23. अब कब आओगे ? (कहानी)
अब कब आओगे?
राम सिंह बिस्तर पर से उठा, तो अचानक से छाती में दर्द महसूस होने लगा । उसे लगा शायद गैस ज्यादा हो गई है जिसके कारण उसका दबाव हार्ट की तरफ बढ़ गया है। उसने सोचा कि मुझे हार्ट की तकलीफ तो नहीं है? ऐसा सोचते हुए वह साथ में आगे वाले कमरे में गया जिसे वे आमतौर पर बैठक कहकर पुकारते थे। उसने देखा कि उसका पूरा परिवार मोबाइल में व्यस्त हैं।
उसने अपनी पत्नी को देखकर कहा, "स्नेहा! मेरी छाती में आज कुछ ज़्यादा दर्द हो रहा है, बर्दाश्त नहीं हो रहा । डाॅक्टरर को दिखा कर आता हूँ।"
"ठीक है, मगर सँभलकर जाना, जरूरत पड़े तो फोन करना।" मोबाइल में देखते-देखते ही पत्नी बोलीं, उसने राम सिंह की तरफ निगाह उठाकर भी नहीं देखी।
राम सिंह एक्टिवा की चाबी लेकर पार्किंग में पहुँचा, उसे बहुत पसीना आ रहा था, उसने एक्टिवा स्टार्ट करने का कई बार असफल प्रयास किया परंतु ऐक्टिवा स्टार्ट नहीं कर पाया।
इसी समय उनके घर का काम करने वाला हरी साईकिल पर वहां आ गया। यह हरि के काम पर आने का समय था। हरी राम सिंह के घर में पोछा लगाने बरतन तथा कपड़े धोने का काम करता था। साईकिल को ताला लगाते लगाते ही, उसने मुझे सामने खड़ा देखा।
"नमस्कार साहब जी! क्यों साहब ऐक्टिवा चालू नहीं हो रही है?" हरि ने राम सिंह से कहा।
"नहीं..!!" राम सिंह ने हरि को उत्तर दिया और खुद को संभालने का प्रयास करने लगे लेकिन पसीना कम होने के स्थान पर और बढ़ गया।
"आपकी तबीयत ठीक नहीं लगती, साहब ! इतना पसीना क्यों आ रहा है?" राम सिंह ने हां में सिर हिला दिया।
उसने राम सिंह से पुनः प्रश्न किया, "साहब ! इस हालत में स्कूटी को किक नहीं मारो, मैं किक मार कर चालू कर देता हूँ।"
हरी ने एक ही किक में ऐक्टिवा को चालू कर दिया, साथ ही पूछा,। "साहब ! साहब कौन जा रहा है, कहीं आप अकेले तो नहीं जा रहे हो?"
हरी ने कहा, "हाँ !"
हरि सब कुछ समझ गया, उसने कहा, "ऐसी हालत में अकेले नहीं जाते, चलिए मेरे पीछे बैठ जाइये।"
राम सिंह ने हरी से आश्चर्यचकित होकर पूछा, "तुम्हें एक्टिवा चलानी आती है?"
"साहब गाड़ी का भी लाइसेंस है, चिंता छोड़कर बैठ जाओ।" कह कर राम सिंह को चिंता मुक्त कर दिया।
वे पास ही एक अस्पताल में हम पहुँचे तो हरी दौड़कर अंदर गया और व्हील चेयर लेकर बाहर आया।
"साहब ! आप चलना मत, इस कुर्सी पर बैठो मैं आपको लेकर चलूंगा।"
हरी के मोबाइल पर लगातार घंटियां बजती रहीं, पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। राम सिंह समझ गया था कि फ्लैट में से सबके फोन आ रहे होंगे कि अभी तक क्यों नहीं आया?
