत समझदार हो। परंतु, राजन ! शर्त के मुताबिक आपको चुप रहना था। अपने मुंह खोल दिया, अब मैं चला।” 

इतना कहकर बेताल एक बार फिर से उड़ जाता है। इतना कहकर बेताल तुरंत ही हर बार की तरह उड़कर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक गया। और विक्रम उसे उतारने के लिए पुनः चल दिया।

लेखक
ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
12/6/10/7/2021

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