तू है, ना!

कोरोना महामारी का समय पीक पर था अप्रैल 2021 के अंत की बात है । टीवी समाचारों में लगातार बुरी तरह से केवल और केवल कोरोना की खबरें चल रही थी। 
*कहीं लोगों को ऑक्सीजन नहीं मिल रही थी 
*कहीं अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहे थे 
*लोग जमीन पर इलाज करा रहे थे। 
*सैकड़ों की संख्या में मौतें हो रही थी। 
*उनके परिवार के लोगों और बच्चों का रोना-धोना देख दख कर। लोगों के दिमाग खराब हो रहा था। 

समाचार पत्रों की सुर्खियों में भी केवल और केवल कोरोना और मौत का साया नजर आता था। लोगों ने अखबार पढ़ने बंद कर दिए। टीवी पर ख़बरें देखनी बंद कर दी । 

परंतु हमारे पड़ोसी शिवराम सिंह को बिना टीवी देखें नींद ही नहीं आती थी। कल उनको लगने लगा की उनकी भी तबीयत खराब होती जा रही है। उन्होंने बाजार से करीब ₹2000 का ऑक्सीमीटर खरीदा परंतु भूल गए कि उसने सेल भी पड़ता है। उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया कि अब उनकी जेब बिल्कुल खाली हो चुकी है। वे इतना हड़बड़ा रहे थे कि पड़ोस की दुकान पर पहुंचे और बोले एक छोटा सेल दे दो । वे जबान से साफ-साफ बोले भी नहीं जा रहे थे। दुकानदार ने उन्हें वह सेल दे दिया। अब वे अपनी जेब में ₹10 खोज रहे थे कि सैल खरीदा जा सके परंतु उनकी जेब में अब पैसे नहीं थे। 

वे सारे पैसे ऑक्सीमीटर खरीदने में दे चुके थे। दुकानदार स्थिति को जानती थीं। यह कोरोना संक्रमण का काल है । जितनी उससे बन पा रही थी वह लोगों की सहायता कर रहीं थीं। 

परचून की दुकान होने के कारण यह दुकान खुली हुई थी। अब शिवराम सिंह नर्वस हो गया। उसकी जेब में पैसे नहीं थे, तो दुकानदार ने कहा अंकल आप सैल ले जाइए टेंशन मत कीजिए । यह मेरी तरफ से गिफ्ट समझो। 

तब जाकर उनके सांस में सांस आई और वे उसे घर ले गए। घर पर जैसे तैसे उन्होंने ऑक्सीमीटर में सैल लगाया तो उनकी ऑक्सीजन कम होती जा रही थी। दिल की धड़कन भी घटती जा रही थी। 

तो उन्होंने मुझे फोन कर दिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है घर आ जाओ । पर पूरी सतर्कता के साथ आना लगता है। मुझे कोरोना हो गया है। अंकल जी भी कैसी बात करते हैं। कल ही तो मिलकर आया था। सब ठीक-ठाक था। टेंशन ले बैठें होंगे। 

मैंने सैनिटाइजर उठाया और ठीक से डबल मास्क लगाया और उनके घर पहुंच गया। देखा कि तेज आवाज में टीवी चल रहा था और वह खबरें देख देख कर परेशान हो रहे थे कि लोग रोजाना बहुत अधिक संख्या में लोग मरते जा रहे हैं । अब जल्दी ही मेरी बारी आने वाली है, क्योंकि मेरा ऑक्सीजन लेवल गिरता जा रहा है मेरी नब्ज़ भी डाउन होती जा रही है। मुझे हॉस्पिटल जाना पड़ेगा, वहां इतनी भीड़ है कि मुझे इलाज नहीं मिलेगा और भी लोग मुझे मार डालेंगे। 

सबसे पहले मैंने वहां जाकर उनका टीवी बंद किया फिर उनसे बोला थोड़ी देर आराम से लेट जाओ और लंबी लंबी सांसे लो । वे मेरा कहना मान कर आराम से लेट गए और बोले टीवी तो चला दे। खबरें मिलती रहेंगी । मैंने कहा ठीक है अभी चला देता हूं । मैंने केबल पर एक फिल्मी गानों का चैनल लगा दिया। पर शिवराम सिंह जी को वह कहां अच्छा लगता। उन्हें तो समाचार सुनने की पड़ी थी। तभी वह जोर से बोले न्यूज़ लगा, न्यूज़ । बहुत हो गए गाने बजाने। 