राम सिंह के कहने पर हरि ने फोन उठाया और स्पीकर पर डाल दिया।
"कल से काम पर मत आना । अपना हिसाब ले जाना ।" दूसरी तरफ से आवाज आई। हरी मुस्कुराया और कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
"सॉरी सर जी ! मैं आज नहीं आ सकता।", कहकर वह अपने कॉल डिस्कनेक्ट करने लगा।
कुछ देर फोन बंद रहने के बाद फिर घंटी बजी तो हरी ने फिर वही दोहराया "सॉरी सर जी ! मैं आज नहीं आ सकता।"
हरी एक पढ़े-लिखे के जैसे ही व्यवहार कर रहा था, जैसे कि बगैर बताये ही उसे मालूम हो गया कि साहब को हार्ट की तकलीफ है। वह लिफ्ट से व्हील चेयर ICU की तरफ लेकर गया।
राम सिंह की तकलीफ़ के बारे में हरी पहले ही बता गया था इसलिए डाॅक्टरों की टीम तो तैयार ही थी, उन्होंने आनन-फानन में सारे टेस्ट कर डाले।
डाॅक्टर ने कहा, "थैंक गॉड! आप समय पर पहुँच गये, इसमें भी आपने व्हील चेयर का उपयोग किया, वह आपके लिए बहुत समझदारी वाला निर्णय रहा।"
"ऑपरेशन के लिए और देरी नहीं कर सकते। किसी अन्य का इंतजार करना आपके लिए बहुत ही हानिकारक हो सकता है, इसलिए बिना देर किए हमें हार्ट का ऑपरेशन कर जल्द से जल्द आपके हार्ट का ब्लोकेज दूर करने होंगे। इस फार्म पर आप के स्वजन के हस्ताक्षर की ज़रूरत है डाॅक्टर ने हरी की ओर देखा।"
राम सिंह ने कहा, "बेटा ! दस्तखत करने आते हैं?"
उसने कहा, "साहब जिम्मेदार हूं, अपनी जिम्मेदारी भी समझता हूं, पर इतना बड़ा भी नहीं ........ प्लीज इतनी बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर न डालो।"
"बेटा ! तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। जिनकी जिम्मेदारी है वेद घर पर फोन में व्यस्त बैठे हैं। तुम्हारे साथ भले ही लहू का सम्बन्ध नहीं है, फिर भी बगैर कहे तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी की जो जिम्मेदारी हकीकत में मेरे परिवार को पूरी करनी चाहिए थी।" राम सिंह की आंखों में आग्रह भरे आंसू थे और दोनों हाथ प्रार्थना की स्थिति में जुड़े हुए थे। वह हरी से पुनः बोलें, "एक और जिम्मेदारी पूरी कर दो बेटा, मैं नीचे श लिख दूँगा कि मुझे कुछ भी होगा तो जिम्मेदारी मेरी है तुम्हारी नहीं, तुमने तो सिर्फ मेरे कहने पर ही हस्ताक्षर किये हैं।"
हरी ने सधे हाथों से हस्ताक्षर कर दिए। जब राम सिंह को ऑपरेशन के लिए ले जाने लगी तो राम सिंह ने हरी से कहा, " अब घर पर खबर कर दो।"
उसी समय राम सिंह की पत्नी का फोन हरी के मोबाइल पर आया। वह शांति से फोन सुनने लगा। "तू बहुत लापरवाह हो गया है। जब देखो छुट्टी कर लेता है। इस बार तेरी पगार अवश्य काटूंगी और तेरी छुट्टी कर देती हूँ। कब तक घर लौटेगा।"
थोड़ी देर के बाद हरी बोला, " सॉरी मैडम ! आपको पगार काटने का हो तो काट लेना, निकालने का हो तो निकाल देना मगर अभी अस्पताल में रहना बहुत जरूरी है।"
"क्यों बहाने बनाता हैं? मैंने तुझे ठीक-ठाक यहां तक आते हुए देखा है और तेरे साइकिल भी बाहर खड़ी है। तू हॉस्पिटल कैसे पहुंचा।" मैडम गुस्से में चिल्ला कर बोली।
" मैडम ! मैं साहब को अस्पताल लेकर आया हूँ, उनकी हालत बहुत खराब है। डाक्टर ने ऑपरेशन की तैयारी कर ली है और आपके इंतजार करने का वक्त नहीं है।"
"बेटा घर से फोन था?", राम सिंह ने पूछा।
"हाँ, साहब !"
