11. स्त्रियो का अंतर सौंदर्य
*स्त्रियो का अंतर सौंदर्य*
[बहुत समय पहले बुजुर्गों के बीच बैठे हुए एक बात सुनने का मिली थी। आज लॉकडाउन में याद आई तो वह डायरी खोज कर, मैं वह विचार आपके सामने रखने का प्रयास कर रहा हूं। इसमें एक स्त्री की मन के सौंदर्य का बहुत ही सुंदर वर्णन है। वैसे तो मैंने हर प्रकार से स्त्री सम्मान का प्रयास किया है। फिर भी अगर गलती हो गई होगी तो माफी चाहूंगा। ]
आज दिल्ली में रहते 25 साल से भी अधिक का समय बीत गया। मैं लॉक डॉउन में बच्चों के लिए दूध देने के लिए जैसे ही दूध की डेरी पर पहुंचा तो डेयरी वाले ने मुझसे दूध के साथ साथ उसके आन्य उत्पाद जैसी दही, छाछ, मक्खन वह घी आदि की रिक्वायरमेंट पूछी। तभी वहां खड़ी एक सुंदर सी बच्ची के किरिया कलाप को देख कर अचानक मेरे दिमाग में बहुत पहले की घटना याद आ गई । जब मैं बहुत छोटा था । बुजुर्गों के साथ चौपाल पर बैठा हुआ था। इसी समय यह बातें प्रारंभ हुई थी। वास्तव में यह बुजुर्ग कोई और नहीं हमारे राय जी थे जो हमारे कुली अर्थात वंशावली तैयार करते थे। यह उनका ही लेखा जोखा है, आइए उनकी बातों को मैं आपके सामने रखने का प्रयास करता हूं।
दूध की डेयरी अर्थात दूध की दुकान पर एक ही स्थान पर दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी आदि सब एक साथ एक स्थान पर ही मिल जाता है
राम जी के अनुसार दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी
की तरह ही स्त्रियो के जीवन की विभिन्न ये अवस्थाएं आती हैं।
हम सब बातें बक्की उनके मुंह की तरफ देखते ही रह गए । तभी वे बोले चलो समझने का प्रयास करते हैं।
सबसे पहले लेते हैं दूध।
दूध, अर्थात विवाह पूर्व का कुमारिका जीवन, शुध्द, निर्मल, शुभ्र, सुंदर। दूध याने मायका, दूध याने माता पिता का माता पिता से रिश्ता।
इस दूध में स्वार्थ रूपी पानी की मिलावट नहीं हो सकती। इसलिए उसे संपूर्ण जगत सुंदर और निर्मल दिखता है।
दूसरे नंबर आती है दही की बारी।
दूध के अच्छी तरह से उबल जाने के उपरांत और उसके ठंडे और गुनगुने रहने के उपरांत ही दूध से दही बनने की बारी आती है।
उसी प्रकार यौवन आने के बाद, विवाह संस्कार में कन्यादान के उपरांत कुमारिका बेटी वधू और बाद में एक पूर्ण स्त्री बन जाती है।
अर्थात वह दूध ही दही में बदल जाता है।
दही याने जमना अर्थात एक ही स्थान पर
जम जाना। विवाह के बाद कुमारिका से स्त्री बनी हुई बेटी। अनेक वर्षों तक इसी दही के जामन की भूमिका में ही रहती आयी है। अनेक बार दूध की तरह को उबालने के लिए आग पर चढ़ाया जाता है। चमचे से से घुमाया जाता है। बार-बार अंगुली डाल डाल कर उसे जांचा-परखा जाता है।
पति कैसा भी मिले, कितनी ही मारपीट करें, कितना ही जुआ, शराब आदि का व्यसन करें,
कितनी ही पर स्त्रियो से संबंध रखे।
इसके बाबजूद भी स्त्री ससुराल में दही की तरह जमी रहती है।
क्यो ?
