20. भगवान पर भरोसा
भगवान पर भरोसा
[दो शब्द – यह कहानी मेरी नहीं है। मेरे एक दोस्त ने बहुत पहले मुझे व्हाट्सएप पर भेजी थी। शायद उसकी भी न हो, यह कहानी किसकी है, मुझे नहीं मालूम परंतु जिसकी भी है मैं इस कहानी का श्रेय उसी व्यक्ति को देता हूं । जिसने इसे लिखा है।
मुझे मालूम है कि ऐसी घटनाएं बहुत कम घटित होती हैै। ]
भगवान पर भरोसा
एक पुरानी सी इमारत में था एक वैद्यजी का मकान था। मकान के पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के घर के लिए आवश्यक सामान को एक चिठ्ठी में लिख कर वैद्य जी को पकड़ा देती थी।
वैद्यजी गद्दी पर बैठकर,श पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते, "हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। दुनियादारी मुझे चलानी नहीं आती, बस तू ही संभाल लेना।"
वैद्यजी का एक नियम था कि वे कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे। वह अपना खाता बंद कर देते थे। उसके बाद वह किसी भी रोगी से दवा के पैसे नहीं लेते थे। चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।
एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए।
एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे नज़र आने लगे किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपने आप पर नियंत्रण पा लिया।
दाल-चावल-आटा आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, "बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।" उसने सामान लिखा गया था।
वैद्य जी कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, ''यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''
एक-दो रोगी आए तो वैद्यजी उन्हें दवाई दे ही रहे थे कि इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी।
वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कारों वाले अक्सर उनके पास आते रहते थे। दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर आकर बैठ गए।
वैद्यजी ने कहा, "अगर आपको दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो उसकी बीमारी की स्थिति का वर्णनकरें।"
वह साहब कहने लगे "वैद्यजी ! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है, लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ।"
वैद्य जी हैरत से उसकी बातें सुन रहे थे। कृष्णलाल बोले ही जा रहा था। "आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, शायद आपको सारी बातें याद आ जाएं। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था बल्कि ईश्वर मुझे आप के पास लेकर आया था।"
कृष्ण लाल ने अपनी बात को इस प्रकार आगे बढ़ाया।
"हुआ यह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने यहीं पर हमारी कार पंक्चर हो गई। संयोग गाड़ी में स्टाफ नींद नहीं थी इसलिए ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि जब तक का ठीक नहीं हो जाती आप उधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ।
अंधा क्या चाहे दो आँखें और मैं कुर्सी पर जाकर बैठ गया। ड्राइवर को कुछ ज्यादा ही देर लगी।
एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है।"
आप उससे बार बार कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं।
मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें।
तब मैंने आपसे कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।"
आपने कहा था, "मेरे भाई ! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में होता है। जो कुछ होना होता है, वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है।........"
मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था।
मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था।
लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था, "बस ठीक है।"
मैंने जोर डाला, तो आपने कहा, "आज का खाता बंद हो गया है।"
मैंने कहा, "मुझे आपकी बात समझ नहीं आई।" इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें दे दी है और उससे अधिक पैसे वे नहीं ले सकते।
मैं कुछ हैरान हुआ और लज्जित भी कि मेरे विचार कितने बेकार थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है।
मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला, "वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरा करेगी।"
आपकी कृपा से आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।
वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ यहीं (भारत में) रहती है। हमारी बहन की उसी बेटी अर्थात हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था, हर सामान मैं दोहरा खरीदने के लिए मजबूर हो जाता था।
जानते हो क्योंकि मेरी आँखों के सामने आपकी छोटी-सी बिटिया भी आ जाती थी और मैं दोहरा खरीदने के लिए मजबूर हो जाता था।
मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिखता है। वह भी मेरी भान्जी ही है।
मुझे लगता था कि ईश्वर ने मुझे, एक नहीं, दो दो भान्जियों के विवाह में भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है। मना मत करना।
वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, '' कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।"
कहते हुए वैद्यजी ने वह चिट्ठी कृष्णलाल जी को पकड़ा दी।
वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था। ''यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''*
काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो।"
वह कुछ देर कर फिर से बोले, "आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा परमात्मा ने, आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता। वाह भगवान वाह! तू महान है! तू दयावान है। आज मैं पूरी तरह से हैरान हूँ कि तू कैसे अपने रंग दिखाता है।"
वैद्यजी ने आगे कहा, "जब से होश सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।

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