मैंने देखा कि उनका ऑक्सीजन लेवल और नब्ज सामान्य की ओर बढ़ रही थी। तो मैं हंस पड़ा और बोला अंकल जी ! गाना सुनो, देखो और मस्त रहो।

मुझे केवल न्यूज़ सुननी है न्यूज। मुझे देश दुनिया की खबर रखनी है। यह कहकर उन्होंने रिमोट मुझसे छीना और न्यूज़ लगाकर बिस्तर पर लेट गए। न्यूज़ चलती रही और मैं उनके पास करीब 2 घंटे बैठा रहा। अचानक से उन्हें नींद आ गई तो मैंने केबल की तार को बीच से काट दिया ताकि उन्हें लगे कि केवल नहीं आ रहा है। जब वे उठे तो मैंने कहा केवल चला गया है। केबल वाले ने कहा है कि लॉकडाउन के कारण बच्चे नहीं हैं इसलिए 2 दिन बाद सही होगा। 

तब तक केवल ठीक नहीं होता आप आराम करो और दिखाओ कि ऑक्सीजन लेवल और पल्स रेट क्या है? 

अब ऑक्सीजन लेवल 99 तथा पल्स रेट 72 दिखाई दे रही थी । मैंने उनसे कहा भगवान का शुक्र है अब आप ठीक हो। पर टीवी मत देखना। 

आज 2 दिन हो गए उन्होंने टीवी नहीं देखा क्योंकि केबल नहीं आ रहा। उन्होंने केबल वाले को फोन लगाया और बोला भाई 2 दिन से तुम्हारा केवल नहीं आ रहा है उसे ठीक करके क्यों नहीं जाते। 

केबल वाला बोला, ''केबल तो आ रहा है। कहीं कुछ गड़बड़ है । अभी लड़के को भेजता हूंं।" लड़के ने आकर देखा तो उसने पाया कि केबल बीच से कटी हुई है। उन्हें अंकल जी को बता दिया कि आपका केवल बीच में से कटा हुआ है। बस फिर क्या था वे सारी बात समझ गए उन्हें बहुत गुस्सा आया उसी गुस्से में उन्होंने फोन उठाया और मुझे गालियां देनी शुरू कर दी, "बदतमीज कहीं का, मेरा केबल ही काट गया। मेरा दिमाग 2 दिन से खराब था। बाहर की खबरें सुनने के लिए नहीं मिल रही थी।" 

अब मैंने उनके घर जाना ही उचित समझा। मैं फोन सुनते सुनते उनके घर जा पहुंचा। मैं बोला, "कल जब हॉस्पिटल जाते तो अच्छा लगता। आप बीमार नहीं हो हो सकता है कि हॉस्पिटल जाते और बीमारी घर ले आते फिर कौन तुम्हें बचाता।" एक बार को तो मुझे बहुत बुरा लगा मैं फिर से बोल उठा, "चलो नालायकी से ही सही, पर अंकल जी मैंने आपकी जान तो बचा दी। अब आप नॉर्मल हो।" कहते कहते मैंने गाने वाला चैनल लगा दिया। 
उस पर जो गाना चल रहा था उसे सुनकर अंकल जी के चेहरे पर हंसी आ गई। 
'मेरी भैंस के डंडा क्यों मारा?
तेरे बाप का वह क्या करती थी 
वो खेत में चारा चरती थी।
मेरी भैंस के डंडा........'
कल जो डर उनके चेहरे पर बैठा हुआ था आज वह गायब हो चुका था तो मैंने भी उनके साथ ही ठहाका लगाया और बोला, "अंकल जी! न्यूज़ लगाते हैं।"

उनकी आंखों में आंसू आ गए उन्होंने मुझे गले से लगा लिया। "अंकल जी कुछ दिनों के लिए आप न्यूज़ मत देखना। आप की देखभाल करने वाला यहां कोई है भी तो नहीं।" अब शिवराम सिंह समझ चुके थे कि मैंने केबल काट कर उनकी जान बचाई है। उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दिया।

"तू है ना।" कह कर वे फिर से हंस पड़े।

लेखक
ॐ जितेंद्र सिंह तोमर
11/5/7/4/2021

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