क्योंकि पति उसके लिए परमेश्वर है इसलिए।
जी नहीं, क्योंकि वह अपने विवाह संबंध को दही की तरह जम कर जमाये रखती है। तभी एक परिवार, परिवार बना रहता है अन्यथा वह फटे दूध की तरह बिखर जाता है। जो किसी मतलब का नहीं होता।
तीसरा नंबर आता है छाछ का
विवाह के समय जो स्त्रियां दही बन जाती है
वे विवाह के उपरांत ससुराल में छाछ बन जाती है
छाछ बनाना आसान नहीं
डिस्चार्ज बनाने के लिए, दही में पानी डाल कर मथनी से मथना पड़ता है
आगे पीछे, दाये बाये, चारों दिशाओं में लुढ़कना पड़ता है।
ज्ध जहां दूध में एक गुण हे जो वहीं दोगुना जाते हैं जैसे छाछ वह ये बारिश आज में अनेक गुण जाते हो। अतः छाछ बहुगुणी होती है।
ताने मारने वाली सासू मां हो।। (वात प्रकृति)
भूनभूनाने, दनदनाने वाला पति हो(पित्त प्रकृति)
सीधे साधे तथा घर के वरिष्ठ ससुर जी (कफ प्रकृति) ननद और देवर आनंद देने वाले पदार्थों की तरह होते हैं।
इन्हें संभालने का और सहन करने का आयुर्वेद का उत्तम उपाय है। छाछ ही है, जिसका उपयोग अलग-अलग को भी की लोगों में अलग-अलग प्रकार से किया जाता है। समस्त विसंगतियों का एक ही उपाय है, स्त्री का छाछ बन जाना।
छाछ, याने बहू का ससुराल से रिश्ता नाता
ससुराल में स्त्री को छाछ की तरह बहुगुणी होना पड़ता है। ससुराल में कभी वह बहू होती तो कभी भाभी, कभी ननद, कभी देवरानी तो कभी जेठानी कभी कुछ और कभी कुछ।
जहां दूध में पानी मिलाने से वह बेस्वाद हो जाता है, वहीं छाछ में पानी मिलाने से उसकी गुणवत्ता बढ जाती है। इसी कारण आयुर्वेद छाछ को अनेक नाम दे गए।
छाछ के कई प्रकार होते हैं। बिना जल के केवल दही को मथ कर तैयार किया गया 'धोल', एक-चौथाई जल मिलाकर तैयार किया गया 'तक्र' तथा आधा जल मिलाकर तैयार किया 'उदश्वित्' कहलाता है। स्नेह (घी) निकाल कर बिना जल मिलाए मथा गया दही 'मथित' कहलाता है।
मक्खन
कयी वर्षों तक ससुराल में मथनी की तरह फिरकने के बाद
छाछ बन कर सबकी पूर्ति कर दी
अब छाछ ने ही पूछना शुरू कर दिया
मेरा फलित क्या
मेरा भविष्य क्या
तब
मुलायम
रेशमी
कुछ हद तक पारदर्शी
सम्मोहक
मनभावन
आकर्षक
मक्खन
अपने आप
उभर कर सामने आ जाता हे
सबको प्रिय जो होता है
मक्खन याने पति से रिश्ता
छाछ
मथते मथते
बर्तन के चारों तरफ
इस रिश्ते के
सम्वेदनशील
कण कण
एकत्रित होने लगते हैं
जिन पर उसका ध्यान नहीं जाता है
मक्खन
फिर से दूध बनना चाहता है
ये पागलपन नहीं तो और क्या है
घी
मक्खन
ये स्त्री की अंतिम अवस्था नहीं है
मक्खन भी अपना रूप बदल कर घी बन जाता है
पति के रिश्ते, रिश्तेदारों के प्रति स्नेह बंधन बन कर
घर के लिए
नाती पोतियों के लिए
दादी नानी
बन कर
घी
बन जाती है
चावल पर
या हलुवे पर
घी डालना हो
इस प्रकार
घर के सभी कामों में
दादी नानी रूपी
घी बन कर
रहती है
पूजा घर के दीपक में
घी डालकर
पूरे घर के लिए
प्रार्थना
करते करते
एक दिन
ये घी भी
समाप्त हो जाता है
यही स्त्रियो महिलाओं को उच्चतम अवस्था है
इसीलिए
स्त्री है तभी श्री है
मैं तो हमेशा से ही कहता रहा हूं
स्त्री है तभी तक ईश्वर भी है
ऐसीा ये स्त्रियो के जीवन कीा संपूर्ण यात्रा है
न कभी रूकने वाली
सतत दौड़ भाग करने वाली
कभी न घबराने वाली
सदैव परिवार की चिंता करने वाली
जुझारू प्रवृत्ति की
इन स्त्रियो को
उनकी जीवन यात्रा को
कोटि-कोटि नमन ।
https://sharechat.com/post/4OOlrDQ?d=n&~campaign=WAShareExpcontrol&referrer=whatsappShare
❗ स्त्री के बगैर ❗
पुरुष की जिंदगी ☞ बेकार है.
उसे हमेशा एक स्त्री का साथ चाहिए.
फिर वो चाहे मन्दिर हो या संसार.
मंदिर में कृष्ण के साथ ☞ 'राधा'
राम के साथ ☞ 'सीता'
शंकर के साथ ☞ 'पार्वती'
सुबह से रात तक मनुष्य को
अपने हर काम में
☞ एक 'स्त्री की' ☜
आवश्यकता होती ही है.
पढ़ते समय ☞ 'विद्या'
फिर ☞ 'लक्ष्मी'
और अंत में ☞ 'शाँति'
दिन की शुरुआत ☞ 'ऊषा' के साथ,
दिन की समाप्ति ☞ 'संध्या' से होती है.
किन्तु काम तो ☞ 'अन्नपूर्णा' के
लिये ही करना है.
रात यानी ☞ 'निशा' के समय भी
'निंदिया रानी'
सोने के बाद ☞ 'सपना'
मंत्रोच्चार के लिये ☞ 'गायत्री'
ग्रंथ पढ़ें तो ☞ 'गीता'
👇 मंदिर में भगवान के सामने 👇
'वंदना' ◆ 'पूजा' ◆ 'अर्चना'
'आरती' ◆ 'आराधना'
और ये सब भी ...
केवल ☞ 'श्रद्धा' के साथ.
अंधेरा हो तो ☞ 'ज्योति'
अकेलापन लग रहा हो तो
☞ 'प्रेमवती' एवं 'स्नेहा' ☜
लड़ाई लड़ने जायें तो
☞ 'जया' और 'विजया' ☜
बुढ़ापे में ☞ 'करुणा' वो भी
☞ 'ममता' के साथ.
गुस्सा आ जाए, तब ☞ 'क्षमा'
इसीलिए तो धन्य है ☞ स्त्री जाति
जिसके बगैर ~ पुरुष अधूरा #👌 अच्छी सोच👍
💐💐🙏
Comments
Post a Comment