राम सिंह मन ही मन पत्नी के बारे में सोचने लगा, तुम किसकी पगार काटने की बात कर रही हो और किसको निकालने की बात कर रही हो?
आँखों में आँसू के साथ ध्रुव के कन्धे पर हाथ रखकर राम सिंह बोला, "बेटा ! चिंता नहीं करते। जहां तुम्हारे जैसे शुभचिंतक हो वहां अशुद्ध हो ही नहीं सकता।"
"मैं एक संस्था में सेवायें देता हूँ, वे बुज़ुर्ग लोगों को सहारा देते हैं, तुम जैसे ही व्यक्तियों की ज़रूरत वहां है। तुम्हारा काम बरतन कपड़े धोने का नहीं है, तुम्हारा काम तो समाज सेवा का है। चिंता मत करना मैं आते ही तुम्हारा वहां इंतजाम कर दूंगा। वहां तुम्हें अच्छी पगार भी मिलेगी।"
ऑपरेशन के बाद राम सिंह होश में आया, तो उसके सामने सामने उसका पूरा परिवार नतमस्तक खड़ा था। लेकिन रामसिंह की निगाहें वहां पर हरि को ढूंढ रही थी।
राम सिंह आँखों में आँसू लिये बोला, "ध्रुव कहाँ है?"
पत्नी बोली, "वो छुट्टी लेकर गाँव चला गया। कह रहा था कि 15 दिन के बाद आयेगा। उसे ही क्रिया करनी है।"
"जानते हो उसके घर से फोन पर फोन आ रहे थे और वह आप के ईलाज में लगा रहा। उसके पिता ऑपरेशन के लिए जाने से पहले हरी से बात करना चाहते थे लेकिन वह उनसे बात नहीं कर पाया।"
मैडम ने एक लंबी सांस ली और कहा, " और अब उसके पिता इस दुनिया में नहीं हैं। उसके पिताजी हार्ट अटैक से गुज़र गये हैं।
अब मुझे समझ में आया कि उसको मेरे अन्दर उसका बाप दिख रहा होगा।
"हे प्रभु! मुझे बचाकर आपने उसके बाप को उठा लिया?" और रामसिंह पूरी तरह से फूट-फूटकर रो पड़ा।
"एक वह अनपढ़ गवार लड़का, जिसने मेरा कुछ भी ना होते हुए मेरी जान बचाई और एक मेरा भरा पूरा परिवार पढ़ा-लिखा परिवार जिसे केवल मोबाइल चाहिए कोई मरता हो मरे उसे क्या लेना।"
राम सिंह का पूरा परिवार हाथ जोड़कर, मूक, नतमस्तक माफी माँग रहा था।
तभी हरि का फोन आया उसने पूछा कि साहब की तबीयत कैसी है?
राम सिंह ने फोन हाथ से छीन लिया, "सब कुछ ठीक से निबट गया ना।"
हरी फूट-फूटकर रोने लगा, "साहब ! मैं घर पहुंचते-पहुंचते लेट हो गया । गांव के लोगों ने उनकी क्रिया कर दी। मैं तो हाथ भी नहीं लगा पाया।"
वह पुनः बोला, "इकलौता बेटा होते हुए भी उनको कंधा नहीं दे पाया। उनकी अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं कर पाया।"
"अब कब आओगे? बेटा!"
"कभी नहीं । साहब ! " कह कर ही नहीं फोन काट दिया । इसके बाद वह और उसका फोन फिर कभी नहीं आया।

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